Subodh Kumar < >
अथर्व वेद में गो हत्या गोमांस खाने के विषय पर निम्न कथन मिलता है ।
221/26. अघविषा निपतन्ती तमो निपतिता । । AV12.5.26
221/26 जब तक गौ के हत्यारे के आरोप सिद्ध नहीं हो जाता और विष का प्रबंध नहीं होता, उस गौ हत्यारे को एक अंधेरी कोठरी में बंद रखना चाहिए | तदोपरान्त गौ के हत्यारे को विष दे कर मार डालें |
222/27. अनुगछन्ती प्राणानुप दासयति ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यस्य । । AV12.5.27
222/27 ब्रह्मगवी – गो और वेदों की वाणी– विद्वान जनों के प्रसार पचार करने वालों शत्रु के घातकों को तो दण्ड दे कर मार दिया गया , गौ भी मर गई | परंतु मृत ब्रह्मगवी हत्या करने वाले का पीछा करती है और पुनर्जन्म लेने पर उस गो हत्या करने वाले के प्राणों को नष्ट कर देती है | समाज के भविष्य को भी नष्ट कर डालती है |
223/28. वैरं विकृत्यमाना पौत्राद्यं विभाज्यमाना । । AV12.5.28
223/28 गौओं के काटने और उन के मांस को बांटने पर, घातक के कुलों में और गोरक्षा करने वालों मे वैर उत्पन्न हो जाता है (समाज में वैर उत्पन्न हो जाता है ) इस वैर का दुष्परिणाम गोहत्या करने वालों के पौत्रों तक को भोगना पड़ता है | यह वैर कहां तक जाता है, यह गोरक्षकों की गौ के प्रति श्रद्धा पर निर्भर है | (इस का प्रत्यक्ष उदाहरण आधुनिक भारतीय समाज में देखा जाता है)
224/29. देवहेतिर्ह्रियमाणा व्यृद्धिर्हृता । । AV12.5.29
224/29 (गो) मांस के व्यापार का राष्ट्र के विद्वानों और दिव्य कोटि के लोगों को पता चलने पर समाज में हिंसा का वातावरण बनता है | गौओं के दूध की कमी और कृषि कर्म की कठिनाइयों के कारण राष्ट्र की ऋद्धि समृद्धि क्षीण हो जाती है |
225/30. पाप्माधिधीयमाना पारुष्यं अवधीयमाना । । AV12.5.30
225/30(गो) मांस का व्यापार समाजिक अशांति की पापवृत्ति को प्रकट करता है और गोमांस का प्रयोग
हृदय की कठोरता को प्रकट करता है |
226/31. विषं प्रयस्यन्ती तक्मा प्रयस्ता । । AV12.5.31
226/31 (गो) मांस पकाने के प्रयास विष रूप है और इन का प्रयोग कष्ट प्रद रोगादि ज्वर रूप है |
( बौद्ध ग्रंथ “सुतनिपात” के अनुसार माता पिता , भाई तथा अन्य सम्बंधियों के समान गौएं हमारी श्रेष्ठ
सखा हैं | पूर्वकाल में केवल तीन ही रोग थे – इच्छा, भूख और क्रमिक ह्रास | परंतु पशुघात मांसाहर के
कारण 98 रोग पैदा हो गए | )
227/32. अघं प्रच्यमाना दुष्वप्न्यं पक्वा । । AV12.5.32
227/32 (गौ) मांसको पकाना पाप है | गोमांस का पका कर प्रयोग जीवन को दु:स्वनों जैसा दुखदायी
बना देता है |
228/ 33. मूलबर्हणी पर्याक्रियमाणा क्षितिः पर्याकृता । । AV12.5.33
228/33 (गो)मांस का प्रयोग यक्ष्मा जैसे अनुवांशिक रोगों से भावी संतानों की जड़ काट देता है |
229/34. असंज्ञा गन्धेन शुगुद्ध्रियमाणाशीविष उद्धृता । । AV12.5.34
229/34 (गो) मांस सेवन करने वालों में अज्ञानता – मूढ़मति– मोटी अकल होती हैं | पकते मांस की गंध का परिणाम शोक – निराशा – उत्पन्न करके विष समान है |
230/35. अभूतिरुपह्रियमाणा पराभूतिरुपहृता । । AV12.5.35
230/35 (गो) मांसाहार के प्रोत्साहन से शारीरिक तेज नष्ट हो जाता है | और समाज में रोग बढ़ते हैं
231/36. शर्वः क्रुद्धः पिश्यमाना शिमिदा पिशिता । । AV12.5.36
231/36 (गो) मांस के सेवन से क्रोध वृत्ति और हिंसक भावना बढ़ते हैं |
232/37. अवर्तिरश्यमाना निरृतिरशिता । । AV12.5.37
232/37 (गो) मांस सेवन से (अवित🙂 दरिद्रता पैदा होती है जिस से कष्ट बढ़ते है|
233/38. अशिता लोकाच्छिनत्ति ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यं अस्माच्चामुष्माच्च । । AV12.5.38
233/38 गो जाति का स्वामी परमेश्वर है | (ब्रह्मज्यम्) गो की रक्षा करने वाले को हानि पहुंचाने वाले का स्वयं सर्वनाश हो जाता है |
234/39. तस्या आहननं कृत्या मेनिराशसनं वलग ऊबध्यं । । AV12.5.39
234/39 गौ हत्या से दुष्परिणाम के अनेक अदृष्य कारण होते हैं जिन्हें एक कृत्या के सन्हारक रूप से देखा जाता है |
235/40. अस्वगता परिह्णुता । । AV12.5.40
235/40 चुराई गौ से लाभ नहीं होता
236/41. अग्निः क्रव्याद्भूत्वा ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यं प्रविश्यात्ति । ।AV12.5.41 । ।
236/41 गोरक्षकों और वेदज्ञों के जीवन को हानि पहुंचाने वालों में श्मशान की शवाग्नि घुस कर
उन को खा जाती है |
237/42. सर्वास्याङ्गा पर्वा मूलानि वृश्चति । । AV12.5.42
237/42 गौ और वेद ज्ञान का ह्रास समाज की जड़ों को नष्ट कर देता है |
238/43. छिनत्त्यस्य पितृबन्धु परा भावयति मातृबन्धु । । AV12.5.43
238/43 गौ और वेद ज्ञान का ह्रास समाज की जड़ों को नष्ट कर देता है |
माता पिता और बन्धु जनों से पारिवारिक सम्बंध भावनाओं से रहित हो जाते हैं |
( पारिवारिक प्रेम और सम्बंधों का ह्रास आधुनिक समाज में स्पष्ट देखा जाता है )
239/44. विवाहां ज्ञातीन्त्सर्वानपि क्षापयति ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यस्य क्षत्रियेणापुनर्दीयमाना । ।
AV12.5.44
239/44 गौ के प्रति आस्था और वेद ज्ञान से विमुख समाज में विवाह का महत्व क्षीण हो जाता है परिणाम, स्वरूप संतान का आचरण ठीक न होने पर भविष्य में उत्तम समाज का निर्माण नहीं हो पाता |
240/45. अवास्तुं एनं अस्वगं अप्रजसं करोत्यपरापरणो भवति क्षीयते । । AV12.5.45
240/45 गौ के प्रति आस्था और वेद ज्ञान से विमुख समाज में व्यक्तिगत घर और सम्पत्ति के साधन नष्ट होने लगते हैं | पालन पोषण के साधन क्षीण हो जाते हैं | अनाथ बच्चे और बिना घर बार के लोग दिखाई देते हैं |
241/46. य एवं विदुषो ब्राह्मणस्य क्षत्रियो गां आदत्ते । । AV12.5.46
242/47. क्षिप्रं वै तस्याहनने गृध्राः कुर्वत ऐलबं । । AV12.5.47
242/46,47 जब विद्वान, गौ और वेद ज्ञान समाज से छिन जाता है |
तब (देश की रक्षा करते हुए मारे जाने वाले) क्षत्रियों का दाह संस्कार करने वाला भी कोइ नहीं रहता , उन के शरीर को खाने के लिए गीध, चील इत्यादि ही इकट्ठे होते हैं |
243/48. क्षिप्रं वै तस्यादहनं परि नृत्यन्ति केशिनीराघ्नानाः पाणिनोरसि कुर्वाणाः पापं ऐलबं । । AV12.5.48
243/48 जब विद्वान, गौ और वेद ज्ञान समाज से छिन जाता है | यह निश्चित है , कि शीघ्र ही उन (वीर देश पर बलिदान होने वालों ) के निधन पर आह स्थान क आस पास खुले केशों वाली हाथ से छाती पीटती हुई स्त्रियां विलाप करती हुई होती हैं |
244/49. क्षिप्रं वै तस्य वास्तुषु वृकाः कुर्वत ऐलबं । । AV12.5.49
244/49 जब विद्वान, गौ और वेद ज्ञान समाज से छिन जाता है | शीघ्र ही उन क्षत्रिय राजाओं के देश में एक दूसरे से लड़ने और चिल्लाने वाले भेड़ियों से भरा समाज बन जाता है | निश्चय ही उन राजाओं के महलों में जंगली जानवर निवास करने लग जाते हैं |
245/50. क्षिप्रं वै तस्य पृछन्ति यत्तदासी३दिदं नु ता३दिति । । AV12.5.50
245/50 जब विद्वान, गौ और वेद ज्ञान समाज से छिन जाता है , शीघ्र ही उस प्रदेश में प्रजा केवल अपने अतीत के क्षत्रिय राजाओं का इतिहास याद करने लगती है |
246/51. छिन्ध्या छिन्धि प्र छिन्ध्यपि क्षापय क्षापय । । AV12.5.51
246/51जब विद्वान, गौ और वेद ज्ञान समाज से छिन जाता है , शीघ्र ही उस प्रदेश में प्रजा केवल अपने अतीत के क्षत्रिय राजाओं का इतिहास याद करने लगती है | जिसे ध्यान कर के सब ओर मार काट मार काट होने लगती है |
247/52. आददानं आङ्गिरसि ब्रह्मज्यं उप दासय । । AV12.5.52
247/52 (इस लिए) अंत में ब्रह्मगवी , गोमाता, गोरक्षा और वैदिक ज्ञान का क्षय करने वाले तत्वों पर ब्रह्मज्ञानी विजय पाते हैं | ( गौ और वेदों की रक्षा करने वाले आर्य विश्व विजयी होते हैं )
248/53. वैश्वदेवी ह्युच्यसे कृत्या कूल्बजं आवृता । । AV12.5.53
248/53 ( हे गोमाता) तुम वैश्वदेवी सब विद्वानों का हित करने वाली कही जाती हो | तुम्हारे आशीर्वाद से मिलने वाले प्रसाद की उपेक्षा करना अथवा न ग्रहण करना इतना ही हानि कारक है जितना अपने किनारों को तोड़ कर विध्वंसकारी नदी में आई बाढ़ का |
249/54. ओषन्ती समोषन्ती ब्रह्मणो वज्रः । । AV12.5.54
248/54( हे गोमाता) तुम वैश्वदेवी सब विद्वानों का हित करने वाली हो | तुम्हारे आशीर्वाद से मिलने वाले प्रसाद की उपेक्षा करना अथवा न ग्रहण करना इतना ही हानि कारक है जितना अपने किनारों को तोड़ कर विध्वंसकारी नदी में आई बाढ़ का | जो सब को समान रूप से जला कर भस्म कर देने वाले दैवीय वज्र के समान है |
250/55. क्षुरपविर्मृत्युर्भूत्वा वि धाव त्वं । । AV12.5.55
250/55गो और वेद ज्ञान के रक्षकों तुम विविध रूप से सक्षम हो कर शीघ्रता से अपना दायित्व निभाओ |
251/56. आ दत्से जिनतां वर्च इष्टं पूर्तं चाशिषः । । AV12.5.56
251/56 गौ जाति को हानि पहुंचाने वाले समाज से उन का वर्चस्व , सब योजनाओं के सिद्ध होने के सफल होने और इच्छाओं की पूर्ति और आशीर्वाद छिन जाते हैं |
252/57. आदाय जीतं जीताय लोकेऽमुष्मिन्प्र यच्छसि । । AV12.5.57
252/57गौ और वैदिक संस्कृति को हानि पहुंचाने वाले तत्वों को भविष्य में विजयी गो और वेद पालकों के अधीन हो जाना पड़ता है | (कृण्वंतोविश्वमार्यम)
253/58. अघ्न्ये पदवीर्भव ब्राह्मणस्याभिशस्त्या । । AV12.5.58
253/58 गौ और वेदों का प्रकाश करने वाले ब्रह्मचारियों की प्रतिष्ठा हो |
254/59. मेनिः शरव्या भवाघादघविषा भव । । AV12.5.59
254/59 वेद निंदक शत्रुओं के पाप के पापाचार के विरुद्ध (ब्रह्मगवी) गौ और वेद ज्ञान से महान घातक विषैला एवं वज्र समान सैन्य बल हो |
255/60. अघ्न्ये प्र शिरो जहि ब्रह्मज्यस्य कृतागसो देवपीयोरराधसः । । AV12.5.60
255/60 गौ और वेद ज्ञान के प्रति हिंसा करनेवालों को यथावत दण्ड मिले |
256/61. त्वया प्रमूर्णं मृदितं अग्निर्दहतु दुश्चितं । । AV12.5.61
256/61 गौ और वेद विरोधी दुराचारियों को न्याय और शासन व्यवस्था जला कर भस्म कर दे |
257/62. वृश्च प्र वृश्च सं वृश्च दह प्र दह सं दह । । AV12.5.62
257/62 शाब्दिक अर्थ – गौ और वेदों के प्रति हिंसा करने वालों को (वृष्च प्र विश्च ) काट डाल चीर डाल , (सं वृश्च) फाड़ डाल (दह सं दह ) फूंक दे भस्म कर दे |
भावार्थ – धर्म पर चलने वाले लोग अधर्मियों का नाश करने में सर्वदा उद्यत रहें |
258/63. ब्रह्मज्यं देव्यघ्न्य आ मूलादनुसंदह । । AV12.5.63
259/64. यथायाद्यमसादनात्पापलोकान्परावतः । । AV12.5.64
259/63,64 राजा को उचित है कि वेद व्यवस्था के अनुसार गौ और वेद और ज्ञान के घातक अधर्मियों और दोषियों को बहुत दूर कारावास (कालापानी) में रखें ।
260/65. एवा त्वं देव्यघ्न्ये ब्रह्मज्यस्य कृतागसो देवपीयोरराधसः । । AV12.5.65
261/66. वज्रेण शतपर्वणा तीक्ष्णेन क्षुरभृष्टिना । । AV12.5.66
262/67. प्र स्कन्धान्प्र शिरो जहि । । AV12.5.67
262/65,66,67 गौ और वेद ज्ञान के अनुयायी जनों –ब्राह्मणों की हिंसा करने वाले पापियों, देवताओं की अराधना न करने और हिंसा करने वाले जनों को शासन को प्रचण्ड दण्ड देवे |
263/68. लोमान्यस्य सं छिन्धि त्वचं अस्य वि वेष्टय । । AV12.5.68
264/69. मांसान्यस्य शातय स्नावान्यस्य सं वृह । । AV12.5.69
265/70. अस्थीन्यस्य पीडय मज्जानं अस्य निर्जहि । । AV12.5.70
266/ 71. सर्वास्याङ्गा पर्वाणि वि श्रथय । । AV12.5.71
266/68,69,70,71 नीति निपुण धर्मज्ञ राजा वेद मार्ग पर चल कर वेद विमुख अत्याचारी लोगों को विविध प्रकार के प्रचण्ड दण्ड देवे |
मांसाहार का पर्यावरण पर घातक प्रभाव
267/ 72. अग्निरेनं क्रव्यात्पृथिव्या नुदतां उदोषतु वायुरन्तरिक्षान्महतो वरिम्णः । । AV12.5.72
267/72 गो मांसाहार पृथ्वी को जला डालता है | पर्यावरण में वायुमन्डल और वर्षा का जल भयंकर रूप धारण कर लेते हैं (संसार में सर्वव्यापी बाढ़ और दुर्भिक्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती हैं )|
268/73. सूर्य एनं दिवः प्र णुदतां न्योषतु । ।AV12.5.73
268/73 सूर्य का ताप मान प्रचंड हो जाता है जो निश्चय ही पृथ्वी को जला देता है | ( Global Warming effect)