No Option But to Declare Bhaarat a Hindu State ||

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From: Rajput < >

Sir, you write:

“It would be in order if Bharat could be declared a Hindu nation on 15 Aug 20.” – Vikram Singh Katoch

Please note that it is not the luxury of being “in order,” but dire necessity to declare Bharat a “HINDU” (State) country if in the neighborhood the “wolves & man eater tigers” have taken up residence.

We CONVENIENTLY forget that they MASSACRED nearly TWO MILLION Hindus in that year of Calamity (1947) alone. We may not recall Partition, and that is OUR problem! But if the next time we have a duo like “Gandhi and Nehru” on top, DELHI WILL DISAPPEAR, TOO, FROM THE MAP OF BHARAT! So, why take the chance? Why live on prayers, when God says, “I WILL HELP THOSE WHO HELP THEMSELVES!”?

In fact, the natives of Hindusthan are SEVENTY-THREE years too late to be just waking up to REALITY around them.

Had M K Gandhi stated this in 1940 when Pakistan Resolution was passed in LAHORE, Jinnah would have “SWALLOWED HIS SPIT.”

Reason? HINDU RASHTRA was not going to be the LAND of OBLIGING CONCUBINES OF ISLAM, but would have put a question mark against the Indian Muslims who imagined themselves to be the offspring of Changez Khan, Halaku Khan, Mohammed Ghori, Aurangzeb and Tipu Sultan, and looked at the Hindus as A FLOCK OF SHEEP, at best a HERD OF CATLE.

The demand puts the Hindus AT PAR with the Muslims and not SUBSERVIENT SLAVES who are begging upon their knees, “SIRE, YOU CAN BREAK UP INDIA AS it SUITS YOU; GO ISLAMIC IN LAHORE & DHAKA IN ORDER TO SOUND THE DEATH KNELL OF HINDUS THERE, WHILE WE WILL REMAIN SECULAR COOLIES IN ORDER TO APPEASE AND PLEASE YOU TILL ETERNITY!” (That was the commitment given to Jinnah by Gandhi and Nehru!)

If the Hindus have come of age, if the nation has recovered their GUTS, COURAGE, CONVICTION & SENSE, then it will pick up a GUN if the enemy on BOTH sides picks up the pistol!

What else is the meaning of SURVIVAL OF THE FITTEST? How fit was the SECULAR Hindu in 1947 that FLED from Dhaka and Karachi in 1947, NEVER TO LOOK BACK?

HINDU RASHTRA is not only a guarantee of Hindu survival from the coming “TSUNAMI” of Muslims within Bharat, (if we care to notice the explosion in their numbers since PARTITION,) but also confers a clear IDENTITY to the nation. The fall-out will be that we shall see the HINDUS in NEPAL and MALAYSIA, too, walking UPRIGHT with “gaurav.”

“Gaurav se kaho hum Hindu hain,” will become “HUM BHI KUCHCH HAIN!” (that is, “second to none”)

rajput

25 July 2020

अथर्ववेद के पृथिवी सूक्त में राष्ट्रभक्ति – ४

अथर्ववेद के पृथिवी सूक्त में राष्ट्रभक्ति – ४                             
मिल कर रास्ट्र की समृद्धि में लगें
      डा.अशोक आर्य

देश समृद्ध होगा तो ही देश के नागरिक समृद्ध होंगे| देश की समृद्धि के बिना राष्ट्र की उन्नति संभव ही नहीं है| देश की समृद्धि के लिए केवल सरकारों के प्रयासों से कार्य संपन्न नहीं होता अपितु इसके लिए नागरिकों को भी एकजुट होकर पुरुषार्थ करना होता है| जब नागरिक संगठित हैं, जब नागरिक पुरुषार्थी हैं और यह पुरुषार्थ एकजुट होकर करते हैं तो परिणाम भी उत्तम होते हैं| इस बात पर ही यह मन्त्र इस प्रकार प्रकाश डाल रहा है :-
यस्याश्चतस्त्र: प्रदिश: पृथिव्या यस्यामन्नं कृष्टय: संबभूव:  |
             या बिभर्ति बहुधा प्राणवेजत् सा नो भूमिर्गोष्वप्यन्ने दधातु || अथर्ववेद १२.१.४ || १.१२.४ || 

इस मन्त्र में नागरिकों के संगठन पर प्रकाश डाला गया है| मन्त्र की भावना है कि देश की समृद्धि के लिए देश के नागरिकों में संगठन की, ऐक्य की भावना का होना आवश्यक है| जहाँ ऍक्य नहीं है, वहां देश की प्रगति संभव नहीं है अपितु देश के ह्रास की संभावना अधिक है| इस आलोक में आओ हम मन्त्र के भावों को विस्तार से समझें |

स्तीर्ण दिशाओं में खेती 
जिस देश में चारों दिशाएं दूर–दूर तक विस्तीर्ण दिखाई दें| देश की इन खुली दिशाओं में, खुली होते हुए भी कोई स्थान खाली न दिखाई दे, प्रत्येक स्थान पर अनेक प्रकार की वनस्पतियों की खेती होती हो | भूमि का कोई खलिहान एसा न हो, जहां वनस्पतियों की हरी–भरी फसलें न लहलहा रही हों, जहाँ फूलों से लदी लताएँ अठखेलियां न कर रही हों और जहाँ फलों से लदे पेड़ अठखेलियें न कर रहे हों| भाव यह है कि देश के प्रत्येक क्षेत्र में अन्नादि से खलिहान भरे हों, लताएँ फूलों व सब्जियों से भरी हों और वृक्ष समय पर फलों से भर जाते हों| एसा देश पूर्ण रूप से संपन्न हो जाता है क्योंकि इस देश के नागरिकों के सामने कभी भरण–पौषण की समस्या नहीं आती| यह अत्यधिक पैदा होने वाला अन्नादि न केवल देश के नागरिकों के भरण–पौषण की समस्या को दूर करता है अपितु बचा हुआ अन्नादि विदेशों में भी व्यापार द्वारा भेज कर अर्थ लाभ प्राप्त किया जा सकता है, जिससे देश की अन्य आवश्यकताएं पूर्ण करने के लिए देश अर्थ साधनों से भी संपन्न हो जाता है|

गरिक मिलकर रहें 
देश के सब नागरिक मिलकर रहें| एकता में बहुत शक्ति होती है| जब नागरिक एक हैं तो किसी अन्य देश को इस देश पर आँख तक उठाने का साहस नहीं होता| इसके साथ ही साथ जब नागरिक संगठित हैं और प्रत्येक कार्य संगठित हो कर सामूहिक हित के लिए सामूहिक रूप से करते हैं तो परिणाम भी अत्यंत उत्तम आते हैं| इसलिए नागरिकों का संगठित होना तथा मिलजुल कर कार्य करना प्रत्येक देश की उन्नति के लिए, रक्षा के लिए आवश्यक होता हैं| अत: देश के नागरिकों को देश की उन्नति के लिए सामूहिक रूप से कार्य करना चाहिये|

मातृभूमि दुग्ध व अन्न से भरण–पौषण करे 
कोई भी माता एसी नहीं, जो अपनी संतान का भरण–पौषण न करती हो| वह अपनी संतानों की उन्नति के स्वप्न सदा संजोये रखती है| उसे यदि कुछ भी अभाव दिखाई देता है तो वह उसे दूर करने के लिए अपना सब कुछ लगा देती है| इस प्रकार ही हमारी यह मातृभूमि निरंतर इस चेष्टा में रहती है कि उसके संतानों(नागरिकों) का ठीक प्रकार से भरण-पौषण कर सके| इस मातृभूमि के कारण ही गो आदि पशुओं का पौषण होता है और इन गौ आदि पशुओं से नागरिकों को पौषण के लिए गोदुग्ध मिलता है| हमारी मातृभूमि ने अपने गर्भ से जो अन्नादि पदार्थ पैदा किये हैं, उन सब के सेवन से वह हमारा पौषण करे अर्थात् इस अन्नादि पदार्थों का सेवन कर हम अपने शरीर को पौषित करते हैं|

प्रत्येक व्यक्ति की उन्नति के उपाय 
ऊपर बताया गया है कि मातृभूमि गो–दुग्ध व अन्नादि पदार्थों से अपने देश के नागरिकों का भरण -पौषण करे| इन पंक्तियों का भाव है कि इस मातृभूमि के प्रत्येक नागरिक के पास, उसकी उन्नति के लिए सब मार्ग खुले रहें| यह उन्नति के मार्ग कैसे खुलेंगे? इन मार्गों को खोलने की चाबी भी इस मन्त्र के अनुसार परमपिता परमात्मा ने अपनी संतान के हाथों में ही दे दी है| मन्त्र उपदेश कर रहा है कि हे मातृभूमि के वीर सपूतो! उठो, आगे बढ़ो. पुरुषार्थ करो और संगठित होकर मातृभूमि पर कुदाल चलाओ, हल चलाओ, फावड़ा चलाओ| आप के इस सामूहिक पुरुषार्थ के परिणाम स्वरूप कृषि करने से हमें उत्तम और विपुल मात्रा में अनादि पदार्थ मिलेंगे| जब हम संगठित हो कर अपने पुरुषार्थ को कलकारखानों में लगावेंगे तो इन कारखानों से निकलने वाले अनेक प्रकार के पदार्थों के उपभोग तथा व्यापार से देश को अत्यधिक धन-संपदा प्राप्त होगी| यह धन संपदा देश को उन्नति के शीर्ष पर ले जाने में सफल होगी| इसलिए देश के प्रत्येक नागरिक को मन्त्र की भावना को न केवल समझना होगा अपितु संगठित होकर इस पर कार्य भी करना होगा| यदि सब नागरिक अपना कर्तव्य समझते हुए कार्य में लगेंगे तो निश्चय ही परिणाम उत्तम होंगे|

डा. अशोक आर्य 

ALL ROUTES TO AYODHYA; FULL STEAM AHEAD!

From; Rajput < >

People of Hindusthan lived in peace without any desire to invade other countries to loot gold and abduct (& rape) girls of the defeated. Being civilized, they never stooped down to such bestiality.

The only thing lacking was unity among the natives and the Will to “teach the invaders a lesson” NEVER to appear again. Hence defeat after defeat followed, millions were slaughtered and millions of girls and women abused, abducted and raped, even sold at open auctions in Kabul, Ghazni and Kandahar. Every temple that came in their way, was razed to ground. World famous Somnath, Mathura and Varanasi mandirs did not escape the brutality of the intolerant barbarians!

At last the grandest and the most magnificent Temple in Ayodhya met the same fate like the others. That was 1526 AD. The invader was Babur, the ruler of Afghanistan. He destroyed the Sri Raam temple in Ayodhya and built a mosque on top of the rubble. But history has seen empires come up and then vanish.

Though the hated Mogul Empire was finished off in 1857, the Temple still remained a ruin since the new Colonial masters from Europe, too, were the “People of Book”, they did not wish the Temple to be re-built.

The most sacred spot in Bharat had to wait for the end of another evil, hostile anti national and anti Hindu, “Empire” (NEHRU DYNASTY) when Bharat, now minus Lahore and Dhaka, got real freedom.

Congratulations to Adityanath Yogi and Narendra Modi, the bold and patriotic duo who allowed the Temple to be re-built, rejecting mischievous Muslim objections whose tolerance of mandirs and Hindus is known to the world.

The FOUNDATION STONE will be laid on August 5, 2020 in the presence of the patriotic and proud prime minister himself.

First requirement will be to ENSURE safety of the VVIP’s. Thereafter the construction should go ahead uninterrupted. It should not only be a place for pujaa but also house many complexes and wings like University of Hindu Theology, Sri Raam, Guru Gobind Singh and Shivaji Foundations, a large library, hospital, Orphanage, Institute of Journalism and Media, and television and radio broadcasting stations with worldwide reach, broadcasts in several world languages and an INTERNATIONAL airport named “Sri Raam International Airport, AYODHYA.

As millions of pilgrims are expected to come to Ayodhya from all over the world, there should be SUBSIDIZED hotel rooms to rent, excellent taxi service and a well-stocked office of Bharatiya Tourist Board with maps of holy places and tourist spots to take away.

Eventually, Delhi, as capital, should be DISCARDED, since it has seen too much bloodshed and the destruction of its own grand Temple where Jama Masjid now stands as an ugly reminder of Islamic barbarity and intolerance. The capital should be moved to AYODHYA.

There is plenty of scope to improve on LUTYEN’S architecture and grand buildings in New Delhi.  An entirely new and most modern capital of Hindusthan should be built in Ayodhya.

Finally, there should be direct and indirect flights to Ayodhya (“Sri Raam International Airport”) from London, New York, San Francisco, Vancouver, Toronto, Perth, Sydney, Bangkok, Beijing and Tokyo.

Three more holy shrines should be built in Sri Raam’s sacred city, a Buddhist Temple, a Sikh Gurdwara and a Jain Temple in order to make Ayodhya the comprehensive befitting center of world spirituality and divinity.

rajput.

24 July 2020