About M. Mehbooba by S. Swami

From: Pramod Agrawal <>

Mufti Mehbooba has her old ‘terrorist’ and ‘anti-Hindu’ link – Dr Subramanian Swamy

“What is going in the valley is nothing but a Pak sponsored Jihad in Kashmir”

Subramanian Swamy thinks ‘Mehbooba as incorrigible’ and equates Mehbooba Mufti with ‘tail of a dog’.

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New Delhi : Swamy again hit straight the role of J&K Chief Minister for a peace process in the present unrest in the State. Senior BJP leader and nominated Rajya Sabha MP Dr Subramanian Swamy equated Jammu and Kashmir chief minister Mehbooba Mufti with the “tail of a dog, which can’t be straightened” in a interview of a TV channel.
“There should be President’s rule in her place …she is like tail of a dog, which can’t be straightened,” said Swamy , in clear defiance of the party which is a partner in the PDP-led coalition government.
“Mehbooba kabhi sudhregi nahi” (Mehbooba will never change,)” said Swamy and added, “She has old links with terrorists”. He said the BJP formed a coalition government with Mehbooba on the hope she will “reform” herself.
Swamy’s comments fly in the face of the synergy between Mehbooba and PM Narendra Modi as was seen when they met last week and agreed on the common goal to combat terrorism and address popular demands.
“Laldenga was a terrorist but he became Mizoram chief minister and ran a successful government,” said Swamy. The Rajya Sabha MP wanted to clarify that even once terrorist could run a Govt. after rejecting the subversive attitude, but Mehbooba failed to change.
When asked whether his remark (as published in a TV channel) will put BJP in a trouble, Swamy told HENB this “I am not that person to reject truth for any cheap politics. Mehbooba Mufti and her father were never a friend of the uprooted Kashmiri Hindupeople and the pandits anyway. They had alleged link with separatists in Kashmir and this is very clear now with her intention to sit with the separatist again.”
“What is going in the valley is nothing but a Pak sponsored Jihad in  Kashmir”, the veteran statesman of India told HENB.

राष्ट्र-चिंतन – क्या मदर टेरेसा संत थीं ?

From: Pramod Agrawal < >

(1) राष्ट्र-चिंतन

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1929 में गुलाम भारत में ईसाइयत के प्रचार-प्रसार के लिए वेटिकन सिटी ने अपना कर्मचारी बना कर मदर टरेसा को भेजा था। मदर टरेसा का समर्पण किसके प्रति था?मदर टरेसा का समर्पण ‘‘ वेटिकन सिटी ‘‘ के प्रति था। वेटिकन सिटी की ही वह कर्मचारी थी। वेटिकन सिटी कथैलिक ईसाई धर्म की राजधानी है और जिसका सर्वेसर्वा पोप होता है। मदर टरेसा का समर्पण उसी वेटिकन सिटी के प्रति था जिस वेटिकन सिटी के अनुआयियों ने भारत को गुलाम बनाया था, मदर टरेसा का समर्पण उसी वेटिकन सिटी के प्रति जिस वेटिकन सिटी के अनुआयियों ने अफ्रीका में छुआछूत और रंगभेद का नंगा नाच किया था और जिसके विरोध में नेल्सन मंडेला को 30 सालों तक जेल में रहना पड़ा था, मदर टरेसा का समर्पण उसी वेटिकन सिटी के प्रति था जिसके अनुआयी अमेरिका पर कब्जा कर अमेरिका के आदिवासी और मूल निवासी रेड इंडियनो की संस्कृति को जमीेदोज की थी रेड इंडियन आज तक अमेरिका में रंगभेद के शिकार हैं, जिनके साथ पशुवत व्यवहार होता है और जिन्हें राजनीतिक तौर पर हाशिये पर रखा गया है।, मदर टरेसा का समर्पण उसी वेटिकन सिटी के प्रति था जिस वेटिकन सिटी के अनेको पादरी अमेरिका और यूरोप में बाल यौन शोषण के आरोपी रहे हैं जिन्हें सजा के लिए कानून को सौंपने की जगह उनके नाम और पते बदल कर भारत और अफ्रीकी देशों में भेज दिये गये थे। वेटिकन सिटी आज भी बाल यौन शोषण के आरोपी पादरियों की असली पहचान बताने से इनकार करती रही है। अनाथ बच्चों को ईसाई मिशनरियां किस प्रकार से ईसाई बनाती हैं, यह कौन नहीं जानता है।

भारत में अनेकानेक संगठन और हस्तियां रहें हैं जिन्होंने मानवता की सेवा में सर्वश्रेष्ठ योगदान देने की सफलतम कोशिश की है पर इन्हें मदर टरेसा जैसा सौभाग्य नहीं मिला। रामकृष्ण मिशन ने अनाथ बच्चों की सेवा में बडा योगदान दिया है। हरिद्वार और वाराणसी में बीमार, बुजुर्ग और असहाय तथा अनाथ महिलाओं की रक्षा और उनके जीवन को सुखमय बनाने में कई संगठन और कई धार्मिक हस्तियां लगी हुई हैं पर इन संगठनों और इन हस्तियों की चर्चा तक नहीं होती है। इन्हें विदेशी फड नहीं मिलते हैं और न ही देशी सरकारों से फंड मिलते हैं। पर वेटिकन सिटी और अन्य ईसाइयत के संगठनों को न केवल विदेशी फंड मिलते हैं और बल्कि देशी सरकारों से भी करोड़ों-अरबों का फंड मिलता है। भारज में अंधविश्वास को दूर करने और शती प्रथा जैसी हिंसक धार्मिक बुराइयों को समाप्त करने के लिए राजा राम मोहन राय ने बड़ी भूमिका निभायी थी, रामकृष्ण परमहंस और दयानंद सरस्वती ने धार्मिक पाखंड को समाप्त करने के लिए बडी भूमिका निभायी थी। पर क्या रामकृष्ण परमहंस और दयानंद सरस्वती को नोबेल पुरकार मिला था? उत्तर नहीं। पर अधविश्वास के प्रतीक चमत्माकर को स्थापित करने वाले,विदेशी पैसे पर सेवाभाव करने वाले, गुलाम भारत पर एक शव्द भी न बोलने वाले को न केवल नोबल पुरस्कार मिलता है बल्कि वेटिकन सिटी संत भी घोषित कर देता है।

(2) क्या मदर टेरेसा संत थीं?

केथोलिक संप्रदाय के विश्व-गुरु पोप फ्रांसिस आज मदर टेरेसा को संत की उपाधि प्रदान करेंगे। मदर टेरेसा भारतीय नागरिक थीं। इसलिए उन्हें कोई संत कहे और विश्व-स्तर पर कहे तो क्या हमें अच्छा नहीं लगेगा? वैसे भी उन्हें भारत-रत्न और नोबेल पुरस्कार भी मिल चुका है। उनके योगदान पर कई पुस्तकें भी आ चुकी हैं और छोटी-मोटी फिल्में भी बन चुकी हैं।

लेकिन मेरे मन में आज यह जिज्ञासा पैदा हुई कि मालूम करुं कि केथोलिक संप्रदाय में संत किसे घोषित किया जाता है? संत किसे माना जाता है? दो शर्तें हैं। एक शर्त तो यह है कि जो ईसा मसीह के लिए अपना जीवन समर्पित करे और दूसरी यह कि जो जीते-जी या मरने के बाद भी कम से कम दो चमत्कार करे। टेरेसा ने ये दोनों शर्तें पूरी की हैं। इसीलिए पूरी खात्री करने के बाद रोमन केथोलिक चर्च आज उन्हें ‘संत’ की सर्वोच्च उपाधि से विभूषित कर रहा है।

जहां तक ‘चमत्कारों’ की बात है, यह शुद्ध पाखंड है। विज्ञान, विवेक और तर्क की तुला पर उन्हें तोला जाए तो ये चमत्कार शुद्ध अंधविश्वास सिद्ध होंगे। टेरेसा का पहला चमत्कार वह था, जिसमें उन्होंने एक बंगाली औरत के पेट की रसौली को अपने स्पर्श से गला दिया। उनका दूसरा चमत्कार माना जाता है, एक ब्राजीलियन आदमी के मष्तिष्क की कई गांठों को उन्होंने गला दिया। यह चमत्कार उन्होंने अपने स्वर्गवास के 11 साल बाद 2008 में कर दिखाया। ऐसे हास्यास्पद चमत्कारों को संत-पद के लिए जरुरी कैसे माना जाता है? ऐसे चमत्कार सिर्फ ईसाइयत में ही नहीं हैं, हमारे भारत के हिंदू पाखंडी, स्याने-भोपे और बाजीगर भी दिखाते रहते हैं और अपनी दुकानें चलाते रहते हैं।

जहां तक मदर टेरेसा की मानव-सेवा की बात है, उसकी भी पोल उन्हीं के साथी अरुप चटर्जी ने अपनी किताब में खोलकर रखी है। उसने बताया है कि मदर टेरेसा का सारा खेल मानव-करुणा पर आधारित था। वे अपने आश्रमों में मरीजों, अपंगों, नवजात फेंके हुए बच्चों, मौत से जूझते लोगों को इसलिए नहीं लाती थीं कि उनका इलाज हो सके बल्कि इसलिए लाती थीं कि उनकी भयंकर दुर्दशा दिखाकर लोगों को करुणा जागृत की जा सके। उनके पास समुचित इलाज की कोई व्यवस्था नहीं थी और मरनेवालों के सिर पर पट्टी रखकर उन्हें वे छल-कपट से बपतिस्मा दे देती थीं याने ईसाई बना लेती थीं। मरते हुए आदमी से वे पूछ लेंती थीं कि ‘क्या तुमको स्वर्ग जाना है?’ इस प्रश्न के जवाब में ‘ना’ कौन कहेगा? ‘हां’ का मतलब हुआ बपतिस्मा। किसी को दवा देकर या पढ़ाकर या पेट भरकर बदले में उसका धर्म छीनने से अधिक अनैतिक कार्य क्या हो सकता है? कोई स्वेच्छा और विवेक से किसी भी धर्म में जाए तो कोई बुराई नहीं है लेकिन इस तरह का काम क्या कोई संत कभी कर सकता है? 1994 में लंदन में क्रिस्टोफर हिचंस और तारिक अली ने एक फिल्म बनाई, जिसमें मदर टेरेसा के आश्रमों का आंखों देखा हाल दिखाया गया था। हिचंस ने फिर एक किताब भी लिखी। उसमें बताया कि कैसे हैती के बदनाम और लुटेरे तानाशाह ज्यां क्लाड दुवालिए से टेरेसा ने सम्मान और धनराशि भी हासिल की। लंदन के राबर्ट मेक्सवेल और चार्ल्स कीटिंग-जैसे अपराधियों से उन्होंने करोड़ों रु. लिये। उन्होंने आपात्काल का समर्थन किया और भोपाल गैस-कांड पर लीपा-पोती की। धन्य है, मदर टेरेसा, जिनके संत बनने पर हमारे भोले प्रचार प्रेमी नेता वेटिकन पहुंच गए हैं।

 

एशिया के मुसलमानों की दुनिया में औकात

From: Pramod Agrawal < >

 

एशिया के मुसलमानों की दुनिया में औकात :-

 

(१) एशिया ( भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, नेपाल, श्रीलंका ) के मुसलमान अपने आप को अरबीयों का वंशज मानते हैं और अपने को बढ़ चढ़ कर अरबी दिखाने के जुनूनी होते हैं, लेकिन अरब देशों के असली शेख मुसलमान इनको मुसलमान ही नहीं मानते । ( क्योंकि जैसे एक हिजड़ा भी अपने आप को औरत की तरह सुंदर दिखाने के चक्कर में किसी औरत से भी ज्यादा कमर मटकाता है और नज़ाकत दिखाता है लेकिन उसे ये पता नहीं कि असली औरत और मर्द उसे हिजड़ा ही समझते हैं चाहे कितना भी वो ज़ोर लगा ले ठीक वही हाल एशिया के मुसलमानों का है )

 

(२) अरबी लोग एशिया के मुसलमानों को गंदा, गलीज़, नापाक, हरामी, Converted, कुत्ता, हैवान आदि समझते हैं और इन्हीं शब्दों से संबोधित करते हैं । अधिकतर वो इनको अपने बाप दादा परदादाओं की गलतियों का नतीजा समझते हैं और वहाँ पर किसी भी एशिया के मुसलमान को कोई अरबी शेख अगर बुलाना चाहे तो वो उसे “या अब्दी” कहकर बुलात है (अब्दी का मतलब होता है गुलाम)

 

(३) वहाँ पर कोई भी एशिया का मुसलमान अगर पचास साल भी अपनी ज़िन्दगी के लगाकर वहाँ काम करे तो भी उसे वहाँ पर न तो ज़मीन खरीदकर रहने का अधिकार मिलता है न ही उसे वहाँ की नागरिकता मिलती है ।

 

(४) कोई भी एशिया का मुसलमान वहाँ पर किसी अरबी मुसलमान औरत से शादी नहीं कर सकता और अगर गलती से करने की कोशिश भी करे तो मार दिया जाता है ।

 

(५) कोई भी अरबी शेख जब चाहे वहाँ पर किसी भी एशिया के मुसलमान की लड़की को मज़े के लिए उठवा सकता है और उसे अपनी हसीन रातों की नमकीन बेगम बनाकर उसके मज़े लूट सकता है लेकिन किसी एशिया के मुसलमान की वहाँ हिम्मत नहीं पड़ती कि ऐसा करने पर उन्हें रोक पाए ।

 

(६) वहाँ पर अधिकतर एशिया के मुसलमानों को बकरियाँ चराने, ऊँट चराने या अन्य किसी कामों में लगाया जाता है और बहुत से एशिया के मुसलमान वहाँ अरबीयों का मल मूत्र भी उठाते हैं । क्योंकि वे लोग इनको मल मूत्र से भी गंदा और नापक समझते हैं ।

 

(७) एशिया से गए हाजियों के साथ वहाँ पर बहुत ही गंदा व्यवहार किया जाता है । बाज़ार में लेनदेन के समय अरबी उनसे बहुत बदतमीज़ी से पेश आते हैं । उनको वहाँ पर अरबी हाजियों से दूर ही कैंप बनाने की इजाज़त है । कोई भी एशिया का मुसलमान वहाँ अरबी हाजियों के साथ अपने कैंप नहीं बना सकता ।

 

(८) एक बार हज के दौरान कैंपों में भयंकर आग लग गई थी तो सभी हाजियों में अफरा तफरी मच गई तो वहाँ एशिया के मुसलमानों को उनके क्षेत्र से निकलने की इजाज़त न दी गई क्योंकि वहाँ के अधिकारी चाहते थे कि अरबी हाजियों को इन नापाकों की भगदड़ से कोई परेशानी न हो जिसका नतीजा ये निकला कि पाकिस्तान और भारत के हाजी वहाँ जलकर मर गए थे लेकिन उनकी मौत पर किसी अरबी को अफसोस भी नहीं हुआ और हज यात्रा ज्यों की त्यों चलती रही ।

 

(९) अभी ताज़ा घटना में हज यात्रा में जब शैतान नामक बड़े पत्थार के टीले को पत्थर मारते वक्त हाजीयों में भगदड़ मच गई तो वहाँ बहुत से हाजी मारे गए । लेकिन वहाँ मक्का की सरकार ने अरबी हाजियों की लाशों को बहुत ही सम्मान के साथ उठाया और एशिया के हाजियों को क्रेन से उठावाया गया जैसे कि किसी कचरे को उठवाया जाता है ।

 

(१०) अरबी शेख वहाँ पर एशिया के मुसलमानों को गुलामों की तरह रखते हैं और अगर उनसे कोई गलती हो जाए तो उन्हें कुत्ते की तरह मार पीटकर मज़े ले लेकर मारते हैं और बहुत दिनों तक खाना भी नहीं देते । ये अरबी शेख बांग्लादेशी मुसलमान को मार रहा है और अपने पैर चटवा रहा है :- https://www.youtube.com/watch?v=puPSg-H9ggc ऐसे ही बहुत से वीडीयों आप You Tube पर देख सकते हैं ।

 

(११) एशिया के मुसलमान जहाँ अरबीयों पर दुनिया में हो रहे अत्याचारों के लिए अपनी छातियाँ पीटते हैं, मातम करते हैं और सड़कें जाम करके आसमान सिर पर उठा लेते हैं । जैसे कि इज़राईल के फिलिस्तीन पर हमले के लिए, अमरीका के इराक पर हमले के लिए, फ्रांस के मुसलमानों पर प्रतिबन्ध लगाने आदि मसलों पर खूब मतम मचाते हैं लेकिन वही अरबी इनपर आई आपत्ति के लिए इनपर थूकते भी नहीं । जैसे पेशावर में स्कूल पर हमला हुआ तो किसी अरबी ने कोई मातम नहीं किया, म्यांमार में रोहिंगया मुसलमानों को मारा गया तो किसी अरबी ने एक मोमबत्ती तक नहीं जलाई । ऐसे और भी कई मौके हैं अरबीयों को इनकी बिलकुल भी परवाह नहीं है ।

 

(१२) साऊदी के प्रिंस अब्दुल्लाह और मिश्र के एक मौलवी ने भी अभी हाल ही में ये बयान दिया है कि भारत और पाक के मुसलमान अपने आप को हमसे मिलाकर न देखें, वे हमा शुद्ध खून वालों की तरह अरबी नहीं हैं कनवर्टिड होने से हमारे कुत्ते हैं । वे हमसे दूर रहें ।

 

(१३) कोई एशिया का मुसलमान अगर वहाँ जकर किसी अरबी के सामने गलती से जकर ये बोल दे कि “हमने हिन्दोस्तान पर 1000 साल तक राज किया है” तो पहले तो वो अरबी उसे गंदी गंदी गालियाँ देगा और उसके मूँह पर थूकते हुए बोलेगा कि “जो किया है हमने किया! तुम हो ही कौन हरामी ? तुम हमारी नाजायज़ औलादें हो जो न तो अपने मज़हब और देश के वफादार रह सके और न किसी और के” । ऐसा ही कुछ हुआ था पकिस्तान की आवाज़ कहे जाने वाले डा. इकबाल के साथ जिसे उर्दू बोलने के कारण गुलामों की ज़ुबान बोलने वाला गलीज़ कहा गया और तभी उसने आकर भारत में ये गीत बनाया “सारे जहाँ से अच्छा ! हिन्दोस्ताँ हमारा” ।

 

(१४) पाकिस्तान के पूरा ज़ोर लगाने पर भी उसे अरब लीग में शामिल नहीं किया गया था । जिसका मुख्य कारण अरबीयों की एशिया के कनवर्टिड मुसलमानों के प्रति नफरत ही था ।

 

(१५) अगर वहाँ अरब देश में किसी ATM Machine पर एशिया के मुसलमानों की पैसे निकलवाने के लिए लम्बी लाईन लगी हो । तो कोई अरबी शेख आकर बिना लाईन में लगे ही पैसे निकलवाकर ले जायेगा और किसी एशियाई मुसलमान की हिम्मत नहीं होगी की उसको थोड़ा सा भी कुछ बोल जायेगा । वहाँ किसी अरबी शेख से बैर ले लेना मानों मौत क बुला लेना है । और किसी से पंगा हो भी जाए तो अगर उसने एशिया के मुसलमान को सिर्फ लात और जूते से बुरी तरह मारकर और अपनी थूक चटवाकर छोड़ दिया तो मानों बहुत बड़ा एहसान कर दिया क्योंकि वहाँ वह कम से कम हत्या तक कर डालते हैं और सरकार भी कुछ नहीं कहती ।

 

(१६) एशिया के मुसलमान इतने जाहिल होते हैं कि वहाँ अरबीयों की हर चीज़ को पाक ही समझते हैं वहाँ किसी सड़क पर कोई अरबी में लिखी कोई चीज़ पड़ी हो तो उसे भी पाक समझकर उठाकर चूम लेते हैं चाहे उसमें गंदी और अश्लील बातें ही क्यों न लिखी हों ।

 

(१७) एशिया के मुसलमान इतनी भयंकर मानसिक गुसामी में जी रहे हैं कि अरब की तर्ज पर अपने देशों का हाल बनाने में तुले हुए हैं । जैसे पाकिस्तान में बँटवारे के वक्त लाहौर में सभी पीपल के पेड़ उखाड़कर खजूर के पेड़ लगा दिये गए क्योंकि हुज़ूर के मुल्क में खजूर के पेड़ हैं, पाकिस्तान या भारत की किसी सब्जी बेचने वाली दुकान जिसे मुसलमान चलाता हो ज्यादातर लौकी की सब्जी को सारी सब्जियों से ऊपर रखा जाता है चाहे वो सड़ भी जाए तो भी फेंका नहीं जाता खा लिया जाता है क्योंकि रसूल साहब लौकी खाते थे, लम्बी दाढ़ियाँ और कपड़े से शरीर ढकना अरबी देशों में इसलिए ज़रूरी है क्योंकि वहाँ रेत के भयंकर तुफान आते हैं और ऐसा न करने पर त्वचा तक छील देते हैं इसी कारण औरतें वहाँ पर हिज़ब पहनती हैं, लेकिन एशिया के मुसलमान बिना सोचे समझे ही उनकी नकल करके सब पहनते हैं और दाढ़ीयाँ रखते हैं, अरब देशों में पानी की बहुत किल्लत होती है जिसके कारण पानी बचाना पड़ता है और अरबी कम नहाते धोते हैं लेकिन एशिया के मुसलमान पानी सम्पन्न देशों में भी अरबीयों की नकल करते हुए नहाने से बचेंगे और पत्थर से पिछवाड़ा साफ करेंगे और बदबूदार रहेंगे, नमाज़ पढ़ते वक्त अरबी लोग कई रह की सलाह बाँधते हैं ( उठक बैठक करना ) क्योंकि कपड़ों पर बार बार रेत लग जाती है जिसे उतारना पड़ता है लेकिन एशिया के मुसलमान बिना सोचे ही वैसी उठक बैठक नमाज़ के वक्त करते हैं । ऐसी ही कई बातें हैं जिसमें एशिया के मुसलमान अरबीयों की बिना सोचे नकलें करते हैं ।

 

(१८) ये तो एशिया के मुसलमानों की बात रही । इससे भी अधिक भारत के मुसलमानों को पाकिस्तान में भी नीची नज़रों से देखा जाता है । वहाँ पर इनको उर्दू बोलने वाले मुहाज़िर बोला जाता है । बँटवारे के वक्त जिन मुसलमानों ने बढ़चढ़कर भाग लिया था । उन्हीं को वहाँ पाकिस्तान जाने के बाद पश्तूनों ने मारना शुरू कर दिया और आजतक वहाँ पर मुहाज़िर बोलकर उनको मारा काटा जा रहा है ।

 

(१९) अरब के शेख भारत में सैक्स टूरिज़म के लिए आते हैं और यहाँ पर कम उमर की कमसीन मुसलमान हसीन लड़कियों को खरीदकर अपनी अय्याशी के लिए अपने साथ अरब देशों में ले जाते हैं और यहाँ के मुसलमान इस बात को अपना बड़ा सौभाग्य समझते हैं कि “शेख साहब ने हमारी बेटी को चुना” । वहाँ पर इस हसीनाओं के साथ खूब रंग रलिया मनाते हुए वो उन्हें अपनी रखैल बनाकर रखते हैं ।

नोट :- इस्लाम समीक्षा पढ़ने के लिए ऋषिदयानंद सरस्वति कृत सत्यार्थ प्रकाश का 14 वाँ समुल्लास अवश्य पढ़ें ।

 

जागो ! भारत कि मीडिया दुश्मनो के हाथमे है।

From: Pramod Agrawal < >

जागो ! भारत कि मीडिया दुश्मनो के हाथमे है।

क्या आप जानते हैं हम मीडिया को बिकाऊ क्यूँ कहते हैं?
क्या आप जानते हैं हमारा मीडिया पश्चिमीकरण का समर्थन और भारतीयता का विरोध क्यों करता है ?
भारत की मीडिया हिन्दू विरोधी क्यों है ??

आइये जानते हैं भारत के सारे चैनलों और मीडिया की सच्चाई के बारे में-सन् 2005 में एक फ़्रांसिसी पत्रकार भारत दौरे पर आया उसका नाम फ़्रैन्कोईसथा,उसने भारत में हिंदुत्व के ऊपर हो रहे अत्याचारों के बारे में अध्ययन किया और उसने फिर बहुत हद तक इस कार्य के लिए मीडिया को जिम्मेवार ठहराया, फिर उसने पता करना शुरू किया तो वह आश्चर्य चकित रह गया कि भारत में चलने वाले न्यूज़ चैनल, अखबार वास्तव में भारत के है ही नही —-

फिर भारत के मीडिया समूह और उसकी आर्थिक श्रोत के बारे में पता किया गया जो निम्न है।

1. द हिन्दू :-जोशुआ सोसाईटी, बर्न, स्विट्जरलैंड, इसके संपादक एन॰ राम, इनकी पत्नी ईसाई में बदल चुकी हैं।

2. एनडीटीवी :- गोस्पेल ऑफ़ चैरिटी, स्पेन, यूरोप।

3. सीएनएन, आईबीएन 7, सीएनबीसी:-100 % आर्थिक सहयोग साउथर्न बैपिटिस्ट चर्च द्वारा ।

4. द टाइम्स ऑफ़ इंडिया,नवभारत, टाइम्स नाउ :- बेनेट एंड कोल्मान द्वारा संचालित, 80% फंड वर्ल्ड क्रिस्चियन काउंसिल द्वारा, बचा हुआ 20% एक अंग्रेज़ और इटैलियन द्वारा दिया जाता है , इटैलियन व्यक्ति का नाम रोबेर्ट माइन्दो है जो यूपीए अध्यक्षा सोनिया गाँधी का निकट सम्बन्धी है।

5. हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक हिन्दुस्तान :- मालिक बिरला ग्रुप लेकिन टाइम्स ग्रुप के साथ जोड़ दिया गया है।

6. इंडियन एक्सप्रेस :- इसे दो भागों में बाँट दिया गया है, दि इंडियन एक्सप्रेस और न्यू इंडियन एक्सप्रेस (साउथर्न एडिसन) फंडिंग लंदन से

7. दैनिक जागरण ग्रुप :- इसके एक प्रबंधक समाजवादी पार्टी से राज्यसभा में सांसद है ,अब आगे कुछ कहने की ज़रूरत नही आप जानते हैं।

8. दैनिक सहारा :- इसके प्रबंधन सहारा समूह देखती है, इसके निर्देशक सुब्रोतो राय भी समाजवादी पार्टी के बहुत मुरीद हैं।

9. आंध्र ज्योति:- हैदराबाद की एक मुस्लिम पार्टी एम्आईएम् (MIM ये वही पार्टी है जो हैदराबाद मे दंगे करते रहते है) ने इसे कांग्रेस के एक मंत्री के साथ कुछ साल पहले खरीद लिया।

10. दि स्टेट्स मैन :- कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया द्वारा संचालित।

11. इंडिया न्यूज:- प्रबन्धक कार्तिकेय शर्मा (जेसिका लाल हत्या के आरोपी मनु शर्मा का भाई), जिनके पिता विनोद शर्मा हरियाणा से काँग्रेस विधायक हैं।

12 स्टार टीवी ग्रुप (एबीपी न्यूज़):-सेन्ट पीटर पोंतिफिसिअल चर्च, मेलबर्न, ऑस्ट्रेलिया। स्टार न्यूज़ (एबीपी न्यूज़) सदा से ही भारत में हिंदू विरोधी रहा है,भारत में इसके मुख्य संपादक शाजी जमान हैं जो शुरू से ही हिंदू विरोधी रहे हैं

13- आज तक न्यूज़ :- क्रिश्चियन कॉउंसिल ऑफ़ लंदन,100% फंडिंग लंदन ।

इस तरह से एक लंबी लिस्ट है जिससे ये पता चलता है की भारत की मीडिया भारतीय बिलकुल भी नहीं है और जब इनकी फंडिंग विदेश से होती है है तो भला भारत के बारे में कैसे सोच सकते हैं।

कृपया इस जानकारी को अधिक से अधिक लोगो के पास पहुंचाएँ ताकि दूसरो को नंगा करने वाले दलाल बिकाऊ मीडिया की भी सच्चाई का पता लग सके।

 

 

An Alternate Constitution of Bhaarat i.e. India

I invite Vedic and nationalist experts to review it and comment on it for any improvement to make it Pro-Vedic. – Suresh Vyas

ALTERNATE CONSTITUTION OF INDIA-By Bharat Somal

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From: Bharat Somal
9/5/2016, 7:23 PM
To: Suresh Vyas <skanda987@gmail.com>
Namaste Ji,
Thanks a lot (for uploading it to skanda987 blog.)
It is print ready copy, in case anyone want to distribute they have right to do so. I will be sending 20 copies to top ministers from USA.
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Fasting for Political Reason is Demoniac Act

Fasting for Political Reason is Demoniac Act

 

(Bhagavaan Krishna says: ) “Those who undergo severe austerities and penances not recommended in the scriptures, performing them out of pride and egoism, who are impelled by lust and attachment, who are foolish and who torture the material elements of the body as well as the Supersoul dwelling within, are to be known as demons.” Bhagavad Gita 17.5-6

Purport (By Bhaktivedanta Swami Prabhupapa):

 

There are persons (E.g. M K Gandhi and his followers*) who manufacture modes of austerity and penance which are not mentioned in the scriptural injunctions. For instance, fasting for some ulterior purpose, such as to promote a purely political end, is not mentioned in the scriptural directions. The scriptures recommend fasting for spiritual advancement, not for some political end or social purpose. Persons who take to such austerities are, according to Bhagavad-gītā, certainly demoniac. Their acts are against the scriptural injunctions and are not beneficial for the people in general. Actually, they act out of pride, false ego, lust and attachment for material enjoyment. By such activities, not only is the combination of material elements of which the body is constructed disturbed, but also the Supreme Personality of Godhead Himself living within the body. Such unauthorized fasting or austerities for some political end are certainly very disturbing to others. They are not mentioned in the Vedic literature. A demoniac person may think that he can force his enemy or other parties to comply with his desire by this method, but sometimes one dies by such fasting. These acts are not approved by the Supreme Personality of Godhead, and He says that those who engage in them are demons. Such demonstrations are insults to the Supreme Personality of Godhead because they are enacted in disobedience to the Vedic scriptural injunctions.

Source: https://www.vedabase.com/en/bg/17/5-6

*words inserted here by Suresh Vyas.

Ambedkar’s View About MK Gandhi

From: Pramod Agrawal < >

 

Ambedkar on MK Gandhi

 

“I refuse to call him mahatma! He does not deserve that title, not even from the point view of his morality.” – Dr. Bhim Rao Ambedker on M.K. Gandhi

 

The Congress party has forever used Dr. B.R. Ambedkar as their poster boy. Not many know that Ambedkar hated Congress and Gandhi, and frequently spoke against them. A quick check on a few facts, and how Congress treated Ambedkar:

Dr. Ambedkar could not find a place among the 296 members initially sent to the Constituent Assembly. A Dalit leader from East Bengal withdrew himself, paving the way for Dr. Ambedkar to enter the Constituent Assembly as a member in his own right

  1. It was Gandhi who forced Nehru to induct Ambedkar into his interim cabinet. Arun Shourie’s book Worshipping False Godsstates as follows, “Ambedkar requested Jagjivan Ram to lobby Gandhi for a cabinet berth” . Jagjivan Ram was one of the first backward class leaders in 1946. He convinced Gandhi, who in turn convinced Nehru. Christoph Jaffrelot also agrees with Shourie on this issue in his book  Ambedkar and UntouchabilityRajmohan Gandhi also elaborates in his book The Good Boatman on Gandhi’s role in securing Ambedkar’s participation through an intermediary, Muriel Lester
  2. Congress ensured Ambedkar’s defeat in the 1952 General Election. Lal Krishna Advani and Mayavati have been quoting this in many of their campaigns. You may find a link on Google about the same.

After betraying Ambedkar to this extent, I seriously wonder why Congress is even bothered in claiming Ambedkar was a part of their party.

The video given below is an interview of B.R. Ambedkar taken by a BBC journalist in 1955. Ambedkar’s views about Gandhi will shock you.

SHOCKING: “I Refuse To Call Him Mahatma” -Ambedkar’s views on Gandhi – Jagruk Bharat

 

Ambedkar never liked congress!

 

॥ जन गण मन की कहानी ॥

From: Pramod Agrawal < >

॥ जन गण मन की कहानी ॥

सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था। सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया। पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये। इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया। रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा।

उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निर्देशक (Director) रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था। और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए। रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है “जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता”। इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था।

इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है :-

“भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक (Super hero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारास्त्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। ”

जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया। जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया। क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है। जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की। वह बहुत खुश हुआ। उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये। रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए। जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था। उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया। तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया। क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था। टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो , और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है। जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया।

रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली। इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया।

सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे। रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे। अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) । इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत ‘जन गण मन’ अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है। लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ , लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे। 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये।

1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो खेमो में बट गई। जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे। मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने। जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है। इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया। कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए। एक नरम दल और एक गरम दल। गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी। वे हर जगह वन्दे मातरम् गाया करते थे। और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे)। लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे। उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना। हर समय अंग्रेजो से समझौते में रहते थे। वन्देमातरम् से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी। नरम दल वाले गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत “जन गण मन” गाया करते थे और गरम दल वाले “वन्दे मातरम् ”। नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम् नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है। उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे। उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम् गाने से मना कर दिया। जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली। संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु

द्वारा लिखित वन्देमातरम् को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई। बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु। उनका तर्क था कि वन्दे मातरम् गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट

पहुंचती थी)। अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास। गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम् के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये। तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा”। लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए। नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है। उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम् को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया। नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम् इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था। बीबीसी ने एक सर्वे किया था। उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों ने कहा वन्देमातरम् । बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम् है। कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है। तो ये इतिहास है वन्दे मातरम् का और जन गण मन का। अब ये आप को तय करना है कि आपको क्या गाना है .

इतने लम्बे पत्र को आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा इसके लिए आपका धन्यवाद्। और अच्छा लगा हो तो इसे फॉरवर्ड कीजिये, आप अगर और भारतीय भाषाएँ जानते हों तो इसे उस भाषा में अनुवादित कीजिये अंग्रेजी छोड़ कर।

जय हिंद |

 

भविष्यत् पुराण में इस्लाम के बारे में

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भविष्यत् पुराण में इस्लाम के बारे में

(कुछ ५००० साल पहले श्री व्यासदेव ने ये पुराण लिखा है। – skanda987)

 

इस्लाम के बारे में क्या लिखा गया था भविष्य पुराण में, जानकर माथा घूम जायेगा आपका .

भविष्य पुराण में इस्लाम के बारे में बता दिया गया था . भविष्य पुराण का ये संस्कृत श्लोक देखें इसका अनुवाद भी नीचे हिंदी में दिया गया है .

 

लिंड्गच्छेदी शिखाहीनः श्मश्रुधारी सदूषकः।

उच्चालापी सर्वभक्षी भविष्यति जनोमम।।25।।

विना कौलं च पश्वस्तेषां भक्ष्या मतामम।

मुसलेनैव संस्कारः कुशैरिव भविष्यति ।।26।।

तस्मान्मुसलवन्तो हि जातयो धर्मदूषकाः।

इति पैशाचधर्मश्च भविष्यति मया कृतः ।। 27।।

– (भविष्य पुराण पर्व 3, खण्ड 3, अध्याय 1, श्लोक 25, 26, 27)

 

इसका हिंदी अनुवाद:

“ रेगिस्तान की धरती पर एक “पिशाच” जन्म लेगा जिसका नाम महामद होगा, वो एक ऐसे धर्म की नींव रखेगा जिसके कारण मानव जाति त्राहि माम कर उठेगी। वो असुर कुल सभी मानवों को समाप्त करने की चेष्टा करेगा।

 

उस धर्म के लोग अपने लिंग के अग्रभाग को जन्म लेते ही काटेंगे, उनकी शिखा (चोटी ) नहीं होगी, वो दाढ़ी रखेंगे पर मूँछ नहीं रखेंगे। वो बहुत शोर करेंगे और मानव जाति को नाश करने की चेष्टा करेंगे। राक्षस जाति को बढ़ावा देंगे तथा स्वयं को सबसे बड़ा बताएँगे। और ये असुर धर्म कालान्तर में हिंसा करते करते स्वतः समाप्त हो जायेगा। “

यह श्लोक और इसका अनुवाद सत्य माना जाये तो मानना पडेगा कि कम से कम आज के संदर्भ में यह बिलकुल फिट बैठता है , विशेषकर इस्लामिक इस्लामिक स्टेट, तालिबान और बोको हराम के संदर्भ में ।

 

हमे आश्चर्य है कि इतना महत्वपूर्ण ग्रन्थ जिसने इतने समय पूर्व इतनी स्टीक और स्पष्ट भविष्यवाणियां की हुई है, दुनियां की नजरों से ओझल क्यों रहा है ? जबकि इसके विपरीत नास्त्रादेमस की भविष्यवाणिया जो अस्पष्ट, असत्य व भ्रम में डालने वाली है दुनियां भर में ख्याति पा गई है ।