Reality Of Islam And Mughals औरंगजेब को महान व जिंदा पीर कहने वाले दूर रहें।
॥ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ Dharma & Rashtra Seva; Vedic awakening; Hindu State will be a nation where everyone will strive to advance spiritually. ===Seeking a website IT volunteer who can make this site beautiful and attractive, get more traffic on this site, is a staunch Hindu, loves Bhaarat, and desires to make Bhaarat a Vedic State. Please contact Suresh Vyas at skanda987@gmial.com
From: Vivek Arya < >
नारी जाति के विषय में वेदों को लेकर अनेक भ्रांतियां हैं। भारतीय समाज में वेदों पर यह दोषारोपण किया जाता हैं की वेदों के कारण नारी जाति को सती प्रथा, बाल विवाह, देवदासी प्रथा, अशिक्षा, समाज में नीचा स्थान, विधवा का अभिशाप, नवजात कन्या की हत्या आदि अत्याचार हुए हैं। किसी ने यह प्रचलित कर दिया गया था की जो नारी वेद मंत्र को सुन ले तो उसके कानों में गर्म सीसा डाल देना चाहिए और जो वेदमंत्र को बोल दे तो उसकी जिव्हा को अलग कर देना चाहिए।
1. वेदों में नारी के कर्तव्यों एवं अधिकारों के विषय में क्या कहा गया हैं?
समाधान- वेदों में नारी की स्थिति अत्यंत गौरवास्पद वर्णित हुई हैं। वेद की नारी देवी हैं, विदुषी हैं, प्रकाश से परिपूर्ण हैं, वीरांगना हैं, वीरों की जननी हैं, आदर्श माता हैं, कर्तव्यनिष्ट धर्मपत्नी हैं, सद्गृहणी हैं, सम्राज्ञी हैं, संतान की प्रथम शिक्षिका हैं, अध्यापिका बनकर कन्याओं को सदाचार और ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देनेवाली हैं, उपदेशिका बनकर सबको सन्मार्ग बतानेवाली हैं ,मर्यादाओं का पालन करनेवाली हैं, जग में सत्य और प्रेम का प्रकाश फैलानेवाली हैं। यदि गुण-कर्मानुसार क्षत्रिया हैं,तो धनुर्विद्या में निष्णात होकर राष्ट्र रक्षा में भाग लेती हैं। यदि वैश्य के गुण कर्म हैं उच्चकोटि कृषि, पशुपालन, व्यापार आदि में योगदान देती हैं और शिल्पविद्या की भी उन्नति करती हैं। वेदों की नारी पूज्य हैं, स्तुति योग्य हैं, रमणीय हैं, आह्वान-योग्य हैं, सुशील हैं, बहुश्रुत हैं, यशोमयी हैं।
पुरुष और नारी के संबंधों के विषय में वेदों में आलंकारिक वर्णन हैं। पुरुष धुलोक हैं तो नारी पृथ्वी हैं दोनों के सामंजस्य से हो सौर जगत बना हैं ,पुरुष साम हैं तो नारी ऋक हैं दोनों के सामंजस्य से ही सृष्टि का सामगान होता हैं,पुरुष वीणा-दंड हैं तो नारी वीणा तन्त्री हैं, दोनों के सामंजस्य से ही जीवन के संगीत की नि:सृत झंकार होती हैं, पुरुष नदी का एक तट हैं, तो नारी दूसरा तट हैं, दोनों के बीच में ही वैयविक्त और सामाजिक विकास की धारा बहती हैं। पुरुष दिन हैं, तो नारी रजनी हैं। पुरुष प्रभात हैं तो नारी उषा हैं। पुरुष मेघ हैं तो नारी विद्युत हैं। पुरुष अग्नि हैं, तो नारी ज्वाला हैं। पुरुष आदित्य हैं तो नारी प्रभा हैं। पुरुष तरु हैं, तो नारी लता हैं। पुरुष फूल हैं, तो नारी पंखुड़ी हैं। पुरुष धर्म हैं, तो नारी धीरता हैं। पुरुष सत्य हैं, तो नारी श्रद्धा हैं। पुरुष कर्म हैं, तो नारी विद्या हैं। पुरुष सत्व हैं, तो नारी सेवा हैं। पुरुष स्वाभिमान हैं, तो नारी क्षमा हैं। दोनों के सामंजस्य में ही पूर्णता हैं। विवाह इसी सामंजस्य का एक प्रतीक हैं।
वेदों में नारी के दो जन्म माने गए हैं। एक शरीरत: और एक विद्यात: । विद्यात: जन्म होने पर नारी का पदार्पण जैसे ही विवाह-वेदी पर होता हैं, वैसे ही उसका कुल,व्रत, यज्ञ आदि सब-कुछ बदल जाता हैं। उसके नाम,काम,रिश्ते-नाते सब बदल जाते हैं। उसके दो कुल हो जाते हैं। एक पितृकुल और एक पति कुल। वह दोनों कुलों को जोड़ने वाली कड़ी हैं। पितृकुल में नारी कन्या,पुत्री, भगिनी, ननद, बुआ हैं तो पतिकुल में नारी वधु, गृहिणी, पत्नी, भार्या, जाया, दारा, जननी, अम्बा, माता, श्वश्रु हैं। वेदों में इन सभी दायित्वों के अनुरूप नारी के कर्तव्यों का विस्तार से वर्णन हैं। वैदिक मन्त्रों में नारी को उसके कर्तव्यों का पालन करने के प्रेरणा देते हुए महान बनने के प्रेरणा हैं।
2. स्वामी दयानंद के नारी जाति के उत्थान के विषय में क्या विचार हैं?
समाधान- स्वामी दयानंद नारी जाति को न केवल शिक्षित करने के पक्षधर थे अपितु नारी जाति को गृह स्वामिनी से लेकर प्राचीनकाल की महान विदुषी गार्गी और मैत्रयी के समान विद्वान बनाना चाहते थे। स्वामी जी के अनुसार नारी ताड़न की नहीं अपितु सम्मान करने योग्य हैं।
सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी दयानंद क्रान्तिकारी उद्घोष करते हुए लिखते हैं
“जन्म से पांचवे वर्ष तक के बालकों को माता तथा छ: से आठवें वर्ष तक पिता शिक्षा करे और नौवें के प्रारंभ में द्विज अपने संतानों का उपनयन करके जहाँ पूर्ण विद्वान तथा पूर्ण विदुषी स्त्री, शिक्षा और विद्या-दान करने वालो हो वहां लड़के तथा लडकियों को भेज दे।[सत्यार्थ प्रकाश]”
“लड़कों को लड़कों की तथा लड़कियों को लकड़ियों की शाला में भेज देवें, लड़के तथा लड़कियों की पाठशालाएँ एक दुसरे से कम से कम दो कोस की दुरी पर हो।[सत्यार्थ प्रकाश]”
जो वहां अध्यापिका और अध्यापक अथवा भृत्य, अनुचर हों, वे कन्यायों की पाठशाला में सब स्त्री तथा पुरुषों की पाठशाला में सब पुरुष रहें। स्त्रियों की पाठशाला में पांच वर्ष का लड़का और पुरुषों की पाठशाला में पांच वर्ष की लड़की भी न जाने पाए।[सत्यार्थ प्रकाश]
जब तक वे ब्रहाम्चारिणी रहे, तब तक पुरुष का दर्शन, स्पर्शन, एकांत सेवन, भाषण, विषय-कथा, परस्पर क्रीरा, विषय का ध्यान और संग इन आठ प्रकार के मैथुनों से अलग रहे।[सत्यार्थ प्रकाश]
इसमें राजनियम और जाती नियम होना चाहिए कि पांचवे अथवा आठवें वर्ष से आगे अपने लड़के और लड़कियों को घर में न रख सकें, पाठशाला में अवश्य भेज देवें। जो न भेजे वह दंडनीय हो ।[सत्यार्थ प्रकाश]
स्वामी दयानंद नारी शिक्षा के महत्व को यथार्थ में समझते थे क्यूंकि माता ही शिशु की प्रथम गुरु होती हैं इसलिए नारी का शिक्षित होना अत्यंत महत्व पूर्ण होता है। स्वामी जी शिक्षा के प्रबल पक्षधर थे परन्तु सहशिक्षा के पक्षधर नहीं थे इसलिए उन्होंने लड़के लड़कियों की पाठशाला को न केवल अलग होने का सन्देश दिया हैं अपितु उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए भी यही नियम बताया था की केवल पुरुष अध्यापक लड़कों को पढ़ाये एवं स्त्री अध्यापिका लड़कियों को पढ़ाये। देखा जाये तो यह नियम समाज में होने वाले दुराचार, बलात्कार, शारीरिक शोषण, चरित्रहीनता आदि से युवक-युवतियों की रक्षा कर उन्हें राष्ट्र के लिए तैयार करने की दूरगामी सोच हैं। स्वामी जी दुराचार की भावना को मनुष्य के लिए विनाशकारी मानते थे इसीलिए उनका मानना था की अगर माता और पिता का चरित्र उज्जवल होगा तभी संतान भी सुयोग्य एवं चरित्रवान होगी। स्वामी जी के चिंतन में अशिक्षित रखने वाले माता-पिता को राजा द्वारा दण्डित करना प्रशंसनीय हैं क्यूंकि अगर देश की अगली पीढ़ी का विकास उचित प्रकार से होगा और उनकी नींव विधिवत रूप से रखी जाएगी तभी वे समाज के लिए जिम्मेदार नागरिक बनेगे। जिसका नींव में ही दोष होगा वह समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का कैसे निर्वाहन कर पायेगा।
आज से 150 वर्ष पूर्व स्वामी दयानंद के विचारों से शिक्षा चेतना का प्रचार हुआ जिसके कारण देश में हज़ारों शिक्षण संस्थाएं खुली, अनेक विद्यालय, गुरुकुल आदि प्रारम्भ हुए जिससे शिक्षा क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई। यह स्वामी दयानंद के चिंतन का परिणाम था।[1 ]
3. शंका – क्या वेद नारी जाति को शिक्षा का अधिकार देते हैं?
समाधान – स्वामी दयानंद ने “स्त्रीशूद्रो नाधियातामिति श्रुते:” – स्त्री और शूद्र न पढे यह श्रुति हैं को नकारते हुए वैदिक काल की गार्गी, सुलभा, मैत्रयी, कात्यायनी आदि सुशिक्षित स्त्रियों का वर्णन किया जो ऋषि- मुनिओं की शंकाओं का समाधान करती थी। उनका प्रयास नारी जाति को शिक्षित, स्वालम्बी, आत्मनिर्भर बनाने का था इसीलिए वे नारी को शिक्षा दिलवाने के पक्षधर थे। वेदों में नारी को शिक्षित करने के लिए अनेक मंत्र हैं जैसे-
1.ऋग्वेद 6/44/18 का भाष्य करते हुए स्वामी दयानंद लिखते हैं राजा ऐसा यत्न करे जिससे सब बालक और कन्यायें ब्रहमचर्य से विद्यायुक्त होकर समृधि को प्राप्त हो सत्य, न्याय और धर्म का निरंतर सेवन करे।
2. राजा को प्रयत्नपूर्वक अपने राज्य में सब स्त्रियों को विदुषी बनाना चाहिए – यजुर्वेद 10/7।
3. विद्वानों को यही योग्यता हैं की सब कुमार और कुमारियों को पुन्दित बनावे, जिससे सब विद्या के फल को प्राप्त होकर सुमति हों- ऋग्वेद 6/44/18।
4. जितनी कुमारी हैं वे विदुषियों से विद्या अध्ययन करे और वे कुमारी ब्रह्मचारिणी उन विदुषियों से ऐसी प्रार्थना करें की आप हम सबको विद्या और सुशिक्षा से युक्त करें -ऋग्वेद 2/41/16।
इस प्रकार यजुर्वेद 11/36,6/14,11/59 एवं ऋग्वेद 1/152/6 में भी नारी को शिक्षा का अधिकार दिया गया हैं। इतने स्पष्ट प्रमाण होने के बाद भी मध्य काल में नारी जाति को शिक्षा से वंचित रखना न केवल उनपर अत्याचार था अपितु वेदों के प्रचलन से सामान्य समाज की अनभिज्ञता का प्रदर्शन भी था।
4. क्या वेद सती प्रथा का समर्थन करते हैं?
समाधान- 1875 में स्वामी दयानंद ने पूना [2] में दिए गए अपने प्रवचन में स्पष्ट घोषणा की थी की “सती होने के लिए वेद की आज्ञा नहीं हैं” ।
वैदिक काल के इतिहास में कहीं भी सती होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता। महाभारत में माद्री के पाण्डु के मृत शरीर के साथ आत्मदाह का उल्लेख हैं जिसका सती प्रथा से कोई सम्बन्ध नहीं हैं। मध्य काल में जब अवनति का दौर चला तब नारी जाति की दुर्गति आरम्भ हुई। सती प्रथा उसी काल के देन हैं।
जहाँ तक वेदों का प्रश्न हैं सायण ने अथर्ववेद 18/3/1 में सती प्रथा दर्शाने का प्रयास किया हैं। सायण के अनुसार यहाँ पर वेद नारी को आदेश दे रहे हैं की “यह नारी अनादीशिष्टाचारसिद्ध, स्मृति पुराण आदि में प्रसिद्द सहमरणरूप धर्म का परी पालन करती हुई पतिलोक को अर्थात जिस लोक में पति गया हैं उस स्वर्गलोक को वरण करना चाहती हुई ,तुझ मृत के पास सहमरण के लिए पहुँच रही हैं। अगले जन्म में तू इसे पुत्र- पौत्रादि प्रजा और धन प्रदान करना। अगले मंत्र में सायण कहते हैं अगले जन्म में भी उसे वही पति मिलेगा। इसलिए ऐसा कहा गया हैं।
यहाँ पर सायण के अर्थों को देखकर अनेक शंका उत्पन्न होती हैं। इस मंत्र का सही अर्थ इस प्रकार हैं – यह नारी पुरातन धर्म का पालन करती हुई पतिगृह को पसंद करती हुई। हे मरण धर्मा मनुष्य , तुझ मृत के समीप नीचे भूमि पर बैठी हुई हैं। उसे संतान और सम्पति यहाँ सौप। अर्थात पति की मृत्यु होने के पश्चात पत्नी का उसकी सम्पति और संतान पर अधिकार हैं।
हमारे कथन की पुष्टि अथर्ववेद 18/3/2 मंत्र में स्वयं सायण करते हुए कहते हैं “हे मृत पति की धर्मपत्नी ! तू मृत के पास से उठकर जीवलोक में आ, तू इस निष्प्राण पति के पास क्यों पड़ी हुई हैं? पाणीग्रहणकर्ता पति से तू संतान पा चुकी हैं, उसका पालन पोषण कर.’
सायण के इस अर्थ से हमें कोई शंका नहीं हैं। दोनों मन्त्रों में विरोधाभास होना हमारे पक्ष को भी सिद्ध करता हैं।
मध्यकाल के बंगाल के कुछ पंडितो ने ऋग्वेद 10/18/7 में अग्रे के स्थान पर अग्ने पढकर सती प्रथा को वैदिक सिद्ध करना चाहा था, परन्तु यह केवल असत्य कथन हैं।
इस मंत्र में वधु को अग्नि नहीं अपितु अग्रे अर्थात गृह में प्रवेश के समय आगे चलने को कहा गया हैं।
इस प्रकार से वेद के मन्त्रों के असत्य अर्थ निकाल कर सती प्रथा को वैदिक सिद्ध किया गया था। धन्य हैं आधुनिक भारत के विचारक राजा राममोहन राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद जिनके प्रयासों से सती प्रथा का प्रचलन बंद हुआ।
5. शंका- क्या नारी जाति को वेदाध्ययन करने का अधिकार नहीं हैं?
समाधान- कुछ अज्ञानी लोगों ने यह प्रचलित कर दिया हैं की नारी और शूद्रों को वेदाध्ययन का अधिकार नहीं हैं परन्तु आज तक ऐसा मानने वाले वेद मन्त्रों में एक भी मंत्र इस कथन के समर्थन में नहीं दिखा पाये हैं। इसके विपरीत वेदों में नारी को वेदाध्ययन करने का स्पष्ट सन्देश हैं।
ऋग्वेद 10/191/3 में ईश्वर सन्देश देते हुए कह रहे हैं की हे समस्त नर नारियों! तुम्हारे लिए ये मंत्र समान रूप से दिए गए हैं तथा तुम्हारा परस्पर विचार भी समान रूप से हो। मैं तुम्हें समान रूप से ग्रंथों का उपदेश करता हूँ।
अथर्ववेद 11/6/18 में स्पष्ट सन्देश हैं की ब्रह्मचर्य का पालन कर कन्या वर का ग्रहण करे। यहाँ पर ,ब्रह्मचर्य का अर्थ हैं ब्रह्म अर्थात वेद में चर अर्थात गमन, ज्ञान या प्राप्ति करना।
अथर्ववेद 14/1/64 में नववधू को सम्बोधित करते हुए उपदेश दिया गया हैं की हे वधु! तेरे आगे, पीछे,मध्य में, अंत में सर्वत्र वेद विषयक ज्ञान रहे। और वेदज्ञान को प्राप्त करके तदनुसार तुम अपना सारा जीवन बना।
इसी प्रकार से यजुर्वेद 14/2 में स्त्री को उपदेश हैं की “इमा ब्रह्मा पीपिही ” अर्थात सौभाग्य की प्राप्ति के लिए वेदमंत्रों के अमृत का बार बार अच्छी प्रकार से पान कर।
ऋग्वेद 1/1/5 में स्वामी दयानंद लिखते हैं जो कन्या 24 वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य पूर्वक अंग-उपांग सहित वेद विद्याओं को पढ़ती हैं, वे मनुष्य जाति को सुशोभित करने वाली होती हैं।
यजुर्वेद 14/14 के भाष्य में स्वामी दयानंद लिखते हैं यदि मनुष्य इस सृष्टि में ब्रह्मचर्य आदि से कुमार और कुमारियों को द्विज बनाएं तो वे शीघ्र विद्वान हो जाएं।
ऋग्वेद 1/71/21 के भाष्य में स्वामी दयानंद लिखते हैं जिस प्रकार वैश्य लोग धर्म धारण करके धनोपार्जन करते हैं, उसी प्रकार कन्याओं को चाहिए की विवाह से पहले शुभ ब्रह्मचर्य व्रत धारण करके विदुषी अध्यापिकाओं को प्राप्त करके सुशिक्षा और (वेद ) विद्या संचय करके विवाह करें।
ऋग्वेद 1/119/5 के भाष्य में स्वामी दयानंद लिखते हैं जैसे ब्रह्मचर्य करके यौवनावस्था को प्राप्त हुई विदुषी कुमारी कन्या अपने पति को पा निरंतर उसकी सेवा करती हैं और जैसे ब्रह्मचर्य को किये हुए जवान पुरुष अपनी प्रीति के अनुकूल चाही हुई स्त्री को पाकर आनंदित होता हैं, वैसा ही सभा और सेनापति सदा होवें।
ऐसा ही आशय ऋग्वेद 5/32/11 में मिलता हैं।
महाभारत आदिपर्व 131/10 में स्पष्ट रूप से लिखा हैं की जिनका धन समान हो और वेदशास्त्रविषयक ज्ञान समान हो, उनमें मित्रता और विवाह आदि हो सकते हैं ,बलवान और सर्वथा निर्बल व्यक्तियों में नहीं।
वेदों में स्त्री को विदुषी बनने का और अपने गुण, कर्म और स्वभाव के अनुसार गुणशाली वर चुनने का अधिकार दिया गया हैं। इस प्रकार से वेदों में अनेक मंत्र स्त्रियों को वेदाध्ययन की प्रेरणा देते हैं।
वेदों में अनेक सूक्त हैं जैसे ऋग्वेद 10 /134, 10/40, 8/91, 10/95,10/107, 10/109, 10/154, 10/159,5/28 आदि जिनकी ऋषिकाएँ गोधा,घोषा, विश्ववारा, अपाला, उपनिषत्, निषत्, रोमशा आदि हुई हैं। यह ऋषिकाएँ न केवल वेदों को पढ़ती थी, उनके रहस्य को समझती थी अपितु उनका प्रचार भी करती थी [3 ]।
इन ऋषिकाओं [4] की सूची बृहद देवता 24/84-86अध्याय में मिलती हैं। ऋषिकायों को ब्रह्मवादिनी भी कहा जाता था और इनका नियमपूर्वक उपनयन, वेदाध्ययन, वेदाध्यापन, गायत्री मंत्र का उपदेश प्रदान आदि होता था।
6. शंका- क्या नारी जाति को यज्ञ में भाग लेने का अधिकार नहीं हैं?
समाधान- वैदिक काल में नारी जाति को यज्ञ में भाग लेने का पूर्ण अधिकार था जिसे मध्य काल में वर्जित कर दिया गया था। कुछ ग्रंथों में इस बात को प्रचलित कर दिया गया की नारी का स्थान यज्ञवेदी से बाहर है [शतपथ ब्रह्मण 27/4] अथवा कन्या और युवती अग्निहोत्र की होता नहीं बन सकती । वेद परम प्रमाण हैं इसलिए इस शंका का समाधान भी वेद भली प्रकार से करते हैं। वेद नारी जाति को यज्ञ में भाग लेने का पूर्ण अधिकार देते हैं।
ऋग्वेद 8/31/5-8 में कहा गया हैं की जो पति-पत्नी समान मनवाले होकर यज्ञ करते हैं उन्हें अन्न, पुष्प, हिरण्य आदि की कमी नहीं रहती हैं।
ऋग्वेद 10/85/47 में कहा गया हैं की विवाह यज्ञ में वर वधु उच्चारण करते हुए एक दुसरे का ह्रदय-स्पर्श करते हैं।
ऋग्वेद 1/72/5 में कहा गया हैं की विद्वान लोग पत्नी सहित यज्ञ में बैठते हैं और नमस्करणीय (नमन करने योग्य जैसे ईश्वर, विद्वान आदि) को नमस्कार करते हैं।
इस प्रकार यजुर्वेद 3/44,3/45,3/47,3/60,11/5,15/50 और अथर्ववेद 3/28/6, 3/30/6, 14/2/18,14/2/23,14/2/24 में भी यज्ञ में नारी के भाग लेने के स्पष्ट प्रमाण हैं।
7. शंका – क्या नारी को यज्ञ में ब्रह्मा बनने का अधिकार हैं?
समाधान- यज्ञ में ब्रह्मा का पद सबसे ऊँचा होता है। ऐतरेय ब्राह्मण 5/33 के अनुसार ज्ञान, कर्म और उपासना तीनों विद्याओं के प्रतिपादक वेदों के पूर्ण ज्ञान से ही मनुष्य ब्रह्मा बन सकता हैं। शतपथ ब्राह्मण 11/5/7 में इसी तथ्य का समर्थन किया गया हैं। गोपथ ब्राह्मण 1/3 के अनुसार जो सबसे अधिक परमेश्वर और
वेदों का ज्ञाता हो उसे ब्रह्मा बनाना चाहिए।
ऋग्वेद 8/33 में नारी को कहा गया है कि “स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ” अर्थात इस प्रकार से उचित सभ्यता के नियमों का पालन करती हुई नारी निश्चित रूप से ब्रह्मा के पद को पाने योग्य बन सकती है।
जब वेदों में स्पष्ट रूप से नारी जाति को यज्ञ में ब्रह्मा बनने का आदेश हैं तो अन्य ग्रंथों से इसके विरोध में अगर कोई प्रमाण प्रस्तुत किया जाता है तो वह अमान्य है
क्यूंकि मनुस्मृति 2/13में लिखा है कि धर्म को जानने की इच्छा रखने वालों के लिए वेद ही परम प्रमाण है।
8. शंका- क्या वेदों में दहेज देने की प्रथा का विधान हैं जिसके कारण नारी जाति पर अनेक अत्याचार हो रहे है?
समाधान- वेदों में पुत्री को दहेज से अलंकृत करने का सन्देश दिया गया है परन्तु यहाँ पर दहेज का वास्तिक अर्थ उससे भिन्न है जैसा प्राय: प्रचलित है।
अथर्ववेद 14/1/8 के मंत्र में पिता द्वारा कन्या को स्तुति वृति वाला बना देना ही पुत्री के लिए सच्चा दहेज़ है। यहाँ पर स्तुति वृति का भाव है पुत्री सदा दूसरों के गुणों की प्रशंसा करने वाली हो, किसी के भी अवगुणों की और ध्यान नहीं देने वाली हो अर्थात परनिंदा नहीं करने वाली हो एवं उसके गहने उसकी भद्रता , उसका शिष्टाचार और उसकी प्रभु के गुणगान करने की वृति हो।
यहाँ पर पुत्री को गुणों से सुशोभित करना एक पिता के लिए सच्चा दहेज देने के समान हैं। कालांतर में कुछ लोभी लोगो ने दहेज का अर्थ धन समझ लिया जिसके कारण उनका लालच बढ़ता गया एवं उसका परिणाम नारी जाति पर अत्याचार के रूप में आया हैं जो निश्चित रूप से सभ्य समाज के माथे पर कलंक के समान हैं।
9. शंका- क्या वेदों में केवल पुत्र की कामना करी गई हैं?
समाधान- आज समाज में कन्या भ्रूण हत्या का महापाप प्रचलित हो गया है। जिसका मुख्य कारण नारी जाति का समाज में उचित सम्मान न होना, धन आदि के रूप में दहेज जैसी कुरीतियों का होना ,समाज में बलात्कार जैसी घटनाओं का बढ़ना ,चरित्र दोष आदि हैं जिससे नारी जाति की रक्षा कर पाना कठिन हो गया हैं। ऐसे में समाज में पुत्र की कामना अधिक बलवती हो उठी हैं एवं पुत्री को बोझ समझा जाने लगा हैं। कुछ लोगो ने यह कुतर्क देना प्रारम्भ कर दिया है कि वेद नारी को हीन दृष्टी से देखते है और वेदों में सर्वत्र पुत्र ही मांगे गई है। सत्य यह है कि वेदों में पत्नी को उषा के सामान प्रकाशवती [ऋग्वेद 4/14/3, ऋग्वेद 7/78/3, ऋग्वेद 1/124/3, ऋग्वेद 1/48/8], वीरांगना [अथर्ववेद14/1/47, यजुर्वेद 5/10, यजुर्वेद 10/26, यजुर्वेद 13/16, यजुर्वेद 13/18], वीरप्रसवा [ऋग्वेद 10/47/2-5, ऋग्वेद 4/2/5, ऋग्वेद 7/56/24, ऋग्वेद 9/98/1], विद्या अलंकृता [यजुर्वेद 20/84, यजुर्वेद 20/85, ऋग्वेद 1/164/49, ऋग्वेद 6/49/7], स्नेहमयी माँ [ऋग्वेद 10/17/10, ऋग्वेद 6/61/7, यजुर्वेद 6/17, यजुर्वेद 6/31, अथर्ववेद 3/13/7], पतिंवरा (पति का वरण करने वाली) [ऋग्वेद 5/32/11, यजुर्वेद 37/10, यजुर्वेद 37/19, यजुर्वेद 8/7, अथर्ववेद 2/36/5] , अन्नपूर्णा [ अथर्ववेद 7/60/5, अथर्ववेद 3/24/4, अथर्ववेद 3/12/2, यजुर्वेद 8/42, ऋग्वेद 1/92/8], सदगृहणी और सम्राज्ञी [अथर्ववेद14/1/17, अथर्ववेद 14/1/42, यजुर्वेद 11/63, यजुर्वेद 11/64, यजुर्वेद 15/63] आदि से संबोधित किया गया हैं जो निश्चित रूप से नारी जाति को उचित सम्मान प्रदान करते हैं।
उदहारण के लिए वेदों में नारी जाति की यशगाथा के लिए कुछ वेद मंत्र प्रस्तुत कर रहे हैं।
1. मेरे पुत्र शत्रु हन्ता हों और पुत्री भी तेजस्वनी हो।[ऋग्वेद 10/159/3]
2. यज्ञ करने वाले पति-पत्नी और कुमारियों वाले होते है।[ऋग्वेद 8/31/8]
3. प्रति प्रहर हमारी रक्षा करने वाला पूषा परमेश्वर हमें कन्यायों का भागी बनायें अर्थात कन्या प्रदान करे।[ऋग्वेद 9/67/10]
4. हमारे राष्ट्र में विजयशील सभ्य वीर युवक पैदा हो, वहां साथ ही बुद्धिमती नारियों के उत्पन्न होने की भी प्रार्थना हैं।[यजुर्वेद 22/22 ]
5. जैसा यश कन्या में होता हैं वैसा यश मुझे प्राप्त हो ।[अथर्ववेद 10/3/20]
इस प्रकार से नारी जाति की वेदों में महिमामंडन हैं नाकि उन्हें अवांछनीय मान कर केवल पुत्रों की कामना की गई हैं।
10. शंका- क्या वेदों में बहु-विवाह आदि का विधान हैं?
समाधान- वेदों के विषय में एक भ्रम यह भी फैलाया गया हैं की वेदों में बहुविवाह की अनुमति दी गयी है [5 ]।
वेदों में स्पष्ट रूप से एक ही पत्नी होने का विधान बताया गया हैं।
ऋग्वेद 10/85 को विवाह सूक्त के नाम से जाना चाहता हैं। इस सूक्त के मंत्र ४२ में कहा गया हैं तुम दोनों इस संसार व गृहस्थ आश्रम में सुख पूर्वक निवास करो। तुम्हारा कभी परस्पर वियोग न हो और सदा प्रसन्नतापूर्वक अपने घर में रहो। यहाँ पर हर मंत्र में “तुम दोनों” अर्थात पति और पत्नी आया हैं। अगर बहुपत्नी का सन्देश वेदों में होता तो “तुम सब” आता।
ऋग्वेद 10/85/47 में हम दोनों (वर-वधु) सब विद्वानों के सम्मुख घोषणा करते हैं की हम दोनों के ह्रदय जल के समान शांत और परस्पर मिले हुए रहेंगे।
अथर्ववेद 7/35/4 में पति पत्नी के मुख से कहलाया गया हैं की तुम मुझे अपने ह्रदय में बैठा लो , हम दोनों का मन एक ही हो जाये।
अथर्ववेद 7/38/4 पत्नी कहती हैं तुम केवल मेरे बनकर रहो और अन्य स्त्रियों का कभी कीर्तन व व्यर्थ प्रशंसा आदि भी न करो।
ऋग्वेद 10/101/11 में बहु विवाह की निंदा करते हुए वेद कहते हैं जिस प्रकार रथ का घोड़ा दोनों धुराओं के मध्य में दबा हुआ चलता हैं वैसे ही एक समय में दो स्त्रियाँ करनेवाला पति दबा हुआ होता हैं अर्थात परतंत्र हो जाता हैं.इसलिए एक समय दो व अधिक पत्नियाँ करना उचित नहीं हैं।
इस प्रकार वेदों में बहुविवाह के विरुद्ध स्पष्ट उपदेश हैं। वेदों की अलंकारिक भाषा को समझने में गलती करने से इस प्रकार की भ्रान्ति होती हैं।
11. शंका- क्या वेद बाल विवाह का समर्थन करते हैं?
समाधान- हमारे देश पर विशेषकर मुस्लिम आक्रमण के पश्चात बाल विवाह की कुरीति को समाज ने अपना लिया जिससे न केवल ब्रहमचर्य आश्रम लुप्त हो गया बल्कि शरीर की सही ढंग से विकास न होने के कारण एवं छोटी उम्र में माता पिता बन जाने से संतान भी कमजोर पैदा होती गयी जिससे हिन्दू समाज दुर्बल से दुर्बल होता गया।
अथर्ववेद के ब्रहमचर्य सूक्त के 11/5/18 मंत्र में कहा गया हैं की ब्रहमचर्य (सादगी, संयम और तपस्या) का जीवन बिता कर कन्या युवा पति को प्राप्त करती हैं। इस मंत्र में नारी को युवा पति से ही विवाह करने का प्रावधान बताया गया हैं जिससे बाल विवाह करने की मनाही स्पष्ट सिद्ध होती हैं।
इसी प्रकार से अथर्ववेद 2/30/5 में भी परस्पर युवक और युवती एक दुसरे को प्राप्त करके कह रहे हैं की मैं पतिकामा अर्थात पति की कामना वाली और यह तू जनीकाम अर्थात पत्नी की कामना वाला दोनों मिल गए हैं। युवा अवस्था में ही पति-पत्नी की कामना की इच्छा हो सकती हैं छोटे छोटे बालक और बालिकाओं में यह इच्छा नहीं होती हैं। इन प्रमाणों से यही सिद्ध होता हैं की वेद बालविवाह का समर्थन नहीं करते।
12. शंका- वेदों में नारी की महिमा का संक्षेप में वर्णन बताये?
समाधान- संसार की किसी भी धर्म पुस्तक में नारी जाति की महिमा [6] का इतना सुंदर गुण गान नहीं मिलता जितना वेदों में मिलता हैं। कुछ उद्हारण देकर हम अपने कथन को सिद्ध करेगे।
1. उषा के समान प्रकाशवती – हे राष्ट्र की पूजा योग्य नारी! तुम परिवार और राष्ट्र में सत्यम, शिवम्, सुंदरम की अरुण कान्तियों को छिटकती हुई आओ , अपने विस्मयकारी सद्गुणगणों के द्वारा अविद्या ग्रस्त जनों को प्रबोध प्रदान करो। जन-जन को सुख देने के लिए अपने जगमग करते हुए रथ पर बैठ कर आओ।[ऋग्वेद 4/14/3]
2. वीरांगना- हे नारी! तू स्वयं को पहचान ।तू शेरनी हैं, तू शत्रु रूप मृगों का मर्दन करनेवाली हैं, देवजनों के हितार्थ अपने अन्दर सामर्थ्य उत्पन्न कर। हे नारी ! तू अविद्या आदि दोषों पर शेरनी की तरह टूटने वाली हैं, तू दिव्य गुणों के प्रचारार्थ स्वयं को शुद्ध कर! हे नारी ! तू दुष्कर्म एवं दुर्व्यसनों को शेरनी के समान विश्वंस्त करनेवाली हैं, धार्मिक जनों के हितार्थ स्वयं को दिव्य गुणों से अलंकृत कर।[यजुर्वेद 5/10]
3. वीर प्रसवा- राष्ट्र को नारी कैसी संतान दे- हमारे राष्ट्र को ऐसी अद्भुत एवं वर्षक संतान प्राप्त हो, जो उत्कृष्ट कोटि के हथियारों को चलाने में कुशल हो, उत्तम प्रकार से अपनी तथा दूसरों की रक्षा करने में प्रवीण हो, सम्यक नेतृत्व करने वाली हो, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूप चार पुरुषार्थ- समुद्रों का अवगाहन करनेवाली हो, विविध संपदाओं की धारक हो, अतिशय क्रियाशील हो, प्रशंशनीय हो, बहुतों से वरणीय हो, आपदाओं की निवारक हो।[ ऋग्वेद 10/47/3]
4. विद्या अलंकृता-विदुषी नारी अपने विद्या-बलों से हमारे जीवनों को पवित्र करती रहे। वह कर्मनिष्ठ बनकर अपने कर्मों से हमारे व्यवहारों को पवित्र करती रहे। अपने श्रेष्ठ ज्ञान एवं कर्मों के द्वारा संतानों एवं शिष्यों में सद्गुणों और सत्कर्मों को बसाने वाली वह देवी गृह आश्रम-यज्ञ एवं ज्ञान-यज्ञ को सुचारू रूप से संचालित करती रहे। [यजुर्वेद 20/84]
5. स्नेहमयी माँ- हे प्रेमरसमयी माँ! तुम हमारे लिए मंगल कारिणी बनो, तुम हमारे लिए शांति बरसाने वाली बनो, तुम हमारे लिए उत्कृष्ट सुख देने वाली बनो। हम तुम्हारी कृपा-दृष्टि से कभी वंचित न हो।[अथर्वेद 7/68/2]
6. अन्नपूर्णा- इस गृह आश्रम में पुष्टि प्राप्त हो, इस गृह आश्रम में रस प्राप्त हो. इस गिरः आश्रम में हे देवी! तू दूध-घी आदि सहस्त्रों पोषक पदार्थों का दान कर। हे यम- नियमों का पालन करने वाली गृहणी! जिन गाय आदि पशु से पोषक पदार्थ प्राप्त होते हैं उनका तू पोषण कर।[अथर्ववेद 3/28/4]
अंत में मनुस्मृति के प्रचलित श्लोक से इस विषय को विराम देना चाहेंगे।संसार में नारी जाति को सम्मान देने के लिए इससे सुन्दर शब्द शायद हो कहीं मिलेंगे।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: । यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।।
जिस कुल में नारियो कि पूजा, अर्थात सत्कार होता हैं, उस कुल में दिव्यगुण , दिव्य भोग और उत्तम संतान होते हैं और जिस कुल में स्त्रियो कि पूजा नहीं होती, वहां जानो उनकी सब क्रिया निष्फल हैं।
[1] Census Report of 1901 on Female literacy rate in united provinces was 15/10,000 for common population while for members of Arya Samaj it was 674/10,000.
[2] पूना प्रवचन उपदेश मंजरी 12 वां प्रवचन
[3] आधुनिक भारतीय विद्वानों में से स्वामी दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश में, पंडित सत्यव्रत जी सामश्रमी ने ऐतरेयालोचन में, श्री रमेशचन्द्र दत्त ने History of civilization of India में, श्री भगवत शरण उपाध्याय Women in Rigveda में, डॉ ऐतलेकर The education in ancient India में, पंडित शिवदत्त शर्मा महामहोपाध्याय आर्य विद्या सुधाकर में, श्री काणे महोदय History of Dharam Shastras में, श्री महादेव जी शास्त्री The Vedic Law of Marriage में मानते हैं की प्राचीन काल में कन्याओं का उपनयन होता था और नारी न केवल वेदाध्ययन करती थी अपितु ऋषिकाएँ भी बनती थी।
[4] डॉ मिज़ Dharma and Society में लिखते हैं In Rigvedic India there were women Rishis, the wives participated in the ceremonies with their husbands. They were highly honored and respected and could even perform the function of a priest at a sacrifice.
[5] Vedic Age page 390
[6] वैदिक नारी रचियता रामनाथ वेदालंकार
From: Suresh Vyas < >
I request all readers of this comment to share this comment with others, especially with the KKKs, so that they too know the truth about who is an Arya or Aryan. According to the greatest epic Mahaabhaarat, which is 5000+ years old, and describes a great war that was fought in India, Arya or Aryan is not a race at all. Arya or Aryan is a person who understands that the Veda is given to mankind by God in the beginning of creation; the Veda provides complete spiritual science providing several processes living per which any human can advance spiritually. As one advances spiritually, one lives more and more sin-free. Therefore, when one strives to live per a Vedic process to advance spiritually, then he/she is an Arya or Aryan.