#1 Problem For The Largest Democracy–India

From: Kumar Arun < >

Number One Problem For Largest Democracy-India

Almost every intellectuals and corrupt politicians in India, have been lecturing the entire world about their favorite party’s pseudo-development but how much are they right? No political party, including four plus years of Modi government ever talked about explosion in population. If this is the way Indians keep producing, by 2050, the land of Hindus will turn into land of Muhammad for ever, no if & but (read UNO report).
If Modi government fails to establish following revolutionary change within his next term, goodbye to Hindutwa:
  1. Replace current constitution with a new one based upon Vedic Philosophies and Traditions
  2. Total elimination of Sharia laws from the land of Ram & Krish’n
  3. One marriage at a time and not more than 2 children in one family regardless of multiple marriages. 
  4. Eliminate reservation of any kind and replace with government subsidized free education to poor only
  5. Term Limit for any and all politicians, NO pension or any kind f perks for their services. 

Respectfully,

 
Dr. Kumar Arun
f: India Heritage Foundation
November 5, 2018

होमी भाभा

From: Pramod Agrawal < >

वह महान वैज्ञानिक जिसने भारत को बैलगाड़ी युग से निकालकर

नाभिकीय युग मे पहुंचा दिया

Pradeep द्वारा

भारत की स्वतंत्रता और उसके नए संविधान के लागू होने के साथ ही देश की प्रगति की नींव रखी गई। स्वतंत्रता के तुरंत बाद हमारे देश का नेतृत्व आधुनिक भारत के निर्माता पं. जवाहरलाल नेहरू को सौंपा गया। नेहरू जी का यह यह मानना था कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का एक ही रास्ता है- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को विकास से जोड़ा जाए। नेहरू जी  ने मुख्यत: दो क्षेत्रों मे अपना ध्यान केन्द्रित किया – परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का विकास और इसके माध्यम से अंतरिक्ष विज्ञान का विकास और वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के अंतर्गत देश में एक के बाद एक कई वैज्ञानिक संस्थाओं और प्रयोगशालाओं की स्थापना। भारत मे नाभिकीय ऊर्जा के व्यवहार्य और दूरदर्शी कार्यक्रम की स्थापना होमी जहाँगीर भाभा और नेहरू जी के संयुक्त दृष्टिकोणों के परिणामस्वरूप हुई। आइए, भारत को नाभिकीय युग मे प्रवेश दिलाने मे भाभा की भूमिका के बारे मे चर्चा करते हैं।
imagesभाभा के साथ पं. नेहरू
होमी भाभा का जन्म 30 अक्तूबर, 1909 को मुंबई मे एक सम्पन्न पारसी परिवार मे हुआ था। स्कूली शिक्षा मे शानदार अकादमिक प्रदर्शन के बाद भाभा ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए कैंब्रिज विश्वविद्यालय मे प्रवेश लिया। भौतिकी मे उनकी व्यापक दिलचस्पी थी, इसलिए उन्होने नाभिकीय भौतिकी को अपना अनुसंधान क्षेत्र चुना। कैंब्रिज विश्वविद्यालय से पीएचडी करने के बाद वहीं उन्हें प्राध्यापक के रूप मे नियुक्ति मिली। भाभा ने भौतिकी के चोटी के वैज्ञानिकों, रदरफोर्ड, डिराक, चैडविक, बोर, आइंस्टाइन, पौली आदि के साथ कार्य किया। भाभा का शोधकार्य मुख्यत:  कॉस्मिक किरणों पर केंद्रित था। कॉस्मिक किरणें अत्यधिक ऊर्जा वाले वे कण होते हैं जो बाहरी अंतरिक्ष मे पैदा होते हैं और छिटक कर पृथ्वी पर आ जाते हैं। भाभा ने वर्ष 1937 मे वाल्टर हाइटलर के साथ मिलकर कॉस्मिक किरणों पर एक सैद्धांतिक शोधपत्र प्रकाशित करवाया। उनके कॉस्मिक किरणों पर किये गए शोध कार्य को वैश्विक स्तर पर व्यापक मान्यता प्राप्त हुई। तब तक भाभा एक प्रतिष्ठित भौतिक विज्ञानी बन चुके थे।
द्वितीय विश्व युद्ध की भारत को देन
यह एक संयोग ही कहा जा सकता है कि वर्ष 1939 मे भाभा कैंब्रिज से कुछ दिनों की छुट्टी लेकर भारत आए। और इसी बीच यूरोप मे अचानक द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया। इसलिए उन्होने विश्व युद्ध के ख़त्म होने तक भारत मे ही रहने का निर्णय किया। और उन्होने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइन्स, बैंगलोर मे चंद्रशेखर वेंकट रामन के आमंत्रण पर रीडर के पद पर नियुक्ति प्राप्त की। इससे भाभा के जीवन में एक बड़ा मोड़ा तो आया ही साथ मे भारत के वैज्ञानिक विकास को भी एक नई दिशा मिली।
प्रारम्भ मे भाभा का अनुसंधान कार्य कॉस्मिक किरणों पर ही केंद्रित था, मगर नाभिकीय भौतिकी के क्षेत्र मे विकास को देखते हुए भाभा को यह विश्वास हो गया कि इस क्षेत्र के अनुसन्धानों से भारत निकट भविष्य में लाभ उठा सकेगा। वर्ष 1944 में भाभा ने टाटा ट्रस्ट के अध्यक्ष दोराब जी टाटा को संबोधित करते हुए एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होने नाभिकीय भौतिकी के क्षेत्र में मौलिक अनुसंधान हेतु एक संस्थान के निर्माण का प्रस्ताव रखा तथा नाभिकीय विद्युत की उपयोगिता पर प्रकाश डाला। टाटा ट्रस्ट के अनुदान से वर्ष 1945 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामैंटल रिसर्च (टीआईएफ़आर) की डॉ. होमी भाभा के नेतृत्व में स्थापना हुई। टीआईएफ़आर ने भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को संगठित करने के लिए आधारभूत ढांचा उपलब्ध करवाया।
दो महान विभूतियों के बीच अद्भुत बौद्धिक संबंध
भारत मे परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम संबंधी वैज्ञानिक गतिविधियों को बढ़ावा देने का श्रेय भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू और होमी भाभा की दूरदर्शिता को जाता है। भाभा की प्रतिभा के नेहरू जी कायल थे तथा दोनों के बीच काफी मधुर संबंध थे। वर्ष 1948 में भाभा की अध्यक्षता में परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना की गई। यह भाभा की दूरदृष्टि ही थी कि नाभिकीय विखंडन की खोज के बाद जब सारी दुनिया नाभिकीय ऊर्जा के विध्वंसनात्मक रूप परमाणु बम के निर्माण मे लगी हुई थी तब भाभा ने भारत की ऊर्जा जरूरतों को ध्यान मे रखते हुए विद्युत उत्पादन के लिए परमाणु शक्ति के उपयोग की पहल की। भाभा के नेतृत्व में भारत में प्राथमिक रूप से विद्युत शक्ति पैदा करने तथा कृषि, उद्योग, चिकित्सा, खाद्य उत्पादन और अन्य क्षेत्रों में अनुसंधान के लिए नाभिकीय अनुप्रयोगों के विकास की रूपरेखा तैयार की गई। इस दौरान भाभा को नेहरू जी की निरंतर सहायता और प्रोत्साहन मिलती रही, जिससे भारत दुनिया भर के उन मुट्ठी भर देशों में शामिल हो सका जिनको सम्पूर्ण नाभिकीय चक्र पर स्वदेशी क्षमता हासिल था।homi-bhabha-1
त्रिस्तरीय नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम
डॉ. भाभा ने देश में उपलब्ध यूरेनियम और थोरियम के विपुल भंडारों को देखते हुए परमाणु विद्युत उत्पादन की तीन स्तरीय योजना बनाई थी, जिसमें क्रमश: यूरेनियम आधारित नाभिकीय रिएक्टर स्थापित करना, प्लूटोनियम को ईंधन के रूप मे उपयोग करना तथा थोरियम चक्र पर आधारित रिएक्टरों की स्थापना करना शामिल था। इस त्रिस्तरीय योजना का दो हिस्सा भारत पूरा कर चुका है। इस प्रकार भाभा ने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में भारत को स्वावलंबी बनाकर उन लोगों के दाँतो तले ऊंगली दबा दिया जो परमाणु ऊर्जा के विध्वंसनात्मक उपयोग के पक्षधर थे।
परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के पक्षधर
परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग से संबंधित भाभा का विजन सम्पूर्ण मानवता के लिए युगांतरकारी सिद्ध हुआ। उन्होने यह बता दिया कि परमाणु का उपयोग सार्वभौमिक हित और कल्याण के लिए करते हैं, तो इसमें असीम संभावनाएं छिपी हुई है। वर्ष 1955 में भारत के प्रथम नाभिकीय रिएक्टर ‘अप्सरा’ की स्थापना परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग की दिशा में पहला सफल कदम था। इसके बाद भाभा के नेतृत्व में साइरस, जरलीना आदि रिएक्टर अस्तित्व में आए। हालांकि डॉ. भाभा शांतिपूर्ण कार्यों के लिए परमाणु ऊर्जा के उपयोग के पक्षधर रहे, लेकिन 1962 के भारत-चीन युद्ध मे भारत की हार ने उन्हें अपनी सोच बदलने को विवश कर दिया। इसके बाद वे कहने लगे कि ‘शक्ति का न होना हमारे लिए सबसे महंगी बात है’। अक्तूबर 1965 में डॉ. भाभा ने ऑल इंडिया रेडियों से घोषणा कि अगर उन्हें मौका मिले तो भारत 18 महीनों में परमाणु बम बनाकर दिखा सकता है। उनके इस वक्तव्य ने सारी दुनिया में सनसनी पैदा कर दी। हालांकि इसके बाद भी वे विकास कार्यों में परमाणु ऊर्जा के उपयोग की वकालत करते रहे तथा ‘शक्ति संतुलन’ हेतु भारत को परमाणु शक्ति सम्पन्न बनना आवश्यक बताया।
विमान दुर्घटना और असामयिक मृत्यु
24 जनवरी, 1966 को अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग की बैठक मे भाग लेने के लिए विएना जाते हुए एक विमान दुर्घटना में मात्र 57 वर्ष की आयु में डॉ. भाभा का निधन हो गया। इस प्रकार भारत ने एक उत्कृष्ट वैज्ञानिक, प्रशासक और कला एवं संगीत प्रेमी को खो दिया। डॉ. भाभा द्वारा प्रायोजित भारतीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम आज भी देश के बहुआयामी विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा रहा है।

Cleaning Up of the Judiciary of Aryavart

From:

Chandra Segaran Krishnan Nair < > :

Yes, I am in total agreement with you Chandar Kohli.

It is high time Modi Ji did some cleaning up of the Judiciary. It is begging for an immediate revamp.
I find the Indian judiciary has gone overboard in the matters of religion particularly Hinduu tradition and its laid out rule and regulation to the extent it has handed down a controversial verdict defying Sabarimala Ayeppan Shrine’s established rule denying entry to women of productive age.
This is definitely not within its ambit to entertain an affidavit challenging the Sabarimala Shrine’s standing rule by a none-Hinduu.
I feel this is a lopsided verdict and I consider it an affront and insult to the Hinduus, in general, it must not be left unchallenged, I would suggest the President should step in and nullify the verdict of the SC. and at the same time stipulate the courts to stay out of controversy in the matter of HInduu / Vedic Sanatana Dharma. Not only that but also relinquish the governments hold on Hinduu religious affair and its many temples administration and its funds donated by the Hinduu devotees. Stop the state from taking the Temple’s incomes accrued as per the donations of the devotees. All funds so accrued should be the responsibility of the Devastanam to ACCUMULATE and used solely to that particular temple for its maintenance and expenses incurred.
(Please read the article at below link:

jaya sri Krishna! – Surfesh Vyas)

 
 Jai Hind.
 
Chandra1510

भारत को पटेल जैसा “लौह पुरुष” चाहिये….

 भारत को पटेल जैसा “लौह पुरुष” चाहिये….

 

”भारत की  बर्बादी तक जंग रहेगी जारी” और “भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह” आदि आदि के नारे लगा कर देश को ललकारने वाले तत्वों ने राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाये रखने के लिये स्व.सरदार पटेल की आत्मा को अवश्य पीड़ित किया होगा. सरदार वल्लभभाई पटेल की दूरदर्शी सोच व कुशल शासकीय क्षमता का ही परिणाम था जिससे छोटे-छोटे राज्यों को एक साथ मिला कर एक सशक्त राष्ट्र के रूप में भारत का निर्माण हुआ था।ध्यान रहें, राजाओं व नबावों के स्वामित्व वाले लगभग 564 राज्यों का एकीकरण करने की जटिल प्रक्रिया में सरदार पटेल की अदभुत भूमिका ने उनको भारत का “लौह पुरुष” बना दिया।

अधिकांश भारतीय समाज को देश के विभाजन की अनेक हिन्दू-मुस्लिम जटिलताओं का पूर्णतः ज्ञान सम्भवतः न हो इसलिए यह भी स्मरण आवश्यक है कि सरदार पटेल के दूरदर्शी व साहसिक निर्णयों के कारण ही केवल एक पाकिस्तान बना नही तो अंग्रेजो ने तो ऐसी स्थिति बना दी थी कि हमारे बीच में ही अनेक घोषित पाकिस्तान बन जाते। इसलिए भी सरदार पटेल को “लौह पुरुष” कहा जाता है।यहां यह लिखना अनुचित नही होगा कि धार्मिक व सांस्कृतिक आधार को छोड़ दिया जाय तो भारत का राजनैतिक दृष्टि से सम्भवतः सम्राट अशोक के काल के अतिरिक्त कभी भी इतना विशाल स्वरूप नही रहा होगा.

वर्तमान परिस्थितियों में जब देशद्रोही शक्तियां भारत को खड़-खंड करने की तुच्छ मानसिकता  का परिचय देने का दुःसाहस कर रही हो तो राष्ट्र को अखंड रखने के लिये सरदार पटेल की कार्यशैली और अधिक प्रसांगिक हो जाती है। भारत के सन 1947 के धर्माधारित विभाजन के पश्चात भी अनेक भारत विरोधी देशी-विदेशी शक्तियां देश को और अधिक विभाजित करने के अवसरों को ढूंढने में अभी तक सफल नही हो पा रही है। यह अत्यंत दुःखद है कि आज देश की स्वतंत्रता के 70 वर्ष पश्चात भी हम  सशक्त व कुशल राजनैतिक व प्रशासकीय नेतृत्व के अभाव में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के दुष्परिणामों को झेलने के लिये विवश हैं।

हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इतना अधिक दुरुपयोग हो रहा है कि राष्ट्रद्रोही भावनाओं को भड़काने वाले तत्व प्रभावी होते जा रहे हैं। क्या यह अनुचित नही कि शत्रु देश पाकिस्तान के पक्ष में नारे लगाना , उसका झण्डा लहराना एवं देश के टुकड़े-टुकड़े करके उसकी बर्बादी तक जंग को जारी रखने वालों पर शासकीय तंत्र कोई अंकुश न लगा सका, क्यों ?  आपको ज्ञात ही होगा कि देश की राजधानी नई दिल्ली में स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में कुछ अराष्ट्रीय तत्व वर्षो से सक्रिय है। लेकिन लगभग ढाई वर्ष (फरवरी 2016) पूर्व जो “भारत की बर्बादी” जैसे चीखते व चुभते नारों ने राष्ट्रीय मानस को स्तब्ध कर दिया था।

क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह होता है कि अपनी ही मातृभूमि के विरुद्ध षडयन्त्रकारियों को उत्साहित करके उनकी योजनाओं को सफल करने में सहायक बनें ? क्या अर्थ व अन्य लोभ-लालच वश देश-विदेश के द्रोहियों का समर्थन करके विश्वासघाती बनना अपराध नही ? क्या विश्व के किसी भी देश में ऐसे विश्वासघातियों को जो राष्ट्र को खड़-खंड करने के दुःस्वप्न देखते हो को बंधक बनाने के स्थान पर विभिन्न मचों पर सम्मानित होना स्वीकार होगा ?

ऐसे में शासकीय शिथिलता व कठोर निर्णायक क्षमता के अभाव में ऐसे तत्वों का दुःसाहस इतना अधिक बढ़ गया कि वे हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को ही स्व.राजीव गांधी के समान लक्ष्य बनाकर षड्यंत्र करने की सोचने लगे। पिछले माह आये ऐसे अनेक समाचारों से यह विदित हुआ है कि माओवादियों की देशद्रोही वैचारिक पृष्ठ भूमि की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी है। इनके साथियों में न जाने कितने वरिष्ठ बुद्धिजीवियों के नामों ने तो आश्चर्यचकित ही कर दिया। इन तथाकथित बुद्धिजीवियों पर जब संदेह की दृष्टि से प्रशासकीय कार्यवाही की गयी तो अनेक पत्रकार, बुद्धिजीवी, अधिवक्तागण एवम राजनेता आदि एकाएक इनके पक्ष में खड़े हो गये और वैधानिक प्रक्रिया को प्रभावित किया।

प्रायः अनेक अवसरों पर जब भी आतंकवादियों, अलगाववादियों, घुसपैठियों व अन्य देशद्रोही मानसिकता वालों के विरुद्ध कोई कठोर कार्यवाही होती है तो ऐसे तत्वों की संदिग्ध सक्रीयता बढ़ जाती है।ऐसी विकट स्थिति में जब राष्ट्रीय संप्रभुता पर संकट मंडराने लगे तो उसे  कैसे थामा जाय ? क्या भारत विरोधी शक्तियां इनती अधिक सशक्त है कि वे हमारे प्रबुद्ध माने जाने वाले वर्ग में स्वदेश के प्रति नकारात्मक भावनाऐ भरने में सफल हो जाते है ?  जिस कारण  वे समय समय पर आन्दोलित होते रहते और भारतीय लोकतंत्र को प्रभावित करते आ रहे है। ऐसे में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षार्थ अराष्ट्रीय मानसिकता वाले विभिन्न संदिग्ध वर्गों पर अंकुश लगना ही चाहिये।

अतः ऐसी विपरीत अवस्था में आज हमको सरदार पटेल जैसे कठोर प्रशासक व नेतृत्व की महत्ती आवश्यकता है। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था , जहां चुनावों में विजयी होने वाले राजनैतिक दल द्वारा ही सरकार गठित होती है,  में क्या ऐसी सामर्थ है कि वह एक ऐसा प्रभावशाली राजनैतिक नेतृत्व प्रदान करें जो राष्ट्रविरोधी तत्वों व अन्य शत्रुओं पर दृढ़ता से प्रहार कर सकें ? क्या देश की वर्तमान परिस्थितियों में कोई ऐसा नायक मिलेगा जो सरदार पटेल जैसी “लौह पुरुष” की भूमिका निभा सके ?

इतिहास में वही शासक सफल माने गये है जो राष्ट्रहित को सर्वोपरि मान कर कठोर व कडवें निर्णयों के साथ आगे बढ़े थे। कुछ ऐसी ही संभावनाओं को ढूंढने के लिये सरदार वल्लभ भाई पटेल की गुजरात (साधुबेट- नर्मदा जिला) में 182 मीटर ऊंची विशाल प्रतिमा “स्टैच्यू ऑफ यूनिटी” का 31 अक्टूबर 2018  (144 वी जयंती ) को हमारे  प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी अनावरण करके उस महापुरुष को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ ही करोड़ो भारत वासियों को सकारात्मक संदेश देना चाहेंगे।यह भी एक संयोग है कि इस विशालकाय प्रतिमा का शिलान्यास भी श्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्य मन्त्री के रूप में सरदार पटेल की जन्म तिथि 31 अक्टूबर को ही 5 वर्ष पूर्व किया था।

इस विशालकाय प्रतिमा का निर्माण मुख्यतः भारत के कोने कोने से लाये गये लोहे व मिट्टी से किया गया है। जिससे हम सबको एक स्पष्ट संदेश भी मिलता है कि सहस्त्रो वर्ष प्राचीन हमारी संस्कृति का भारत को एकजुट करने व रखने में सर्वश्रेष्ठ योगदान रहा और रहेगा । इस शास्वत सत्य को समझने और उसे धरातल पर स्थापित करके  “भारत” का निर्माण करने वाले सरदार पटेल के महान व्यक्तित्व व कृतित्व  के अनुरूप आज हमको एक और “लौहपुरुष” चाहिये। आज हम सब भारतवासियों का यह दायित्व है कि राष्ट्रीय एकता और अखंडता के प्रति समर्पित लौह पुरुष सरदार पटेल को अपनी अपनी  श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यह उदघोष अवश्य करें कि “भारत अखंड,  अजेय और अमर रहें।”

 

विनोद कुमार सर्वोदय

(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)

गाज़ियाबाद

बाहें पसारता हिन्दू समाज (Abnormal Behavior)

From: Vinod Kumar Gupta < >

बाहें पसारता हिन्दू समाज (Abnormal behavior)

 

बाहें पसारता हिन्दू समाज कब तक सैकड़ों वर्षों से आत्मसमर्पण की पराजित भावनाओं से घिरा रहेगा?

राष्ट्र के प्रति सर्वाधिक प्रतिबद्ध “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ” के प्रमुख श्री मोहन भागवत जी ने पिछले दिनों एक तीन दिवसीय कार्यक्रम में अनेक बिंदुओं पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करके सम्पूर्ण भारतीय समाज को अपने मानवतावादी विचारों से अवगत करवाया। मुख्यतः उनका लक्ष्य अनेक सम्प्रदायों में विखरे हुए समाज को संगठित करके देश के सशक्त निर्माण में उनकी भागेदारी सुनिश्चित करने का सकारात्मक प्रयास है.

 

लेकिन उनके वक्तव्य के कुछ मुख्य बिंदू अवश्य विचारणीय है, जैसे…

“जिस दिन हम कहेंगे कि मुसलमान नही चाहिये … उस दिन हिंदुत्व भी नही रहेगा ,

जिस दिन कहेंगे कि यहां केवल वेद चलेंगे, दूसरे ग्रंथ नही चलेंगे … उसी दिन हिंदुत्व का भाव नष्ट हो जायेगा,

क्योंकि हिंदुत्व में वसुधैव कुटुम्बकम की भावना समाहित है … जितने भी सम्प्रदाय जन्में है सबकी मान्यतायें है ,

हिंदुत्व के दर्शन में किसी भी सम्प्रदाय से अलगाव नही है ।”

(When the Veda said, “वसुधैव कुटुम्बकम,” it talks about blood relation, which cannot be denied. But more important than the blood relation is commitment to follow Vedic dharma or asuric ideology.  Sure, in this world there will be more or less demoniac people as Krishna has said in Bhagavad Gita: ॥ द्वौ भूत सर्गौ लोकेस्मिन् दैव असुर एव च॥.  But the Vedic dharma says that the suras (the devines) must fight to control or kill the asiric (demoniac) people in order to maintain law and order in the society.  Never forget that in Mahabhaarat/Gita, when Arjun said he does not want to fight, Krishna recommended him to fight.

 

Additionally, the anti-Vedic religions or ideologies (e. g. Islam, Xianity, and Communism) are not the offshoots from the Vedic dharma as the Jainism, Buddhism and Sikhism and Kabir Panth, etc. are.)  These anti-Vedic ideologies or religions are hell bent to completely wipe out the Vedic dharma (which is universal dharma for mankind) from the face of the Earth.  Therefore, they should not be given legal status in Aryavart, the land of the Vedics.  These anti- Vedic ideologies are foreign virus forcibley invasded in Aryavart.  They must be declared illegal by amending the constitution.

– Suresh Vyas)

 

इतिहास में भी प्रायः मुसलमानों का गुणगान करते हुए यह पढ़ाया जाता है कि वे बाहर से आये और हमारे ऊपर 600-700 वर्षो तक राज किया और उनमें से एक अकबर को महान बना दिया गया । लेकिन उन्होंने हमारे मठ-मंदिरों का विंध्वस किया, हमारे लाखों – करोड़ों पूर्वजों का बलात धर्मांतरण व भयानक नरसंहार करने के अतिरिक्त हमारी बहन-बेटियों पर अमानवीय अत्याचार किये आदि के इतिहास को साम्प्रदायिक सौहार्द बनाये रखने के लिये हमारे नीतिनियन्ताओं ने अधिक महत्व नही दिया। (because the ruling party was anti-Vedic.)

यहां एक अत्यंत कष्टकारी बिंदु सोचने को विवश करता है कि जब अन्य सम्प्रदाय “हिंदुत्व” के प्रति सौहार्द के स्थान पर  वैमनस्यपूर्ण व्यवहार करते आ रहे थे, है और भविष्य में भी उसमें कोई परिवर्तन होने की संभावना शिथिल न हो तो ऐसे में क्या किया जाय?

क्या उन बिन् हिंदु सम्प्रदायों की भारत के मूल निवासियों प्रति के बलात धर्मांतरण की अनाधिकार चेष्टा उचित है?

क्या उनको अपने-अपने सम्प्रदाय को श्रेष्ठ स्थापित करने की दूषित महत्वाकांक्षा के वशीभूत हो कर हिंदुओ पर अत्याचार करते रहने का मौलिक अधिकार मिला हुआ है, जबकि हमारा इतिहास साक्षी है कि आक्रांताओं और धर्मांधों के (हमारी संस्कृति और धर्म को नष्ट करने के लिये) किये गये अत्याचारों की कोई सीमा नही थी।

वर्तमान में भी ऐसे कट्टरपंथी हिन्दू समाज को शांतिपूर्वक जीवन निर्वाह करते रहने में बाधक बनें हुए है। विभिन्न गावों व नगरों में प्रायः होने वाले साम्प्रदायिक दंगे व आतंकवादियों के द्वारा निर्दोष और मासूमों को बम विस्फोटो से उड़ाना आदि कट्टरपंथियों के घिनौने प्रदर्शन अभी भी अनियंत्रित है। ऐसे में हम सबकी मान्यताओं का सम्मान करते हुए एक तरफा सहिष्णु बनकर कब तक अपने आप को आहत होते देखते रहें? अपने धर्म संस्कृति और् राष्ट्र के अस्तित्व की रक्षार्थ कर्तव्यविमुख होकर केवल उदारता व अहिंसा के गुणगान करने से क्या हम आत्महत्या के पाप का भागी नही बन जाएंगे?

हम कब तक बाहें पसारें सभी को गले लगाने को आतुर होते रहेंगे?

 

जब 90 वर्षो से “हिंदुत्व ही राष्ट्रीयत्व है” की प्रेरणा से करोड़ों देशभक्तों का निर्माण करने वाला “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ” अपने ही सिद्धान्तों और आदर्शो पर प्रश्नचिन्ह लगायेगा तो 1300 वर्षो से चल रहे जिहादियों के अत्याचारों पर अंकुश लगा कर मानवता की रक्षार्थ कौन सतर्क होगा?

क्या अपने को समयानुसार परिवर्तनशील, उदारवादी व सामाजिक समरसता में ढलने का ज्ञान बाटनें वाला हिन्दू समाज जिहादी दर्शन में भी परिवर्तन करवाने का प्रयास करेगा? (This is not possible because Koran does not give freedom of thought, speech and action. Punishment to quit Islam is death. What the Hindus can do in Aryavart is to declare the anti-Vedic religions and ideologies illegal. – Suresh Vyas)

 

हिंदुओं से ही सदैव यह आशा क्यों की जाती है कि वे ही अपने आप को इस्लाम व ईसाईयत के अनुरूप ढाल लें और एक तरफा उदार व सहिष्णु बनें रहें?  (It is due to foolishness (dharma glaani) of the Hindus. – Suresh Vyas)

…क्या यह दृष्टिकोण हिंदुओं की सनातन आस्थाओं और श्रद्धाओं को आहत नही करेगा?

हमारी व हमारे नेताओं की भावनावश हिन्दू-मुस्लिम सांझी परंपराओं व सांझे पूर्वजों का गुणगान करने से भी मुसलमानों की जिहादी मनोवृति  को प्रभावित नही किया जा सकता। लेकिन ऐसे सद्भावनापूर्ण प्रयासो से हिन्दू अवश्य भ्रमित होता आ रहा है। इसलिये आज भी हमारे अनेक महापुरुषों का विचार है कि “सहनशील व सहिष्णु होना अच्छा गुण है, परन्तु अन्याय का विरोध उससे कई गुणा उत्तम गुण” प्रसांगिक है। धर्मानुसार न्याय के साथ सहिष्णुता का व्यवहार व अन्याय के साथ असहिष्णुता का मार्ग ही स्वधर्म रक्षार्थ आवश्यक होता है।

(The Vedic wisdom is this:

अहिंसा परमो धर्मः। Non-volence is supreme Vedic dharma.

धर्म हिंसा तथैव च्॥ Violence authorized by the Vedic dharma is also supreme dharma.

  • Suresh Vyas)

सामान्यतः विश्वबंधुत्व की भावना के कारण ही हम हिन्दू मित्र व शत्रु में भेद नही कर पाते  जिससे वर्तमान व भविष्य के संकटो से अनभिज्ञ रहते है। परिणामस्वरूप धर्म व देश की रक्षार्थ उदासीन हो जाते है। स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी का दूरदर्शी संदेश आज भी प्रसांगिक है, उन्होंने कहा था कि “जिस राष्ट्र की जनता शत्रु और मित्र को पहचानने में भूल करती है, उस राष्ट्र को उस भूल का भयंकर परिणाम भुगतना पड़ता है” । हमारे ग्रंथों में भी यह स्पष्ट आदेश है कि “मित्र के साथ मित्रवत, व शत्रु के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार ही उचित रहता है”। (The focus should be on the ideology or religions. The forcibly invaded anti-Vedic religions must be declared illegal in Aryavart, else there is no possibility of peace or prosperity.  No virus (e.g. Islam) can be allowed in a computer (Aryavart.) – Suresh Vyas)

धर्माधारित देश के विभाजन के उपरांत भी पाकिस्तान, बांग्लादेश व कश्मीर आदि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ही अब तक लगभग एक करोड़ से ऊपर हिंदुओं का धर्म के नाम पर बलिदान हुआ हो तो कोई आश्चर्य नही होगा। परंतु जब हमारे धर्माचार्यों व नेताओं को सर्वधर्म समभाव, सहिष्णुता, उदारता व अहिंसा के उपदेश देने में ही परम आनन्द आता हो तो धर्मांधों व जिहादियों का दुःसाहस बढ़ना स्वाभाविक ही है।

हिंदुओं में तेजस्विता का अभाव  (dharma glaani) और उनकी समझौतावादी मनोवृत्ति ने भी हिन्दू विरोधी षड्यंत्रकारियों को उत्साहित किया है। बाहें पसारता हिन्दू समाज कब तक सैकड़ों वर्षों से आत्मसमर्पण की पराजित भावनाओं से घिरा रहेगा? हम कब तक यह सोचने को विवश होते रहेंगे कि भारत में राष्ट्रभक्ति रहित राजनीति के वर्चस्व से कब छुटकारा मिलेगा, विशेषतौर पर आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब मुख्य रूप से धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार की प्रमुखता से धर्मनिरपेक्षता जर्जर हो रही हो और सुरक्षित, सुदृढ़ व गौरवशाली भारत के निर्माण की योजनाओं की प्राथमिकता का अभाव हो रहा हो।

ध्यान रहें “वसुधैव कुटुम्बकम” के मंत्र से संस्कारित “हिंदुत्व” अपने शास्त्रों के ज्ञान के आधार पर मानवता की रक्षा करके उसको ऊर्जावान व प्रकाशवान करना चाहता है। ऐसे में जो दर्शन मानव समाज को विभक्त करते हो तो उसमें संशोधन करवाने का (सम्पूर्ण समाज को अपना परिवार मानने वाली) भारतीय संस्कृति भी दायित्व निभाये तो अनुचित नहीं होगा।

(There is no need for any research. The total history of Islam, Xianity, Pakista, Bangladesh, Rhingyas, etc. andy many books and Youtube videos have clearly exposed the anth-Vedic religions.  – Suresh Vyas)

वैसे भी हिंदुत्व में अलगाववाद का कोई स्थान नही तो उसे अलगाववादी दर्शन का विरोध तो करना ही चाहिये।

आज जब संघ के द्वितीय प्रमुख गुरु गोलवरकर जी की पुस्तक “द बंच ऑफ थॉट्स” की समीक्षा करके हिन्दू समाज बाहें पसारने को आतुर है, तो अन्य सम्प्रदायों (these are not sampradayas, they are anti-Vedic foreign religions.) को भी अपने अपने रूढ़िवादी ग्रंथो की समीक्षा करनी चाहिये। Why say so? They will not listen us kafirs. – Suresh Vyas) अतः सभी सम्प्रदायों के धार्मिक विद्वानों का भी यह दयित्व है कि वे अपने धर्म ग्रंथों और विद्याओं में आवश्यक संशोधन करके भारत सहित सम्पूर्ण विश्व को सकारात्मक संदेश देकर सभ्यताओं में हो रहे टकरावों को दूर करें।

 

✍विनोद कुमार सर्वोदय

(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)

गाज़ियाबाद

 

Anti-Majority Supreme Court in Bhaarat

From: Mohan Natarajan < >

redit: Rajappa Srinivasan

 

1a. #Sabarimala – SC decides who will enter.

1b. Masjids/Haji Ali/polygamy/3 Talaq/Halala/Sharia – Internal matter of Moslems.

 

2a. Height of Dahi Handi – SC will give you inch tape.

2b. Slow & painful Halal slaughter of animals – Internal matter of Moslems.

 

3a. DJ on Ganesh Visarjan – Ganesh doesn’t need DJ.

3b. Loudspeakers from Masjids 5 times a day x 365 days – Their God has hearing issues.

Internal matter of Moslems.

 

4a. Crackers on Diwali – SC will decide decibel limit, pollution and finally ban it.

4b. Blood on Bakr Eid – Peaceful festivals are internal matter of Moslems.

 

5a. Durga Puja immersion – Water pollution, traffic jams.

5b. Bloodshed on streets on Muharram – Internal matter of Moslems.

 

6a. Kashmiri Hindu massacre – SC doesn’t have time to reopen ‘old and irrelevant’ cases.

6b. Adultery – SC says there is nothing like adultery. All polygamous Jihadis must have right to target & trap Hindu married women and their kids.

 

Unless we Hindus change our present judiciary, the day is not far when:

Massacre of Hindus will be declared internal matter of Moslems.

 

It is not the time to enjoy IPL, Movies and chant ‘We Respect All Religions’.

Islam and Xianity aim to wipe out Hindus and Hinduism from Bhaarat desh.

 

Adultery Declared Legal by SC in Hindustan?

From: Vasant Sardesai

No doubt adultery involves two persons but in this case how can it be said that the SC acted on the basis of the law in force when he ruled that adultery is not a crime when the law in force clearly says that under section 497 of IPC it is a crime punishable with imprisonment and/or fine?
And under what provisions it declared it as unconstitutional on the ground that it deprived a woman of sexual autonomy by perpetuating stereotypes in society?
Can a person after marriage claim sexual autonomy to have sex with multiple persons? What does marriages especially a Hindu marriages mean?
Does SC want to introduce new norms in the Indian society or does the Constitution say that the party to a marriage shall have full rights to have sex with any other person of his/her choice in spite of marriage?
If that is the understanding of the judiciary, we should urgently change such judiciary and such judges should be impeached for trying to break the Indian society through such judgments rather than following or acting on such judgments.
V. S. Sardesai.