मुसलमान, राष्ट्रवाद और मुख्य धारा

From Vinod Kumar Gupta < >

मुसलमान: राष्ट्रवाद और मुख्य धारा       16.6.19

★इस्लाम के शासन में प्रायः अधिकांश मुख्य सरकारी पदों पर मुसलमान ही होते थे। हिन्दुओं की ही स्थिति अत्यधिक दयनीय होती थी। इस्लाम से छुटकारा मिला तो अंग्रेजों ने शासन किया। फिर भी हिन्दुओं की स्थिति अधिक नहीं सुधरी। बल्कि मुसलमानों की आक्रामकता व जिद्द के कारण उन्हें एक तिहाई भारत भूमि का भाग देने पर भी लगभग 3 करोड़ मुसलमान शेष भारत को इस्लामिक बनाने के लिए यहीं रुक गए, जिसके परिणामस्वरूप आज लगभग इनकी संख्या 25 करोड़ से ऊपर हो चुकी हैं।

★क्या यह पूर्णतः सिद्धान्त के विरुद्ध नहीं था? मुसलमानों को दुर्बल व उपेक्षित मान कर उन पर दया करने वालों को पुनः विचार करना होगा? सन् 1947 के विभाजन की पूर्व संध्या पर लाखों निर्दोष हिन्दुओं की हत्या के रक्तरंजित इतिहास से स्पष्ट होता है कि मुसलमान सदा सम्पन्न, सशक्त व आक्रामक रहें। क्या केवल जिहादी सोच वाला दुर्बल व असहाय समाज अपने से अधिक सामर्थ्य वालों का यों ही कत्लेआम करके लूटमार करने का दुःसाहस कर सकता है? लेकिन एक भ्रमित व उदार विचारधारा के वशीभूत हमारे नेताओं ने मुसलमानों को पिछड़ा, निर्धन व उपेक्षित आदि मान लिया। फलस्वरूप स्वतंत्रता के बाद से अभी तक भी मुसलमानों को विशेष लाभान्वित किया जाता आ रहा है। जबकि आज भी भारत में निर्धन हिन्दुओं की संख्या मुसलमानों से अधिक है तो फिर उन हिन्दुओं की विशेष सहायता क्यों नहीं की जाती? यह दोगलापन क्यों ?
★साप्ताहिक पत्रिका ‘पाञ्चजन्य’ 21.10.2012 में प्रकाशित प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ.सतीश चंद्र मित्तल के एक लेख “मजहबी, उन्मादी तथा राष्ट्र विरोधी खतरा”  के अनुसार “जमात-ए-इस्लामी” की स्थापना 26 अगस्त 1941 को लाहौर में हुई थी, जिसका उद्देश्य विश्व में “इस्लामी राज्य की स्थापना” करना था, के संस्थापक मौलाना अबुल आला मौदूदी का स्पष्ट विचार था कि “जो भी लोग अपने को नेशनलिस्ट (राष्ट्रवादी) या वतनपरस्त (देशभक्त) कहते हैं, वे बदकिस्मत लोग या तो इस्लाम की नसीहतों से कतई नावाकिफ (अनजान) हैं या दीगर मज़हबों (अन्य मत-पंथो) का अलिफ, वे, पे (क, ख, ग) भी नहीं जानते या वे बिल्कुल सिफर ( शून्य) हैं। एक मुसलमान सिर्फ एक मुसलमान ही हो सकता है, इसके अलावा (अतिरिक्त) कुछ नहीं। अगर वह कुछ होने का दावा करता है तो मैं गारंटी के साथ कह सकता हूँ कि वह पैगम्बर साहब के मुताबिक (अनुसार) मुसलमान नहीं है।”

★मौलाना मौदूदी ने राष्ट्रवाद को शैतान तथा देशभक्ति को शैतानी वसूल (बड़ी बुराई) बतलाया। उन्होंने ‘नेशनलिस्म’ को मुसलमानों के लिए एक जहालत (मूर्खता) बतलाया। इस्लाम और राष्ट्रीयता दोनों भावना तथा अपने मकसद के लिहाज (उद्देश्य की दृष्टि से) एक दूसरे के विरोधी है। जहां राष्ट्रीयता है वहां इस्लाम कभी फलीभूत नहीं हो सकता और जहां इस्लाम है वहां राष्ट्रीयता के लिए कोई जगह नहीं है। राष्ट्रीयता की तरक़्क़ी (उन्नति) के मायने है कि इस्लाम के फैलाने का रास्ता बंद हो जाये और इस्लाम के मायने (अर्थ) है कि राष्ट्रीयता की जड़ें बुनियाद (नींव) से उखाड़ दी जाय। उन्होंने पाकिस्तान की मांग का विरोध किया था और कहा था कि इस्लाम विश्व का मजहब है तथा इसे राष्ट्रीय सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता।
★परंतु पाकिस्तान बनने के बाद वे वहां चले गए और वहां इस्लामी राज्य की स्थापना में सक्रिय रहें। पर भारत में नए रूप में जमात-ए-इस्लामी-ए-हिन्द 1948 में बनाई गयी और उसके नेता मौलाना अबुल लईस नदवी को बनाया गया। इन्होंने भी रामपुर सम्मेलन में लगभग उसी भाषा का प्रयोग करते हुए कहा था कि “मुसलमानों के लिए बाजिव (उचित) है कि वे एक ऐसी पार्टी की शक्ल में उठ के खड़े हों जिसका मुल्क या मुल्की सरहद (देश की सीमाओं) से न कोई सरोकार हो न ही उसे कुछ लेना-देना हो। इस्लाम यह बर्दाश्त (सहन) नहीं कर सकता कि मुसलमान नेशनलिस्म या वतनपरस्ती (देश के प्रति निष्ठा) के लिए इस्लाम के असूल (कानून) छोड़ दें, मुसलमान को तो सिर्फ मुसलमान ही रहना है।”
★इस जमात के नेताओं ने पाकिस्तान बनने के बाद भी स्वयं को इस्लाम का सच्चा प्रतिनिधि व संदेशवाहक बताते हुआ यह भी दोहराया कि राष्ट्रवाद में सिवाय तबाही के कुछ नहीं मिलेगा। जमात में मुसलमानों को जीवन का उद्देश्य पूरी तरह से कुरान और शूरा के अनुसार चलने को बताया जाता है। ध्यान रहे कि भारत में जिहाद तथा मज़हवी उन्माद फैलाने में इस जमात के ही छात्र संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) का विशेष हाथ रहा है, जो आज अपनी इस्लामिक आतंकी गतिविधियों के कारण ही प्रतिबंधित है।
★ऊपरोक्त के अतिरिक्त अगर गहराई से अन्य मौलानाओं और मुस्लिम नेताओं के विचारों व इस्लामिक विद्याओं का अध्ययन किया जाय तो उनकी सोच भी मौलाना मौदूदी व उनके उत्तराधिकारियों आदि के विचारों की पोषक ही हैं ?
यह अत्यधिक दुर्भाग्यपूर्ण व अमानवीय है कि मजहबी वर्चस्व स्थापित करने के लिए यह जमात पंथनिरपेक्षता में विश्वास नहीं करती। जो कि सर्वथा भारतीय संविधान के प्रतिकूल है।
★इसलिये राष्ट्रीय एकता, अखंडता व प्रभुसत्ता के लिए ऐसे सभी संगठनों से सावधान रहने की आवश्यकता है जो राष्ट्रवाद व देशभक्ति में विश्वास नहीं करते और जो भारत के इस्लामीकरण में ही समस्त समस्याओं के सामाधान को ही मुख्यधारा समझ कर देश के संविधान की भी उपेक्षा करते आ रहे है।
★अतः जब यह सर्वविदित है कि विश्व में सर्वत्र मुसलमान की मुख्यधारा केवल इस्लाम है और इसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं तो फिर हम व हमारा राष्ट्रवादी नेतृत्व कब तक मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने की मृगमरीचिका से बाहर नहीं निकलेगा? उन्हें नित्य कोई न कोई प्रलोभन दिया जाता रहे और वे फिर भी भारतीय संस्कृति व राष्ट्रीय अस्मिता से अपने को दूर रखें और संविधान की भी उपेक्षा करें तो इसमें किसका दोष है?
★हमारे नीति नियन्ताओं को निष्पक्ष रूप से इस दिग्भ्रमित विचारधारा को त्यागना होगा। उन्हें यह सोचना चाहिये कि कट्टरपंथियों को अपने में सम्मलित करने और अलगाववाद को दूर करने के लिए एक समान नीतियों व योजनाओं का निर्माण कैसे हो? वैसे भी धर्म/पंथनिरपेक्ष देश में धर्मों के आधार पर योजनाएं बनाना असंवैधानिक है।
★अतः मुसलमान को दीन-हीन मानना सर्वथा अशुद्ध होगा। उनकी मज़हवी रूढ़िवादिता और कट्टरता को वस्तु मान कर उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। इसलिये मुसलमानों की मुख्यधारा स्वतः ही एक मृगमरीचिका बन गयी है।

(We the Hindus or non-Muslims have no reason to be concerned about bringing the Muslims into the Hindu mainstream. We foolishly made that that efforts for 700 years and the history tells that we suffered immensely in Bhaarat. Islam never wants to assimilate in any non-Muslim mainstream. it wants to convert the whole world to Islam.  Therefore, we need to purge out Islam from Bhaarat. We, with unity, need to press the Muslims in every way to quit Islam or quit Bhaarat. 1947 partition of Bhaarat is the product of Islam. After the partition Bhaarat is a Hindu State by default, and we need to declare it officially. For that the constitution must be made pro-Vedic. – Suresh Vyas)

~विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
गाज़ियाबाद 201001
उत्तर प्रदेश (भारत)

18 नवम्बर/इतिहास-स्मृति : अन्तिम सांस तक संघर्ष

From Praamod Agrawal < >

18 नवम्बर/इतिहास-स्मृति

अन्तिम सांस तक संघर्ष

भारतीय वीर सैनिकों के बलिदान की गाथाएं विश्व इतिहास में यत्र-तत्र स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं। चाहे वह चीन से युद्ध हो या पाकिस्तान से; हर बार भारतीय वीरों ने अद्भुत शौर्य दिखाया है। यह बात दूसरी है कि हमारे नेताओं की मूर्खता और समझौतावादी प्रवृत्ति ने रक्त से लिखे उस इतिहास को कलम की नोक से काट दिया। 18 नवम्बर 1962 को चुशूल में मेजर शैतान सिंह और उनके 114 साथियों का अप्रतिम बलिदान इसका साक्षी है।

उत्तर में भारत के प्रहरी हिमालय की पर्वत शृंखलाएं सैकड़ों से लेकर हजारों मीटर तक ऊंची हैं। मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में 13वीं कुमाऊं की ‘सी’ कम्पनी के 114 जवान शून्य से 15 डिग्री कम की हड्डियां कंपा देने वाली ठंड में 17,800 फुट ऊंचे त्रिशूल पर्वत की ओट में 3,000 गज लम्बे और 2,000 गज चौड़े रजांगला दर्रे पर डटे थे। 

वहां की कठिन स्थिति का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि चाय बनाने के लिए पानी को कई घंटे तक उबालना पड़ता था। भोजन सामग्री ठंड के कारण बिलकुल ठोस हो जाती थी। तब आज की तरह आधुनिक ठंडरोधी टैंट भी नहीं होते थे। 

उन दिनों हमारे प्रधानमंत्री नेहरू जी ‘हिन्दी-चीनी, भाई-भाई’ के नशे में डूबे थे, यद्यपि चीन की सामरिक तैयारियां और उसकी साम्राज्यवादी प्रवृत्ति देखकर सामाजिक रूप से संवेदनशील अनेक लोग उस पर शंका कर रहे थे। इनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री गुरुजी भी थे। उस समय हमारे सैनिकों के पास शस्त्र तो दूर, अच्छे कपड़े और जूते तक नहीं थे। नेहरू जी का मत था कि यदि हम शांति के पुजारी हैं, तो कोई हम पर आक्रमण क्यों करेगा ? पर चीन ऐसा नहीं सोचता था। 

18 नवम्बर 1962 को भोर में चार बजकर 35 मिनट पर चीनी सैनिकों रजांगला दर्रे पर हमला बोल दिया; पर उन्हें पता नहीं था कि उनका पाला किससे पड़ा है। मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में भारतीय सैनिक शत्रु पर टूट पड़े। उन्होंने अंतिम सांस और अंतिम गोली तक युद्ध किया। पल्टन के सब सैनिक मारे गये; पर चीन का कब्जा वहां नहीं हो पाया। कैसी हैरानी की बात है कि इस युद्ध का पता दिल्ली शासन को महीनों बाद तब लगा, जब चुशूल गांव के गडरियों ने सैनिकों के शव चारों ओर छितरे हुए देखे। 

सर्दियां कम होने पर जब भारतीय जवान वहां गये, तब पूरा सच सामने आया। भारतीय सैनिकों के हाथ बंदूक के घोड़े (ट्रिगर) पर थे। कुछ के हाथ तो हथगोला फेंकने के लिए तैयार मुद्रा में मिले। इसी स्थिति में वे जवान मातृभूमि की गोद में सदा के लिए सो गये। भारतीय सीमा में एक हजार से भी अधिक चीनी सैनिकों के शव पड़े थे। स्पष्ट था कि अपना बलिदान देकर 13वीं कुमाऊं की ‘सी’ कम्पनी ने इस महत्वपूर्ण चौकी की रक्षा की थी।

चीन से युद्ध समाप्त होने के बाद मूलतः जोधपुर (राजस्थान) निवासी मेजर शैतान सिंह को परमवीर चक्र, आठ सैनिकों को वीर चक्र तथा चार को सेना पदक दिया गया। सर्वस्व बलिदानी इस पल्टन को भी सम्मानित किया गया। 

इस युद्ध की स्मृति में रजांगला में एक स्मारक बना है, जिस पर 114 सैनिकों के नाम लिखे हैं। पास में ही ‘अहीर धाम’ बना है, चूंकि उस पल्टन के प्रायः सभी सैनिक रिवाड़ी (हरियाणा) के आसपास के अहीर परिवारों के थे। इस बलिदानी युद्ध से प्रेरित होकर एम.एस.सथ्यू ने ‘हकीकत’ फिल्म बनायी, जो अत्यधिक लोकप्रिय हुई।  

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