मुसलमान, राष्ट्रवाद और मुख्य धारा

From Vinod Kumar Gupta < >

मुसलमान: राष्ट्रवाद और मुख्य धारा       16.6.19

★इस्लाम के शासन में प्रायः अधिकांश मुख्य सरकारी पदों पर मुसलमान ही होते थे। हिन्दुओं की ही स्थिति अत्यधिक दयनीय होती थी। इस्लाम से छुटकारा मिला तो अंग्रेजों ने शासन किया। फिर भी हिन्दुओं की स्थिति अधिक नहीं सुधरी। बल्कि मुसलमानों की आक्रामकता व जिद्द के कारण उन्हें एक तिहाई भारत भूमि का भाग देने पर भी लगभग 3 करोड़ मुसलमान शेष भारत को इस्लामिक बनाने के लिए यहीं रुक गए, जिसके परिणामस्वरूप आज लगभग इनकी संख्या 25 करोड़ से ऊपर हो चुकी हैं।

★क्या यह पूर्णतः सिद्धान्त के विरुद्ध नहीं था? मुसलमानों को दुर्बल व उपेक्षित मान कर उन पर दया करने वालों को पुनः विचार करना होगा? सन् 1947 के विभाजन की पूर्व संध्या पर लाखों निर्दोष हिन्दुओं की हत्या के रक्तरंजित इतिहास से स्पष्ट होता है कि मुसलमान सदा सम्पन्न, सशक्त व आक्रामक रहें। क्या केवल जिहादी सोच वाला दुर्बल व असहाय समाज अपने से अधिक सामर्थ्य वालों का यों ही कत्लेआम करके लूटमार करने का दुःसाहस कर सकता है? लेकिन एक भ्रमित व उदार विचारधारा के वशीभूत हमारे नेताओं ने मुसलमानों को पिछड़ा, निर्धन व उपेक्षित आदि मान लिया। फलस्वरूप स्वतंत्रता के बाद से अभी तक भी मुसलमानों को विशेष लाभान्वित किया जाता आ रहा है। जबकि आज भी भारत में निर्धन हिन्दुओं की संख्या मुसलमानों से अधिक है तो फिर उन हिन्दुओं की विशेष सहायता क्यों नहीं की जाती? यह दोगलापन क्यों ?
★साप्ताहिक पत्रिका ‘पाञ्चजन्य’ 21.10.2012 में प्रकाशित प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ.सतीश चंद्र मित्तल के एक लेख “मजहबी, उन्मादी तथा राष्ट्र विरोधी खतरा”  के अनुसार “जमात-ए-इस्लामी” की स्थापना 26 अगस्त 1941 को लाहौर में हुई थी, जिसका उद्देश्य विश्व में “इस्लामी राज्य की स्थापना” करना था, के संस्थापक मौलाना अबुल आला मौदूदी का स्पष्ट विचार था कि “जो भी लोग अपने को नेशनलिस्ट (राष्ट्रवादी) या वतनपरस्त (देशभक्त) कहते हैं, वे बदकिस्मत लोग या तो इस्लाम की नसीहतों से कतई नावाकिफ (अनजान) हैं या दीगर मज़हबों (अन्य मत-पंथो) का अलिफ, वे, पे (क, ख, ग) भी नहीं जानते या वे बिल्कुल सिफर ( शून्य) हैं। एक मुसलमान सिर्फ एक मुसलमान ही हो सकता है, इसके अलावा (अतिरिक्त) कुछ नहीं। अगर वह कुछ होने का दावा करता है तो मैं गारंटी के साथ कह सकता हूँ कि वह पैगम्बर साहब के मुताबिक (अनुसार) मुसलमान नहीं है।”

★मौलाना मौदूदी ने राष्ट्रवाद को शैतान तथा देशभक्ति को शैतानी वसूल (बड़ी बुराई) बतलाया। उन्होंने ‘नेशनलिस्म’ को मुसलमानों के लिए एक जहालत (मूर्खता) बतलाया। इस्लाम और राष्ट्रीयता दोनों भावना तथा अपने मकसद के लिहाज (उद्देश्य की दृष्टि से) एक दूसरे के विरोधी है। जहां राष्ट्रीयता है वहां इस्लाम कभी फलीभूत नहीं हो सकता और जहां इस्लाम है वहां राष्ट्रीयता के लिए कोई जगह नहीं है। राष्ट्रीयता की तरक़्क़ी (उन्नति) के मायने है कि इस्लाम के फैलाने का रास्ता बंद हो जाये और इस्लाम के मायने (अर्थ) है कि राष्ट्रीयता की जड़ें बुनियाद (नींव) से उखाड़ दी जाय। उन्होंने पाकिस्तान की मांग का विरोध किया था और कहा था कि इस्लाम विश्व का मजहब है तथा इसे राष्ट्रीय सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता।
★परंतु पाकिस्तान बनने के बाद वे वहां चले गए और वहां इस्लामी राज्य की स्थापना में सक्रिय रहें। पर भारत में नए रूप में जमात-ए-इस्लामी-ए-हिन्द 1948 में बनाई गयी और उसके नेता मौलाना अबुल लईस नदवी को बनाया गया। इन्होंने भी रामपुर सम्मेलन में लगभग उसी भाषा का प्रयोग करते हुए कहा था कि “मुसलमानों के लिए बाजिव (उचित) है कि वे एक ऐसी पार्टी की शक्ल में उठ के खड़े हों जिसका मुल्क या मुल्की सरहद (देश की सीमाओं) से न कोई सरोकार हो न ही उसे कुछ लेना-देना हो। इस्लाम यह बर्दाश्त (सहन) नहीं कर सकता कि मुसलमान नेशनलिस्म या वतनपरस्ती (देश के प्रति निष्ठा) के लिए इस्लाम के असूल (कानून) छोड़ दें, मुसलमान को तो सिर्फ मुसलमान ही रहना है।”
★इस जमात के नेताओं ने पाकिस्तान बनने के बाद भी स्वयं को इस्लाम का सच्चा प्रतिनिधि व संदेशवाहक बताते हुआ यह भी दोहराया कि राष्ट्रवाद में सिवाय तबाही के कुछ नहीं मिलेगा। जमात में मुसलमानों को जीवन का उद्देश्य पूरी तरह से कुरान और शूरा के अनुसार चलने को बताया जाता है। ध्यान रहे कि भारत में जिहाद तथा मज़हवी उन्माद फैलाने में इस जमात के ही छात्र संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) का विशेष हाथ रहा है, जो आज अपनी इस्लामिक आतंकी गतिविधियों के कारण ही प्रतिबंधित है।
★ऊपरोक्त के अतिरिक्त अगर गहराई से अन्य मौलानाओं और मुस्लिम नेताओं के विचारों व इस्लामिक विद्याओं का अध्ययन किया जाय तो उनकी सोच भी मौलाना मौदूदी व उनके उत्तराधिकारियों आदि के विचारों की पोषक ही हैं ?
यह अत्यधिक दुर्भाग्यपूर्ण व अमानवीय है कि मजहबी वर्चस्व स्थापित करने के लिए यह जमात पंथनिरपेक्षता में विश्वास नहीं करती। जो कि सर्वथा भारतीय संविधान के प्रतिकूल है।
★इसलिये राष्ट्रीय एकता, अखंडता व प्रभुसत्ता के लिए ऐसे सभी संगठनों से सावधान रहने की आवश्यकता है जो राष्ट्रवाद व देशभक्ति में विश्वास नहीं करते और जो भारत के इस्लामीकरण में ही समस्त समस्याओं के सामाधान को ही मुख्यधारा समझ कर देश के संविधान की भी उपेक्षा करते आ रहे है।
★अतः जब यह सर्वविदित है कि विश्व में सर्वत्र मुसलमान की मुख्यधारा केवल इस्लाम है और इसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं तो फिर हम व हमारा राष्ट्रवादी नेतृत्व कब तक मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने की मृगमरीचिका से बाहर नहीं निकलेगा? उन्हें नित्य कोई न कोई प्रलोभन दिया जाता रहे और वे फिर भी भारतीय संस्कृति व राष्ट्रीय अस्मिता से अपने को दूर रखें और संविधान की भी उपेक्षा करें तो इसमें किसका दोष है?
★हमारे नीति नियन्ताओं को निष्पक्ष रूप से इस दिग्भ्रमित विचारधारा को त्यागना होगा। उन्हें यह सोचना चाहिये कि कट्टरपंथियों को अपने में सम्मलित करने और अलगाववाद को दूर करने के लिए एक समान नीतियों व योजनाओं का निर्माण कैसे हो? वैसे भी धर्म/पंथनिरपेक्ष देश में धर्मों के आधार पर योजनाएं बनाना असंवैधानिक है।
★अतः मुसलमान को दीन-हीन मानना सर्वथा अशुद्ध होगा। उनकी मज़हवी रूढ़िवादिता और कट्टरता को वस्तु मान कर उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। इसलिये मुसलमानों की मुख्यधारा स्वतः ही एक मृगमरीचिका बन गयी है।

(We the Hindus or non-Muslims have no reason to be concerned about bringing the Muslims into the Hindu mainstream. We foolishly made that that efforts for 700 years and the history tells that we suffered immensely in Bhaarat. Islam never wants to assimilate in any non-Muslim mainstream. it wants to convert the whole world to Islam.  Therefore, we need to purge out Islam from Bhaarat. We, with unity, need to press the Muslims in every way to quit Islam or quit Bhaarat. 1947 partition of Bhaarat is the product of Islam. After the partition Bhaarat is a Hindu State by default, and we need to declare it officially. For that the constitution must be made pro-Vedic. – Suresh Vyas)

~विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
गाज़ियाबाद 201001
उत्तर प्रदेश (भारत)

18 नवम्बर/इतिहास-स्मृति : अन्तिम सांस तक संघर्ष

From Praamod Agrawal < >

18 नवम्बर/इतिहास-स्मृति

अन्तिम सांस तक संघर्ष

भारतीय वीर सैनिकों के बलिदान की गाथाएं विश्व इतिहास में यत्र-तत्र स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं। चाहे वह चीन से युद्ध हो या पाकिस्तान से; हर बार भारतीय वीरों ने अद्भुत शौर्य दिखाया है। यह बात दूसरी है कि हमारे नेताओं की मूर्खता और समझौतावादी प्रवृत्ति ने रक्त से लिखे उस इतिहास को कलम की नोक से काट दिया। 18 नवम्बर 1962 को चुशूल में मेजर शैतान सिंह और उनके 114 साथियों का अप्रतिम बलिदान इसका साक्षी है।

उत्तर में भारत के प्रहरी हिमालय की पर्वत शृंखलाएं सैकड़ों से लेकर हजारों मीटर तक ऊंची हैं। मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में 13वीं कुमाऊं की ‘सी’ कम्पनी के 114 जवान शून्य से 15 डिग्री कम की हड्डियां कंपा देने वाली ठंड में 17,800 फुट ऊंचे त्रिशूल पर्वत की ओट में 3,000 गज लम्बे और 2,000 गज चौड़े रजांगला दर्रे पर डटे थे। 

वहां की कठिन स्थिति का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि चाय बनाने के लिए पानी को कई घंटे तक उबालना पड़ता था। भोजन सामग्री ठंड के कारण बिलकुल ठोस हो जाती थी। तब आज की तरह आधुनिक ठंडरोधी टैंट भी नहीं होते थे। 

उन दिनों हमारे प्रधानमंत्री नेहरू जी ‘हिन्दी-चीनी, भाई-भाई’ के नशे में डूबे थे, यद्यपि चीन की सामरिक तैयारियां और उसकी साम्राज्यवादी प्रवृत्ति देखकर सामाजिक रूप से संवेदनशील अनेक लोग उस पर शंका कर रहे थे। इनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री गुरुजी भी थे। उस समय हमारे सैनिकों के पास शस्त्र तो दूर, अच्छे कपड़े और जूते तक नहीं थे। नेहरू जी का मत था कि यदि हम शांति के पुजारी हैं, तो कोई हम पर आक्रमण क्यों करेगा ? पर चीन ऐसा नहीं सोचता था। 

18 नवम्बर 1962 को भोर में चार बजकर 35 मिनट पर चीनी सैनिकों रजांगला दर्रे पर हमला बोल दिया; पर उन्हें पता नहीं था कि उनका पाला किससे पड़ा है। मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में भारतीय सैनिक शत्रु पर टूट पड़े। उन्होंने अंतिम सांस और अंतिम गोली तक युद्ध किया। पल्टन के सब सैनिक मारे गये; पर चीन का कब्जा वहां नहीं हो पाया। कैसी हैरानी की बात है कि इस युद्ध का पता दिल्ली शासन को महीनों बाद तब लगा, जब चुशूल गांव के गडरियों ने सैनिकों के शव चारों ओर छितरे हुए देखे। 

सर्दियां कम होने पर जब भारतीय जवान वहां गये, तब पूरा सच सामने आया। भारतीय सैनिकों के हाथ बंदूक के घोड़े (ट्रिगर) पर थे। कुछ के हाथ तो हथगोला फेंकने के लिए तैयार मुद्रा में मिले। इसी स्थिति में वे जवान मातृभूमि की गोद में सदा के लिए सो गये। भारतीय सीमा में एक हजार से भी अधिक चीनी सैनिकों के शव पड़े थे। स्पष्ट था कि अपना बलिदान देकर 13वीं कुमाऊं की ‘सी’ कम्पनी ने इस महत्वपूर्ण चौकी की रक्षा की थी।

चीन से युद्ध समाप्त होने के बाद मूलतः जोधपुर (राजस्थान) निवासी मेजर शैतान सिंह को परमवीर चक्र, आठ सैनिकों को वीर चक्र तथा चार को सेना पदक दिया गया। सर्वस्व बलिदानी इस पल्टन को भी सम्मानित किया गया। 

इस युद्ध की स्मृति में रजांगला में एक स्मारक बना है, जिस पर 114 सैनिकों के नाम लिखे हैं। पास में ही ‘अहीर धाम’ बना है, चूंकि उस पल्टन के प्रायः सभी सैनिक रिवाड़ी (हरियाणा) के आसपास के अहीर परिवारों के थे। इस बलिदानी युद्ध से प्रेरित होकर एम.एस.सथ्यू ने ‘हकीकत’ फिल्म बनायी, जो अत्यधिक लोकप्रिय हुई।  

…………………………….इस प्रकार के भावपूर्ण संदेश एकत्रित करके नियमित रूप से भेजने वाले

महावीर प्रसाद जी सिंघल

अनुपम सिटी सेकिड़ पथोली रोड़

आगरा मौ 9897230196

अल्पसंख्यकवाद के दुष्परिणाम…

From: Vinod Kumar Gupta < >

अल्पसंख्यकवाद के दुष्परिणाम…

इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि अल्पसंख्यकवाद  की राजनीति ने हमारे राष्ट्र को अभी भी दिग्भ्रमित किया हुआ है ,जबकि यह स्पष्ट होता आ रहा है कि ‘अल्पसंख्यकवाद’ की अवधारणा  अलगाववाद व आतंकवाद की परोक्ष पोषक होने से राष्ट्र की अखण्डता व साम्प्रदायिक सौहार्द के लिये एक बड़ी चुनौती है। सन् 1947 में लाखों निर्दोषो और मासूमों की लाशों के ढेर पर हुआ अखंड भारत का विभाजन और पाकिस्तान का निर्माण इसी साम्प्रदायिक कटुता का परिणाम था। आज परिस्थितिवश यह कहना भी गलत नही कि “अल्पसंख्यकवाद” से देश सामाजिक, साम्प्रदायिक व मानसिक स्तर पर भी विभाजित होता जा रहा है। विश्व के किसी भी देश में अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों से अधिक अधिकार प्राप्त नहीं होते क्योंकि बहुसंख्यकों की उन्नति से ही देश का विकास संभव है न कि अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण अथवा उनके सशक्तिकरण से। अल्पसंख्यकों को सम्मान देना एक बात है लेकिन उनका तुष्टिकरण करना अर्थात् उनकी अनुचित बातों को मानना और उनके कट्टरवाद को समर्थन देना बिल्कुल अव्यवहारिक व अनुचित है । क्या यह विरोधाभास हमको चेतावनी नही देता कि जब कभी बहुसंख्यक हिन्दुओं, उनकी सभ्यता और संस्कृति के विरुद्ध  एवं उनके महापुरुषों के सम्मान के विपरीत कहा जाय तो स्वीकार्य है परंतु यदि कोई प्रश्न या प्रकरण अल्पसंख्यकों यानि मुस्लिमों की वास्तविकता से जुड़ा हो, उनके मुल्ला-मौलवियों से जुड़ा हो या उनकी विद्याओं और पैग़म्बर से संबंधित हो तो उसे सार्वजनिक जीवन की मर्यादा के विरुद्ध घोषित करके राष्ट्रवादियों को अपराधी बनाने के यत्न किये जाते है। हमारे देश कि संवैधानिक विडंबना भी कैैसी है कि अल्पसंख्यक कहे जाने वाले मुसलमान आदि अपने धार्मिक व नागरिक दोहरे अधिकारों से लाभान्वित होते आ रहे हैं , जबकि संविधान के अनुच्छेद  28  में बहुसंख्यक हिदुओं को उनके शिक्षा संबंधित धार्मिक अधिकारों से वंचित रखा हुआ है। इसप्रकार किसी पंथनिरपेक्ष देश में पंथ आधारित अल्पसंख्यकों व बहुसंख्यकों में भेदभाव करना क्या सर्वथा अनुचित नहीं है ? ध्यान रहे कि विश्व में कहीं भी अल्पसंख्यकों के अनुसार कानून नहीं बनाए जाते। वहाँ के कानून बहुसंख्यक भूमि पुत्रों के धार्मिक रीति-रिवाज़ों व संस्कृति पर आधारित होते हैं । इन्हीं कानूनों के अनुसार अल्पसंख्यकों को अपने रीति रिवाज़ों को अपनाते हुए वहाँ के मूल निवासियों के साथ मिलजुल कर रहना होता है। इसीलिये ‘अल्पसंख्यक कौन और क्यों’ पर एक बड़ी बहस आज अत्यंत आवश्यक हो गयी है।

दशकों से अल्पसंख्यकवाद  की राजनीति ने हमारे राष्ट्र को कर्तव्यविमुख कर दिया है । इसलिए जो कट्टरवाद के समर्थक हैं और अलगाववाद व आतंक को कुप्रोत्साहित करते हैं उन्हें दंडित करने में भी अनेक समस्याएँ आ जाती हैं। वर्षों से आई.एस.आई. व अन्य आतंकवादी संगठनों ने अपने स्थानीय सम्पर्को से मिल कर सारे देश में देशद्रोहियों का जाल फैला रखा है , जिसके कारण देश के अधिकांश नगरों और कस्बों में आतकियों के अड्डे मिलें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा ? अल्पसंख्यकवाद की राजनीति ने केवल राजनीतिज्ञों को ही पथभ्रष्ट नहीं किया बल्कि राष्ट्र का चेतन समाज भी पथभ्रष्ट होता जा रहा है।राष्ट्रवाद व हिंदुत्व की निंदा को हम पंथ/धर्म निरपेक्षता मानने लगे हैं । हम बहुसंख्यक हिन्दू आत्मनिन्दा करते हुए थकते ही नहीं जो एक चिंताजनक स्थिति बन चुकी है। आज हिंदुत्व विरोध को प्रगतिशीलता और आतंकवाद के विरोध को साम्प्रदायिकता समझने की आम धारणा बन गई है। जिस बंग्लादेशी मुस्लिम आदि घुसपैठ को सर्वोच्च न्यायालय ने “राष्ट्र पर आक्रमण” माना था उसे न केवल यथावत् जारी रहने दिया गया, बल्कि उसका विरोध करने वालों को सांप्रदायिक माना जाने लगा। वही प्रवृत्ति देश की बर्बादी के नारे लगाने वालों को देशद्रोही कहना तथाकथित बुद्धिजीवियों व सेक्युलर नेताओं को अस्वस्थ बना देती है
और इसी अल्पसंख्यकवाद का दुष्परिणाम है कि प्रखर राष्ट्रवाद को हिन्दू कट्टरवाद व साम्प्रदायिक कहा जाने लगा है । अल्पसंख्यकवाद के पोषण से हमारी वसुधैव कुटुंबकम् की संस्कृति व सर्व धर्म समभाव की धारणा निरंतर आहत हो रही है। निःसंदेह हमारी संस्कृति किसी से बदला लेने या उस पर आक्रामक होने की नहीं है, फिर भी हम आतंकवादियों और कट्टरपंथियों को संरक्षण देने वालों को देश का शुभचिंतक नहीं मान सकते ? आक्रान्ताओं की जिहादी विकृति जो मानवता विरोधी है और विश्व शांति के लिए एक भयंकर चुनौती है , समाज में अलगाववाद का विष ही घोल रही है। अतः राष्ट्रीय सुरक्षा व विकास के लिए अति अल्पसंख्यकवाद से सावधान रहना चाहिये। यह सत्य है कि भूमि पुत्र बहुसंख्यकों की अवहेलना करके कोई राष्ट्र प्रगति नहीं कर सकता। यह विचित्र है कि आज इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में समर्पित राजनीतिज्ञ , सामाजिक व धार्मिक नेता  अलग-थलग पड़ते जा रहें है। आधुनिकता की चकाचौंध ने सभी को राष्ट्रनीति के स्थान पर राजनीति के चक्रव्यूह में फँसा दिया है जिससे अल्पसंख्यकवाद की पोषित राजनीति ने राष्ट्र को अपने मानवीय मूल्यों, नैतिक आधारो, धर्म व संस्कृति आदि को ही धीरे धीरे तिलांजलि देने को विवश कर दिया है।
मुस्लिम पोषित राजनीति का पर्याय बन चुका “अल्पसंख्यकवाद ” आज अपने एकजुट वोटों के सहारे भारत ही नही सारे संसार में जहाँ जहाँ लोकतंत्र है वहाँ वहाँ अपनी संख्या के बल पर पर प्रभावी होता जा रहा है। आज जब विश्व में इन जिहादियों के वीभत्स अत्याचारों से सारी मानवता त्राहि-त्राहि कर रही है, फिर भी विश्व के अनेक शक्तिशाली नेता धैर्य रखो और देखते रहो की नीतियों पर चलना चाहते हैं। अनेक गणमान्य लोगों का मानना है कि इन कट्टरपंथी मुसलमानों का सर्वमान्य एक ही लक्ष्य है  “दारुल-इस्लाम” …अतः इनकी कितनी ही उदार सहायता करते रहो फिर भी इनकी अनन्त माँगे कभी पूरी नहीं होंगी। इनकी स्पष्ट मान्यता है कि जब तक इस्लाम है तब तक जिहाद रुकेगा नहीं और जो विश्व के इस्लामीकरण से कम में संतुष्ट होने वाला नहीं है। इसके लिए हाफिज सईद, मसूद अजहर, अबु बकर बगदादी और जाकिर नाईक जैसे इस्लाम के हज़ारों हिंसक व अहिंसक प्रवर्तक वर्षों से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सक्रिय हैं।
मैने यह लेख लगभग 2 वर्ष पूर्व भी सम्भवतः प्रेषित किया होगा लेकिन आज भी उतना ही प्रसांगिक हैं। मोदी सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी द्वारा पांच करोड़ मुस्लिम छात्र-छात्राओं को दी जाने वाली छात्रवृत्ति की घोषणा आज मुख्य विवाद का कारण बन गयी है। अनेक योजनाओं द्वारा पिछले कार्यकाल में मुसलमानों को निरंतर लाभान्वित करने वाले मंत्री जी अति शीघ्रता व चतुरता से उनको (मुसलमानों) पुनः लाभान्वित करने में सक्रिय हो गए हैं। लेकिन मुसलमानों को मुख्य धारा में लाने के झूठे भ्रम में फंस कर अरबों-खरबों के धन का दुरुपयोग पूर्णतः अनुचित हैं। निःसंदेह जब तक मदरसा शिक्षा प्रणाली रहेगी तब तक मुसलमानों को मुख्य धारा में लाने के नाम पर कितना ही राजकीय कोष लुटाते रहो जिहाद पर अंकुश नहीं लग सकेगा। अतः अगर सरकार वास्तव में मुसलमानों का भला चाहती है तो मदरसा शिक्षा प्रणाली बंद करनी होगी। भारतीय सीमाओं पर कुकरमुत्तों की तरह उग रहे हज़ारों अवैध अरबी-फारसी मदरसे जो आतंकवादियों के पोषक व सहायक है, पर सरकार को विशेष सर्जिकल स्ट्राइक करनी होगी। अल्पसंख्यक मंत्री जी को अपनी राष्ट्रवादिता का परिचय देने के लिये आज देश में शिक्षा संबंधित एक समान व्यवस्था लागू करवानी चाहिये। इससे ही सबका साथ,सबका विकास और सबका विश्वास का ध्येय सफल होगा।
इसलिये तटस्थ रहकर विचार करना होगा कि  इस्लामिक जिहाद से त्रस्त भारत सहित विश्व के अनेक देश इस नफरत व घृणास्पद वैचारिक जड़ता को मिटाने के लिए मुस्लिम कट्टरपंथियों की कितनी ही आर्थिक व समाजिक सहायता करते रहें , फिर भी क्या वे उस राष्ट्र की मुख्य धारा से कभी जुड़ें या जुड़ेंगे ? इसमें भी कोई संदेह नहीं कि इन कट्टरपंथी जिहादियों को सुरक्षा एजेंसियों के भरोसे भी नियंत्रित नहीं किया जा सकता। अतः मानवता की रक्षा के लिए मुसलमानों का अतिरिक्त पोषण बंद करना होगा और इनकी धार्मिक शिक्षाओं व दर्शन में आवश्यक संशोधन करवाने होंगे ।
विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक एवं लेखक)
गाज़ियाबाद

Winston Churchill , Great Statesman of 20th Century

From:

G V Chelvapilla

1861 Wilson ave

Arcadia, CA, 91006                                                                                        June 10th 2019

 

To:

Larry P. Arnn

President, Hillsdale College

Pursuing Truth – Defending Liberty since 1844

 

Dear Mr. Larry P Arnn,

Thanks for sending your assessment of Churchill as great statesman of 20th century. Hope in your learned treatise and in stated ‘pursuing Truth, Defending Liberty since 1844’ you did not overlook heinous role the same Churchill has played in inflicting starvation on India a more powerful weapon than any bomb during II war, just as vicious as gas chambers of Hitler or Gulags of Stalin.

Late Churchill hailed as ‘great statesman’ by you of 20th century is responsible for starving deaths of millions of people of India especially in Bengal during II war when he deliberately and purposefully prevented plenty of food grain on fields to reach starving people even though even British officials on ground in India pleaded with him. Instead he was careful to drop food packets to Gibbons on rock of Gibraltar because he was told and believed that as long as those Gibbons were there, control by British of that strategic area will be intact.

Go ahead hail him , but then you should also take into consideration for proper perspective the fact when it comes to getting rid of human beings considered disposable by ‘great statesmen’ , he was no different from Hitler or Stalin of the same II war who also have to their  credit in getting rid of millions and millions of innocent people.  It is estimated anywhere from 3 million to 30 million people of India were starved to death by manmade famine in Bengal , India during II war with which India had nothing to do, yet  contributed more soldiers than France- 2 million of India fought for allied powers and turned the tide in many theaters of  II war. Money too went from India to finance British war effort. Yet incorrigible imperialists,  being what they were , most notable among them being Churchill felt it is prudent to inflict starvation and famines on India in return for all the loot taken from India,  besides of course as a parting kick for the temerity of India  for demanding  freedom by further fragmenting India into 562 pieces biggest of them being Pakistan from where many terrorists have attacked both London and New York in more recent period, a typical example of biting the hand that feeds.

Here are some pictures of that era from Bengal India. Sir Winston Churchill was not just well aware of that tragedy, but played an important role both as Prime Minister and as on opposition leader later in fragmentation of India.

Wish you all the best in your pursuit of truth which by the way is motto of India as well- Satyameva Jayathe. Truth will triumph.

Best wishes,                                                                                                                                                                                                         G V Chelvapilla

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Starvation People Bengal During II War , Churchill’s Role – Image Results