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Suresh Vyas.
॥ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ Dharma & Rashtra Seva; Vedic awakening; Hindu State will be a nation where everyone will strive to advance spiritually. ===Seeking a website IT volunteer who can make this site beautiful and attractive, get more traffic on this site, is a staunch Hindu, loves Bhaarat, and desires to make Bhaarat a Vedic State. Please contact Suresh Vyas at skanda987@gmial.com
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Suresh Vyas.
From: Kumar Arun < >
Respectfully,
From: Pramod Agrawal < >
Pradeep द्वारा
भाभा के साथ पं. नेहरू
From:
Yes, I am in total agreement with you Chandar Kohli.
jaya sri Krishna! – Surfesh Vyas)
भारत को पटेल जैसा “लौह पुरुष” चाहिये….
▶”भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जारी” और “भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह” आदि आदि के नारे लगा कर देश को ललकारने वाले तत्वों ने राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाये रखने के लिये स्व.सरदार पटेल की आत्मा को अवश्य पीड़ित किया होगा. सरदार वल्लभभाई पटेल की दूरदर्शी सोच व कुशल शासकीय क्षमता का ही परिणाम था जिससे छोटे-छोटे राज्यों को एक साथ मिला कर एक सशक्त राष्ट्र के रूप में भारत का निर्माण हुआ था।ध्यान रहें, राजाओं व नबावों के स्वामित्व वाले लगभग 564 राज्यों का एकीकरण करने की जटिल प्रक्रिया में सरदार पटेल की अदभुत भूमिका ने उनको भारत का “लौह पुरुष” बना दिया।
▶अधिकांश भारतीय समाज को देश के विभाजन की अनेक हिन्दू-मुस्लिम जटिलताओं का पूर्णतः ज्ञान सम्भवतः न हो इसलिए यह भी स्मरण आवश्यक है कि सरदार पटेल के दूरदर्शी व साहसिक निर्णयों के कारण ही केवल एक पाकिस्तान बना नही तो अंग्रेजो ने तो ऐसी स्थिति बना दी थी कि हमारे बीच में ही अनेक घोषित पाकिस्तान बन जाते। इसलिए भी सरदार पटेल को “लौह पुरुष” कहा जाता है।यहां यह लिखना अनुचित नही होगा कि धार्मिक व सांस्कृतिक आधार को छोड़ दिया जाय तो भारत का राजनैतिक दृष्टि से सम्भवतः सम्राट अशोक के काल के अतिरिक्त कभी भी इतना विशाल स्वरूप नही रहा होगा.
▶वर्तमान परिस्थितियों में जब देशद्रोही शक्तियां भारत को खड़-खंड करने की तुच्छ मानसिकता का परिचय देने का दुःसाहस कर रही हो तो राष्ट्र को अखंड रखने के लिये सरदार पटेल की कार्यशैली और अधिक प्रसांगिक हो जाती है। भारत के सन 1947 के धर्माधारित विभाजन के पश्चात भी अनेक भारत विरोधी देशी-विदेशी शक्तियां देश को और अधिक विभाजित करने के अवसरों को ढूंढने में अभी तक सफल नही हो पा रही है। यह अत्यंत दुःखद है कि आज देश की स्वतंत्रता के 70 वर्ष पश्चात भी हम सशक्त व कुशल राजनैतिक व प्रशासकीय नेतृत्व के अभाव में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के दुष्परिणामों को झेलने के लिये विवश हैं।
▶हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इतना अधिक दुरुपयोग हो रहा है कि राष्ट्रद्रोही भावनाओं को भड़काने वाले तत्व प्रभावी होते जा रहे हैं। क्या यह अनुचित नही कि शत्रु देश पाकिस्तान के पक्ष में नारे लगाना , उसका झण्डा लहराना एवं देश के टुकड़े-टुकड़े करके उसकी बर्बादी तक जंग को जारी रखने वालों पर शासकीय तंत्र कोई अंकुश न लगा सका, क्यों ? आपको ज्ञात ही होगा कि देश की राजधानी नई दिल्ली में स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में कुछ अराष्ट्रीय तत्व वर्षो से सक्रिय है। लेकिन लगभग ढाई वर्ष (फरवरी 2016) पूर्व जो “भारत की बर्बादी” जैसे चीखते व चुभते नारों ने राष्ट्रीय मानस को स्तब्ध कर दिया था।
▶क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह होता है कि अपनी ही मातृभूमि के विरुद्ध षडयन्त्रकारियों को उत्साहित करके उनकी योजनाओं को सफल करने में सहायक बनें ? क्या अर्थ व अन्य लोभ-लालच वश देश-विदेश के द्रोहियों का समर्थन करके विश्वासघाती बनना अपराध नही ? क्या विश्व के किसी भी देश में ऐसे विश्वासघातियों को जो राष्ट्र को खड़-खंड करने के दुःस्वप्न देखते हो को बंधक बनाने के स्थान पर विभिन्न मचों पर सम्मानित होना स्वीकार होगा ?
▶ऐसे में शासकीय शिथिलता व कठोर निर्णायक क्षमता के अभाव में ऐसे तत्वों का दुःसाहस इतना अधिक बढ़ गया कि वे हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को ही स्व.राजीव गांधी के समान लक्ष्य बनाकर षड्यंत्र करने की सोचने लगे। पिछले माह आये ऐसे अनेक समाचारों से यह विदित हुआ है कि माओवादियों की देशद्रोही वैचारिक पृष्ठ भूमि की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी है। इनके साथियों में न जाने कितने वरिष्ठ बुद्धिजीवियों के नामों ने तो आश्चर्यचकित ही कर दिया। इन तथाकथित बुद्धिजीवियों पर जब संदेह की दृष्टि से प्रशासकीय कार्यवाही की गयी तो अनेक पत्रकार, बुद्धिजीवी, अधिवक्तागण एवम राजनेता आदि एकाएक इनके पक्ष में खड़े हो गये और वैधानिक प्रक्रिया को प्रभावित किया।
▶प्रायः अनेक अवसरों पर जब भी आतंकवादियों, अलगाववादियों, घुसपैठियों व अन्य देशद्रोही मानसिकता वालों के विरुद्ध कोई कठोर कार्यवाही होती है तो ऐसे तत्वों की संदिग्ध सक्रीयता बढ़ जाती है।ऐसी विकट स्थिति में जब राष्ट्रीय संप्रभुता पर संकट मंडराने लगे तो उसे कैसे थामा जाय ? क्या भारत विरोधी शक्तियां इनती अधिक सशक्त है कि वे हमारे प्रबुद्ध माने जाने वाले वर्ग में स्वदेश के प्रति नकारात्मक भावनाऐ भरने में सफल हो जाते है ? जिस कारण वे समय समय पर आन्दोलित होते रहते और भारतीय लोकतंत्र को प्रभावित करते आ रहे है। ऐसे में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षार्थ अराष्ट्रीय मानसिकता वाले विभिन्न संदिग्ध वर्गों पर अंकुश लगना ही चाहिये।
▶अतः ऐसी विपरीत अवस्था में आज हमको सरदार पटेल जैसे कठोर प्रशासक व नेतृत्व की महत्ती आवश्यकता है। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था , जहां चुनावों में विजयी होने वाले राजनैतिक दल द्वारा ही सरकार गठित होती है, में क्या ऐसी सामर्थ है कि वह एक ऐसा प्रभावशाली राजनैतिक नेतृत्व प्रदान करें जो राष्ट्रविरोधी तत्वों व अन्य शत्रुओं पर दृढ़ता से प्रहार कर सकें ? क्या देश की वर्तमान परिस्थितियों में कोई ऐसा नायक मिलेगा जो सरदार पटेल जैसी “लौह पुरुष” की भूमिका निभा सके ?
▶इतिहास में वही शासक सफल माने गये है जो राष्ट्रहित को सर्वोपरि मान कर कठोर व कडवें निर्णयों के साथ आगे बढ़े थे। कुछ ऐसी ही संभावनाओं को ढूंढने के लिये सरदार वल्लभ भाई पटेल की गुजरात (साधुबेट- नर्मदा जिला) में 182 मीटर ऊंची विशाल प्रतिमा “स्टैच्यू ऑफ यूनिटी” का 31 अक्टूबर 2018 (144 वी जयंती ) को हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी अनावरण करके उस महापुरुष को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ ही करोड़ो भारत वासियों को सकारात्मक संदेश देना चाहेंगे।यह भी एक संयोग है कि इस विशालकाय प्रतिमा का शिलान्यास भी श्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्य मन्त्री के रूप में सरदार पटेल की जन्म तिथि 31 अक्टूबर को ही 5 वर्ष पूर्व किया था।
▶इस विशालकाय प्रतिमा का निर्माण मुख्यतः भारत के कोने कोने से लाये गये लोहे व मिट्टी से किया गया है। जिससे हम सबको एक स्पष्ट संदेश भी मिलता है कि सहस्त्रो वर्ष प्राचीन हमारी संस्कृति का भारत को एकजुट करने व रखने में सर्वश्रेष्ठ योगदान रहा और रहेगा । इस शास्वत सत्य को समझने और उसे धरातल पर स्थापित करके “भारत” का निर्माण करने वाले सरदार पटेल के महान व्यक्तित्व व कृतित्व के अनुरूप आज हमको एक और “लौहपुरुष” चाहिये। आज हम सब भारतवासियों का यह दायित्व है कि राष्ट्रीय एकता और अखंडता के प्रति समर्पित लौह पुरुष सरदार पटेल को अपनी अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यह उदघोष अवश्य करें कि “भारत अखंड, अजेय और अमर रहें।”
✍विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
गाज़ियाबाद
From: Vinod Kumar Gupta < >
बाहें पसारता हिन्दू समाज (Abnormal behavior)
बाहें पसारता हिन्दू समाज कब तक सैकड़ों वर्षों से आत्मसमर्पण की पराजित भावनाओं से घिरा रहेगा?
राष्ट्र के प्रति सर्वाधिक प्रतिबद्ध “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ” के प्रमुख श्री मोहन भागवत जी ने पिछले दिनों एक तीन दिवसीय कार्यक्रम में अनेक बिंदुओं पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करके सम्पूर्ण भारतीय समाज को अपने मानवतावादी विचारों से अवगत करवाया। मुख्यतः उनका लक्ष्य अनेक सम्प्रदायों में विखरे हुए समाज को संगठित करके देश के सशक्त निर्माण में उनकी भागेदारी सुनिश्चित करने का सकारात्मक प्रयास है.
लेकिन उनके वक्तव्य के कुछ मुख्य बिंदू अवश्य विचारणीय है, जैसे…
“जिस दिन हम कहेंगे कि मुसलमान नही चाहिये … उस दिन हिंदुत्व भी नही रहेगा ,
जिस दिन कहेंगे कि यहां केवल वेद चलेंगे, दूसरे ग्रंथ नही चलेंगे … उसी दिन हिंदुत्व का भाव नष्ट हो जायेगा,
क्योंकि हिंदुत्व में वसुधैव कुटुम्बकम की भावना समाहित है … जितने भी सम्प्रदाय जन्में है सबकी मान्यतायें है ,
हिंदुत्व के दर्शन में किसी भी सम्प्रदाय से अलगाव नही है ।”
(When the Veda said, “वसुधैव कुटुम्बकम,” it talks about blood relation, which cannot be denied. But more important than the blood relation is commitment to follow Vedic dharma or asuric ideology. Sure, in this world there will be more or less demoniac people as Krishna has said in Bhagavad Gita: ॥ द्वौ भूत सर्गौ लोकेस्मिन् दैव असुर एव च॥. But the Vedic dharma says that the suras (the devines) must fight to control or kill the asiric (demoniac) people in order to maintain law and order in the society. Never forget that in Mahabhaarat/Gita, when Arjun said he does not want to fight, Krishna recommended him to fight.
Additionally, the anti-Vedic religions or ideologies (e. g. Islam, Xianity, and Communism) are not the offshoots from the Vedic dharma as the Jainism, Buddhism and Sikhism and Kabir Panth, etc. are.) These anti-Vedic ideologies or religions are hell bent to completely wipe out the Vedic dharma (which is universal dharma for mankind) from the face of the Earth. Therefore, they should not be given legal status in Aryavart, the land of the Vedics. These anti- Vedic ideologies are foreign virus forcibley invasded in Aryavart. They must be declared illegal by amending the constitution.
– Suresh Vyas)
इतिहास में भी प्रायः मुसलमानों का गुणगान करते हुए यह पढ़ाया जाता है कि वे बाहर से आये और हमारे ऊपर 600-700 वर्षो तक राज किया और उनमें से एक अकबर को महान बना दिया गया । लेकिन उन्होंने हमारे मठ-मंदिरों का विंध्वस किया, हमारे लाखों – करोड़ों पूर्वजों का बलात धर्मांतरण व भयानक नरसंहार करने के अतिरिक्त हमारी बहन-बेटियों पर अमानवीय अत्याचार किये आदि के इतिहास को साम्प्रदायिक सौहार्द बनाये रखने के लिये हमारे नीतिनियन्ताओं ने अधिक महत्व नही दिया। (because the ruling party was anti-Vedic.)
यहां एक अत्यंत कष्टकारी बिंदु सोचने को विवश करता है कि जब अन्य सम्प्रदाय “हिंदुत्व” के प्रति सौहार्द के स्थान पर वैमनस्यपूर्ण व्यवहार करते आ रहे थे, है और भविष्य में भी उसमें कोई परिवर्तन होने की संभावना शिथिल न हो तो ऐसे में क्या किया जाय?
क्या उन बिन् हिंदु सम्प्रदायों की भारत के मूल निवासियों प्रति के बलात धर्मांतरण की अनाधिकार चेष्टा उचित है?
क्या उनको अपने-अपने सम्प्रदाय को श्रेष्ठ स्थापित करने की दूषित महत्वाकांक्षा के वशीभूत हो कर हिंदुओ पर अत्याचार करते रहने का मौलिक अधिकार मिला हुआ है, जबकि हमारा इतिहास साक्षी है कि आक्रांताओं और धर्मांधों के (हमारी संस्कृति और धर्म को नष्ट करने के लिये) किये गये अत्याचारों की कोई सीमा नही थी।
वर्तमान में भी ऐसे कट्टरपंथी हिन्दू समाज को शांतिपूर्वक जीवन निर्वाह करते रहने में बाधक बनें हुए है। विभिन्न गावों व नगरों में प्रायः होने वाले साम्प्रदायिक दंगे व आतंकवादियों के द्वारा निर्दोष और मासूमों को बम विस्फोटो से उड़ाना आदि कट्टरपंथियों के घिनौने प्रदर्शन अभी भी अनियंत्रित है। ऐसे में हम सबकी मान्यताओं का सम्मान करते हुए एक तरफा सहिष्णु बनकर कब तक अपने आप को आहत होते देखते रहें? अपने धर्म संस्कृति और् राष्ट्र के अस्तित्व की रक्षार्थ कर्तव्यविमुख होकर केवल उदारता व अहिंसा के गुणगान करने से क्या हम आत्महत्या के पाप का भागी नही बन जाएंगे?
हम कब तक बाहें पसारें सभी को गले लगाने को आतुर होते रहेंगे?
जब 90 वर्षो से “हिंदुत्व ही राष्ट्रीयत्व है” की प्रेरणा से करोड़ों देशभक्तों का निर्माण करने वाला “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ” अपने ही सिद्धान्तों और आदर्शो पर प्रश्नचिन्ह लगायेगा तो 1300 वर्षो से चल रहे जिहादियों के अत्याचारों पर अंकुश लगा कर मानवता की रक्षार्थ कौन सतर्क होगा?
क्या अपने को समयानुसार परिवर्तनशील, उदारवादी व सामाजिक समरसता में ढलने का ज्ञान बाटनें वाला हिन्दू समाज जिहादी दर्शन में भी परिवर्तन करवाने का प्रयास करेगा? (This is not possible because Koran does not give freedom of thought, speech and action. Punishment to quit Islam is death. What the Hindus can do in Aryavart is to declare the anti-Vedic religions and ideologies illegal. – Suresh Vyas)
हिंदुओं से ही सदैव यह आशा क्यों की जाती है कि वे ही अपने आप को इस्लाम व ईसाईयत के अनुरूप ढाल लें और एक तरफा उदार व सहिष्णु बनें रहें? (It is due to foolishness (dharma glaani) of the Hindus. – Suresh Vyas)
…क्या यह दृष्टिकोण हिंदुओं की सनातन आस्थाओं और श्रद्धाओं को आहत नही करेगा?
हमारी व हमारे नेताओं की भावनावश हिन्दू-मुस्लिम सांझी परंपराओं व सांझे पूर्वजों का गुणगान करने से भी मुसलमानों की जिहादी मनोवृति को प्रभावित नही किया जा सकता। लेकिन ऐसे सद्भावनापूर्ण प्रयासो से हिन्दू अवश्य भ्रमित होता आ रहा है। इसलिये आज भी हमारे अनेक महापुरुषों का विचार है कि “सहनशील व सहिष्णु होना अच्छा गुण है, परन्तु अन्याय का विरोध उससे कई गुणा उत्तम गुण” प्रसांगिक है। धर्मानुसार न्याय के साथ सहिष्णुता का व्यवहार व अन्याय के साथ असहिष्णुता का मार्ग ही स्वधर्म रक्षार्थ आवश्यक होता है।
(The Vedic wisdom is this:
अहिंसा परमो धर्मः। Non-volence is supreme Vedic dharma.
धर्म हिंसा तथैव च्॥ Violence authorized by the Vedic dharma is also supreme dharma.
सामान्यतः विश्वबंधुत्व की भावना के कारण ही हम हिन्दू मित्र व शत्रु में भेद नही कर पाते जिससे वर्तमान व भविष्य के संकटो से अनभिज्ञ रहते है। परिणामस्वरूप धर्म व देश की रक्षार्थ उदासीन हो जाते है। स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी का दूरदर्शी संदेश आज भी प्रसांगिक है, उन्होंने कहा था कि “जिस राष्ट्र की जनता शत्रु और मित्र को पहचानने में भूल करती है, उस राष्ट्र को उस भूल का भयंकर परिणाम भुगतना पड़ता है” । हमारे ग्रंथों में भी यह स्पष्ट आदेश है कि “मित्र के साथ मित्रवत, व शत्रु के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार ही उचित रहता है”। (The focus should be on the ideology or religions. The forcibly invaded anti-Vedic religions must be declared illegal in Aryavart, else there is no possibility of peace or prosperity. No virus (e.g. Islam) can be allowed in a computer (Aryavart.) – Suresh Vyas)
धर्माधारित देश के विभाजन के उपरांत भी पाकिस्तान, बांग्लादेश व कश्मीर आदि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ही अब तक लगभग एक करोड़ से ऊपर हिंदुओं का धर्म के नाम पर बलिदान हुआ हो तो कोई आश्चर्य नही होगा। परंतु जब हमारे धर्माचार्यों व नेताओं को सर्वधर्म समभाव, सहिष्णुता, उदारता व अहिंसा के उपदेश देने में ही परम आनन्द आता हो तो धर्मांधों व जिहादियों का दुःसाहस बढ़ना स्वाभाविक ही है।
हिंदुओं में तेजस्विता का अभाव (dharma glaani) और उनकी समझौतावादी मनोवृत्ति ने भी हिन्दू विरोधी षड्यंत्रकारियों को उत्साहित किया है। बाहें पसारता हिन्दू समाज कब तक सैकड़ों वर्षों से आत्मसमर्पण की पराजित भावनाओं से घिरा रहेगा? हम कब तक यह सोचने को विवश होते रहेंगे कि भारत में राष्ट्रभक्ति रहित राजनीति के वर्चस्व से कब छुटकारा मिलेगा, विशेषतौर पर आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब मुख्य रूप से धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार की प्रमुखता से धर्मनिरपेक्षता जर्जर हो रही हो और सुरक्षित, सुदृढ़ व गौरवशाली भारत के निर्माण की योजनाओं की प्राथमिकता का अभाव हो रहा हो।
ध्यान रहें “वसुधैव कुटुम्बकम” के मंत्र से संस्कारित “हिंदुत्व” अपने शास्त्रों के ज्ञान के आधार पर मानवता की रक्षा करके उसको ऊर्जावान व प्रकाशवान करना चाहता है। ऐसे में जो दर्शन मानव समाज को विभक्त करते हो तो उसमें संशोधन करवाने का (सम्पूर्ण समाज को अपना परिवार मानने वाली) भारतीय संस्कृति भी दायित्व निभाये तो अनुचित नहीं होगा।
(There is no need for any research. The total history of Islam, Xianity, Pakista, Bangladesh, Rhingyas, etc. andy many books and Youtube videos have clearly exposed the anth-Vedic religions. – Suresh Vyas)
वैसे भी हिंदुत्व में अलगाववाद का कोई स्थान नही तो उसे अलगाववादी दर्शन का विरोध तो करना ही चाहिये।
आज जब संघ के द्वितीय प्रमुख गुरु गोलवरकर जी की पुस्तक “द बंच ऑफ थॉट्स” की समीक्षा करके हिन्दू समाज बाहें पसारने को आतुर है, तो अन्य सम्प्रदायों (these are not sampradayas, they are anti-Vedic foreign religions.) को भी अपने अपने रूढ़िवादी ग्रंथो की समीक्षा करनी चाहिये। Why say so? They will not listen us kafirs. – Suresh Vyas) अतः सभी सम्प्रदायों के धार्मिक विद्वानों का भी यह दयित्व है कि वे अपने धर्म ग्रंथों और विद्याओं में आवश्यक संशोधन करके भारत सहित सम्पूर्ण विश्व को सकारात्मक संदेश देकर सभ्यताओं में हो रहे टकरावों को दूर करें।
✍विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
गाज़ियाबाद
From: Mohan Natarajan < >
redit: Rajappa Srinivasan
1a. #Sabarimala – SC decides who will enter.
1b. Masjids/Haji Ali/polygamy/3 Talaq/Halala/Sharia – Internal matter of Moslems.
2a. Height of Dahi Handi – SC will give you inch tape.
2b. Slow & painful Halal slaughter of animals – Internal matter of Moslems.
3a. DJ on Ganesh Visarjan – Ganesh doesn’t need DJ.
3b. Loudspeakers from Masjids 5 times a day x 365 days – Their God has hearing issues.
Internal matter of Moslems.
4a. Crackers on Diwali – SC will decide decibel limit, pollution and finally ban it.
4b. Blood on Bakr Eid – Peaceful festivals are internal matter of Moslems.
5a. Durga Puja immersion – Water pollution, traffic jams.
5b. Bloodshed on streets on Muharram – Internal matter of Moslems.
6a. Kashmiri Hindu massacre – SC doesn’t have time to reopen ‘old and irrelevant’ cases.
6b. Adultery – SC says there is nothing like adultery. All polygamous Jihadis must have right to target & trap Hindu married women and their kids.
Unless we Hindus change our present judiciary, the day is not far when:
Massacre of Hindus will be declared internal matter of Moslems.
It is not the time to enjoy IPL, Movies and chant ‘We Respect All Religions’.
Islam and Xianity aim to wipe out Hindus and Hinduism from Bhaarat desh.
From: Vasant Sardesai