सबका साथ व विश्वास का सूत्र “समान नागरिक संहिता”

From: Vinod Kumar Gupta < >

सबका साथ व विश्वास का सूत्र “समान नागरिक संहिता”

🔆देश के संविधान की मूल आत्मा व सर्वोच्च न्यायालय के आग्रहों का सम्मान करते हुए शासन को “समान नागरिक संहिता” पर गम्भीरता से चिंतन करना चाहिये। अनेकता में एकता का राष्ट्रव्यापी विचार बिना एक समान कानून के अधूरा है। सबका साथ,सबका विकास व सबका विश्वास पाने के का  सशक्त सूत्र है “समान नागरिक संहिता”। इसके लिए शीर्ष नेतृत्व को अपनी दृढ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति के साथ आगे बढ़ना होगा। राष्ट्रहित में आज केंद्रीय शासन  जिस कार्यकुशलता व निर्णायक क्षमता से समस्याओं का समाधान करने के लिये संघर्षरत है उससे सभी देशवासी उत्साहित है। ऐसे सकारात्मक वातावरण में शासन को सबका साथ, विकास व विश्वास पाने के लिए सबको एक समान कानून के अंतर्गत लाकर इस बहुप्रतीक्षित कार्य को मूर्त रुप देना चाहिये।
🔆सामान्यत: यह विचार क्यों नहीं किया जाता कि जब सर्वोच्च  न्यायालय ने केंद्र सरकार को सन् 1985, 1995, 2003 और  2019 में बार बार समाज में घृणा, वैमनस्य व असमानता दूर करने के लिए समान कानून को लागू कराने आवश्यकता जतायी है तो फिर अभी तक कोई सार्थक पहल क्यों नहीं हो पायी? वर्षों पूर्व किये गए एक सर्वेक्षण के अनुसार  84 % देशवासी इस कानून के समर्थन में थे। जबकि इस सर्वे में अधिकांश मुस्लिम माहिलायें व पुरुषों की भी सहभागिता थी।अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ ने भी सन्  2000 में समान नागरिक व्यवस्था अपनाने के लिए भारत सरकार से विशेष आग्रह किया था।
🔆“समान नागरिक संहिता” (Uniform Civil Code ) का प्रावधान धीरे-धीरे लागू करने की अनुशंसा हमारे संविधान के अनुच्छेद 44 में आरम्भ से ही है। परन्तु मुस्लिम वोट बैंक के लालच व इमामों के दबाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरु जी ने अनेक विवादों के बाद भी “समान नागरिक संहिता”  के प्रावधान को संविधान के मौलिक अधिकारों की सूची से हटा कर “नीति निर्देशक तत्वों” में डलवा दिया। परिणामस्वरूप यह विषय न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो गया और वह अब केवल सरकार को इस क़ानून को बनाने के लिए परामर्श दे सकती हैं, बाध्य नहीं कर सकती।
🔆अनेक विवादों के बाद भी सुधार के लिए हिन्दुओं के पर्सनल लॉ होने के उपरांत भी उसके स्थान पर 1956 में उन पर  हिन्दू कोड बिल ( Hindu Code Bill ) थोपा गया था। परंतु अन्य धर्मावलंबियों के पर्सनल लॉ को यथावत् बनाये रखने की क्या बाध्यता थी जबकि उनमें भी आवश्यक सुधारों की आवश्यकता जब भी थी और अब भी बनी हुई है। निसन्देह मुस्लिम पर्सनल लाँ के यथावत बने रहने से मुस्लिम कट्टरता के दु:साहस ने देश में घृणा के वातावरण को ही उकसाया है।
🔆विश्व के किसी भी देश में धर्म के आधार पर अलग अलग कानून नहीं होते, सभी नागरिकों के लिए एक सामान व्यवस्था व कानून होते हैं। केवल भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ अल्पसंख्यक समुदायों के लिए पर्सनल लॉ बने हुए हैं। जबकि हमारा संविधान अनुच्छेद 15 के अनुसार धर्म, लिंग, क्षेत्र व भाषा आदि के आधार पर समाज में भेदभाव नहीं करता और एक समान व्यवस्था सुनिश्चित करता है। लेकिन संविधान के अनुच्छेद 26 से 31 में कुछ  ऐसे व्यवधान हैं जिससे हिंदुओं के सांस्कृतिक,शैक्षिक व धार्मिक संस्थानों एवं ट्रस्टों को विवाद की स्थिति में शासन द्वारा अधिग्रहण किया जाता रहा है। जबकि अल्पसंख्यकों के संस्थानों आदि में विवाद होने पर शासन कोई हस्तक्षेप नहीं करता, यह भेदभाव क्यों?
🔆इसके अतिरिक्त एक और विचित्र व्यवस्था संविधान में की गई कि अल्पसंख्यकों को अपनी धार्मिक शिक्षाओं को पढ़ने व पढ़ाने की पूर्ण स्वतंत्रता हैं,जबकि बहुसंख्यक हिन्दुओं के लिए यह धारणा मान ही ली थी कि वह तो अपनी धर्म शिक्षाओं को पढ़ाते ही रहेंगे। अतः हिन्दू धर्म शिक्षाओं को पढ़ाने का प्रावधान संविधान में लिखित रूप में नही किये जाने का दुष्परिणाम यह हुआ कि आज तक हिन्दुओं को उनके धर्म शास्त्रों की शिक्षा की कोई अधिकारिक व्यवस्था नहीं होने से वे अपने धर्म मार्ग से विमुख होते जा रहे हैं। आज तक हिन्दू समाज इस अन्याय के प्रति आक्रोशित तो हैं परन्तु संवैधानिक विवशता से बंधा  हुआ हैं।
🔆हमारे संविधान में अल्पसंख्यकों को एक ओर तो उनको अपने धार्मिक कानूनों (पर्सनल लॉ) के अनुसार पालन करने की छूट है और दूसरी ओर संवैधानिक अधिकार भी बहुसंख्यकों के बराबर ही मिले हुए है। फिर भी विभिन्न राष्ट्रीय योजनाओं और नीतियां जैसे परिवार नियोजन, पल्स पोलियो, राष्ट्रगान, वन्देमातरम् आदि पर इस सम्प्रदाय विशेष का आक्रामक व्यवहार बना ही रहता है। इनके पर्सनल लॉ के अनुसार  उत्तराधिकार, विवाह, तलाक़ आदि के सम्बंध में मुस्लिम महिलाओं के उत्पीड़न को रोका नहीं जा सकता।वर्तमान शासन ने मुस्लिम महिलाओं पर एक साथ “तीन तलाक़” कहने की वर्षो से चली आ रही अमानवीय प्रथा को समाप्त करके एक सराहनीय कार्य अवश्य किया। परंतु बहुविवाह का चलन अभी भी बना हुआ है जिससे मुस्लिम महिलाओं की पीड़ा को समझना कठिन है। साथ ही प्रजनन द्वारा बच्चे जनने की कोई सीमा न होने से इन महिलाओं को विभिन्न गंभीर बीमारियों को झेलना पड़ता है।
🔆अधिकाँश कट्टरपंथी व उनके सहयोगी कहते हैं कि सरकार को हमारे धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। परंतु सरकार का अपने नागरिकों को ऐसे अमानवीय अत्याचारों से बचाने का संवैधानिक दायित्व तो है। आज के वैज्ञानिक युग में जब आधुनिक समाज चारों ओर अपनी अपनी प्रतिभाओं के अनुसार निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर है तो उस परिस्थिति में हलाला, मुताह व बहुविवाह जैसी अमानवीय कुरीतियों को प्रतिबंधित करके मुस्लिम महिलाओं को व्याभिचार की गंदगी से बचा कर उनके साथ न्याय तो होना ही चाहिये।
🔆“समान नागरिक संहिता” का विरोध करने वाले कट्टरपंथी मुल्लाओं में इन मज़हबी अमानवीय कुरीतियों के प्रति कोई आक्रोश नहीं, क्यों ? बल्कि कट्टरपंथी मुल्लाओं ने  “समान नागरिक संहिता” से मुस्लिम समाज में एक भय बना रखा है मानो कि भविष्य में उनके शवों को भी दफनाने की प्रथा के स्थान पर कहीं जलाने की व्यवस्था न हो जाय ? इस प्रकार के अज्ञानता से भरे रुढिवादी समाज को “अपना विकास, सबका साथ और सबका विश्वास” तो चाहिए परंतु उसको ठोस आधार देने वाली “समान नागरिक संहिता” स्वीकार नहीं,  क्यों ?
🔆यह कहाँ तक उचित है कि देश में सुधारात्मक नीतियों का विरोध केवल इसलिए किया जाय कि कट्टरपंथी मुल्लाओं की आक्रमकता बनी रहे और अमानवीय अत्याचार होते रहे ? जबकि मुसलमानों को अनेक लाभकारी योजनाओं से लाभान्वित किया जाता है। फिर भी वे अपनी दकियानूसी, रूढ़िवादी व धार्मिक मान्यताओं से कोई समझौता तो दूर उसमें उन्हें कोई दखल भी स्वीकार नहीं।
🔆यहाँ एक और विचारणीय बिंदु यह भी है कि मुस्लिम समुदाय ने अपराधों पर अपने मज़हबी कानून “शरिया” के स्थान पर  “भारतीय दंड संहिता” को ही अपनाना उचित समझा है। क्योंकि शरिया में अपराधों की सजा का प्रावधान अत्यधिक भयानक व कष्टकारी है। फिर भी “समान नागरिक संहिता” का विरोध करना इनका जिहादी जनून है।
जबकि “समान नागरिक संहिता”  में सभी धर्म, सम्प्रदाय व जाति के देशवासियों के लिए एक समान व्यवस्था होने से परस्पर वैमनस्य अवश्य कम  होगा। परंतु विडम्बना यह है कि एक समान कानून की माँग को साम्प्रदायिकता का चोला पहना कर हिन्दू कानूनों को अल्पसंख्यकों पर थोपने के रूप में प्रस्तुत किये जाने का कुप्रचार किया जाता रहा है।
🔆यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि सन् 1947 में हुए धर्माधारित विभाजन के 73 वर्ष बाद भी देश में अल्पसंख्यकवाद को प्रोत्साहित करने की परंपरा यथावत बनी हुई है। इस कारण मौलिक व संवैधानिक अधिकारों के होते हुए भी पर्सनल लॉ की कुछ मान्यताएं कई बार विषम परिस्थितियाँ खड़ी कर देती है, तभी तो उच्चतम न्यायालय  “समान नागरिक संहिता” बनाने के लिए सरकार से बार-बार आग्रह कर रहा है। “राष्ट्र सर्वोपरि”  की मान्यता मानने वाले भी यह चाहते हैं कि एक समान व्यवस्था से राष्ट्र स्वस्थ व समृद्ध होगा और भविष्य में अनेक संभावित समस्याओं से बचा जा सकेगा। साथ ही भविष्य में असंतुलित जनसंख्या अनुपात के संकट से भी बचेंगे और राष्ट्र का पंथनिरपेक्ष स्वरूप व लोकतांन्त्रिक व्यवस्था भी सुरक्षित रहेगी।
🔆आज देश में स्वस्थ राष्ट्रवाद की पताका लहरा रही है। ऐसे में देश की संप्रभुता, एकता व अखंडता को सुदृढ़ व अटूट रखने के लिए  “समान नागरिक संहिता” द्वारा सबका विश्वास पाना भी सरल है। कुछ वर्षों से यह विषय अत्यधिक चर्चा में है परन्तु  राष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक वातावरण नहीं बन पा रहा जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि अभी शासन असमंजस में है। जबकि यह मानना अतिश्योक्ति नहीं कि एक समान कानून की व्यवस्था से मुख्य धारा की राजनीति व राष्ट्रनीति सशक्त होगी। नि:सन्देह “समान नागरिक संहिता” का प्रावधान मोदी जी के मन्त्र “सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास” पाने का सूत्र बनेगा।

✍🏻विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
गाज़ियाबाद  (उ.प्र.)
भारत

सच्चाई की अभिव्यक्ति पर प्रहार क्यों ?

From Vinod Kumar Gupta < >

सच्चाई की अभिव्यक्ति पर प्रहार क्यों     13.9.20

▶️सुदर्शन न्यूज चैनल के प्रधान श्री सुरेश चौहान के. जी की साहसिक पत्रकारिता का अद्भूत पराक्रम वर्षों से देशभक्तों को प्रेरित कर रहा हैं। जबकि देश विरोधी शक्तियां इनकी सच्ची अभिव्यक्ति पर प्रहार करने से कभी भी नहीं चूकती। इनके “बिंदास बोल” कार्यक्रम में वर्षों से राष्ट्र हित के विषयों को प्रमुखता से उठाया जाता आ रहा हैं। जिससे राष्ट्रवादी समाज में व्याप्त अनेक भ्रांतियाँ दूर होने से भारत व भारतीयता का पराभव आज चारों ओर सकारात्मक वातावरण बनाने में सफल हो रहा हैं।

▶️भारतीय प्रशासकीय व प्रदेशीय सेवाओं में प्रवेश हेतू होने वाली परीक्षाओं में पिछ्ले कुछ वर्षों से उर्दू भाषा के कारण अयोग्य मुस्लिम युवकों की घुसपैठ बढ गयी है। इससे देश में जिहादियों को अपने भारत विरोधी षडयंत्रों में सफल होने की सम्भावना अधिक हो सकती है। इसलिये इससे सम्बंधित कुछ विशेष तथ्यों का प्रसारण किये जाने वाले कार्यक्रम के विरुद्ध भारत विरोधी टोलियों ने सक्रिय होकर सुदर्शन न्यूज चैनल के विशिष्ट कार्यक्रम “बिंदास बोल” के इस परिशिष्ट को रुकवाने का दुसाहस किया और श्री सुरेश चौहान जी के विरुद्ध वैधानिक कार्यवाही की अनुचित मांग भी की है।

▶️यह चिंता का विषय है कि  एक विशेष षडयंत्र के अन्तर्गत  भारतीय प्रशासकीय सेवाओं में जब से इस्लामिक शिक्षाओं का विषय सम्मलित किया गया है और उर्दू को माध्यम बनाने की छुट दिये जाने से मुस्लिम समाज के मदरसे से शिक्षित युवाओं का चयन बढ रहा है। जबकि यह सर्वविदित ही है कि मदरसा शिक्षा प्रणाली के कारण ही कट्टरपन बढने से इस्लामिक आतंकवाद बढता है। जिसके कारण पाकिस्तान सहित कुछ मुस्लिम देशों में भी ऐसे मदरसे प्रतिबंधित कर दिये गए हैं,जहां मुसलमानों को आतंकी बना कर जिहाद के लिये तैयार किया जाता था। ऐसे षडयंत्र द्वारा प्रवेश पाये हुए प्रशासकीय अधिकारियों से जिनको किसी विशेष लक्ष्य के लिये जीने व मरने की शिक्षा मिली हो तो वह क्यों कर मानवतावादी व राष्ट्रवादी समाज के साथ न्याय कर पायेंगे?

▶️प्राय: भारत विरोधी, आतंकवादी, अलगाववादी, नक्सलवादी,वामपन्थी, अवार्ड वापसी व टुकडे-टुकडे गैंग आदि सब  राष्ट्रवादी समाज को सतत् जागृत करने वाले श्री सुरेश जी के विरुद्ध बार-बार सक्रिय हो कर माँ-भारती के कष्टों को बढाने के षड्यंत्र रचते रहते है।ये लोग देश में साम्प्रदायिकता के लिये केवल हिन्दुओं को ही दोषी ठहराते हैं और स्वयं को लिबरल व सेकूलर के बुर्के में छिपा लेते हैं। जबकि इन सबको राष्ट्रवादी समाज के देशहित कोई भी विचार स्वीकार नहीं होते।

▶️राष्ट्रहित के कार्यों के विरुद्ध तुरंत प्रतिकार करने वाली इन टोलियों को लिबरल सहिष्णु माना जाने में धोखा स्पष्ट होते हुए भी ये अपने विचारों को फैलाने में सफल हो जाते है। “प्रस्तावित साम्प्रदायिक लक्षित हिंसा रोकथाम विधेयक (2011)” जिसमें बहुसंख्यक हिन्दुओं को अपराधी मान कर जेलों में डाले जाने का प्रावधान किया गया था, पर आज तक इन लिबरलों ने कोई आपत्ति नहीं की, बल्कि 2016 में जे.एन.यू. में “भारत की बर्बादी तक जंग करेंगे जंग करेंगे” के राष्ट्रद्रोही नारे लगाने वालों के समर्थन ये लोबी आज तक खड़ी है।

▶️हमें आज यह भी स्मरण होना चाहिये कि सन् 2004 में लश्करे-तोईबा की फिदाईन ईशरतजहां व उसके तीन अन्य आतंकी साथियों ने मोदी जी को मछली न.5  कोड देकर उन पर आत्मघाती हमले का षडयंत्र रचा था। सौभाग्य से गुजरात प्रशासन की सुझबूझ से इन चारों आतंकियों को ढेर करने में पुलिस सफल रही थी। ऐसे षड्यंत्रकारी व आतंकवादी अभी भी देश में सक्रिय हैं। क्योंकि ये राष्ट्रवाद विरोधी समूह आतंकी ईशरतजहां को ही अति विशिष्ट श्रेणी में रखकर गुजरात सरकार व उस समय के मुख्य मन्त्री मोदी जी को ही फेक एन्काउंटर के नाम पर घेरने में लगभग 15 वर्षों से दु:साहस करता रहा है।

▶️संभवत: पिछ्ले वर्षों में भी हमारे जनप्रिय प्रधानमन्त्री मोदी जी की हत्या का षड्यन्त्र रचने वाले नक्सलवादियों व भारत विरोधियों के षडयंत्र भी अभी उजागर होने शेष है।यहां यह सब लिखने का मुख्य ध्येय यह है कि भारत विरोधी अभी भी सक्रिय हैं। ऐसा वर्ग या समूह या लॉबी अनेक प्रलोभनों के कारण चीन व पाकिस्तान में बैठे अपने विदेशी आकाओं को प्रसन्न करने के लिये देश में कुछ भी कर सकती हैं। ऐसे हिन्दू विरोधियों को अपने भारत विरोधी आकाओं के चांदी के टुकड़ों के लिये अपनी आत्मा को मारने में भी कोई आत्मग्लानि नहीं होती।

▶️हमको यह ध्यान नहीं होता कि मन मस्तिष्क पर जो गलत धारणायें शिक्षा व मीडिया के माध्यम से थोप दी जाती है, उन्हें मिटाना सरल नहीं होता। इसलिये न जाने कितना कुछ असत्य छिपा कर गहरे अंधेरे में हमें रखा गया। जिससे हमारी सोच और समझ को निरंतर गलत दिशा मिलने से हम धर्म और राष्ट्र के प्रति कभी गौरवान्वित न हो सके। यहां एक उदाहरण देने से समझ सकते हैं कि जैसे बार-बार हमको सिखाया जाता हैं कि “सभी धर्म एक समान है एवं सभी धर्म प्रेम व शान्ति की शिक्षा देते है।”  क्या आज तक के भारतीय व वैश्विक इतिहास में ऐसा कुछ ढूँढने पर भी मिल सकता है? संभवतः कदापि नहीं। सभी के ग्रंथ, साहित्य, दर्शन एवं देवता व महापुरुष आदि सभी अलग-अलग हैं। भौगौलिक भिन्नता के कारण सभ्यता, संस्कृति व रीति रिवाजों में भी कोई समानता नहीं होती। सभी धर्मों का उद्गम स्थल व समय आदि भी भिन्न भिन्न होने से उनमें असमानता का होना स्वाभाविक ही हैं।

▶️अत: सब धर्म एक समान कहने व समझने वाले केवल और केवल अज्ञानवश अन्धकार में ही जीते हैं। जबकि विश्व की विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों में परस्पर वैमनस्य व घृणा के कारण संघर्ष को रोकना असम्भव हो रहा है। फिर भी सभी धर्म एक समान के भ्रमित करने वाले असत्य का बार-बार प्रचार किया जाना विशेषतौर पर हम भारत भक्तों को दिग्भ्रमित किये हुए है। जिस कारण हम अपनी एतिहासिक तेजस्विता व ओजस्विता को भूल चूके हैं। हमें अपने इतिहास के स्वर्णिम युग का कोई ज्ञान ही नहीं। मध्यकालीन मुगल साम्राज्य व ब्रिटिश शासन के परतंत्रता काल का महिमा मण्डन करके हमारे मन-मस्तिष्क पर ऐसी छाप थोप दी गयी हैं, जिससे आज स्वतंत्रता के 73 वर्ष बाद भी मुक्त होना एक जटिल समस्या बनी हुई हैं।

▶️ऐसी विपरीत स्थितियों में सुदर्शन न्यूज द्वारा प्रस्तुत सत्य का ज्ञान देने वाले “बिंदास बोल” कार्यक्रम की जितनी सराहना व प्रशंसा की जाय उतनी कम है। श्री सुरेश जी एक ऐसे कर्मयोगी है जो धर्म व संस्कृति की रक्षा हेतू कटिबद्ध है। इनके साहसी व निडर व्यक्तित्व का ही परिणाम हैं कि आज इनके द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रमों से भी देश में व्याप्त अनेक जिहादी समस्याओं और भ्रांतियों से धीरे-धीरे पर्दा उठ रहा हैं। इतना ही नहीं इनके प्रयासों के कारण आज युवाओं में देश व धर्म के प्रति अनुराग व समर्पण का भाव जाग रहा हैं। दिग्भ्रमित युवा समाज अब सेकुलरवाद व लिबरल लॉबी के भारत विरोधी रूप को समझ कर माँ भारती की रक्षा के लिये सतर्क हो रहा हैं।

▶️ऐसे अनेक सत्य के ज्ञान से जब हम सबकी भ्रांतियाँ दूर होगी तो हम भारत विरोधी समस्याओं की जड़ों तक प्रहार करके उनका समाधान करने में सक्षम होंगे। यही हमारा राष्ट्रीय धर्म और दायित्व हैं। हमको यह स्पष्ट होना चाहिये कि हम “सत्यमेव जयते” के उपासक हैं और सच्चाई की अभिव्यक्ति पर प्रहार करने वाले ही पराजित होंगे। इसी अभियान के लिये समर्पित अनेक देशविरोधी षडयंत्रों को उजागर करने वाले कार्यकर्मों के प्रसारण द्वारा देशवासियों को सत्य से अवगत कराने के अथक प्रयासों पर दृढता से डटे रहने वाले धर्मयोद्धा श्री सुरेश जी को बार-बार साधुवाद।

✍🏻विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
गाजियाबाद (उ.प्र.)
भारत

Bollywood contempt of Hindu Dharma

From: Savarfkar Vinayan < >

Bollywood contempt of Hindu Dharma

The millennium 2000 brought a paradigm shift in Bollywood productions of music and film that began to undermine the Hindu Dharma in a subliminal way, and recent academic studies, eg., the Indian Institute of Management Ahmedabad, have shown that the youth are not only influenced by Bollywood films but they believe them to be an authentic representation of culture and society.
These messages are predominantly anti-Hindu:
  • Hindu priests, rituals, gods are mocked in films
  • Casteism where high caste is set against the low caste
  • Hindu surnames are given to characters with low morals while Muslim surnames given to honest and pious characters – we believe this to be a growing trend over the last two decades of the Khan’s era – to the point now that it has become anti-national.
  • Other Muslim stars like Nassurdin Shah and the Lyricist Javed Akhtar – who we believe uses Islamic Taqyia to masquerade as an atheist against non-Muslims – have shown themselves to be anti-CAA, a law to protect the minorities of Hindus Sikhs Christians and Buddhists from the neighbouring Islamic countries where they are persecuted. None of the Muslim stars including the three Khans came out to defend the abrogation of the article 370 which was discriminatory to the Kashmiri Pandits, women and Dalits. Mahesh Bhatt who apparently converted to Islam has been seen inciting Muslims against the nation on YouTube. Its apt to note here that the Congress leader Kapil Sibal used similar words in the debate on CAA in parliament about fearless Muslims, no doubt inciting a community using his parliamentary privilege. Hindus should note also that none of these people came out in favor of Ram Mandir – we give them all the love and praise, but they cannot return the favor.
  • A journalist Vivek Agnihotri, observes that Christian girls are shown to be of lacking morals and that Homosexuals and Sikhs are shown to be a joke
  • Villains always wear the Hindu Tilak on their forehead
In music we hardly see any new songs that can be classified as ‘evergreen’.
Aamir Khan has even taken to the TV screen to show fault lines among Hindus yet never among Muslims in his SatyamaveJayate shows, not to speak of his anti-Hindu big screen productions as PK and the Hindu terrorists in Baazi with our god names of Raghu-Ram, Shiva, and Krishna.
Salman Khan in Big Boss last year tried to destroy the reputation of our main Hindu Bhajan singer Shri Anup Jalota. Govinda the actor explained on YouTube how he and his group destroy newcomers’ careers, after the Sushant Singh Rajput’s (SSR) death, which has wide opened this hornet’s nest.
Kangana Renaut a successful actor, after the SSR death, took on the ‘Bollywood mafia’, in her words, of drugs and nepotism where the second generations of the past great Bollywood directors and producers whom she respects, no longer care for the arts but only their control and power to the point if and when newcomers begin to rise they create schemes to drive them to mental illness and suicide.
Karan Johar the second generation of the great Yash Johar family said in an interview here at the London School of Economics in 2015 that people can leave Bollywood if they have a problem with us…” This arrogant attitude stifles the arts development as it blocks newcomers to rise above the glass ceiling which they cannot surpass.
Kangana has shown how the nexus of Bollywood, media and politicians works and now we saw its proof, when ShivSena’s second generation leader with his power over the municipal authority razed her house today which then the High Court had to intervene to issue an order to stop further damage.
The effects on society is resulting in our Hindu Sadhus being killed during the last few months while the police watch over their beatings by youths as in Palghar Maharashtra and indeed in Tamil Nadu a Christian police officer beat a Sadhu so badly he soon after died.
Bollywood has a moral duty to spread goodness and the high ideals of truth and dharma in society. Sadly, the veterans of Bollywood have chosen to remain silent in the current upheaval started by Sushant Singh Rajput’s death. But the central Government ought to look at helping the industry to establish self-regulatory mechanisms to avoid stifling the art and artists development, by removing financial and other bottlenecks for them – they could establish a Quango funded by the taxes to promote free arts and artists. India has the resources now but lacks some institutions – Government agencies – for checks and balances and promote its culture and art.
We are grateful to Kangana Renaut for exposing all of the above and from Hindu Council UK representing the British Hindus and their temples and cultural organisations we support her implicitly in her endeavors to bring Truth and Dharma to her industry. The paradigm shift we noticed around the start of the millennium when Sonia Gandhi a committed Catholic came to power and started imprisoning our Sadhus and even a Shakracharya and lathi-charging Baba Ramdev in Delhi but now we cannot take the killings of Sadhus lying down, it is an attack on our Dharma and the British Hindus – from India, Nepal, Africa, Caribbean, Srilanka and other nations – will be with you all the way.
Anil Bhanot OBE
Director Hindu Council UK
9 September, 2020

Resist Move to Further Raise Marriageable Age for Girls

From: Madhu Kishwar < >

On the occasion of Independence Day this year PM Narendra Modi announced that a task force had been set up to raise the “age of marriage” for girls.
In this article Sankrant Sanu challenges this move by offering cogent reasons why the move is ill-advised.

Ill- Advised Move to Further Raise Marriageable Age of Girls

Affinities between Vedic and Baltic Cultures | Dr. Gintaras Songaila |

From: Rajput < >

Affinities between Vedic and Baltic Cultures | Dr. Gintaras Songaila |

Please see below an interesting article on Lithuanian published a few years ago.

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Ever wanted to travel back in time? Talk to a Lithuanian!

August 19, 2014 5:38 pm

“Anyone wishing to hear how Indo-Europeans spoke should come and listen to a Lithuanian peasant.” – Antoine Meillet (1886-1936)

Now this is quite a statement to make and it might come as a bit of a surprise since Lithuania is a fairly small country, which has been on and off the world map for ages. Nevertheless, despite the numerous political and geographical changes, occupations and harsh cultural repressions, one thing remained quite constant – the Lithuanian language.

Lithuanian is indeed quite ancient. In fact, many linguists consider it to be the most archaic surviving Indo-European language. It belongs to the Baltic branch like Latvian (yes, we are not Slavs) and has close ties with Latin, Ancient Greek and Sanscrit, and is valuable while trying to reconstruct the Proto-Indo-European language.

Just have a look at these few examples:

English                       Sanskrit             Lithuanian

SON                          sunus                sūnus

SHEEP                       avis                   avis

SOLE                         padas                padas

MAN                          viras                  vyras

SMOKE                      dhumas             dūmas

FIRE                          agnis                 ugnis

GOD                          deva                 dievas

The archaic aspect of the Lithuanian language is not restricted merely to these coincidences, one might say, Lithuanian has also preserved an elaborate grammatical structure.

It is a synthetic language, meaning that the relations in a sentence are expressed by word endings (opposite to an analytic language, like English, where the unbound morphemes and word order do the main job).

Lithuanian has 7 main cases (nominative, genitive, dative, accusative, instrumental, locative, and vocative) as well as illative which is dialectal and allative (reduced to adverbs). A noun, for example, has 5 declensions (different patterns of inflection). We decline other parts of speech as well.

If I haven’t scared you enough yet, I should also mention that Lithuanian has 13 participles, whereas English has 2. Let’s take a simple verb valgyti (‘to eat’) as an example:

valgąs — ‘the one who is eating’ (present active participle)

valgęs — ‘the one who ate; has eaten; was eating’ (past active participle)

valgydavęs — ‘the one who used to eat’ (frequentative past active participle)

valgysiąs — ‘the one who will be eating’ (future active participle)

valgomas — ‘something that is being eaten’ (present passive participle)

valgytas — ‘something that has been eaten’ (past passive participle)

valgysimas — ‘something which will be eaten’ (future passive participle)

valgant — ‘while eating’ (adverbial present active participle)

valgius — ‘after having eaten’ (adverbial past active participle)

valgydavus — ‘after having eaten repeatedly’ (adverbial frequentative past active participle)

valgysiant — ‘having to eat’ (adverbial future active participle)

valgydamas — ‘eating’ (special adverbial present active participle)

valgytinas — ‘something to be eaten’ (participle of necessity)

Of course, a person who would like to learn Lithuanian could easily do without most of them, but I think if one has at least a slightest interest in linguistics, it is rather more fascinating than exhausting to see how, just by adding different morphemes to a root, a single word can contain so much different information.

However, we do make our lives easier since we do not have articles like German, neither our tense system is that difficult. Pronunciation is fairly easy as well. We have 32 letters in our alphabet which is Latin based with some extra diacritical symbol additions, and words are read the way they are written (it is nothing like French, for example, where out of an 8 letter word you pronounce 3 letters in a way you would not expect them to sound).

Still, once in a cafeteria, where I heard two foreigners speaking Lithuanian to each other, for an obvious reason I couldn’t help myself approaching them and asking…why..?!

It might be because, after all, it is….a cute language.

As Benjamin W. Dwight, in the book Modern Philology, says: “Of all European languages, the Lithuanian has the greatest number of affectionate and diminutive terms, more than the Spanish or Italian, even more than Russian, and they can be multiplied almost indefinitely by adding them to verbs and adverbs as well as adjectives and nouns. If the value of a nation in the total sum humanity were to be measured by the beauty of its language, the Lithuanian ought to have the first place among the nations of Europe.”

In a nutshell, there are various theories on the origin and development of languages, and the scholarly work in this field resembles a never-ending story. In case of the Lithuanian language, the work is quite challenging since the first Lithuanian book was published only in 1547 (we insisted on hugging trees and worshipping sun and wind, so literacy along with Christianity came quite late). The language itself has been banned and looked down upon during various times but it persisted with the help of book smugglers, secret schools and folklore. I would say that the fact that, even having endured all these struggles, Lithuanian is thought to be the most conservative living Indo-European language proves that collective memory is a hell of a thing.

 

References

Some unique features of Lithuanian

Incredible Indian-Lithuanian Relations

By Julija Televičiūtė

Graduate from Vilnius University, English Philology (BA)

Translation trainee at Lithuanian Unit