कश्मीर में रमजान पर युद्ध-विराम (??)

From: Vinod Kumar Gupta < >

🔕 कश्मीर में रमजान पर युद्ध-विराम ~

💥जिस कश्मीर में “भारत काफ़िर है” के नारे लगाए जाते हो वहां युद्ध-विराम का क्या औचित्य है ? अनेक आपत्तियों के उपरांत भी केंद्रीय सरकार ने जम्मू-कश्मीर की मुख्यमन्त्री महबूबा मुफ़्ती की मांग को मानते हुए रमजान माह  (अवधि लगभग 30 दिन ) में सेना को आतंकियों के विरोध में अपनी ओर से आगे बढ़ कर कोई कार्यवाही नहीं करने का निर्णय किया है। परंतु अगर आतंकवादी गोलाबारी या अन्य आतंकी गतिविधियों को जारी रखेंगे तो उस समय उसका प्रतिरोध करने को सुरक्षाबलों को छूट होगी। फिर भी यह क्यों नही सोचा गया कि जब केंद्र सरकार की कठोर नीतियों के कारण आतंकवाद पर अंकुश लगाने में सफलता मिल रही है और पिछले एक-दो वर्षों में सैकड़ों आतंकियों को मारा भी जा चुका है तो क्या ऐसे में युद्ध विराम राष्ट्रीय हित में होगा ?
💥क्या इस निर्णय के पीछे सुरक्षा बलों के सफल अभियान से आतंकियों को सुरक्षित करने का कोई षडयंत्र तो नही है ? यद्यपि वर्षो से यह स्पष्ट है कि जब भी रमजान के अवसर पर या अन्य किसी अवसर पर कश्मीर में आतंकियों के प्रति युद्धविराम किया गया तो जिहादियों ने इस छूट का अनुचित लाभ लेते हुए अपने बिखरे हुए व कमजोर पड़ गए आतंकी साथियों को पुनः संगठित किया और सबको शस्त्रों से भी सुज्जित करके सुरक्षा प्रतिष्ठानों व निर्दोष नागरिकों पर भी आक्रमण किये थे। जिसके परिणामस्वरूप ऐसे युद्धविरामों की अवधि में हमारे सैकड़ों सुरक्षाबलों के सैनिकों व सामान्य नागरिकों को भी उन आतंकियों का शिकार बनना पड़ा था। क्या ऐसे अवसरों पर जिहादियों के आक्रमणों से लहूलुहान हुए सैनिकों और नागरिकों के परिवारों की पीड़ाओं के घावों को हरा होने दें ?
💥अतः कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि जम्मू-कश्मीर में जो भी सरकार बनती है वह कभी “रमजान” के बहाने युद्ध-विराम करवाके, तो कभी “हीलिंग-टच” द्वारा और कभी मानवाधिकार की दुहाई देकर सुरक्षाबलों को हतोत्साहित करके जाने-अनजाने आतंकवादियों को ही प्रोत्साहित करती है। जिससे सदैव राष्ट्रीय हित प्रभावित होते रहे हैं।
💥परंतु रमजान में युद्ध विराम के निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि आतंकवादी एक विशेष धर्म से संबंधित होते हैं और उनका धर्म भी होता है। क्योंकि अब आप भली प्रकार समझ सकते हैं कि रमजान का महीना जो केवल इस्लाम के अनुयायियों के लिए पवित्र होता है और जिनको सुरक्षा प्रदान करने के लिए युद्धविराम घोषित हुआ है , वे कौन है ? वे सब मुसलमान है और इस्लाम मज़हब/धर्म के मानने वाले है। अतः इससे यह भी स्पष्ट हुआ है कि आतंकवाद का भी धर्म है और वह है “इस्लाम”।
💥क्या केंद्र सरकार पर कश्मीर की मुख्य मंत्री महबूबा मुफ़्ती का ऐसा कोई दबाव है जो राष्ट्र की सुरक्षा को चुनौती देने वाली युद्धविराम की अनुचित मांग को मानने के लिए विवश होना पड़ा ? क्या यह आत्मघाती कूटनीतिज्ञता नही है ? क्या यह अदूरदर्शी निर्णय कश्मीरी कट्टरपंथियों, अलगाववादियों व आतंकवादियों के आगे घुटने टेकने का संकेत तो नही है ? क्या इससे पाक व पाक परस्त शत्रुओं को प्रोत्साहन नही मिलेगा ? समाचारों से यह भी ज्ञात हुआ है कि केंद्र सरकार ने यह निर्णय इसलिये भी लिया है कि कश्मीर के शांतिप्रिय व अमन पसंद मुसलमान अपने धार्मिक रमजान के महीने को शांतिपूर्वक मना सकें।
💥परंतु जब 1986 से हिंदुओं की हत्याओं व आगजनी का नंगा नाच आरम्भ हुआ और हिंदुओं को वहां से भागने को विवश होना पड़ रहा था तब ये अमन पसंद मुसलमान क्यों मौन थे ? हिंदुओं को घाटी छोड़ देने की चेतावनी के साथ साथ “इस्लाम हमारा मकसद है”  “कुरान हमारा दस्तूर है”  “जिहाद हमारा रास्ता है”   “WAR TILL VICTORY” आदि नारे लिखे पोस्टर पूरी घाटी में लगाये गये। यही नही  “कश्मीर में अगर रहना है ,  अल्लाहो अकबर कहना होगा ” के नारे लगाये जाने लगे जिससे वहां का हिन्दू समाज भय से कांप उठा था।
💥इन अमानवीय अत्याचारों का घटनाक्रम 28 वर्ष पूर्व सन 1990 में लाखों कश्मीरी हिंदुओं को वहां से मार मार कर उनकी बहन-बेटियों व संम्पतियों को लूट कर भगाये जाने तक जारी रहा,  तब ये शान्तिप्रिय कश्मीरी मुसलमान कहां थे ? उस संकटकालीन स्थितियों को आज स्मरण करने से भी सामान्य ह्रदय कांपनें लगता है। इस पर भी कश्मीरी मुसलमानों को शांतिप्रिय समझना क्या उचित होगा ? क्या इन शांतिप्रिय मुसलमानों ने कभी जिहाद के दुष्परिणामों से रक्तरंजित हो रही मानवता की रक्षार्थ कोई सकारात्मक कर्तव्य निभाया है ?
💥एक विडंबना यह भी है कि इन अमन पसंद लोगों के होते कश्मीर में अनेक धार्मिक स्थलों को आतंकवादी समय -समय पर  अपनी शरण स्थली भी बना लेते है। वहां “पाकिस्तान जिन्दाबाद” व “भारतीय कुत्तो वापस जाओं” के नारे तो आम बात है साथ ही पाकिस्तानी व इस्लामिक स्टेट के झण्डे लहराए जाना भी देशद्रोही गतिविधियों का बडा स्पष्ट संकेत हैं। आतंकवादियों के सहयोगी  हज़ारों पत्थरबाजों को क्षमा करने से क्या उनके अंधविश्वासों और विश्वासों से बनी जिहादी विचारधारा को नियंत्रित किया जा सकता है ?
💥मुस्लिम युवकों की ब्रेनवॉशिंग करने वाले मुल्ला-मौलवियों व उम्मा  पर कोई अंकुश न होने के कारण जिहादी विचारधारा का विस्तार थम नही पा रहा है। इस विशेष विचारधारा के कारण ही जम्मू-कश्मीर राज्य में पिछले 70 वर्षों में अरबों-खरबों रुपयों की केंद्रीय सहायता के उपरांत भी वहां के बहुसंख्यक मुस्लिम कट्टरपंथियों में भारत के प्रति श्रद्धा का कोई भाव ही नही बन सका ?
इतिहास साक्षी है कि मानवता का संदेश देने वाला हिन्दू धर्म सदियों से इस्लामिक आक्रान्ताओं को झेल रहा है।
💥परंतु जब भी और वर्तमान में भी जिहाद के लिए विभिन्न मुस्लिम संप्रदायों व अन्य समुदाय के मध्य होने वाले अनेक संघर्ष इस बात के साक्षी है कि “रमजान” में कभी भी कहीं भी काफिरों व अविश्वासियों के विरुद्ध युद्ध विराम नही किया गया। बल्कि इन मज़हबी आतंकियों में अविश्वासियों के धार्मिक त्योहारों पर व स्थलों को अपनी जिहादी मानसिकता का शिकार बनाने में सदैव प्राथमिकता रही थी और अभी भी है।
💥क्या ऐसे में युद्धविराम करके आतंकवाद पर अंकुश लगाया जा सकता है ? ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आतंकवाद पर कठोर निर्णय लेने वाली मोदी सरकार अभी इस्लामिक आतंकवाद को नियंत्रित करने के लिए अपनी इच्छा शक्ति की दृढ़ता का परिचय कराना नही चाहती। जबकि शत्रुओं को हर परिस्थितियों में दण्डित करके कुचलना ही राष्ट्रीय हित में होता है। इस प्रकार राष्ट्रीय हितों को तिलांजलि देने से क्या ऐसा सोचा जा सकता है कि भविष्य में स्वस्थ रणनीति बनाने में हमारे रणनीतिकार भ्रमित तो नही किये जा रहे हैं ?
💥अतः वर्तमान विपरीत परिस्थितियों में युद्धविराम का निर्णय राजनीति के हितार्थ भी अनावश्यक व दुःखद है। राजनैतिक कारणों से लिये गये ऐसे शासकीय निर्णयों से ही हिंदुओं में तेजस्विता धीरे धीरे नष्ट हो रही है और उनको निष्क्रिय किया जा रहा है। जिससे वे अपने शत्रु की शत्रुता को समझते हुए भी बार – बार कबूतर के समान आंखें बंद करने को विवश होते जा रहे हैं । जबकि बिल्ली रूपी जिहादी तो अपना काम कर ही रहे हैं। इसलिये नेताओं के साथ साथ अब सोचना तो हम सबको भी होगा कि “आतंकियों का भी धर्म होता है” तो उनसे कैसे सुरक्षित रहें ?

विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
गाज़ियाबाद

Hindus, KNOW YOUR SICKULAR HISTORIAN – GUHA

From: Mohan Natarajan < >

KNOW YOUR SICKULAR HISTORIAN – GUHA

DEAR ALL

A POSTING FROM ANOTHER GROUP. PLEASE DISSEMINATE

MOHAN

A POSTING IN ANOTHER GROUP, PLEASE:

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Ramachandra Guha (@Ram Guha) tweeted at 9:59 PM on Wed, May 09, 2018:

‘As I wrote in 2015, the only credible right-wing intellectual in India is Arun Shourie; the only person on that side who has produced serious books rather than clever columns or cheeky tweets. That he was completely kept out by Modi/Shah tells us all we need to know about them’.

(https://twitter.com/Ram_Guha/status/994252996203573253?s=03)

 

Very shortly afterwards, he got a reply from@TrueIndology as follows:

True Indology (@TrueIndology) tweeted at 1:05 AM on Thu, May 10, 2018:

Since 2015, Shourie has become a scholar for Ramachandra Guha because that was when Shourie turned anti BJP. Earlier, when Shourie hadn’t turned anti BJP, the same Ramachandra Guha had abused Shourie and dismissed him as “a pamphleteer parading as historian” https://t.co/57JTu3MiXN

(https://twitter.com/TrueIndology/status/994299937390116864?s=03)

True Indology (@TrueIndology) tweeted at 1:15 AM on Thu, May 10, 2018:

 

Snippet from @Ram Guha’s essay “The use and Abuse of Gandhi” from his book “An Anthropologist Among the Marxists..” In this book, he had dismissed Shourie as “pamphleteer, woefully ill informed, bilious polemicist, baiter of minorities and comparable to white American fascists” True Indology on Twitter

 

True Indology on Twitter

“Snippet from @Ram Guha’s essay “The use and Abuse of Gandhi” from his book “An Anthropologist Among the Marxist…

 

(https://twitter.com/TrueIndology/status/994302381453012992?s=03)

The tragedy is that those who occupy the intellectual space think that the Internet Hindus are fools and will not be able to call out the hypocrisy and their changing position based on the latest situation.

Like in George Orwell’s book ‘1984’, where changing alliances involved rewriting history to wipe out the abuses of the new friend when this friend was the enemy, etc.

 

The real problem in the system is not people like Ramachandra Guha, who have a pecuniary compulsion to do what they do. It is those who accept him as an intellectual and thoughtlessly look up to him as an informed guide about what is happening in India.

 

For example, in April 2017, three American Universities (Stanford, Berkley and Georgetown) had invited him to speak to an audience, where presumably would be people (particularly students) who wish to know about what is happening at the political level in India. From the topics listed, clearly the bias was to try and put the present NDA government in bad light, and to narrate how things have seriously deteriorated since it came to power in 2014.

When those who wish to consult anyone on issues relating to India and expect to receive an unbiased narration of what is happening, it is also their duty to do due diligence about the person that they are consulting.

 

When Ramachandraji so blatantly tell lies, as above, then he is doing a great disservice to the nation and its people who have provided him with the resources to live the lifestyle he does.

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RELATED PLEASE:

If ‘propaganda’ is a symphony, Ram Guha is Beethoven

Nupur J Sharma

11 May 2018

Propagandists in India are prone to tawdry and tacky methods. There is very often no elegance in their methods. No poetry. No finesse. They lie clumsily, their hypocrisy, as bright as day, for all men to behold. The kind of propagandists who use photoshop to morph images and don’t dress their lies up just enough so they don’t get caught.

Not Ramchandra Guha. Watching him propagate is like watching poetry in motion.

The lies rolling off his tongue like airy butter cookies melting in one’s mouth, his hypocrisy, misrepresentations and half-truths, blending so effortlessly to falsely present a mirage of truth.

His nonchalant brazenness that has almost become a part of his charm, only amplified by those Harry Pinteresque glasses, albeit rimless, that give him the natural air of nerdy, intellectual superiority.

How can someone not believe a man with his salt pepper, disheveled, quintessentially “intellectual” look?

 

And therein lies the beauty of his con. Look so immaculately tousled, that every bit of lie and hypocrisy is taken at face value.

 

And lord knows, Ram Guha is a treasure trove of hypocrisy and lies.

Please read on @:

http://www.opindia.com/2018/05/if-propaganda-is-a-symphony-ram-guha-is-beethoven/

 

Reply    Reply to all         Forward

 

Udayabhanu Panickar udayabhanupanickar@yahoo.com [aryayouthgroup] <aryayouthgroup@yahoogroups.com></aryayouthgroup@yahoogroups.com>

May 12 (1 day ago)

 

to aryayouthgroup

 

This message is eligible for Automatic Cleanup! (aryayouthgroup@yahoogroups.com) Add cleanup rule | More info

 

A man who fabricates history is talking.

 

Sincerely,

Udayabhanu Panickar

aum namaH ShivAya

 

Our spiritual heritage is neither a cult; a creed, a dogma; nor a one-way single path to heaven. It is multiple lane Super highway for mOKSham, which is the merger of jeevAtHman with paramAThman. It is not even just a religion as such; nor is it just a way of life. It is the complete and comprehensive collection of divine knowledge of the Absolute Truth, which, when learned and practiced; can lead people to the experience of the Absolute and the Ultimate Bliss. It is a continuously evolving and absorbing science; The Science of the Absolute, a flexible body of Divine knowledge centered on the quest of the jeevAtHman (for the English-speaking world, we may refer this as ‘soul’) for its’ birthright, ‘the divine realization’. In addition, it makes provisions for all jeevAtHman in this quest. Yet, it remains immeasurable as it safeguards the very purpose of all life everywhere and in all things. We may call It ‘SanAthana Dharma’, but never categorize it just as a religion, or just as a way of life. It is much Greater and Spiritual than both. The wise called it “The Science of Spirituality”, The Science of the Absolute”, “The Science of the Self” or “The Science of the Soul”. It is braHMavidya. We may call it AdhyAtmavidya, not a religion. ShivOham, ShivOham, ShivOham.

 

 

 

The Crusades Against Islam

Vishwas Pitke <> wrotes:

The Crusades
have finally started as predicted!
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The  first countries to ban Islam:
See how the world is acting fast on the  threat posed by Islam and its barbaric Sharia Law.
Japan has  always refused Muslims to live permanently in their country and they  cannot own any real estate or any type of business, and have banned any  worship of Islam. Any Muslim tourist caught spreading the word of Islam will be deported immediately, including all family members.
Cuba rejects plans for first mosque.
 
The African nation of Angola and several other nations have officially banned Islam.
 
Record number of Muslims,  (over 2,000)  deported from Norway as a way of fighting crime.  Since these Muslim criminals have been deported, crime has dropped by a  staggering 72%. Prison Officials are reporting that nearly half of their jail cells are now vacant, Courtrooms nearly empty, Police now  free to attend to other matters, mainly traffic offenses to keep their  roads and highways safe and assisting the public in as many ways as  they can.
 
In Germany alone in the last year there were 81  violent attacks targeting mosques.
 
Austrian police arrested 13 men targeting suspected jihad recruiters.
 
A Chinese court sends 22 Muslim Imams to jail  for 16 to 20 years for spreading Islam hatred and have executed eighteen Jihadists;  China campaigns against Separatism (disallowing  Islamist to have  their own separate state). Muslim prayers banned in government  buildings and schools in Xinjiang (Western China). Hundreds of Muslim families prepared to leave China for their own safety and return back to their own Middle Eastern countries.
 
Muslim refugees  beginning to realize that they are not welcome in Christian countries  because of their violent ways and the continuing wars in Syria and Iraq whipped up by the hideous IS who are murdering young children and using  mothers and daughters as sex slaves.
 
British Home Secretary  prepares to introduce ‘Anti-social Behavior Order’ for extremists and  strip dual nationals of their Citizenship. Deportation laws also being prepared.
 
The Czech Republic blatantly refuses Islam in their  country, regarding it as evil.
 
Alabama – A new controversial amendment that will ban the recognition of “foreign laws which would  include Sharia law”.
 
The Polish Defense League issues a warning  to Muslims. 16 States have all Introduced Legislation to Ban Sharia Law.
 
Many Muslims in Northern Ireland have announced  plans to leave the country to avoid anti-Islamic violence by Irish  locals. The Announcement comes after an attack on groups of Muslims in  the city of Belfast, Groups of Irish locals went berserk and bashed  teenage Muslim gangs who were referring to young Irish girls as sluts  and should be all gang raped, according to Islam and ”Sharia  Law”. Even hospital staff were reluctant to treat the battered Muslim Patients, the majority were given the Band-Aid treatment and  sent home with staff muttering ”Good Riddance”.
North  Carolina bans Islamic “Sharia Law” in the State, regarding it now as a  criminal offence.
 
Dutch MP’s call for removal of all mosques in  the Netherlands. One Member of the Dutch Parliament said: “We want to clean Netherlands of Islam”.  Dutch MP Machiel De Graaf spoke on  behalf of the Party for Freedom when he said, “All mosques in the  Netherlands should be shut down. Without Islam, the Netherlands would  be a wonderful safe country to live in, as it was before the arrival of  Muslim refugees”.

जिन्नाह को महान बताने वालों ! कुछ तो शर्म करो!

From: Vivek Arya < >

जिन्नाह को महान बताने वालों! कुछ तो शर्म करो!
डॉ विवेक आर्य
रावलपिंडी के समीप हिन्दुओं का एक छोटा सा गांव था। 500 के लगभग व्यसक होंगे। बाकि बच्चे, बुड्ढे। गांव के सरपंच रामलाल एक विशाल बरगद के नीचे बैठे थे। तभी मोहन भागता हुआ आया। बोला सरपंच जी, सरपंच जो। सरपंच जी कहा ,”क्या हुआ मोहन ? ” सरपंच जी मुझे पता लगा है यहाँ से 8 कोस दूर हिन्दुओं ने अपना गांव खाली करना शुरू कर दिया है। सिख भाई भी उनके साथ अमृतसर जाने की तैयारी कर रहे है। सरपंच जी ने एक लम्बी साँस ली और कहा,” मैंने कल ही रेडियो पर सुना था। महात्मा गाँधी जी  ने कहा है कि भारत-पाकिस्तान का विभाजन मेरी लाश पर होगा। क्या तुम्हें उनकी बात पर भरोसा नहीं है?” मोहन बोला,” सुना तो मैंने भी है कि जवाहर लाला नेहरू जी ने कहा है कि हिन्दुओं आश्वस्त रहो। भारत के कभी टुकड़े नहीं होंगे। तुम लोग लाहौर और रावलपिंडी में आराम से रहो। पर जिस गांव की मैं बात कर रहा हूँ। उस गांव पर पिछली रात को चारों और के मुसलमान दंगाइयों ने इकट्ठे होकर हमला कर दिया। उनकी संपत्ति लूट ली। दुकानों में आग लगा दी। मैंने तो यह भी सुना की किसी गरीब हिन्दू की लड़की को भी उठा कर ले गए। भय के कारण उन्होंने आज ही पलायन करना शुरू कर दिया हैं।”  सरपंच जी बोले,”देखो मोहन। हम यहाँ पर सदियों से रहते आये हैं। एक साथ ईद और दिवाली बनाते आये है। नवरात्र के व्रत और रोज़े रखते आये है। हमें डरने की कोई जरुरत नहीं है। तुम आश्वस्त रहो। ” मोहन सरपंच जी की बात सुनकर चुप हो गया मगर उसके मन में रह रहकर यह मलाल आता रहा कि सरपंच जी को कम से कम गांव के हिन्दुओं को इकट्ठा कर सावधान अवश्य करना चाहिए था। अभी दो दिन ही बीते थे। चारों ओर के गांवों के मुसलमान चौधरी इकट्ठे होकर सरपंच से मिलने आये और बोले। हमें मुस्लिम अमन कमेटी के लिए चंदा भेजना है। आप लोग चंदा दो। न नुकर करते हुए भी सरपंच ने गांव से पचास हज़ार रुपया इकठ्ठा करवा दिया। दो दिन बाद फिर आ गए। बोले की ओर दो। सरपंच ने कहा कि अभी तो दिया था। बोले की, “कम पड़ गया और दो। तुमने सुना नहीं 8 कोस दूर हिन्दुओं के गांव का क्या हश्र हुआ है। तुम्हें अपनी सुरक्षा चाहिए या नहीं?” सरपंच ने इस बार भय से सत्तर हज़ार इकट्ठे कर के दिए। दो दिन बाद बलूच रेजिमेंट की लोरी आई और हिन्दुओं को इकठ्ठा कर सभी हथियार यहाँ तक की लाठी, तलवार सब जमा कर ले गई। बोली की यह दंगों से बचाने के लिए किया है।  क़ुराने पाक की कसम खाकर रक्षा का वायदा भी कर गई। नवें दिन गांव को मुसलमान दंगाइयों ने घेर लिया। सरपंच को अचरज हुआ जब उसने देखा कि जो हथियार बलूच रेजिमेंट उनके गांव से जब्त कर ले गई थी। वही हथियार उन दंगाइयों के हाथ में हैं। दंगाइयों ने घरों में आग लगा दी।संपत्ति लूट ली। अनेकों को मौत के घाट उतार दिया गया।  हिन्दुओं की माताओं और बहनों की उन्हीं की आँखों के सामने बेइज्जती की गई। सैकड़ों हिन्दू औरतों को नंगा कर उनका जुलुस निकाला। हिन्दू पुरुष मन मन में यही विनती कर रहे थे कि ऐसा देखने से पहले उन्हें मौत क्यों न आ गई। पर बेचारे  क्या करते। गाँधी और नेहरू ने जूठे आश्वासन जो दिए थे। गांव के कुछ बचे लोग अँधेरे का लाभ उठाकर खेतों में भाग कर छुप गए। न जाने कैसे वह रात बिताई। अगले दिन अपने ही घर वालों की लाशे कुएं में डाल कर अटारी के लिए रेल पकड़नी थी। इसलिए किसी को सुध न थी। आगे क्या होगा। कैसे जियेंगे। कहाँ रहेंगे। यह कहानी कोई एक घर की नहीं थी। यह तो लाहौर, डेरा गाजी खां, झेलम, सियालकोट, कोहाट, मुलतान हर जगह एक ही कहानी थी। कहानी क्या साक्षात् नर पिशाचों का नंगा नाच था।
तत्कालीन कांग्रेस के अध्यक्ष आचार्य कृपलानी के शब्दों में इस कहानी को पढ़िए
“आठ मास हुए आपने मुझे कांग्रेस का अध्यक्ष चुना था। महात्मा गाँधी ने एक प्रार्थना सभा के भाषण में कहा था कि मुझे फूलों का मुकुट नहीं पहनाया जा रहा है। बल्कि काँटों की सेज पर सुलाया जा रहा है। उनका कहना बिलकुल ठीक है।  उनकी घोषणा होने के दो दिन बाद मुझे नोआखली जाना पड़ा। वहां से बिहार और अभी मैं पंजाब होकर आया हूँ।  नोआखली में जो देखा वह मेरे लिए नया अनुभव था। लेकिन बिहार में जो मैंने देखा वह और भी नया और पंजाब में जो देखा वह और भी अधिक था। मनुष्य मनुष्य नहीं रहा। स्त्रियां बच्चों को साथ लेकर इज्जत बचाने के लिए कुओं में कूद पड़ीं। उनको बाद में उससे बचाया गया। पूजा के एक स्थान में पचास स्त्रियों को इकठ्ठा करके उनके घर के लोगों ने उनको मार दिया। एक स्थान में 370 स्त्रियों और बच्चों ने अपने को आग को भेंट कर दिया है।-आचार्य कृपलानी”
(सन्दर्भ- श्यामजी पराशर, पाकिस्तान का विष वृक्ष, नवंबर,1947 संस्करण, राष्ट्रनिर्माण ग्रन्थ माला, दिल्ली, पृष्ठ 42)
महात्मा गाँधी और नेहरू जो पहले कहते थे कि पाकिस्तान हमारी लाश पर बनेगा अब कहने लगे कि हमने देश का विभाजन डरकर नहीं किया। जो खून खराबा हर तरफ हो रहा है, उसी को रोकने के लिए किया। जब हमने देखा कि हम किसी तरह भी मुसलमानों को मना नहीं सकते तब ऐसा किया गया। देश को तो 1942 में ही आज़ाद हो जाना था। अंग्रेजों ने देश छोड़ने से पहले मुस्लिम लीग को आगे कर दिया। जिन्नाह ने मांगे रखनी शुरू कर दी। मैं न मानूं की रट लगाए जिन्नाह तानाशाह की स्थिति अर्जित कर कायदे आज़म बन गया। बात बात पर वाक आउट की धमकी देता था। कभी कहता विभाजन कमेटी में सिखों को मत लो। अगर लिया तो मैं बहिष्कार कर दूंगा। कभी कहता सभी सब-कमेटियों का प्रधान किसी मुसलमान को बनाओ। नहीं तो मैं उठ कर चला जाऊंगा। कांग्रेस के लिए जिन्नाह के साथ जीना मुश्किल, जिन्नाह के बिना जीना मुश्किल। फिर जिन्नाह ने दबाव बनाने के लिए अपने गुर्गे सोहरवर्दी के माध्यम से नोआखली और कोलकाता के दंगे करवाए। सीमांत प्रान्त में दंगे करवाए। मेरठ, पानीपत, सहारनपुर, दिल्ली सारा देश जल उठा। आखिर कांग्रेस को विभाजन स्वीकार करना पड़ा। मुसलमानों को उनका देश मिल गया। हिन्दुओं को क्या मिला? एक हिन्दू राष्ट्र के स्थान पर एक सेक्युलर राष्ट्र। जिसमें बहुसंख्यक हिन्दुओं के अधिकारों से ज्यादा अल्पसंख्यक मुसलमानों के अधिकार हैं। पाकिस्तान में बचे हिन्दुओं के अधिकारों की कोई चर्चा नहीं छेड़ता। उसी कांग्रेस का 1947 में विस्थापित एक प्रधानमंत्री आज कहता है कि देश के संसाधनों पर उन्हीं अल्संख्यक मुसलमानों का अधिकार है। हिन्दू धर्मरक्षा के लिए अपने पूर्वजों की धरती छोड़ आये। अमानुषिक यातनायें सही। चित्तोड़ के जौहर के समान ललनाओं की जिन्दा चिताएं जली। राजसी ठाठ ठुकराकर दर दर के भिखारी बने। अपने बेगाने हो गए। यह सब जिन्नाह की जिद्द के चलते हुआ।
और आज मेरे देश के कुछ राजनेता यह कहते है कि जिन्नाह महान था। वह अंग्रेजों से लड़ा था।
अरे धिक्कार है तुमको जो तुम अपना इतिहास भूल गए। उन अकथनीय अत्याचारों को भूल गए। उन बलिदानों को भूल गए। अपने ही हाथों से अपनी बेटियों के काटे गए सरों को भूल गए। जिन्नाह को महान बताते हो। कुछ तो शर्म करो।
(यह लेख उन अज्ञात लाखों हिन्दु पूर्वजों को समर्पित है जिन्होंने धर्मरक्षा हेतु अपने पूर्वजों की भूमि को पंजाब और बंगाल में त्याग दिया। मगर अपने पूर्वजों के धर्म को नहीं छोड़ा। )

भारत में बलात्कार का आरंभ कहाँ से

From: JAY TEWARY < >

~बलात्कार का आरंभ~
इतिहास के आईने में  —
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आखिर भारत जैसे देवियों को पूजने वाले देश में बलात्कार की गन्दी मानसिकता कहाँ से आयी ~~
आखिर क्या बात है कि जब प्राचीन भारत के रामायण, महाभारत आदि लगभग सभी हिन्दू-ग्रंथ के उल्लेखों में अनेकों लड़ाईयाँ लड़ी और जीती गयीं, परन्तु विजेता सेना द्वारा किसी भी स्त्री का बलात्कार होने का जिक्र नहीं है।
तब आखिर ऐसा क्या हो गया ??  कि आज के आधुनिक भारत में बलात्कार रोज की सामान्य बात बन कर रह गयी है ??
~श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त की पर न ही उन्होंने और न उनकी सेना ने पराजित लंका की स्त्रियों को हाथ लगाया ।
~महाभारत में पांडवों की जीत हुयी लाखों की संख्या में योद्धा मारे गए। पर किसी भी पांडव सैनिक ने किसी भी कौरव सेना की विधवा स्त्रियों को हाथ तक न लगाया ।
अब आते हैं ईसापूर्व इतिहास में~
220-175 ईसापूर्व में यूनान के शासक “डेमेट्रियस प्रथम” ने भारत पर आक्रमण किया। 183 ईसापूर्व के लगभग उसने पंजाब को जीतकर साकल को अपनी राजधानी बनाया और पंजाब सहित सिन्ध पर भी राज किया। लेकिन उसके पूरे समयकाल में बलात्कार का कोई जिक्र नहीं।
~इसके बाद “युक्रेटीदस” भी भारत की ओर बढ़ा और कुछ भागों को जीतकर उसने “तक्षशिला” को अपनी राजधानी बनाया। बलात्कार का कोई जिक्र नहीं।
~”डेमेट्रियस” के वंश के मीनेंडर (ईपू 160-120) ने नौवें बौद्ध शासक “वृहद्रथ” को पराजित कर सिन्धु के पार पंजाब और स्वात घाटी से लेकर मथुरा तक राज किया परन्तु उसके शासनकाल में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं मिलता।
~”सिकंदर” ने भारत पर लगभग 326-327 ई .पू आक्रमण किया जिसमें हजारों सैनिक मारे गए । इसमें युद्ध जीतने के बाद भी राजा “पुरु” की बहादुरी से प्रभावित होकर सिकंदर ने जीता हुआ राज्य पुरु को वापस दे दिया और “बेबिलोन” वापस चला गया ।
विजेता होने के बाद भी “यूनानियों” (यवनों) की सेनाओं ने किसी भी भारतीय महिला के साथ बलात्कार नहीं किया और न ही “धर्म परिवर्तन” करवाया ।
~इसके बाद “शकों” ने भारत पर आक्रमण किया (जिन्होंने ई.78 से शक संवत शुरू किया था)। “सिन्ध” नदी के तट पर स्थित “मीननगर” को उन्होंने अपनी राजधानी बनाकर गुजरात क्षेत्र के सौराष्ट्र , अवंतिका, उज्जयिनी,गंधार,सिन्ध,मथुरा समेत महाराष्ट्र के बहुत बड़े भू भाग पर 130 ईस्वी से 188 ईस्वी तक शासन किया। परन्तु इनके राज्य में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं।
~इसके बाद तिब्बत के “युइशि” (यूची) कबीले की लड़ाकू प्रजाति “कुषाणों” ने “काबुल” और “कंधार” पर अपना अधिकार कायम कर लिया। जिसमें “कनिष्क प्रथम”  (127-140ई.) नाम का सबसे शक्तिशाली सम्राट हुआ।जिसका राज्य “कश्मीर से उत्तरी सिन्ध” तथा “पेशावर से सारनाथ” के आगे तक फैला था। कुषाणों ने भी भारत पर लम्बे समय तक विभिन्न क्षेत्रों में शासन किया। परन्तु इतिहास में कहीं नहीं लिखा कि इन्होंने भारतीय स्त्रियों का बलात्कार किया हो ।
~इसके बाद “अफगानिस्तान” से होते हुए भारत तक आये “हूणों” ने 520 AD के समयकाल में भारत पर अधिसंख्य बड़े आक्रमण किए और यहाँ पर राज भी किया। ये क्रूर तो थे परन्तु बलात्कारी होने का कलंक इन पर भी नहीं लगा।
~इन सबके अलावा भारतीय इतिहास के हजारों साल के इतिहास में और भी कई आक्रमणकारी आये जिन्होंने भारत में बहुत मार काट मचाई जैसे “नेपालवंशी” “शक्य” आदि। पर बलात्कार शब्द भारत में तब तक शायद ही किसी को पता था।
अब आते हैं मध्यकालीन भारत में~
जहाँ से शुरू होता है इस्लामी आक्रमण~
और यहीं से शुरू होता है भारत में बलात्कार का प्रचलन ।
~सबसे पहले 711 ईस्वी में “मुहम्मद बिन कासिम” ने सिंध पर हमला करके राजा “दाहिर” को हराने के बाद उसकी दोनों “बेटियों” को “यौनदासियों” के रूप में “खलीफा” को तोहफा भेज दिया।
तब शायद भारत की स्त्रियों का पहली बार बलात्कार जैसे कुकर्म से सामना हुआ जिसमें “हारे हुए राजा की बेटियों” और “साधारण भारतीय स्त्रियों” का “जीती हुयी इस्लामी सेना” द्वारा बुरी तरह से बलात्कार और अपहरण किया गया ।
~फिर आया 1001 इस्वी में “गजनवी”। इसके बारे में ये कहा जाता है कि इसने “इस्लाम को फ़ैलाने” के उद्देश्य से ही आक्रमण किया था।
“सोमनाथ के मंदिर” को तोड़ने के बाद इसकी सेना ने हजारों “काफिर औरतों” का बलात्कार किया फिर उनको अफगानिस्तान ले जाकर “बाजारों में बोलियाँ” लगाकर “जानवरों” की तरह “बेच” दिया ।
~फिर “गौरी” ने 1192 में “पृथ्वीराज चौहान” को हराने के बाद भारत में “इस्लाम का प्रकाश” फैलाने के लिए “हजारों काफिरों” को मौत के घाट उतर दिया और उसकी “फौज” ने “अनगिनत हिन्दू स्त्रियों” के साथ बलात्कार कर उनका “धर्म-परिवर्तन” करवाया।
~ये विदेशी मुस्लिम अपने साथ औरतों को लेकर नहीं आए थे।
~मुहम्मद बिन कासिम से लेकर सुबुक्तगीन, बख्तियार खिलजी, जूना खाँ उर्फ अलाउद्दीन खिलजी, फिरोजशाह, तैमूरलंग, आरामशाह, इल्तुतमिश, रुकुनुद्दीन फिरोजशाह, मुइजुद्दीन बहरामशाह, अलाउद्दीन मसूद, नसीरुद्दीन महमूद, गयासुद्दीन बलबन, जलालुद्दीन खिलजी, शिहाबुद्दीन उमर खिलजी, कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी, नसरत शाह तुगलक, महमूद तुगलक, खिज्र खां, मुबारक शाह, मुहम्मद शाह, अलाउद्दीन आलम शाह, बहलोल लोदी, सिकंदर शाह लोदी, बाबर, नूरुद्दीन सलीम जहांगीर,
~अपने हरम में “8000 रखैलें रखने वाला शाहजहाँ”।
~ इसके आगे अपने ही दरबारियों और कमजोर मुसलमानों की औरतों से अय्याशी करने के लिए “मीना बाजार” लगवाने वाला “जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर”।
 ~मुहीउद्दीन मुहम्मद से लेकर औरंगजेब तक बलात्कारियों की ये सूची बहुत लम्बी है। जिनकी फौजों ने हारे हुए राज्य की लाखों “काफिर महिलाओं” “(माल-ए-गनीमत)” का बेरहमी से बलात्कार किया और “जेहाद के इनाम” के तौर पर कभी वस्तुओं की तरह “सिपहसालारों” में बांटा तो कभी बाजारों में “जानवरों की तरह उनकी कीमत लगायी” गई।
~ये असहाय और बेबस महिलाएं “हरमों” से लेकर “वेश्यालयों” तक में पहुँची। इनकी संतानें भी हुईं पर वो अपने मूलधर्म में कभी वापस नहीं पहुँच पायीं।
~एकबार फिर से बता दूँ कि मुस्लिम “आक्रमणकारी” अपने साथ “औरतों” को लेकर नहीं आए थे।
~वास्तव में मध्यकालीन भारत में मुगलों द्वारा “पराजित काफिर स्त्रियों का बलात्कार” करना एक आम बात थी क्योंकि वो इसे “अपनी जीत” या “जिहाद का इनाम” (माल-ए-गनीमत) मानते थे।
~केवल यही नहीं इन सुल्तानों द्वारा किये अत्याचारों और असंख्य बलात्कारों के बारे में आज के किसी इतिहासकार ने नहीं लिखा।
~बल्कि खुद इन्हीं सुल्तानों के साथ रहने वाले लेखकों ने बड़े ही शान से अपनी कलम चलायीं और बड़े घमण्ड से अपने मालिकों द्वारा काफिरों को सबक सिखाने का विस्तृत वर्णन किया।
~गूगल के कुछ लिंक्स पर क्लिक करके हिन्दुओं और हिन्दू महिलाओं पर हुए “दिल दहला” देने वाले अत्याचारों के बारे में विस्तार से जान पाएँगे। वो भी पूरे सबूतों के साथ।
~इनके सैकड़ों वर्षों के खूनी शासनकाल में भारत की हिन्दू जनता अपनी महिलाओं का सम्मान बचाने के लिए देश के एक कोने से दूसरे कोने तक भागती और बसती रहीं।
~इन मुस्लिम बलात्कारियों से सम्मान-रक्षा के लिए हजारों की संख्या में हिन्दू महिलाओं ने स्वयं को जौहर की ज्वाला में जलाकर भस्म कर लिया।
~ठीक इसी काल में कभी स्वच्छंद विचरण करने वाली भारतवर्ष की हिन्दू महिलाओं को भी मुस्लिम सैनिकों की दृष्टि से बचाने के लिए पर्दा-प्रथा की शुरूआत हुई।
~महिलाओं पर अत्याचार और बलात्कार का इतना घिनौना स्वरूप तो 17वीं शताब्दी के प्रारंभ से लेकर 1947 तक अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में भी नहीं दिखीं। अंग्रेजों ने भारत को बहुत लूटा परन्तु बलात्कारियों में वे नहीं गिने जाते।
~1946 में मुहम्मद अली जिन्ना के डायरेक्टर एक्शन प्लान, 1947 विभाजन के दंगों से लेकर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम तक तो लाखों काफिर महिलाओं का बलात्कार हुआ या फिर उनका अपहरण हो गया। फिर वो कभी नहीं मिलीं।
~इस दौरान स्थिती ऐसी हो गयी थी कि “पाकिस्तान समर्थित मुस्लिम बहुल इलाकों” से “बलात्कार” किये बिना एक भी “काफिर स्त्री” वहां से वापस नहीं आ सकती थी।
~जो स्त्रियाँ वहां से जिन्दा वापस आ भी गयीं वो अपनी जांच करवाने से डरती थी।
~जब डॉक्टर पूछते क्यों तब ज्यादातर महिलाओं का एक ही जवाब होता था कि “हमपर कितने लोगों ने बलात्कार किये हैं ये हमें भी पता नहीं”।
~विभाजन के समय पाकिस्तान के कई स्थानों में सड़कों पर काफिर स्त्रियों की “नग्न यात्राएं (धिंड) “निकाली गयीं, “बाज़ार सजाकर उनकी बोलियाँ लगायी गयीं”
~और 10 लाख से ज्यादा की संख्या में उनको दासियों की तरह खरीदा बेचा गया।
~20 लाख से ज्यादा महिलाओं को जबरन मुस्लिम बना कर अपने घरों में रखा गया। (देखें फिल्म “पिंजर” और पढ़ें पूरा सच्चा इतिहास गूगल पर)।
~इस विभाजन के दौर में हिन्दुओं को मारने वाले सबके सब विदेशी नहीं थे। इन्हें मारने वाले स्थानीय मुस्लिम भी थे।
~वे समूहों में कत्ल से पहले हिन्दुओं के अंग-भंग करना, आंखें निकालना, नाखुन खींचना, बाल नोचना, जिंदा जलाना, चमड़ी खींचना खासकर महिलाओं का बलात्कार करने के बाद उनके “स्तनों को काटकर” तड़पा-तड़पा कर मारना आम बात थी।
अंत में कश्मीर की बात~
~19 जनवरी 1990~
~सारे कश्मीरी पंडितों के घर के दरवाजों पर नोट लगा दिया जिसमें लिखा था~  “या तो मुस्लिम बन जाओ या मरने के लिए तैयार हो जाओ या फिर कश्मीर छोड़कर भाग जाओ लेकिन अपनी औरतों को यहीं छोड़कर “।
~लखनऊ में विस्थापित जीवन जी रहे कश्मीरी पण्डित संजय बहादुर उस मंजर को याद करते हुए आज भी सिहर जाते हैं।
~वह कहते हैं कि “मस्जिदों के लाउडस्पीकर” लगातार तीन दिन तक यही आवाज दे रहे थे कि यहां क्या चलेगा, “निजाम-ए-मुस्तफा”, ‘आजादी का मतलब क्या “ला इलाहा इलल्लाह”, ‘कश्मीर में अगर रहना है, “अल्लाह-ओ-अकबर” कहना है।
~और ‘असि गच्ची पाकिस्तान, बताओ “रोअस ते बतानेव सान” जिसका मतलब था कि हमें यहां अपना पाकिस्तान बनाना है, कश्मीरी पंडितों के बिना मगर कश्मीरी पंडित महिलाओं के साथ।
~सदियों का भाईचारा कुछ ही समय में समाप्त हो गया जहाँ पंडितों से ही तालीम हासिल किए लोग उनकी ही महिलाओं की अस्मत लूटने को तैयार हो गए थे।
~सारे कश्मीर की मस्जिदों में एक टेप चलाया गया। जिसमें मुस्लिमों को कहा गया की वो हिन्दुओं को कश्मीर से निकाल बाहर करें। उसके बाद कश्मीरी मुस्लिम सड़कों पर उतर आये।
~उन्होंने कश्मीरी पंडितों के घरों को जला दिया, कश्मीर पंडित महिलाओ का बलात्कार करके, फिर उनकी हत्या करके उनके “नग्न शरीर को पेड़ पर लटका दिया गया”।
~कुछ महिलाओं को बलात्कार कर जिन्दा जला दिया गया और बाकियों को लोहे के गरम सलाखों से मार दिया गया।
~कश्मीरी पंडित नर्स जो श्रीनगर के सौर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में काम करती थी, का सामूहिक बलात्कार किया गया और मार मार कर उसकी हत्या कर दी गयी।
~बच्चों को उनकी माँओं के सामने स्टील के तार से गला घोंटकर मार दिया गया।
~कश्मीरी काफिर महिलाएँ पहाड़ों की गहरी घाटियों और भागने का रास्ता न मिलने पर ऊंचे मकानों की छतों से कूद कूद कर जान देने लगी।
~लेखक राहुल पंडिता उस समय 14 वर्ष के थे। बाहर माहौल ख़राब था। मस्जिदों से उनके ख़िलाफ़ नारे लग रहे थे। पीढ़ियों से उनके भाईचारे से रह रहे पड़ोसी ही कह रहे थे, ‘मुसलमान बनकर आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो या वादी छोड़कर भागो’।
~राहुल पंडिता के परिवार ने तीन महीने इस उम्मीद में काटे कि शायद माहौल सुधर जाए। राहुल आगे कहते हैं, “कुछ लड़के जिनके साथ हम बचपन से क्रिकेट खेला करते थे वही हमारे घर के बाहर पंडितों के ख़ाली घरों को आपस में बांटने की बातें कर रहे थे और हमारी लड़कियों के बारे में गंदी बातें कह रहे थे। ये बातें मेरे ज़हन में अब भी ताज़ा हैं।
~1989 में कश्मीर में जिहाद के लिए गठित जमात-ए-इस्लामी संगठन का नारा था-  ‘हम सब एक, तुम भागो या मरो’।
~घाटी में कई कश्मीरी पंडितों की बस्तियों में सामूहिक बलात्कार और लड़कियों के अपहरण किए गए। हालात और बदतर हो गए थे।
~कुल मिलाकर हजारों की संख्या में काफिर महिलाओं का बलात्कार किया गया।
~आज आप जिस तरह दाँत निकालकर धरती के जन्नत कश्मीर घूमकर मजे लेने जाते हैं और वहाँ के लोगों को रोजगार देने जाते हैं। उसी कश्मीर की हसीन वादियों में आज भी सैकड़ों कश्मीरी हिन्दू बेटियों की बेबस कराहें गूंजती हैं, जिन्हें केवल काफिर होने की सजा मिली।
~घर, बाजार, हाट, मैदान से लेकर उन खूबसूरत वादियों में न जाने कितनी जुल्मों की दास्तानें दफन हैं जो आज तक अनकही हैं। घाटी के खाली, जले मकान यह चीख-चीख के बताते हैं कि रातों-रात दुनिया जल जाने का मतलब कोई हमसे पूछे। झेलम का बहता हुआ पानी उन रातों की वहशियत के गवाह हैं जिसने कभी न खत्म होने वाले दाग इंसानियत के दिल पर दिए।
~लखनऊ में विस्थापित जीवन जी रहे कश्मीरी पंडित रविन्द्र कोत्रू के चेहरे पर अविश्वास की सैकड़ों लकीरें पीड़ा की शक्ल में उभरती हुईं बयान करती हैं कि यदि आतंक के उन दिनों में घाटी की मुस्लिम आबादी ने उनका साथ दिया होता जब उन्हें वहां से खदेड़ा जा रहा था, उनके साथ कत्लेआम हो रहा था तो किसी भी आतंकवादी में ये हिम्मत नहीं होती कि वह किसी कश्मीरी पंडित को चोट पहुंचाने की सोच पाता लेकिन तब उन्होंने हमारा साथ देने के बजाय कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेक दिए थे या उनके ही लश्कर में शामिल हो गए थे।
~अभी हाल में ही आपलोगों ने टीवी पर “अबू बकर अल बगदादी” के जेहादियों को काफिर “यजीदी महिलाओं” को रस्सियों से बाँधकर कौड़ियों के भाव बेचते देखा होगा।
~पाकिस्तान में खुलेआम हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर सार्वजनिक रूप से मौलवियों की टीम द्वारा धर्मपरिवर्तन कर निकाह कराते देखा होगा।
~बांग्लादेश से भारत भागकर आये हिन्दुओं के मुँह से महिलाओं के बलात्कार की हजारों मार्मिक घटनाएँ सुनी होंगी।
~यहाँ तक कि म्यांमार में भी एक काफिर बौद्ध महिला के बलात्कार और हत्या के बाद शुरू हुई हिंसा के भीषण दौर को देखा होगा।
~केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनियाँ में इस सोच ने मोरक्को से ले कर हिन्दुस्तान तक सभी देशों पर आक्रमण कर वहाँ के निवासियों को धर्मान्तरित किया, संपत्तियों को लूटा तथा इन देशों में पहले से फल फूल रही हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता का विनाश कर दिया।
~परन्तु पूरी दुनियाँ में इसकी सबसे ज्यादा सजा महिलाओं को ही भुगतनी पड़ी…
बलात्कार के रूप में ।
~आज सैकड़ों साल की गुलामी के बाद समय बीतने के साथ धीरे-धीरे ये बलात्कार करने की मानसिक बीमारी भारत के पुरुषों में भी फैलने लगी।
~जिस देश में कभी नारी जाति शासन करती थीं, सार्वजनिक रूप से शास्त्रार्थ करती थीं, स्वयंवर द्वारा स्वयं अपना वर चुनती थीं, जिन्हें भारत में देवियों के रूप में श्रद्धा से पूजा जाता था आज उसी देश में छोटी-छोटी बच्चियों तक का बलात्कार होने लगा और आज इस मानसिक रोग का ये भयानक रूप देखने को मिल रहा है ।
सादर ✍
साभार🙏-via facebook

जिन्नाह के जिन्न से नही, जिन्नाहवादी सोच से बचो

From: Vinod Kumar Gupta < >

~जिन्नाह के जिन्न से नही जिन्नाहवादी सोच से बचो〰

◾एक बार नेहरू जी ने कहा था कि  “एक क्या एक हज़ार जिन्नाह भी पाकिस्तान नही बना सकते”। तब जिन्नाह बोले थे कि  “पाकिस्तान का जन्म तो तभी हो गया था जब पहले हिन्दू का धर्मपरिवर्तन करके उसे मुसलमान बना दिया गया था “। अतः उनकी भविष्य में भारत को मुगलिस्तान बनाने की सोच व दूरदर्शिता स्पष्ट थी। जबकि हमारे नेतागण धर्मनिरपेक्षता की ओढ़नी में इस्लामिक मानसिकता से दबते हुए व परिस्थितियों से समझौता करते हुए आत्मसमर्पण करते आ रहे हैं। हम कभी मुस्लिम तुष्टिकरण की योजनाएं बनाकर उनपर भारी राजकोष व्यय करते हैं तो कभी उन्हें और अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए मुस्लिम सशक्तिकरण का अभियान चला कर आत्मसंतुष्ट होना चाहते हैं ।
◾परंतु अज्ञानवश इस सबसे हम आत्मघात की ओर बढ़ रहें हैं। इसी का परिणाम है कि जिन्नाह जैसे देशद्रोही को अपना आदर्श मानने वाला समाज उनकी विभाजनकारी नीतियों को आगे बढ़ाते हुए आज उसी राष्ट्र को जला रहा हैं जहां की माटी में वे सब पले-बढ़े हुए हैं। जिसके अन्न-जल ने उन्हें सींच कर भारत जैसे एक प्रमुख राष्ट्र का सम्मानित नागरिक बनाया है । क्या ऐसे समाज को भारत भूमि के लिये उसकी संस्कृति व आदर्शों के प्रति कोई सम्मान नहीं होना चाहिये ?
◾इस सत्य को मानना अनुचित नही कि मोहम्मद अली जिन्नाह ही पाकिस्तान के जनक कहलाये जाते है। उन्होंने मुस्लिम लीग के 22 मार्च 1940 के लाहौर अधिवेशन में द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत प्रतिपादित किया। उन्होंने कहा भारत में “हिन्दू-मुसलमान दो जातियां नही अपितु दो राष्ट्र है, क्योंकि दोनों का खान-पान , रीति-रिवाज व रहन-सहन बिल्कुल भिन्न है। दोनों न सहभोज कर सकते है और न ही दोनों सहविवाह कर सकते। यहां तक कि हिन्दू का महापुरुष मुसलमान के लिए खलनायक है व मुसलमान का महापुरुष हिन्दू का खलनायक है। इसलिए भारत को हिन्दू – भारत  व  मुस्लिम – भारत के रूप में विभाजित कर देना चाहिये “। 23 मार्च 1940 को इसी अधिवेशन में पाकिस्तान संबंधित प्रस्ताव पारित कर दिया गया, जिसके तुरंत बाद मुस्लिम  लीग के नेताओं ने जहां तहां भी उनसे हो सका हिन्दुओं व सिक्खों की हत्या, लूटमार व बलात्कार आदि आरम्भ कर दिये । ढाका, मुंबई व अहमदाबाद आदि में तो बल्वे अधिक भयंकर हुए थे।
◾इतिहास साक्षी है कि जिद्दी जिन्नाह को मनाने के लिए महात्मा गांधी सन 1944 में दिनांक  9 से 27 सितंबर तक निरन्तर 19 दिन जिन्नाह की कोठी पर गए थे और उनको “कायदे-आजम” ( सबसे बड़ा आदमी ) कहते हुए संबोधित करके गांधी जी ने मुस्लिम-तुष्टीकरण की सारी सीमाएं लांघ दी थी। परंतु जिन्नाह अपनी जिद्द पर अड़े रहे। यह सत्य है कि पूर्व में जिन्नाह कट्टरपंथी नही थे परंतु सत्ता पाने की होड़ने और नेहरू आदि के व्यवहारों ने उन्हें मुस्लिम लीग का नेता बना कर स्वतः इस्लामिक कट्टरता के मार्ग पर चलने को विवश कर दिया था।
◾यह भी अवश्य स्मरण होना चाहिये कि  16 अगस्त 1946 को जिन्नाह ने मुस्लिम लीग द्वारा सीधी कार्यवाही  ( डायरेक्ट एक्शन ) का आदेश देकर हिन्दू व सिक्खों को मारने का आह्वान किया था। जिसके कारण बंगाल की मुस्लिम लीग सरकार ने कलकत्ता की सड़कों को हिंदुओं के रक्त से लाल कर दिया। नोआखाली  में तो हिंदुओं की हज़ारों महिलाओं व लड़कियों का बलात्कार व अपहरण हुआ था। अखंड भारत के पश्चिमी पंजाब में हिन्दू व सिक्खों के लहू की नदियां बही थी। परिणामस्वरूप इन भयावह हत्याकांडों ने देश को एक खतरनाक स्थिति मे पहुँचाते हुए दर्दनाक मोड़ देने से भारत को विभाजन की त्रासदी झेलनी पड़ी ।
◾क्या किसी ने यह नही सोचा कि 1947 में भारत विभाजन की भूमिका के उत्तरदायी जिन्नाह व गाँधी एवं नेहरू के अड़ियल रुख के कारण हुए विभाजन की दुःखद त्रासदी में लगभग 2.5 करोड़ लोग बेघर हुए ,  10-15 लाख निर्दोष मारे गए व लगभग हज़ारों अबलाओं का बलात्कार हुआ और हज़ारों लोगों को अपना धर्म त्यागने का पाप झेलना पड़ा। यह केवल भारत के इतिहास की नही बल्कि मानव इतिहास को कलंकित करने वाली एक बड़ी दुर्घटना घटी थी। कायदे आजम कहलाने वाले जिन्नाह की ही योजना थी कि पाकिस्तान बनने के डेढ़ माह बाद ही कश्मीर के मीरपुर, मुजफ्फराबाद आदि बीसियों शहरों और गावों में  (जो अब पाक अधिकृत  कश्मीर में हैं ) हिंदुओं का नरसंहार करवाया गया। उस समय जिन्नाह ही पाकिस्तान के गवर्नर जनरल थे ।
◾धर्म के नाम यह सब क्यों हुआ और आगे भी होता जा रहा है क्योंकि हमको अपने हिन्दू धर्म की तेजस्विता का ज्ञान ही नही हैं और न ही हमारा कोई नेता इतना सक्षम है कि वह शुद्ध रूप से संविधान के अनुसार धर्मनिरपेक्षता का पालन कर सकें और भोली-भाले राष्ट्रवादियों की अस्मिता की रक्षा कर सकें। वर्षो पूर्व जब आडवाणी जी ने पाकिस्तान जाकर जिन्नाह को धर्मनिरपेक्ष कहा और जसवंत सिंह ने एक पुस्तक लिखकर जिन्नाह का पक्ष रखा तो संघ परिवार सहित भाजपा ने उन्हें शीर्ष नेतृत्व से अलग-थलग कर दिया था। ये दोनों नेता आज तक उस राष्ट्रीय अपमानजनक कृत्य का परिणाम भुगत रहे हैं।
◾यह अत्यंत दुःखद है कि देश में समान नागरिक सहिंता , अनुच्छेद 370 व 35 (ए) , विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं, बांग्ला देशी एवं रोहिंग्या मुसलमान घुसपैठियों व राम जन्मभूमि मंदिर की वर्षो पुरानी राष्ट्रीय समस्याओं पर सकारात्मक जागरण अभियान की प्राथमिक आवश्यकता के स्थान पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय में जिन्नाह के चित्र को लेकर विवाद  70 वर्ष बाद अब क्यों उछाला जा रहा है ? ◾भविष्य में राजनीति क्या रूप लें, अभी कहना शीघ्रता होगी क्योंकि जिन्नाहवादी पाकिस्तानी सोच राष्ट्रवादियों द्वारा मुसलमानों को अतिरिक्त लाभान्वित करवा के उनको और अधिक शक्तिशाली बनाने के लिये अपने एजेंडे पर कार्य कर रही हैं। हमारे तथाकथित राष्ट्रवादी नेता जब सत्ता से बाहर होते हैं तो सच्चर कमेटी व अल्पसंख्यक आयोग व मंत्रालय द्वारा मुसलमानों को मालामाल करने की योजनाओं का यथा संभव विरोध करने से नही चूकते और जब स्वयं सत्ता में हैं तो मुस्लिम सशक्तिकरण के लिए कोई भी मार्ग छोड़ना नही चाहते चाहे उसमें राष्ट्रवादियों को प्रताड़ना ही क्यों न झेलनी पड़ें ?
◾राजमद में ये नेता अपने सारे वायदे और सिद्धान्तों को भुला कर भविष्य में पुनः सत्ता पाने के लिये अल्पसंख्यकवाद की चपेट में आ चुके हैं। जबकि इतिहास साक्षी हैं की अल्पसंख्यकवाद का वास्तविक लाभ उठाने वाला मुस्लिम सम्प्रदाय राष्ट्रवादियों का पक्ष नही लेता। इस प्रकार की मुस्लिम उन्मुखी राजनीति  समस्त राष्ट्रवादियों व संघ परिवारों से संबंधित देशभक्तों को भी आहत कर रही हैं। फिर भी अधिकांश देशभक्त  इसको भाजपा की कूटनीतिज्ञता समझने को विवश हो रहें हैं।
◾लेकिन चाटुकारों से घिरा हुआ शीर्ष नेतृत्व जब चुनाव जीतने को ही सर्वोच्च लक्ष्य मानने लगेगा तो राजनीति में सिद्धान्तहीनता की जड़ें और अधिक गहरी होती रहेगी। नेताओं को यह ध्यान🏼रखना चाहिए कि कार्यकर्ता समाज का सेवक होता है न कि किसी नेता का दास और संगठन को नेताओं से अधिक कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है। क्योंकि किसी भी संगठन की शक्ति उसके कार्यकर्ताओं से ही निर्मित होती है , इसलिए उनकी इच्छाओं का सम्मान व सेवाओं का मूल्यांकन होना ही चाहिये।
◾अतः आज आवश्यकता यह है कि जिन्नाह के जिन्न से नही जिन्नाहवादी पाकिस्तानी / जिहादी सोच से बचना होगा इसलिए राष्ट्रवादी नेताओं को समझना होगा कि सफल राजनीति के लिये राष्ट्रवादी समाज व कार्यकर्ताओं को रबर के समान इतना न खींचों की वह टूट कर बिखर जाये।

विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
गाज़ियाबाद

ALLAH NOT FREE FROM PREJUDICE

From: Devindersing Gulati < >
ALLAH NOT FREE FROM PREJUDICE.
13. “Dread the day wherein one soul shall not make satisfaction for another soul, neither shall any intercession be accepted from them, nor shall any compensation be received, neither shall they be helped.” (2: 48)

C. ~ Should we not dread the present? One should dread evil doing on all days. If it be true that no intercession will be accepted, how can this statement be reconciled with the belief of the  Mohammedan that they will go to paradise through the intercession of the Prophet?

Does God help only those who are in paradise and not those who are in hell? If it is so, God is not free from prejudice. [Swami Dayanand; Satayarth Prakash].

Gulati
On Friday, 4 May, 2018, 7:52:28 AM IST, devindersingh gulati < > wrote:
12. “And we said, O Adam, dwell thou and thy wife in the garden, and eat of the fruit thereof plentifully wherever ye will; but approach not this tee, lest ye become of the number of the transgressors. But Satan caused them to forfeit paradise, and turned them out of the state of happiness wherein they had been, whereupon we said, Get down, one of you shall be an enemy unto the other; and there shall be a dwelling place for you on earth, a provision for a season. And Adam learned words of prayer for His Lord and then came down to earth.” (2: 35 – 37.)

C. ~ This indicates that God was not omniscient inasmuch as He one moment blesses Adam saying “Dwell thou…. In the garden” and in the next turns them out. Had He been cognizant of the future, He would not have blessed him at all? It also appears that God was powerless to punish Satan, the tempter.
Did God plant that tree for Himself or for others? If it was for others He should not have prevented them (Adam and his wife) from tasting the fruit thereof. God could never do such things, nor could they be ever found in His book. What were the words Adam leant from God and how did Adam come down on earth? Is the paradise somewhere in the sky or on some hill? Did Adam fly sown like a bird or fall down like a stone?

It appears that there is dust in paradise since Adam was made of dust. Angels too like Adam must also have been made of dust inasmuch as bodily organs cannot be made without dust (earthly material) but the body made of dust, must perish. Hence if the angels are also subject to death, one should like to know where they go after death. On the other hand if they do not die, they could not have been born, but if they were born, they would surely die. If this be the case, the statement of the Qoran that women in paradise live for ever cannot be valid inasmuch as they must also die. It follows, therefore, that all those who go to heaven will also die. [Dayanand]
Gulati
On Thursday, 3 May, 2018, 7:38:03 PM IST, devindersingh gulati < > wrote:
ALLAH WAS NOT OMNISCIENT.
11. “And when we said unto the angels, worship Adam, they all worshipped him except Eblis (Satan), who refused, and was puffed up withpride and became of the number of the unbelievers.” 2: 34.)

C. ~ This indicates that the Mohammedan God was not Omniscient i.e., He was not cognizant of the three periods of time – the past, the present, and future. Had he been Omniscient, He would not have created Satan. Nor was God All-powerful, since when Satan deliberately refuse to obey Him he could do nothing against him. Now if only one infidel (Satan), could trouble God so much as to render Him helpless what will He and His votaries do when they will have to cope with millions (according to their own belief) of infidels? God increased infirmity in some and let others astray. He must have learnt such things from Satan and Satan from God.
Gulati

Talk the 1947 Partition; Exercise Your Freedom to Talk It

From: Rajput < >

 
There is a certain country in South Asia that does not admit that it is PARTITIONED. None recollects or realizes that until recently Lahore was as “Indian” as Mumbai and Kolkata today. And since there is lack of guts, courage, even patriotism, none wishes to know from the President’s mouth the reason of Lahore being “beheaded”!
 
Where to turn for the answer, “Why was Lahore deleted from the map of India?” Or “Why has the frontier dropped from Khyber to Wagah?” And the most disturbing of all is the question, “What are the MUSLIMS doing in Delhi after the “beheading” of  LAHORE?”
We can only pray for “achche din” when not only the President but his Constitution, too, will tell the Truth by naming the TRAITORS who gave their consent to Partition, willingly or unwillingly. The frontier did not drop to Wagah automatically!
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Pakistani community in the UK is planning a great demonstration to “welcome” Mr. Modi when he comes to London next week. Indian “coolie” media is not informing the world about the origin of the country called “Pakistan” and what she did within days of gaining sovereignty from “mother” India. We have never seen a graphic representation of the invasion of Kashmir that started on October 24, 1947.
 
On that day we understood the meaning of “Islam is a religion of peace!” when Pakistani regulars, along with wild tribesmen of Frontier province, crossed the undefended border and started killing, raping and looting all the non Muslim civilians living there. Instead of consolidating their territorial gains and celebrating their victory over New Delhi, they descended to the level of beasts and barbarians and got busy with raping, looting and killing.
Today one can see Islamic “civilization” in Syria, Somalia, Iraq, Afghanistan and Pakistan where TENS OF MILLIONS of followers of Mohammed have fled their homes, lands and countries in order to live among the Christians in Europe and North America. And the Bangladeshi MUSLIMS are happy to come to the same Hindustan that they profusely abused and left, a generation ago.
 
 In Kashmir Pakistan is on the offensive but India (Bharat) is on the defensive. Muslims have been on the offensive since 712 while we HINDUS who never expelled them from our soil nor crossed the border to capture and enslave Arabia or Afghanistan, have been on the defensive, claiming to be ”morally superior”!
Suppressing all awareness of PARTITION is again an act of extreme cowardice- too extreme and beyond imagination, impossible for words to describe. Here the frontier dropped from KHYBER to WAGAH and there is NO shame or regret worth owning up in public! The Hindu nation sits SHRUNK in its cocoon and seems in agony while for the RULERS “achche din” are about to come despite the “burning fuse” in Kashmir. What “achche din” came to Bharat after the fall of Sindh (712), and then after the fall of Lahore (approx.. 900 AD) and then after the fall of Delhi (1192), and finally, after the surrender of Lahore and East Bengal (1947)?
The only promise of “achche din” is to show guts and patriotism to publicly renew the pledge of loyalty to Lahore, Multan and East Bengal till eternity.
 
Hindus who kept quiet after the defeat of 712 AD INVITED the fall of Lahore. And those who “lumped” the defeat of Lahore then INVITED the fall of Delhi in 1192 AD. And then the “achche din” came with the occupation of Bharat by Britain. Our leaders, GANDHI & NEHRU kept promising us “achche din” during all those days of slavery when all the silver, diamonds, gold and treasures of Maharajas was being taken to LONDON. But, instead, we had PARTITION and one third of Bharat flew off the map of India. So the readers ought to KNOW for sure now what is meant by “achche din” for our Hindu nation!
 
For “achche din” it is not the technical developments or the wealth and riches or the flourishing Bollywood, but an IDEOLOGICAL TRANSFORMATION of the nation’s mentality and belief system. To be serious about living safely in Delhi after fleeing East Bengal, Karachi, Lahore and Srinagar, it is necessary to go over the causes of that historic and horrendous defeat and surrender of 1947.

All the Governments of Bharat since PARTITION (1947) should have remained in the mode of grief, regret, anger, revenge and RETALIATION, making great din and noise, protesting against that uncalled for, unjustified and sudden Islamic ONSLAUGHT.
In 2001 we could have told even America after her WTC towers were set ablaze, “WE HAD WARNED YOU ABOUT ISLAMIC TERRORISM!”
Dear (perishing) Hindu nation, you cannot imagine what the NATIVES of Syria, Iran, Afghanistan and SINDH, who saw their temples destroyed men killed and women raped, had to go through when the barbarians from Arabia INVADED their lands to impose Islam.
The Jews of Irak, the Christians of Syria, the Zoroastrians of Iran and the Buddhists of Afghanistan did not vanish automatically nor do they have an EYE WITNESS of the upheaval when “Islam” arrived with Koran and Sword. But luckily only the Hindus of Pakistan are the EYE WITNESSES of that great calamity when Islam replaced secularism and drowned us in its poison, or forced us to flee in all directions. And yet for the rulers of Partitioned India this “PARTITION” was a NON EVENT that cannot be discussed in Lok Sabha or entered in the Constitution!
To conclude EVERYONE can be sure that behaving like the timid virgin who conceals the FACT of being raped again and again, Bharat will be attacked and invaded from inside and outside again and again till DELHI falls in massacres and bloodshed like Lahore.
TO ALL THOSE SLEEPING WELL SINCE 1947, DREAMING OF “ACHCHE DIN”, HERE IS THE MESSAGE:

To ensure the future of “achche din” we have to look closely and objectively at PARTITION and declare it NULL & VOID since the Muslims in Bharat are as happy or unhappy as in Pakistan. We appeal to the Rashtrapati,
“Mr. President, do what the SHEEP would do in order to survive after a pack of WOLVES has appeared in their forest. Failing to address the surrender of Lahore is to make sure that Delhi goes the SAME way!
“Let there be nationwide discussion on ‘What Sri Krishna, Sri Ram, Shivaji, Netaji, and above all, Guru Gobind Singhji, would have done facing the prospect of Partition- and the surrender of Lahore, the city founded by Luv, the son of Sri Ram and Sita Devi, where Guru Arjun Dev was tortured and killed and Shaheed Bhagat Singh was hanged to death for the cause of “achche din” (Independence)!’”*
 
rajput
Baisakhi, 2018

*  LAHORE IS NO LESS IMPORTANT THAN DELHI FOR THE HEALTH (“ACHCHE DIN”) OF BHARAT EVEN IF THE ANTS CANNOT IMAGINE THE SIZE OF AN ELEPHANT!

प्रतिभाओं को मत काटो, आरक्षण की तलवार से…

 

Shrikrishna Pandey < >

April 7 at 11:03pm

 

ये कविता किसने लिखी है, मुझे नहीं मालूम, पर जिसने भी लिखी है उसको नमन करता हूँ।

आरक्षण के मुद्दे पर बहुत ही प्रभावी अभिव्यक्ति है…..

 

करता हूँ अनुरोध आज मैं, भारत की सरकार से,

प्रतिभाओं को मत काटो, आरक्षण की तलवार से…

वर्ना रेल पटरियों पर जो, फैला आज तमाशा है,

जाट आन्दोलन से फैली, चारो ओर निराशा है…

 

अगला कदम पंजाबी बैठेंगे, महाविकट हडताल पर,

महाराष्ट में प्रबल मराठा , चढ़ जाएंगे भाल पर…

राजपूत भी मचल उठेंगे, भुजबल के हथियार से,

प्रतिभाओं को मत काटो, आरक्षण की तलवार से…

 

निर्धन ब्राम्हण वंश एक दिन परशुराम बन जाएगा,

अपने ही घर के दीपक से, अपना घर जल जाएगा…

भड़क उठा गृह युध्द अगर, भूकम्प भयानक आएगा,

आरक्षण वादी नेताओं का, सर्वस्व मिटाके जायेगा…

 

अभी सम्भल जाओ मित्रों, इस स्वार्थ भरे व्यापार से,

प्रतिभाओं को मत काटो, आरक्षण की तलवार से…

जातिवाद की नही , समस्या मात्र गरीबी वाद है,

जो सवर्ण है पर गरीब है, उनका क्या अपराध है…

 

कुचले दबे लोग जिनके, घर मे न चूल्हा जलता है,

भूखा बच्चा जिस कुटिया में, लोरी खाकर पलता है…

समय आ गया है उनका , उत्थान कीजिये प्यार से,

प्रतिभाओं को मत काटो, आरक्षण की तलवार से…

 

जाति गरीबी की कोई भी, नही मित्रवर होती है,

वह अधिकारी है जिसके घर, भूखी मुनिया सोती है…

भूखे माता-पिता , दवाई बिना तडपते रहते है,

जातिवाद के कारण, कितने लोग वेदना सहते है…

 

उन्हे न वंचित करो मित्र, संरक्षण के अधिकार से

प्रतिभाओं को मत काटो, आरक्षण की तलवार से…

 

I got this post from what’s app.

This is best poetry in my view. Please share it.

 

A BLOODIED LEAF FROM MEMORY

From: Rajput < >

On Sat, 31 Mar 2018 18:49

A BLOODIED LEAF FROM MEMORY
And then the ENEMY captured Lahore and proceeded to massacre the non Muslim residents in the city- the indigenous people.  
Gangs of killers roamed freely. Law enforcing authorities were nowhere to be seen. Residents shut their doors & windows in terror, awaiting the inevitable, expecting the worst.
There was NO law and order in Lahore just as there had been NO law and order in Multan and Rawalpindi earlier, now resembling ghost towns. The barbarians had wiped out civilization.
Those who stepped out to fetch water from the street taps, buy food or milk for the babies were instantly beheaded. The others perished in their own homes set ablaze by the highly charged Muslim mobs shouting “Allah hu Akbar”. Women and girls were dragged out of their homes to be raped and gang raped, none heeding to their anguished cries. They shouted “Mummy!, Daddy!” whose mutilated corpses lay in front of their eyes.
India, Bharat, Hindustan, whatever one may wish to call her, had DIED.
Where was humanity? Where were the champions of Secularism? Where were the super powers? Where was the UNO? where were HUMAN – RIGHTS , Where was God?
Weeks later the INVADERS were to head for Srinagar, raping, looting, burning along the way till the Indian army, flown in post-haste, confronted them just 12 miles short of Srinagar, the capital, where the residents heaved a sigh of relief.
Was “Partition” a non event like the bite of a mosquito or a devastating, crippling, major attack by a “beast” that mutilated India, devouring a leg and an arm, claimed two million lives, brought the frontier down from Khyber to Wagah, with gangrene spreading in torso?
How patriotic are those who “deny” Partition like those who deny the Jewish Holocaust? How right are they who do not wish to talk about Partition of India, fearing civil war and their own death?
Are they serving or betraying Truth? Are they brave or cowards? Can the cowards defy common sense and the entire wisdom of mankind, all the lessons from history, all Laws of Nature- and still hold on to LAND?
What do YOU think?
 
Rajput
Easter weekend 2018
(Saturday 31 March 2018)
PS: Please preserve this “leaf from memory” and save it for the coming generations, for the humanity – till eternity.
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On Sunday, April 1, 2018 7:46 AM, rsingh305 via Patriots Forum < > wrote:

Sir,

Thank you.
 
Our great civilisation and the even greater glory of our Scriptures, thoughts and writings must be seen through the lense of PERFORMANCE ON LAND. By now it should be OBVIOUS to all that our enemies, with Spiritual & Ideological epicentres in distant FOREIGN lands, aim to capture our LAND to the last square inch and exterminate us or drive us up the trees. How many Non Muslims have survived in West Punjab and what is the STATUS & IMAGE of Hindus in East Bengal?
 
In other words, all the Vedas and Granths and all our heroes and martyrs and the great scholarly volumes on the “Hindu” way of life, philosophy and Dharma, mean little if they are contemptuously considered little or irrelevant in Lahore and East Bengal, and if we see a Hindu dreaming of getting back to his home in Srinagar or crying over the sight of his looted shop and home and the burnt out shell of his temple in West Bengal. Overall “Hindu” (majority community) protective UMBRELLA was also expected to ensure the safety and well-being of the smaller and more vulnerable NATIVE “streams and tributaries” like the Jains, the SIKHS and the Buddhists.
 
“Performance on Land” means the ability of the NATIVES (Hindus) to DOMINATE our territory from KHYBER to CHITTAGONG in a virile and manly manner, NOT from Wagah to Hoogly.
With these ideas, a resurgence should begin straightaway with the aim of flying Bhagwa over KHYBER PASS once again. The WATERSHED between Savage and the Civilised has to be Khyber Pass and Sulaiman Range, not Wagah and Kutch. A bully and aggressor must NEVER be rewarded, or allowed to live with his LOOT.
 
Rajput
1 Apr 18