ईसाई समाज अपने गिरेबान में तो झांकें

From: Vivek Arya < >

ईसाई समाज अपने गिरेबान में तो झांकें

डॉ विवेक आर्य

दिल्ली के ईसाई आर्क बिशप अनिल काउटो ने पादरियों को चिट्ठी लिखी है कि 2019 में नई सरकार के लिए दुआ कीजिये और हर शुक्रवार को उसके लिए उपवास रखिये। मामले ने तूल पकड़ लिया है। ईसाईयों का मानना है कि जबसे मोदी सरकार ने सत्ता संभाली है। तबसे अल्पसंख्यक ईसाईयों पर अत्याचार हो रहा हैं। ईसाई समाज में निम्नलिखित प्रतिक्रिया मोदी जी काल में देखने को मिल रही हैं। ईसाईयों द्वारा पहले दिल्ली के ईसाई गिरिजाघरों में चोरी की घटनाओं को सांप्रदायिक घटना करार दिया गया। फिर बंगाल में एक नन से बलात्कार की घटना को हिन्दू आतंकवाद के जुमले से जोड़ा गया जबकि दोषी बांग्लादेशी अवैध मुस्लिम शरणार्थी निकला। फिर झारखण्ड सरकार द्वारा धर्म परिवर्तन विधेयक पारित किये जाने का ईसाई संस्थाओं ने पुरजोर विरोध किया। गुजरात, नागालैंड और मेघालय के चुनावों में भी चर्च द्वारा मोदी विरोधी पार्टियों को वोट देने की अपील निकाली गई थी। वैसे तो जबसे मोदी सरकार द्वारा सभी NGO को उनके खर्च का लेखा जोखा दर्ज करवाने का आदेश दिया गया है। तभी से ईसाई संस्थाओं में खलबली मच गई थी। उनकी यह खलबली ईसाई फतवों के रूप में सामने आ रही हैं। अपने आपको नैतिक, शिष्ट, सभ्य, आधुनिक सोच का बताने वाला ईसाई समाज खुलेआम कैसे धर्म परिवर्तन में लगे हुआ हैं। सभी को मालूम हैं। उनकी इस मनमर्जी पर सरकार अंकुश न लगाए। इसलिए चर्च मोदी सरकार के विरोध में बयानबाजी कर रहा हैं।

पर नैतिकता की बात करने वाले चर्च को वर्तमान के साथ साथ इतिहास में भी झांक कर देख लेना चाहिए। जैसे आज साम,दाम, दंड और भेद की नीति से वह धर्म परिवर्तन में लीन हैं। इतिहास में उसने इससे भी अधिक काले और अक्षम्य अपराध किये हैं। इस लेख में आप वह इतिहास जानिए।

भारत देश में ईसाई मत का आगमन कब हुआ। यह कुछ निश्चित नहीं हैं। एक मान्यता के अनुसार 52 AD में संत थॉमस का आगमन दक्षिण भारत में हुआ। उनके प्रभाव से ईसाई बने भारतीय अपने आपको सीरियन ईसाई कहते हैं। ईसाई इतिहासकारों की इस मान्यता में अनेक कल्पनायें समाहित हैं।[i] वास्को दे गामा के 1498 में भारत आगमन के साथ ईसाई व्यापारी के रूप में भारत आने लगे। वास्को दी गामा ने केरल के राजा के ऊपर कैसा अत्याचार किया था। यह जगजाहिर है।
भारत में ईसाईयों के इतिहास में दो हस्तियों के कारनामे सबसे अधिक प्रसिद्द हैं। पहले फ्रांसिस ज़ेवियर और दूसरे रोबर्ट दी नोबिली। पुर्तग़ालियों के भारत आने और गोवा में जम जाने के बाद ईसाई पादरियों ने भारतीयों का बलात् धर्म-परिवर्तन करना शुरू कर दिया[ii]। इस अत्याचार को आरम्भ करने वाले ईसाई पादरी का नाम फ्रांसिस ज़ेवियर (Francis Xavier, 7 April 1506–3 December 1552) था। फ्रांसिस ज़ेवियर ने हिन्दुओं को धर्मान्तरित करने का भरसक प्रयास किया मगर उसे आरम्भ में विशेष सफलता नहीं मिली। उसने देखा की उसके और ईसा मसीह की भेड़ों की संख्या में वृद्धि करने के मध्य हिन्दू ब्राह्मण सबसे अधिक बाधक हैं। फ्रांसिस जेविअर के अपने ही शब्दों में ब्रह्माण उसके सबसे बड़े शत्रु थे क्यूंकि वे उन्हें धर्मांतरण करने में सबसे बड़ी रुकावट थे। फ्रांसिस ज़ेवियर ने इस समस्या के समाधान के लिए ईसाई शासन का आश्रय लिया। वाइसराय द्वारा यह आदेश लागू किया गया कि सभी ब्राह्मणों को पुर्तगाली शासन की सीमा से बाहर कर दिया जाये । गोवा में किसी भी स्थान पर नए मंदिर के निर्माण एवं पुराने मंदिर की मरमत करने की कोई इजाज़त नहीं होगी[iii]। इस पर भी असर न देख अगला आदेश लागू किया गया की जो भी हिन्दू ईसाई शासन के मार्ग में बाधक बनेगा उसकी सम्पति जप्त कर ली जाएगी। इससे भी सफलता न मिलने अधिक कठोरता से अगला आदेश लागू किया गया। राज्य के सभी ब्राह्मणों को धर्म परिवर्तन कर ईसाई बनने का अथवा देश छोड़ने का फरमान जारी हुआ। इस आदेश के साथ हिन्दुओं विशेष रूप से ब्राह्मणों पर भयंकर अत्याचार आरम्भ हो गये। हिन्दू पंडित और वैद्य पालकी पर सवारी नहीं कर सकता था। ऐसा करने वालो को दण्डित किया जाता था। यहाँ तक जेल में भी ठूस दिया जाता था[iv]। हिन्दुओं को ईसाई बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। ईसाई बनने पर राज संरक्षण की प्राप्ति होना एवं हिन्दू बने रहने पर प्रताड़ित होने के चलते हजारों हिन्दू ईसाई बन गए[v]। हिन्दुओं को विवाह आदि पर उत्सव करने की मनाही करी गई। ईसाई शासन के अत्याचारों के चलते हिन्दू बड़ी संख्या में पलायन के लिए विवश हुए[vi]। फ्रांसिस ज़ेवियर के शब्दों में परिवर्तित हुए हिन्दुओं को ईसाई बनाते समय उनके पूजा स्थलों को,उनकी मूर्तियों को उन्हें तोड़ने देख उसे अत्यंत प्रसन्नता होती थी। हजारों हिन्दुओं को डरा धमका कर, अनेकों को मार कर, अनेकों को जिन्दा जला कर, अनेकों की संपत्ति जब्त कर, अनेकों को राज्य से निष्कासित कर अथवा जेलों में डाल कर ईसाई मत ने अपने आपको शांतिप्रिय एवं न्यायप्रिय सिद्ध किया[vii]। हिन्दुओं पर हुए अत्याचार का वर्णन करने भर में लेखनी कांप उठती है। गौरी और गजनी का अत्याचारी इतिहास फिर से सजीव हो उठा था[viii]। विडंबना देखिये की ईसा मसीह के लिए भेड़ों की संख्या में वृद्धि के बदले फ्रांसिस जेविअर को ईसाई समाज ने संत की उपाधि से नवाजा गया। गोवा प्रान्त में एक गिरिजाघर में फ्रांसिस ज़ेवियर की अस्थिया सुरक्षित रखी गई है। हर वर्ष कुछ दिनों के लिए इन्हें दर्शनार्थ रखा जाता है। सबसे बड़ी विडंबना देखिये इनके दर्शन एवं सम्मान करने गोवा के वो ईसाई आते है जिनके पूर्वज कभी हिन्दू थे एवं उन्हें इसी ज़ेवियर ने कभी बलात ईसाई बनाया गया था।

रोबर्ट दी नोबिली नामक ईसाई का आगमन 1606 में मदुरै, दक्षिण भारत में हुआ। उसने पाया की वहां पर हिन्दुओं को धर्मान्तरित करना लगभग असंभव ही है। उसने देखा की हिन्दू समाज में ब्राह्मणों की विशेष रूप से प्रतिष्ठा हैं। इसलिए उसने धूर्तता करने की सोची। उसने पारम्परिक धोती पहन कर एक ब्राह्मण का वेश धरा। जनेऊ, शिखा रख कर शाकाहारी भोजन करना आरम्भ कर दिया। उसने यह प्रचलित कर दिया की वह सुदूर रोम से आया हुआ ब्राह्मण है। उसके पूर्वज भारत से रोम गए थे। उसने तमिल और संस्कृत भाषा में ग्रन्थ रचना करने का नया प्रपंच भी किया। इस ग्रन्थ को उसने “वेद” का नाम दिया। ब्राह्मण वेश धरकर नोबिली ने सत्संग करना आरम्भ कर दिया। उसके सत्संग में कुछ हिन्दू आने लग गए। धीरे धीरे उसने सत्संग में ईसाई प्रार्थनों का समावेश कर दिया। उसके प्रभाव से अनेक हिन्दू ईसाई बन गए[ix]। कालांतर में मैक्समूलर ने नोबिली के छदम “वेद” का रहस्य उजागर कर दिया। पाठक सोच रहे होंगे की मैक्समूलर ने ऐसा क्यों किया। जबकि दोनों ईसाई थे। उत्तर सुनकर रोंगटे खड़े हो जायेगे। नोबिली ईसाइयत के एक सम्प्रदाय रोमन कैथोलिक से सम्बंधित था जबकि मैक्समूलर प्रोटोस्टेंट सम्प्रदाय से सम्बंधित था। दोनों के आपसी जलन और फुट ने इस भेद का भंडाफोड़ कर दिया। जहाँ पर धर्म का स्थान मज़हब/मत मतान्तर ले लेते हैं। वहां पर ऐसा ही होता है।

नोबिली को ईसाई समाज में दक्षिण भारत में धर्मान्तरण के लिए बड़े सम्मान से देखा जाता है। पाठक स्वयं विचार करे। वेश बदल कर धोखा देने वाला नकल करने वाला सम्मान के योग्य है अथवा तिरस्कार के योग्य है? प्रसिद्द राष्ट्रवादी लेखक सीता राम गोयल द्वारा ईसाई समाज द्वारा हिन्दू वेश धारण करने, हिन्दू मंदिरों के समान गिरिजाघर बनाने, हिन्दू धर्मग्रंथों के समान ईसाई भजन एवं मंत्र बनाने, हिन्दू देवी देवताओं के समान ईसा मसीह एवं मरियम की मूर्तियां बनाने, ईसाई शिक्षण संस्थान को गुरुकुल की भाँति नकल करने की अपने ग्रंथों में भरपूर आलोचना करी है[x]। विचार करे क्या ईसाईयों को अपने धर्म ग्रंथों एवं सिद्धांतों पर इतना अविश्वास है की उन्हें नकल का सहारा लेकर अपने मत का प्रचार करना पड़ता है। धर्म की मूल सत्यता पर टीकी है। न की जूठ,फरेब, नकल और धोखे पर टिकी हैं।

भारत देश के विशाल इतिहास के ईसाईयों के अत्याचार, जूठ, धोखे से सम्बंधित दो कारनामों का सत्य इतिहास मैंने अपने समक्ष रखा हैं। यह इतिहास उस काल का है जब भारत में अंग्रेजी हुकूमत की स्थापना नहीं हुई थी। पाठक कल्पना करे अंग्रेजों के संरक्षण में ईसाईयों ने कैसे कैसे कारनामे करे होगे।मदर टेरेसा का नोबेल की आड़ में धर्म परिवर्तन करना किसी से छिपा नहीं हैं। ईसाई पादरियों द्वारा चंगाई सभा के नाम पर सरेआम लोगन को बेवकूफ बनाना किसी से छुपा नहीं है। इसलिए अन्यों को दोष देने से पहले ईसाईयों को अपने गिरेबान में अवश्य झांक लेना चाहिए।

डॉ विवेक आर्य

[i] The myth of Saint Thomas and the Mylapore Shiva Temple by Ishwar Sharan, Voice of India, New Delhi, 1991

[ii] Alfredo DeMello, “The Portuguese Inquisition in Goa”

[iii] Viceroy António de Noronha issued in 1566, an order applicable to the entire area under Portuguese rule:

“I hereby order that in any area owned by my master, the king, nobody should construct a Hindu temple and such temples already constructed should not be repaired without my permission. If this order is transgressed, such temples shall be, destroyed and the goods in them shall be used to meet expenses of holy deeds, as punishment of such transgression.”

[iv] Priolkar, A. K. The Goa Inquisition. (Bombay, 1961)

[v] Shirodhkar, P. P., Socio-Cultural life in Goa during the 16th century, p. 35

[vi] Shirodhkar, P. P., Socio-Cultural life in Goa during the 16th century, p. 35

[vii] Charles Dellon ,L’Inquisition de Goa (The Inquisition of Goa)

[viii] The words Auto da fé reverberated throughout Goa, reminiscent of the furies of Hell, which concept, incidentally does not exist in the Hindu pantheon. On April 1st 1650 for instance, four people were burnt to death, the next auto da fé was on December 14, 1653, when 18 were put to the flames, accused of the crime of heresy. And from the 8th April 1666 until the end of 1679 – during which period Dellon was tried – there were eight autos da fé, inwhich 1208 victims were sentenced. In November 22, 1711 another auto da fé took place involving 41 persons. Another milestone was on December 20, 1736, when the Inquisition burnt an entire family of Raaim, Salcete, destroying their house, putting salt on their land, and placing a stone padrao, which still existed in the place (at least in 1866)-Alfredo De Mello (‘Memoirs of Goa’ Chapter 21)

[ix] History of Hindu Christian encounters by Sita Ram Goel, Chap 4

[x] The masquerade of Robert Di Nobili has been described in detail in Sita Ram Goel, Catholic Ashrams: Sannyasins or Swindlers?, Voice of India, New Delhi, 1995.

An Open Letter To Cardinal Oswal Gracia

Deva Sarran Samaroo < > wrote:

 

An Open Letter To Cardinal Oswal Gracia

 

By Hilda Raja

 

10000 CHURCH LED MOB WENT AGGRESSIVE IN TUTICORIN- NOT TAMIZAN (HINDUS)

IT IS TIME INDIA RECOGNIZED ROME AS A SEPARATE STATEAND WITHDRAW DIPLOMATIC RELATION

WHY A RELIGIOUS ORGANIZE CHURCH HAS SEPARATE STATEHOOD?

 

CATHOLIC CHURCH IS FUNDED BY FORD AND CLINTON FOUNDATION BEFORE THAT IT WAS FUNDED BY CIA N FBI AMNESTY INTERNATIONAL THEIR PURPOSE IS TO DESTROY NON CATHOLIC COUNTRIES IF CONVERSION FAILS.

 

CATHOLIC CHURCH IS AN CIA FBI AGENT

 

Followers of Jesus are on the warpath with India.

And people following ‘absolute’ (whatever that may mean)

and having ‘brahmavidya’ are clueless what to do, as expected.

With people like these in India, we don’t need crystal gazing

to know what the outcome will be – only common sense

and reading of history without prejudice will be enough.

Who can give a wake-up call to the people in a deep coma

induced by anesthesia called spiritualism?

 

Dear Cardinal Oswal Gracias,

 

I take this opportunity to inform you Cardinal that I know what the Catholic Church is all about and the CBCI. In fact, I was in the 80s nominated by the CBCI to its National Advisory Committee. My husband and I have been teaching in prestigious Catholic institutions-Loyola College and Stella Maris college in Chennai. So it is not that I am a stranger to the politics and the policies of the Church and the church allied institutions. In fact, I was on the selection Board of St John’s Medical College, Banglore.

 

Seeing the happenings-witnessing the large-scale misuse of Minority Rights I am forced to write this letter to you. After the controversy regarding the letter by the Archbishop Anil Couto-you Cardinal Oswal Gracias instead of smoothening things have made it more controversial. If the Archbishop Anil Couto mentioned the ‘present turbulent times’ we are going through you have mentioned the growing anxiety among the minorities and even blamed the government for not doing enough. One wonders what the Catholic Church is up to. Instead of playing with words it could right away issue a statement saying that it does not support Modi’s government. One needs courage and guts to openly state that the church supports the Italian Mrs Maino and her son Raul Vinci.. The church cannot play hide and seek

 

Now I wonder what is ‘enough’ when the you cite that the government is not doing enough, Cardinal Oswal you should clarify and quantify what that ‘enough’ means. Look at the treachery in which Christian NGOs are indulging in breaking India. Then dear Cardinal you have nothing to say about it. Will any country across the globe allow this kind of freedom that the minorities enjoy in this Bharat? Let us be honest. Take a look at the neighboring countries-the persecution and the denial of basic rights to the minorities are part of those governments’ functioning. I personally feel that the Catholics and the church have divided loyalties. It is totally oriented to Vatican. China is a good example on how to nurture patriotism and love for one’s own country.

 

By issuing statements and prayers you are abetting and polarizing the nation on the basis of religion. This is exactly what the Congress under Mrs Miano and Raul Vinci is indulging in. After having got foreign agencies to advise them on how to win power. Power at all cost. Raul Vinci who stated that power is poison today is eager to drink that poison. By the way dear Cardinal how many years did the Congress rule this country? Any idea-then the UPA 1 and UPA2. Had these done ‘enough’ for the poor, the down trodden, women and dalits? Would we be in this state of affairs? Did you then issue a statement then when you saw scams raining warning that the morality of the government is at question? Did you instruct the ‘flock’ to pray for a government that is scam free? But in four years’ time expectations from Modi is simply presumptuous given the enormity of the tasks unattended to by the previous governments.

 

It strikes me Cardinal to put the same question to you. Has the Catholic Church done enough for the dalits-minorities and women and the down trodden? You know how under the leadership of the late Rev Jerome D’souze sj pleaded and demanded in the Constituent Assembly for Minority Rights. The Jesuits had vested interest in education. It was granted. The Minority Rights are for the Minority people-not exclusively for the priests and the nuns the rich and their close circles. Look at the number of prestigious institutions you have. The thousands of educational institutions across the country are run on the tax payers’ monies it comes from the government-the grants, the salaries, the pensions et al. Yet did you think it necessary to use it at least for the downtrodden people-the dalits the women and the poor minorities and the poor for whom now your heart bleeds. No, you used these for the rich and made them richer –kept all these segments of whom now you mention and accuse the government of not doing enough for them, at the bottom of the hierarchical social and economic ladder. Please dear Cardinal remember the Minority Rights flow from the Minority people and are meant first for them. The government is investing heavily on these institutions and yet you say the government is not doing enough. How and why do you transfer these to the rich by giving them the priority in your institutions? In the 80s when I went to Patna to attend the NAC the then bishop of Patna in his homily stated that his ‘flock’ is very poor. In the next sentence he said that the first thing he did was to establish a college. This poor ‘flock’ of his has not even stepped into the portals of a school. Why the hell did he have to start a college I thought? So, I met him after Mass and asked him. To this he replied that then ‘we will get all the powerful people with us’. So, you see Cardinal you and the Church are no better -seeking always power. A contradiction to that carpenter’s son who said that His kingdom is not of this world. He did not establish a religion. He stood for values and these the church must uphold. It cannot be a counter witness to Jesus. So, when you say that the government is not doing enough I am wondering if you did your mite after taking all that government money in the name of the Minorities.

 

To come back to the anxieties, you mentioned. You will know much better than me that India is the one and only country where the Catholics are living in peace and there is no cause for anxiety. Tell me when we have 1. 25 billion is it not in the nature of things that stray incidents happen. The church has abetted violence right from the beginning. Tamilnadu is an example. The Christian NGOs are another headache. One wonders if we have too much of ‘aazadi’. The media –especially the western media is anti- Hindu.

 

A few years ago, there was a headline in a leading paper in the front page, ‘Church vandalized. But a few days later in a corner of the same paper in small print it was reported investigation showed that no church was vandalized but a cracker burst and a glass pane in one of the windows cracked. I have been to remote places to evaluate NGOs working and found that most of the Christian NGOs simply fenced large tracts of government land and put up a cross. There was a mobile ambulance kept there-nothing more and nothing less. But the acres of land it occupied under the Cross was shameful-no hamlets for miles across. Land is simply occupied and fenced-put up a Crescent and’/ or Cross and one is safe. This cannot be done by the Hindus. Churches are built just with a few bamboo poles and the roof is of straw or a sheet covering. If this is shaken down then the media will report church building demolished. This is simply atrocious. No country will tolerate this kind of ‘aazadi’ where no tax is paid by the church for the land. The neighborhood poor people get annoyed and agitated when they realize that their land is all taken up and no tax paid-while they have to pay taxes. Where is truth?

 

This polarization of the nation started by the Congress for power. You must know that Rajiv Gandhi ordered the breaking of locks of the Babri Masjid –and claimed that he will bring in Ram Rajya. That which started as a trickle has swelled into a torrent under his Italian wife. Now his son proclaims that the family is Shiva-Bakhts and he wears the Janeu Dhari. Have you excommunicated him? You will not because to garner votes you know he is using religion. Is that not cheating the people? Is this the secularism you are expecting from a government? So what religion does he and Mrs Maino belong to? Dividing the people on the basis of caste and then on basis of religion. Please Cardinal Oswal do not become another politician it will hurt that Master whom you solemnly swear that you follow. If you issue statements then the swamis and mutts can also issue statements-they can perform Yagnas for Modi’s government to come back because they want a secular government-not one ruled by Vatican and the Koran. This is a Hindu country. There is no denying it. Baba Sahib Ambedkar had clearly stated that after partition the Muslims must leave the country and go to Pakistan. You cannot eat the cake and have it to. This the dalits and the politicians will not cite. Right from time immemorial the Hindus have been at the receiving end-through persecution, Inquisitions and forced conversions-they have no blood in their hands. They had not persecuted other religious groups. Today a few fringe groups may become violent-that is not the Hindu community. It is not in their religion to persecute and to convert by sword. They have been the victims. One must accept this history. So why raise such an alarm when small incidents happen. -why talk of growing anxiety-of turbulent period etc.. Now why do we raise an alarm when they assert? We have the Islamic countries-the Christian countries-nobody raises their eyebrows but when one says this is a Hindu country why all hell breaks loose?

 

Coming back to the Minority Rights had you used it judiciously and with a purpose-had you targeted the dalits and down trodden and women today we would not have any poor down trodden. I can understand the politicians but why did the church neglect them after taking their Rights and the people’s money. You will be quite aware that the Church in India possesses large assets –estates and properties. What does this all stand for? Why do you want the government to do ‘enough’ why not the church use these assets which belong to the people for their upliftment? Stand for a democracy-that is what our Constitution has given us-not a dynasty. So, when you want a government which will be secular and which will uphold the Constitution then surely it cannot be the Congress. Please do not hide under riddles. Be frank and honest that is what we expect of a religious leader. Stand up for the values of Jesus and not for any one religion.

 

Dr Mrs Hilda Raja

 

हिन्दू राष्ट्र’ के उत्तराधिकारी बनें … 🔥

From: Vinod Kumar Gupta < >

‘हिन्दू राष्ट्र’ के उत्तराधिकारी बनें … 🔥

💥“इस जगत में यदि हम हिन्दू राष्ट्र के नाते स्वाभिमान का जीवन जीना चाहते हैं तो उसका हमें पूरा अधिकार है और वह राष्ट्र हिन्दुराष्ट्र के ध्वज के नीचे ही स्थापित होना चाहिए। इस पीढ़ी में नही तो अगली पीढ़ी में मेरी यह महत्वाकाँक्षा अवश्य सही सिद्ध होगी। मेरी महत्वाकाँक्षा गलत सिद्ध हुई तो पागल कहलाऊंगा मैं और यदि महत्वाकाँक्षा सही सिद्ध हुई तो भविष्यद्रष्टा कहलाऊंगा मैं।
मेरा यह उत्तराधिकार मैं तुम्हें सौंप रहा हूँ।” …. वि. द. सावरकर
💥प्रायः प्रति वर्ष मई माह के 28 वें दिवस पर राष्ट्र चेतना के धधकते अंगारे, हिन्दू राष्ट्र के प्रचंड परंतु सर्वाधिक प्रताड़ित योद्धा स्वातंत्र्यवीर विनायक दमोदर सावरकर जी को उनके जन्मोत्सव पर अधिकांश राष्ट्रवादी समाज स्मरण करके उनसे प्रेरित होता आ रहा है । प्रतिवर्ष आने वाली यह तिथि (28 मई) हिन्दुत्वनिष्ठ समाज को एकजुट व संगठित करके संगोष्ठी व वार्ताओं के विभिन्न कार्यक्रमों द्वारा वीर सावरकर जी के अथाह राष्ट्रप्रेम से आने वाली पीढ़ी को भी अवगत कराती रही है।
💥इस वर्ष भी हम सब उनके  136 वें जन्मोत्सव पर पुनः पूर्व की भांति होने वाले कार्यक्रमों में सम्मलित होंगे और सामूहिक रुप से हिंदुत्ववादी विचारधाराओं व कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित होंगे। निसंदेह इतिहास के अत्यंत प्रेरणादायी महापुरुष के जीवन पर हम सभी उनके राष्ट्र व हिंदुत्व के प्रति अदम्य साहस , समर्पण और अभूतपूर्व दूरदर्शिता के प्रसंगों की चर्चाऐं करके अपने आप गौरवान्वित हो कर संतुष्ट हो जाते है।
💥परंतु क्या हम उस वीर योद्धा पर मातृभूमि की रक्षा के लिये दशकों तक हुए अमानवीय अत्याचारों व यातनाओं की पीड़ाओं का एक पल के लिये भी अभास कर पाते है ? क्या वर्ष में एक बार “वीर सावरकर जयंती” के आयोजन मात्र से हम उन करोड़ों छात्र-छात्राओं व युवाओं को यह संदेश देने में समर्थ है कि वीर सावरकर जी के अंतःस्थल में एक ही ध्येय बसा था….  “बस तेरे लिए जीये माँ और तेरे लिये मरे हम , कितनी ही विपदायें-बाधायें आई , पर नही डरे हम”। जिसकी रग रग में राष्ट्रप्रेम का संचार कभी थमा नही उस महान योद्धा का अनुसरण जब तक हम नही करेंगे अपने धर्म और राष्ट्र को सुरक्षित कैसे रख पायेंगे ?
💥उन्होंने अपने छात्र जीवन में ही नासिक में रहते हुए कुछ मित्रो के साथ मिलकर “राष्ट्र भक्त समूह” नाम की एक गुप्त संस्था बनाई थी। उच्च अध्ययन के लिए ब्रिटेन जाने के पश्चात उन्होंने सार्वजनिक आंदोलन करने के लिए “फ्री इंडिया सोसाइटी” का भी गठन किया था। उनके अदम्य साहस की अनेक घटनाओं में से एक प्रमुख घटना  8 जुलाई 1910 की है जब उनको बंदी बना कर इंग्लैंड से जलपोत द्वारा भारत भेजा जा रहा था तो रास्ते में मार्सेलिस पोर्ट (फ्रांस) में जहाज के रुकने पर सावरकर जी ने शौचालय के पोर्टहोल से समुद्र में अद्भुत छलांग लगा कर भी ब्रिटिश बंधन से बचने में असफल रहें।
💥परंतु  इस अभूतपूर्व घटना ने वीर सावरकर के अदम्य साहस व शौर्य का परिचय करा के पूरी दुनिया को ही चकित कर दिया था। उन विपरीत संघर्षरत अवधि में भी उनकी दृढ़ता और निर्भयता का स्पष्ट संकेत जलपोत में लिखी उनकी पंक्तियों में मिलता~ “मैं अनादि हूं , अनन्त हूं , अतः विश्व में कौन ऐसा शत्रु है जो मुझे मार सके ” ?
💥उनका ध्येय वाक्य था कि “स्वतंत्रता साध्य और शस्त्र क्रांति साधन है”। इसलिए उनका मत था कि “हिंदुओं का सैनिकीकरण होना चाहिये , क्योंकि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के बाद अग्रेजो ने हिन्दू सैनिको को भारतीय राजनीति से दूर रखने की नीति अपनाई है , इसलिए हिन्दू सैनिकों में राजनीति करना हमारा प्रथम कर्तव्य है , तभी हम स्वतंत्रता का युद्ध जीत सकेंगे”। द्वितीय विश्वयुद्ध  (1939 ) के अवसर पर उन्होंने अधिक से अधिक हिन्दुओं को सेनाओं में भेज कर युद्ध कौशल में निपुण होने का परामर्श दिया जबकि कुछ नेताओं ने इसका विरोध किया कि यह तो ब्रिटिश सेना की सहायता होगी ।
💥परंतु सावरकर जी का स्पष्ट मत था कि ऐसा अवसर पिछले 50 वर्षों में पहली बार आया है और संभवतः आने वाले 50 वर्षो में भी पुनः न मिलें तो इसका अधिकतम लाभ उठाना चाहिये। वे अपने तर्क को समझाते हुए कहते थे कि “मै एक प्रश्न आपसे पूछता हूं कि यदि कोई यह कहता है कि यह हिंसाचार है या साम्राज्यवादी शक्ति की सहायता करना है तो फिर हमें अपने हाथ में आई सैनिक शक्ति बढ़ाने का यह सुअवसर छोड़ देना चाहिये “। उनका मानना था कि अंग्रेज़ी राज्य को समाप्त करने के लिए भारतीय युवकों को हाथों में शस्त्र लेकर मरने मारने को तैयार हो जाना चाहिये तभी स्वाधीनता मिलेगी।
💥वे हिन्दू युवको का आह्वान करते थे कि सेना में अधिक से अधिक भर्ती हो और सैन्य विद्या सीखें। उनकी इसी दूरदर्शिता के परिणाम स्वरुप सेनाओं में स्वतंत्रता के पश्चात भी हिन्दुओं की बहुलता है।गाँधीजी के अहिंसा के सिद्धांत का उन्होंने सदा विरोध किया। उनका मत था कि “जब बहन-बेटियों की रक्षा अहिंसा से नही कर सकते तो स्वाधीनता कैसे मिलेगी ?  आतताई, अत्याचारी व आक्रमणकारी को मार डालना हिंसा न होकर अहिंसा व सदाचार ही है”। अहिंसा की बात करने वाले मोहनदास करमचंद गांधी को उनका संदेश था कि “ब्रिटिश शासन को अहिंसा से ध्वस्त करने की कल्पना किसी बड़े किले को बारुद की जगह फूंक से उड़ा देने के समान हास्यास्पद है।”
💥वीर सावरकर जी ने ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस को सशस्त्र क्रांति के लिए विदेश जाकर एक फौज बनाकर ब्रिटिश राज्य को भारत से उखाड़ने के लिये प्रेरित किया था। वीर सावरकर सुभाष बाबू के अनेक क्रांतिकारी कार्यो से परिचित थे। उन दिनों ब्रिटेन विश्व युद्ध मे फंसा हुआ था अतः उन्होंने सुभाष बाबू को इस स्थिति का लाभ उठाते हुए बड़े निश्चय व निर्णय के साथ उन्हें भारत में छोटे छोटे क्रांतिकारी कार्यों में फंसने से बच कर एक बड़े लक्ष्य को साधने के लिए रासबिहारी बोस के पास जापान भेजा। यही नही अनेक अभावों के उपरांत भी वीर सावरकर ने सुभाष जी की विदेश में सारी व्यवस्था भी की थी।
💥वे मुसलमानों की विशेष मांगो व अधिकारों के सदा विरोधी रहें। हिन्दू-मुस्लिम एकता के संदर्भ में उनका कहना था कि “साथ आये तो तुम्हारे साथ,न आये तो तुम्हारे बिना, किंतु यदि तुमने विरोध किया तो हिन्दू तुम्हारे विरोध का सामना करके अपनी शक्ति के बल पर स्वतंत्रता के युद्ध को आगे बढ़ाते रहेगें।” उन्होंने एक बार हिन्दू महासभा के कानपुर अधिवेशन में हिन्दू-मुस्लिम एकता की भ्रामक कल्पना ग्रस्त गांधी जी के एक पत्र के कुछ अंश पढ कर सुनाये जिसमें गांधी जी ने लिखा था कि ” ब्रिटिश के हाथ की सभी हिंदुस्तान की सत्ता यदि उन्होंने मुस्लिम लीग के हाथों में सौप दी तो भी कांग्रेस उसका विरोध नही करेगी।” इसके संदर्भ में सावरकर जी ने स्पष्ट किया कि “हिन्दू हित और शुद्ध राष्ट्रीयता के साथ इतना बड़ा द्रोह और क्या हो सकता है ? ” इसी अधिवेशन के अंत में उन्होंने एक ध्येय वाक्य दिया.. “राजनीति का हिन्दुकरण और हिन्दुओं का सैनिकीकरण”  कीजिये । वे अखंड भारत के विभाजन के घोर विरोधी थे। उन्होंने कहा था कि “पाकिस्तान बन सकता है तो वह मिट भी सकता है “।

💥वे संस्कृतनिष्ठ हिंदी के प्रबल समर्थक और उर्दू व अंग्रेज़ी के घोर विरोधी’हिन्दू राष्ट्र’ के उत्तराधिकारी बनें … थे। उनका मानना था कि भाषा राष्ट्रीयता का प्रमुख अंग होती है और  हमारी संस्कृति, सभ्यता, इतिहास व दर्शन आदि सभी इसी भाषा में है और यह हमारे पूर्वजों की अनमोल देन है। उन्होंने जाति भेद का निरंतर विरोध किया और समस्त जातियों को एकजुट करने में सदा सक्रिय रहें। वे कहते थे कि ” हम कुत्ते , भैस, घोड़े, गधे जैसे पशुओं को छू सकते है, सर्प को दूध पिलाते है, प्रितिदिन चूहे का रक्त चूसने वाली बिल्ली के साथ बैठकर खाते है, तो फिर, हे हिन्दुओ ! अपने ही जैसे इन मनुष्यों को , जो तेरे ही राम और देवताओं के उपासक है, अपने ही देशबंधुओं को छूने में तुम्हें किस बात की शर्म आती है।”
💥उन्होंने शुद्धिकरण और अछूतोद्धार आंदोलन भी चलाये। उनका मत था कि “रामायण और महाभारत” हमारे दो ग्रंथ ही हमें एकजुट करने में समर्थ है। हमारा धर्म महान है हम राष्ट्र को ही धर्म मानते है। अतः वे सभी कार्य जो राष्ट्र को पुष्ट करें वही हमारा धर्म है। धर्म ही राजनीति का पोषक होता है, धर्म ही राजनीति शास्त्र की आधारशिला है उसके बिना राजनीति का कोई अस्तित्व ही नही। मातृभूमि के प्रति अपार श्रद्धा रखने वाले सावरकर जी कहते थे कि “हे मातृभूमि तेरे लिए मरना ही जीना है और तुझे भूल कर जीना ही मरना है” । उन्होंने एक और मूलमंत्र स्थापित किया …”हिंदुत्व ही राष्ट्रीयत्व है और राष्ट्रीयत्व ही हिंन्दुत्व है”।
💥मैं महान हुतात्मा को कोटि कोटि नमन करते हुए अंत में काले पानी का उल्लेख अवश्य करुंगा कि विश्व के इतिहास में दो जन्मों का आजीवन कारावास पाने वाले एकमात्र  वीर सावरकर ने अंडमान- निकोबार की काल कोठरी की सफेद दीवारों को कागज और कीलों को कलम बना कर लगभग 13500 पंक्तियों में विभिन्न काव्य उकेर कर अपने दर्दनाक कष्टों को भी मातृभूमि की अथक सेवा में सुखमय बना लिया था। इससे पूर्व उनके द्वारा लिखा गया एक महत्वपूर्ण ग्रंथ “1857 का स्वतंत्रता संग्राम” ने भारत सहित विश्व के अनेक क्रांतिकारियों को भी प्रेरित किया था ।
💥भारत के इस अनमोल धधकते अंगारे की  26 फरवरी 1966 को प्राण ज्योति अनन्त में विलीन हो गई। इस प्रकार भारतीय इतिहास का एक और सुनहरा अध्याय करोडों-करोडों राष्ट्रवादियों को प्रेरणा देता आ रहा है और देता रहेगा जिससे एक दिन हमारा देश “हिन्दू राष्ट्र” बनकर उनके सपने को भी साकार करेगा।

💥उन्ही के कथनानुसार …”वटवृक्ष का बीज राई से भी सूक्ष्म होता है किंतु उस बीज में जो स्फूर्ति होती है, जो महत्वाकाँक्षा होती है उसके कारण वह बढ़ते-बढ़ते प्रचंड वटवृक्ष का रूप ले लेता है जिसके नीचे गौओं के झुंड सुस्ताते हैं। धूप से त्रस्त लोगों को वह वटवृक्ष छाया प्रदान करता है। एक ऐसी ही महत्वाकाँक्षा मुझे भी सँजोने दो…”मेरा गीत मुझे गाने दो…यदि हमें हिन्दू राष्ट्र के रूप में सम्मान और गौरव से रहना है~जिसका हमें पूर्णाधिकार है~तो वह राष्ट्र हिन्दू ध्वज के नीचे ही अवतरित होगा~यह मेरा उत्तराधिकार है मैं तुम्हें सौंप रहा हूं”।

(Skanda’s comment: Instead of thinking “…”मेरा गीत मुझे गाने दो…,” we the Hindus need to think:

“ham hinduu apane hi dharma aur ichchhaa ke anusaar jiyenge, anapaa raashtra banaaye.nge.
iske liye hame koi duusare ki manjuuri ki jarurat nahi hai.  hame rokne vaalo.n se ham takkar lenge.”)
✍विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
गाज़ियाबाद

Rohingyas Massacred nearly 1000 Hindus

From: Shriharsha Sharma < >

https://scroll.in/latest/879946/rohingya-militants-massacred-nearly-100-hindus-in-myanmar-in-august-2017-finds-amnesty

Rohingya militants massacred nearly 1000 Hindus in

Myanmar in August 2017, finds Amnesty

Accountability for the insurgents’ action is as crucial as the military crackdown that followed, the human rights group said.

Rohingya insurgents killed nearly 1000 Hindu civilians in western Myanmar in August, rights organisation Amnesty International has found. In a report on Tuesday, Amnesty said an armed group killed up to 990 Hindus, including children, in one, or possibly two, massacres.

The alleged attacks by the Arakan Rohingya Salvation Army had prompted military action in northern Rakhine state, forcing almost 7 lakh Rohingya Muslims to flee to Bangladesh in subsequent weeks. The United Nations has used the term “ethnic cleansing” to describe the military action against the community, which included widespread rapes, arson and massacres.

Masked fighters of the Rohingya outfit killed Hindus near Kha Maung Seik village, Amnesty International found. The report cites witnesses including eight Hindu women who alleged they were abducted by ARSA fighters and forced to convert to Islam.

The militant group had denied allegations of massacre of Hindus in September 2017.

“It’s hard to ignore the sheer brutality of ARSA’s actions, which have left an indelible impression on the survivors we’ve spoken to,” Tirana Hassan, Amnesty International’s crisis response director, said in a statement. “Accountability for these atrocities is every bit as crucial as it is for the crimes against humanity carried out by Myanmar’s security forces in northern Rakhine State.”

Amnesty International has called for Myanmar to grant UN investigators access to the conflict area to look into the alleged atrocities by both the Rohingya insurgent and the Army.

कश्मीर में रमजान पर युद्ध-विराम (??)

From: Vinod Kumar Gupta < >

🔕 कश्मीर में रमजान पर युद्ध-विराम ~

💥जिस कश्मीर में “भारत काफ़िर है” के नारे लगाए जाते हो वहां युद्ध-विराम का क्या औचित्य है ? अनेक आपत्तियों के उपरांत भी केंद्रीय सरकार ने जम्मू-कश्मीर की मुख्यमन्त्री महबूबा मुफ़्ती की मांग को मानते हुए रमजान माह  (अवधि लगभग 30 दिन ) में सेना को आतंकियों के विरोध में अपनी ओर से आगे बढ़ कर कोई कार्यवाही नहीं करने का निर्णय किया है। परंतु अगर आतंकवादी गोलाबारी या अन्य आतंकी गतिविधियों को जारी रखेंगे तो उस समय उसका प्रतिरोध करने को सुरक्षाबलों को छूट होगी। फिर भी यह क्यों नही सोचा गया कि जब केंद्र सरकार की कठोर नीतियों के कारण आतंकवाद पर अंकुश लगाने में सफलता मिल रही है और पिछले एक-दो वर्षों में सैकड़ों आतंकियों को मारा भी जा चुका है तो क्या ऐसे में युद्ध विराम राष्ट्रीय हित में होगा ?
💥क्या इस निर्णय के पीछे सुरक्षा बलों के सफल अभियान से आतंकियों को सुरक्षित करने का कोई षडयंत्र तो नही है ? यद्यपि वर्षो से यह स्पष्ट है कि जब भी रमजान के अवसर पर या अन्य किसी अवसर पर कश्मीर में आतंकियों के प्रति युद्धविराम किया गया तो जिहादियों ने इस छूट का अनुचित लाभ लेते हुए अपने बिखरे हुए व कमजोर पड़ गए आतंकी साथियों को पुनः संगठित किया और सबको शस्त्रों से भी सुज्जित करके सुरक्षा प्रतिष्ठानों व निर्दोष नागरिकों पर भी आक्रमण किये थे। जिसके परिणामस्वरूप ऐसे युद्धविरामों की अवधि में हमारे सैकड़ों सुरक्षाबलों के सैनिकों व सामान्य नागरिकों को भी उन आतंकियों का शिकार बनना पड़ा था। क्या ऐसे अवसरों पर जिहादियों के आक्रमणों से लहूलुहान हुए सैनिकों और नागरिकों के परिवारों की पीड़ाओं के घावों को हरा होने दें ?
💥अतः कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि जम्मू-कश्मीर में जो भी सरकार बनती है वह कभी “रमजान” के बहाने युद्ध-विराम करवाके, तो कभी “हीलिंग-टच” द्वारा और कभी मानवाधिकार की दुहाई देकर सुरक्षाबलों को हतोत्साहित करके जाने-अनजाने आतंकवादियों को ही प्रोत्साहित करती है। जिससे सदैव राष्ट्रीय हित प्रभावित होते रहे हैं।
💥परंतु रमजान में युद्ध विराम के निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि आतंकवादी एक विशेष धर्म से संबंधित होते हैं और उनका धर्म भी होता है। क्योंकि अब आप भली प्रकार समझ सकते हैं कि रमजान का महीना जो केवल इस्लाम के अनुयायियों के लिए पवित्र होता है और जिनको सुरक्षा प्रदान करने के लिए युद्धविराम घोषित हुआ है , वे कौन है ? वे सब मुसलमान है और इस्लाम मज़हब/धर्म के मानने वाले है। अतः इससे यह भी स्पष्ट हुआ है कि आतंकवाद का भी धर्म है और वह है “इस्लाम”।
💥क्या केंद्र सरकार पर कश्मीर की मुख्य मंत्री महबूबा मुफ़्ती का ऐसा कोई दबाव है जो राष्ट्र की सुरक्षा को चुनौती देने वाली युद्धविराम की अनुचित मांग को मानने के लिए विवश होना पड़ा ? क्या यह आत्मघाती कूटनीतिज्ञता नही है ? क्या यह अदूरदर्शी निर्णय कश्मीरी कट्टरपंथियों, अलगाववादियों व आतंकवादियों के आगे घुटने टेकने का संकेत तो नही है ? क्या इससे पाक व पाक परस्त शत्रुओं को प्रोत्साहन नही मिलेगा ? समाचारों से यह भी ज्ञात हुआ है कि केंद्र सरकार ने यह निर्णय इसलिये भी लिया है कि कश्मीर के शांतिप्रिय व अमन पसंद मुसलमान अपने धार्मिक रमजान के महीने को शांतिपूर्वक मना सकें।
💥परंतु जब 1986 से हिंदुओं की हत्याओं व आगजनी का नंगा नाच आरम्भ हुआ और हिंदुओं को वहां से भागने को विवश होना पड़ रहा था तब ये अमन पसंद मुसलमान क्यों मौन थे ? हिंदुओं को घाटी छोड़ देने की चेतावनी के साथ साथ “इस्लाम हमारा मकसद है”  “कुरान हमारा दस्तूर है”  “जिहाद हमारा रास्ता है”   “WAR TILL VICTORY” आदि नारे लिखे पोस्टर पूरी घाटी में लगाये गये। यही नही  “कश्मीर में अगर रहना है ,  अल्लाहो अकबर कहना होगा ” के नारे लगाये जाने लगे जिससे वहां का हिन्दू समाज भय से कांप उठा था।
💥इन अमानवीय अत्याचारों का घटनाक्रम 28 वर्ष पूर्व सन 1990 में लाखों कश्मीरी हिंदुओं को वहां से मार मार कर उनकी बहन-बेटियों व संम्पतियों को लूट कर भगाये जाने तक जारी रहा,  तब ये शान्तिप्रिय कश्मीरी मुसलमान कहां थे ? उस संकटकालीन स्थितियों को आज स्मरण करने से भी सामान्य ह्रदय कांपनें लगता है। इस पर भी कश्मीरी मुसलमानों को शांतिप्रिय समझना क्या उचित होगा ? क्या इन शांतिप्रिय मुसलमानों ने कभी जिहाद के दुष्परिणामों से रक्तरंजित हो रही मानवता की रक्षार्थ कोई सकारात्मक कर्तव्य निभाया है ?
💥एक विडंबना यह भी है कि इन अमन पसंद लोगों के होते कश्मीर में अनेक धार्मिक स्थलों को आतंकवादी समय -समय पर  अपनी शरण स्थली भी बना लेते है। वहां “पाकिस्तान जिन्दाबाद” व “भारतीय कुत्तो वापस जाओं” के नारे तो आम बात है साथ ही पाकिस्तानी व इस्लामिक स्टेट के झण्डे लहराए जाना भी देशद्रोही गतिविधियों का बडा स्पष्ट संकेत हैं। आतंकवादियों के सहयोगी  हज़ारों पत्थरबाजों को क्षमा करने से क्या उनके अंधविश्वासों और विश्वासों से बनी जिहादी विचारधारा को नियंत्रित किया जा सकता है ?
💥मुस्लिम युवकों की ब्रेनवॉशिंग करने वाले मुल्ला-मौलवियों व उम्मा  पर कोई अंकुश न होने के कारण जिहादी विचारधारा का विस्तार थम नही पा रहा है। इस विशेष विचारधारा के कारण ही जम्मू-कश्मीर राज्य में पिछले 70 वर्षों में अरबों-खरबों रुपयों की केंद्रीय सहायता के उपरांत भी वहां के बहुसंख्यक मुस्लिम कट्टरपंथियों में भारत के प्रति श्रद्धा का कोई भाव ही नही बन सका ?
इतिहास साक्षी है कि मानवता का संदेश देने वाला हिन्दू धर्म सदियों से इस्लामिक आक्रान्ताओं को झेल रहा है।
💥परंतु जब भी और वर्तमान में भी जिहाद के लिए विभिन्न मुस्लिम संप्रदायों व अन्य समुदाय के मध्य होने वाले अनेक संघर्ष इस बात के साक्षी है कि “रमजान” में कभी भी कहीं भी काफिरों व अविश्वासियों के विरुद्ध युद्ध विराम नही किया गया। बल्कि इन मज़हबी आतंकियों में अविश्वासियों के धार्मिक त्योहारों पर व स्थलों को अपनी जिहादी मानसिकता का शिकार बनाने में सदैव प्राथमिकता रही थी और अभी भी है।
💥क्या ऐसे में युद्धविराम करके आतंकवाद पर अंकुश लगाया जा सकता है ? ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आतंकवाद पर कठोर निर्णय लेने वाली मोदी सरकार अभी इस्लामिक आतंकवाद को नियंत्रित करने के लिए अपनी इच्छा शक्ति की दृढ़ता का परिचय कराना नही चाहती। जबकि शत्रुओं को हर परिस्थितियों में दण्डित करके कुचलना ही राष्ट्रीय हित में होता है। इस प्रकार राष्ट्रीय हितों को तिलांजलि देने से क्या ऐसा सोचा जा सकता है कि भविष्य में स्वस्थ रणनीति बनाने में हमारे रणनीतिकार भ्रमित तो नही किये जा रहे हैं ?
💥अतः वर्तमान विपरीत परिस्थितियों में युद्धविराम का निर्णय राजनीति के हितार्थ भी अनावश्यक व दुःखद है। राजनैतिक कारणों से लिये गये ऐसे शासकीय निर्णयों से ही हिंदुओं में तेजस्विता धीरे धीरे नष्ट हो रही है और उनको निष्क्रिय किया जा रहा है। जिससे वे अपने शत्रु की शत्रुता को समझते हुए भी बार – बार कबूतर के समान आंखें बंद करने को विवश होते जा रहे हैं । जबकि बिल्ली रूपी जिहादी तो अपना काम कर ही रहे हैं। इसलिये नेताओं के साथ साथ अब सोचना तो हम सबको भी होगा कि “आतंकियों का भी धर्म होता है” तो उनसे कैसे सुरक्षित रहें ?

विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
गाज़ियाबाद

Hindus, KNOW YOUR SICKULAR HISTORIAN – GUHA

From: Mohan Natarajan < >

KNOW YOUR SICKULAR HISTORIAN – GUHA

DEAR ALL

A POSTING FROM ANOTHER GROUP. PLEASE DISSEMINATE

MOHAN

A POSTING IN ANOTHER GROUP, PLEASE:

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Ramachandra Guha (@Ram Guha) tweeted at 9:59 PM on Wed, May 09, 2018:

‘As I wrote in 2015, the only credible right-wing intellectual in India is Arun Shourie; the only person on that side who has produced serious books rather than clever columns or cheeky tweets. That he was completely kept out by Modi/Shah tells us all we need to know about them’.

(https://twitter.com/Ram_Guha/status/994252996203573253?s=03)

 

Very shortly afterwards, he got a reply from@TrueIndology as follows:

True Indology (@TrueIndology) tweeted at 1:05 AM on Thu, May 10, 2018:

Since 2015, Shourie has become a scholar for Ramachandra Guha because that was when Shourie turned anti BJP. Earlier, when Shourie hadn’t turned anti BJP, the same Ramachandra Guha had abused Shourie and dismissed him as “a pamphleteer parading as historian” https://t.co/57JTu3MiXN

(https://twitter.com/TrueIndology/status/994299937390116864?s=03)

True Indology (@TrueIndology) tweeted at 1:15 AM on Thu, May 10, 2018:

 

Snippet from @Ram Guha’s essay “The use and Abuse of Gandhi” from his book “An Anthropologist Among the Marxists..” In this book, he had dismissed Shourie as “pamphleteer, woefully ill informed, bilious polemicist, baiter of minorities and comparable to white American fascists” True Indology on Twitter

 

True Indology on Twitter

“Snippet from @Ram Guha’s essay “The use and Abuse of Gandhi” from his book “An Anthropologist Among the Marxist…

 

(https://twitter.com/TrueIndology/status/994302381453012992?s=03)

The tragedy is that those who occupy the intellectual space think that the Internet Hindus are fools and will not be able to call out the hypocrisy and their changing position based on the latest situation.

Like in George Orwell’s book ‘1984’, where changing alliances involved rewriting history to wipe out the abuses of the new friend when this friend was the enemy, etc.

 

The real problem in the system is not people like Ramachandra Guha, who have a pecuniary compulsion to do what they do. It is those who accept him as an intellectual and thoughtlessly look up to him as an informed guide about what is happening in India.

 

For example, in April 2017, three American Universities (Stanford, Berkley and Georgetown) had invited him to speak to an audience, where presumably would be people (particularly students) who wish to know about what is happening at the political level in India. From the topics listed, clearly the bias was to try and put the present NDA government in bad light, and to narrate how things have seriously deteriorated since it came to power in 2014.

When those who wish to consult anyone on issues relating to India and expect to receive an unbiased narration of what is happening, it is also their duty to do due diligence about the person that they are consulting.

 

When Ramachandraji so blatantly tell lies, as above, then he is doing a great disservice to the nation and its people who have provided him with the resources to live the lifestyle he does.

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RELATED PLEASE:

If ‘propaganda’ is a symphony, Ram Guha is Beethoven

Nupur J Sharma

11 May 2018

Propagandists in India are prone to tawdry and tacky methods. There is very often no elegance in their methods. No poetry. No finesse. They lie clumsily, their hypocrisy, as bright as day, for all men to behold. The kind of propagandists who use photoshop to morph images and don’t dress their lies up just enough so they don’t get caught.

Not Ramchandra Guha. Watching him propagate is like watching poetry in motion.

The lies rolling off his tongue like airy butter cookies melting in one’s mouth, his hypocrisy, misrepresentations and half-truths, blending so effortlessly to falsely present a mirage of truth.

His nonchalant brazenness that has almost become a part of his charm, only amplified by those Harry Pinteresque glasses, albeit rimless, that give him the natural air of nerdy, intellectual superiority.

How can someone not believe a man with his salt pepper, disheveled, quintessentially “intellectual” look?

 

And therein lies the beauty of his con. Look so immaculately tousled, that every bit of lie and hypocrisy is taken at face value.

 

And lord knows, Ram Guha is a treasure trove of hypocrisy and lies.

Please read on @:

http://www.opindia.com/2018/05/if-propaganda-is-a-symphony-ram-guha-is-beethoven/

 

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Udayabhanu Panickar udayabhanupanickar@yahoo.com [aryayouthgroup] <aryayouthgroup@yahoogroups.com></aryayouthgroup@yahoogroups.com>

May 12 (1 day ago)

 

to aryayouthgroup

 

This message is eligible for Automatic Cleanup! (aryayouthgroup@yahoogroups.com) Add cleanup rule | More info

 

A man who fabricates history is talking.

 

Sincerely,

Udayabhanu Panickar

aum namaH ShivAya

 

Our spiritual heritage is neither a cult; a creed, a dogma; nor a one-way single path to heaven. It is multiple lane Super highway for mOKSham, which is the merger of jeevAtHman with paramAThman. It is not even just a religion as such; nor is it just a way of life. It is the complete and comprehensive collection of divine knowledge of the Absolute Truth, which, when learned and practiced; can lead people to the experience of the Absolute and the Ultimate Bliss. It is a continuously evolving and absorbing science; The Science of the Absolute, a flexible body of Divine knowledge centered on the quest of the jeevAtHman (for the English-speaking world, we may refer this as ‘soul’) for its’ birthright, ‘the divine realization’. In addition, it makes provisions for all jeevAtHman in this quest. Yet, it remains immeasurable as it safeguards the very purpose of all life everywhere and in all things. We may call It ‘SanAthana Dharma’, but never categorize it just as a religion, or just as a way of life. It is much Greater and Spiritual than both. The wise called it “The Science of Spirituality”, The Science of the Absolute”, “The Science of the Self” or “The Science of the Soul”. It is braHMavidya. We may call it AdhyAtmavidya, not a religion. ShivOham, ShivOham, ShivOham.

 

 

 

The Crusades Against Islam

Vishwas Pitke <> wrotes:

The Crusades
have finally started as predicted!
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The  first countries to ban Islam:
See how the world is acting fast on the  threat posed by Islam and its barbaric Sharia Law.
Japan has  always refused Muslims to live permanently in their country and they  cannot own any real estate or any type of business, and have banned any  worship of Islam. Any Muslim tourist caught spreading the word of Islam will be deported immediately, including all family members.
Cuba rejects plans for first mosque.
 
The African nation of Angola and several other nations have officially banned Islam.
 
Record number of Muslims,  (over 2,000)  deported from Norway as a way of fighting crime.  Since these Muslim criminals have been deported, crime has dropped by a  staggering 72%. Prison Officials are reporting that nearly half of their jail cells are now vacant, Courtrooms nearly empty, Police now  free to attend to other matters, mainly traffic offenses to keep their  roads and highways safe and assisting the public in as many ways as  they can.
 
In Germany alone in the last year there were 81  violent attacks targeting mosques.
 
Austrian police arrested 13 men targeting suspected jihad recruiters.
 
A Chinese court sends 22 Muslim Imams to jail  for 16 to 20 years for spreading Islam hatred and have executed eighteen Jihadists;  China campaigns against Separatism (disallowing  Islamist to have  their own separate state). Muslim prayers banned in government  buildings and schools in Xinjiang (Western China). Hundreds of Muslim families prepared to leave China for their own safety and return back to their own Middle Eastern countries.
 
Muslim refugees  beginning to realize that they are not welcome in Christian countries  because of their violent ways and the continuing wars in Syria and Iraq whipped up by the hideous IS who are murdering young children and using  mothers and daughters as sex slaves.
 
British Home Secretary  prepares to introduce ‘Anti-social Behavior Order’ for extremists and  strip dual nationals of their Citizenship. Deportation laws also being prepared.
 
The Czech Republic blatantly refuses Islam in their  country, regarding it as evil.
 
Alabama – A new controversial amendment that will ban the recognition of “foreign laws which would  include Sharia law”.
 
The Polish Defense League issues a warning  to Muslims. 16 States have all Introduced Legislation to Ban Sharia Law.
 
Many Muslims in Northern Ireland have announced  plans to leave the country to avoid anti-Islamic violence by Irish  locals. The Announcement comes after an attack on groups of Muslims in  the city of Belfast, Groups of Irish locals went berserk and bashed  teenage Muslim gangs who were referring to young Irish girls as sluts  and should be all gang raped, according to Islam and ”Sharia  Law”. Even hospital staff were reluctant to treat the battered Muslim Patients, the majority were given the Band-Aid treatment and  sent home with staff muttering ”Good Riddance”.
North  Carolina bans Islamic “Sharia Law” in the State, regarding it now as a  criminal offence.
 
Dutch MP’s call for removal of all mosques in  the Netherlands. One Member of the Dutch Parliament said: “We want to clean Netherlands of Islam”.  Dutch MP Machiel De Graaf spoke on  behalf of the Party for Freedom when he said, “All mosques in the  Netherlands should be shut down. Without Islam, the Netherlands would  be a wonderful safe country to live in, as it was before the arrival of  Muslim refugees”.

जिन्नाह को महान बताने वालों ! कुछ तो शर्म करो!

From: Vivek Arya < >

जिन्नाह को महान बताने वालों! कुछ तो शर्म करो!
डॉ विवेक आर्य
रावलपिंडी के समीप हिन्दुओं का एक छोटा सा गांव था। 500 के लगभग व्यसक होंगे। बाकि बच्चे, बुड्ढे। गांव के सरपंच रामलाल एक विशाल बरगद के नीचे बैठे थे। तभी मोहन भागता हुआ आया। बोला सरपंच जी, सरपंच जो। सरपंच जी कहा ,”क्या हुआ मोहन ? ” सरपंच जी मुझे पता लगा है यहाँ से 8 कोस दूर हिन्दुओं ने अपना गांव खाली करना शुरू कर दिया है। सिख भाई भी उनके साथ अमृतसर जाने की तैयारी कर रहे है। सरपंच जी ने एक लम्बी साँस ली और कहा,” मैंने कल ही रेडियो पर सुना था। महात्मा गाँधी जी  ने कहा है कि भारत-पाकिस्तान का विभाजन मेरी लाश पर होगा। क्या तुम्हें उनकी बात पर भरोसा नहीं है?” मोहन बोला,” सुना तो मैंने भी है कि जवाहर लाला नेहरू जी ने कहा है कि हिन्दुओं आश्वस्त रहो। भारत के कभी टुकड़े नहीं होंगे। तुम लोग लाहौर और रावलपिंडी में आराम से रहो। पर जिस गांव की मैं बात कर रहा हूँ। उस गांव पर पिछली रात को चारों और के मुसलमान दंगाइयों ने इकट्ठे होकर हमला कर दिया। उनकी संपत्ति लूट ली। दुकानों में आग लगा दी। मैंने तो यह भी सुना की किसी गरीब हिन्दू की लड़की को भी उठा कर ले गए। भय के कारण उन्होंने आज ही पलायन करना शुरू कर दिया हैं।”  सरपंच जी बोले,”देखो मोहन। हम यहाँ पर सदियों से रहते आये हैं। एक साथ ईद और दिवाली बनाते आये है। नवरात्र के व्रत और रोज़े रखते आये है। हमें डरने की कोई जरुरत नहीं है। तुम आश्वस्त रहो। ” मोहन सरपंच जी की बात सुनकर चुप हो गया मगर उसके मन में रह रहकर यह मलाल आता रहा कि सरपंच जी को कम से कम गांव के हिन्दुओं को इकट्ठा कर सावधान अवश्य करना चाहिए था। अभी दो दिन ही बीते थे। चारों ओर के गांवों के मुसलमान चौधरी इकट्ठे होकर सरपंच से मिलने आये और बोले। हमें मुस्लिम अमन कमेटी के लिए चंदा भेजना है। आप लोग चंदा दो। न नुकर करते हुए भी सरपंच ने गांव से पचास हज़ार रुपया इकठ्ठा करवा दिया। दो दिन बाद फिर आ गए। बोले की ओर दो। सरपंच ने कहा कि अभी तो दिया था। बोले की, “कम पड़ गया और दो। तुमने सुना नहीं 8 कोस दूर हिन्दुओं के गांव का क्या हश्र हुआ है। तुम्हें अपनी सुरक्षा चाहिए या नहीं?” सरपंच ने इस बार भय से सत्तर हज़ार इकट्ठे कर के दिए। दो दिन बाद बलूच रेजिमेंट की लोरी आई और हिन्दुओं को इकठ्ठा कर सभी हथियार यहाँ तक की लाठी, तलवार सब जमा कर ले गई। बोली की यह दंगों से बचाने के लिए किया है।  क़ुराने पाक की कसम खाकर रक्षा का वायदा भी कर गई। नवें दिन गांव को मुसलमान दंगाइयों ने घेर लिया। सरपंच को अचरज हुआ जब उसने देखा कि जो हथियार बलूच रेजिमेंट उनके गांव से जब्त कर ले गई थी। वही हथियार उन दंगाइयों के हाथ में हैं। दंगाइयों ने घरों में आग लगा दी।संपत्ति लूट ली। अनेकों को मौत के घाट उतार दिया गया।  हिन्दुओं की माताओं और बहनों की उन्हीं की आँखों के सामने बेइज्जती की गई। सैकड़ों हिन्दू औरतों को नंगा कर उनका जुलुस निकाला। हिन्दू पुरुष मन मन में यही विनती कर रहे थे कि ऐसा देखने से पहले उन्हें मौत क्यों न आ गई। पर बेचारे  क्या करते। गाँधी और नेहरू ने जूठे आश्वासन जो दिए थे। गांव के कुछ बचे लोग अँधेरे का लाभ उठाकर खेतों में भाग कर छुप गए। न जाने कैसे वह रात बिताई। अगले दिन अपने ही घर वालों की लाशे कुएं में डाल कर अटारी के लिए रेल पकड़नी थी। इसलिए किसी को सुध न थी। आगे क्या होगा। कैसे जियेंगे। कहाँ रहेंगे। यह कहानी कोई एक घर की नहीं थी। यह तो लाहौर, डेरा गाजी खां, झेलम, सियालकोट, कोहाट, मुलतान हर जगह एक ही कहानी थी। कहानी क्या साक्षात् नर पिशाचों का नंगा नाच था।
तत्कालीन कांग्रेस के अध्यक्ष आचार्य कृपलानी के शब्दों में इस कहानी को पढ़िए
“आठ मास हुए आपने मुझे कांग्रेस का अध्यक्ष चुना था। महात्मा गाँधी ने एक प्रार्थना सभा के भाषण में कहा था कि मुझे फूलों का मुकुट नहीं पहनाया जा रहा है। बल्कि काँटों की सेज पर सुलाया जा रहा है। उनका कहना बिलकुल ठीक है।  उनकी घोषणा होने के दो दिन बाद मुझे नोआखली जाना पड़ा। वहां से बिहार और अभी मैं पंजाब होकर आया हूँ।  नोआखली में जो देखा वह मेरे लिए नया अनुभव था। लेकिन बिहार में जो मैंने देखा वह और भी नया और पंजाब में जो देखा वह और भी अधिक था। मनुष्य मनुष्य नहीं रहा। स्त्रियां बच्चों को साथ लेकर इज्जत बचाने के लिए कुओं में कूद पड़ीं। उनको बाद में उससे बचाया गया। पूजा के एक स्थान में पचास स्त्रियों को इकठ्ठा करके उनके घर के लोगों ने उनको मार दिया। एक स्थान में 370 स्त्रियों और बच्चों ने अपने को आग को भेंट कर दिया है।-आचार्य कृपलानी”
(सन्दर्भ- श्यामजी पराशर, पाकिस्तान का विष वृक्ष, नवंबर,1947 संस्करण, राष्ट्रनिर्माण ग्रन्थ माला, दिल्ली, पृष्ठ 42)
महात्मा गाँधी और नेहरू जो पहले कहते थे कि पाकिस्तान हमारी लाश पर बनेगा अब कहने लगे कि हमने देश का विभाजन डरकर नहीं किया। जो खून खराबा हर तरफ हो रहा है, उसी को रोकने के लिए किया। जब हमने देखा कि हम किसी तरह भी मुसलमानों को मना नहीं सकते तब ऐसा किया गया। देश को तो 1942 में ही आज़ाद हो जाना था। अंग्रेजों ने देश छोड़ने से पहले मुस्लिम लीग को आगे कर दिया। जिन्नाह ने मांगे रखनी शुरू कर दी। मैं न मानूं की रट लगाए जिन्नाह तानाशाह की स्थिति अर्जित कर कायदे आज़म बन गया। बात बात पर वाक आउट की धमकी देता था। कभी कहता विभाजन कमेटी में सिखों को मत लो। अगर लिया तो मैं बहिष्कार कर दूंगा। कभी कहता सभी सब-कमेटियों का प्रधान किसी मुसलमान को बनाओ। नहीं तो मैं उठ कर चला जाऊंगा। कांग्रेस के लिए जिन्नाह के साथ जीना मुश्किल, जिन्नाह के बिना जीना मुश्किल। फिर जिन्नाह ने दबाव बनाने के लिए अपने गुर्गे सोहरवर्दी के माध्यम से नोआखली और कोलकाता के दंगे करवाए। सीमांत प्रान्त में दंगे करवाए। मेरठ, पानीपत, सहारनपुर, दिल्ली सारा देश जल उठा। आखिर कांग्रेस को विभाजन स्वीकार करना पड़ा। मुसलमानों को उनका देश मिल गया। हिन्दुओं को क्या मिला? एक हिन्दू राष्ट्र के स्थान पर एक सेक्युलर राष्ट्र। जिसमें बहुसंख्यक हिन्दुओं के अधिकारों से ज्यादा अल्पसंख्यक मुसलमानों के अधिकार हैं। पाकिस्तान में बचे हिन्दुओं के अधिकारों की कोई चर्चा नहीं छेड़ता। उसी कांग्रेस का 1947 में विस्थापित एक प्रधानमंत्री आज कहता है कि देश के संसाधनों पर उन्हीं अल्संख्यक मुसलमानों का अधिकार है। हिन्दू धर्मरक्षा के लिए अपने पूर्वजों की धरती छोड़ आये। अमानुषिक यातनायें सही। चित्तोड़ के जौहर के समान ललनाओं की जिन्दा चिताएं जली। राजसी ठाठ ठुकराकर दर दर के भिखारी बने। अपने बेगाने हो गए। यह सब जिन्नाह की जिद्द के चलते हुआ।
और आज मेरे देश के कुछ राजनेता यह कहते है कि जिन्नाह महान था। वह अंग्रेजों से लड़ा था।
अरे धिक्कार है तुमको जो तुम अपना इतिहास भूल गए। उन अकथनीय अत्याचारों को भूल गए। उन बलिदानों को भूल गए। अपने ही हाथों से अपनी बेटियों के काटे गए सरों को भूल गए। जिन्नाह को महान बताते हो। कुछ तो शर्म करो।
(यह लेख उन अज्ञात लाखों हिन्दु पूर्वजों को समर्पित है जिन्होंने धर्मरक्षा हेतु अपने पूर्वजों की भूमि को पंजाब और बंगाल में त्याग दिया। मगर अपने पूर्वजों के धर्म को नहीं छोड़ा। )

भारत में बलात्कार का आरंभ कहाँ से

From: JAY TEWARY < >

~बलात्कार का आरंभ~
इतिहास के आईने में  —
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आखिर भारत जैसे देवियों को पूजने वाले देश में बलात्कार की गन्दी मानसिकता कहाँ से आयी ~~
आखिर क्या बात है कि जब प्राचीन भारत के रामायण, महाभारत आदि लगभग सभी हिन्दू-ग्रंथ के उल्लेखों में अनेकों लड़ाईयाँ लड़ी और जीती गयीं, परन्तु विजेता सेना द्वारा किसी भी स्त्री का बलात्कार होने का जिक्र नहीं है।
तब आखिर ऐसा क्या हो गया ??  कि आज के आधुनिक भारत में बलात्कार रोज की सामान्य बात बन कर रह गयी है ??
~श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त की पर न ही उन्होंने और न उनकी सेना ने पराजित लंका की स्त्रियों को हाथ लगाया ।
~महाभारत में पांडवों की जीत हुयी लाखों की संख्या में योद्धा मारे गए। पर किसी भी पांडव सैनिक ने किसी भी कौरव सेना की विधवा स्त्रियों को हाथ तक न लगाया ।
अब आते हैं ईसापूर्व इतिहास में~
220-175 ईसापूर्व में यूनान के शासक “डेमेट्रियस प्रथम” ने भारत पर आक्रमण किया। 183 ईसापूर्व के लगभग उसने पंजाब को जीतकर साकल को अपनी राजधानी बनाया और पंजाब सहित सिन्ध पर भी राज किया। लेकिन उसके पूरे समयकाल में बलात्कार का कोई जिक्र नहीं।
~इसके बाद “युक्रेटीदस” भी भारत की ओर बढ़ा और कुछ भागों को जीतकर उसने “तक्षशिला” को अपनी राजधानी बनाया। बलात्कार का कोई जिक्र नहीं।
~”डेमेट्रियस” के वंश के मीनेंडर (ईपू 160-120) ने नौवें बौद्ध शासक “वृहद्रथ” को पराजित कर सिन्धु के पार पंजाब और स्वात घाटी से लेकर मथुरा तक राज किया परन्तु उसके शासनकाल में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं मिलता।
~”सिकंदर” ने भारत पर लगभग 326-327 ई .पू आक्रमण किया जिसमें हजारों सैनिक मारे गए । इसमें युद्ध जीतने के बाद भी राजा “पुरु” की बहादुरी से प्रभावित होकर सिकंदर ने जीता हुआ राज्य पुरु को वापस दे दिया और “बेबिलोन” वापस चला गया ।
विजेता होने के बाद भी “यूनानियों” (यवनों) की सेनाओं ने किसी भी भारतीय महिला के साथ बलात्कार नहीं किया और न ही “धर्म परिवर्तन” करवाया ।
~इसके बाद “शकों” ने भारत पर आक्रमण किया (जिन्होंने ई.78 से शक संवत शुरू किया था)। “सिन्ध” नदी के तट पर स्थित “मीननगर” को उन्होंने अपनी राजधानी बनाकर गुजरात क्षेत्र के सौराष्ट्र , अवंतिका, उज्जयिनी,गंधार,सिन्ध,मथुरा समेत महाराष्ट्र के बहुत बड़े भू भाग पर 130 ईस्वी से 188 ईस्वी तक शासन किया। परन्तु इनके राज्य में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं।
~इसके बाद तिब्बत के “युइशि” (यूची) कबीले की लड़ाकू प्रजाति “कुषाणों” ने “काबुल” और “कंधार” पर अपना अधिकार कायम कर लिया। जिसमें “कनिष्क प्रथम”  (127-140ई.) नाम का सबसे शक्तिशाली सम्राट हुआ।जिसका राज्य “कश्मीर से उत्तरी सिन्ध” तथा “पेशावर से सारनाथ” के आगे तक फैला था। कुषाणों ने भी भारत पर लम्बे समय तक विभिन्न क्षेत्रों में शासन किया। परन्तु इतिहास में कहीं नहीं लिखा कि इन्होंने भारतीय स्त्रियों का बलात्कार किया हो ।
~इसके बाद “अफगानिस्तान” से होते हुए भारत तक आये “हूणों” ने 520 AD के समयकाल में भारत पर अधिसंख्य बड़े आक्रमण किए और यहाँ पर राज भी किया। ये क्रूर तो थे परन्तु बलात्कारी होने का कलंक इन पर भी नहीं लगा।
~इन सबके अलावा भारतीय इतिहास के हजारों साल के इतिहास में और भी कई आक्रमणकारी आये जिन्होंने भारत में बहुत मार काट मचाई जैसे “नेपालवंशी” “शक्य” आदि। पर बलात्कार शब्द भारत में तब तक शायद ही किसी को पता था।
अब आते हैं मध्यकालीन भारत में~
जहाँ से शुरू होता है इस्लामी आक्रमण~
और यहीं से शुरू होता है भारत में बलात्कार का प्रचलन ।
~सबसे पहले 711 ईस्वी में “मुहम्मद बिन कासिम” ने सिंध पर हमला करके राजा “दाहिर” को हराने के बाद उसकी दोनों “बेटियों” को “यौनदासियों” के रूप में “खलीफा” को तोहफा भेज दिया।
तब शायद भारत की स्त्रियों का पहली बार बलात्कार जैसे कुकर्म से सामना हुआ जिसमें “हारे हुए राजा की बेटियों” और “साधारण भारतीय स्त्रियों” का “जीती हुयी इस्लामी सेना” द्वारा बुरी तरह से बलात्कार और अपहरण किया गया ।
~फिर आया 1001 इस्वी में “गजनवी”। इसके बारे में ये कहा जाता है कि इसने “इस्लाम को फ़ैलाने” के उद्देश्य से ही आक्रमण किया था।
“सोमनाथ के मंदिर” को तोड़ने के बाद इसकी सेना ने हजारों “काफिर औरतों” का बलात्कार किया फिर उनको अफगानिस्तान ले जाकर “बाजारों में बोलियाँ” लगाकर “जानवरों” की तरह “बेच” दिया ।
~फिर “गौरी” ने 1192 में “पृथ्वीराज चौहान” को हराने के बाद भारत में “इस्लाम का प्रकाश” फैलाने के लिए “हजारों काफिरों” को मौत के घाट उतर दिया और उसकी “फौज” ने “अनगिनत हिन्दू स्त्रियों” के साथ बलात्कार कर उनका “धर्म-परिवर्तन” करवाया।
~ये विदेशी मुस्लिम अपने साथ औरतों को लेकर नहीं आए थे।
~मुहम्मद बिन कासिम से लेकर सुबुक्तगीन, बख्तियार खिलजी, जूना खाँ उर्फ अलाउद्दीन खिलजी, फिरोजशाह, तैमूरलंग, आरामशाह, इल्तुतमिश, रुकुनुद्दीन फिरोजशाह, मुइजुद्दीन बहरामशाह, अलाउद्दीन मसूद, नसीरुद्दीन महमूद, गयासुद्दीन बलबन, जलालुद्दीन खिलजी, शिहाबुद्दीन उमर खिलजी, कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी, नसरत शाह तुगलक, महमूद तुगलक, खिज्र खां, मुबारक शाह, मुहम्मद शाह, अलाउद्दीन आलम शाह, बहलोल लोदी, सिकंदर शाह लोदी, बाबर, नूरुद्दीन सलीम जहांगीर,
~अपने हरम में “8000 रखैलें रखने वाला शाहजहाँ”।
~ इसके आगे अपने ही दरबारियों और कमजोर मुसलमानों की औरतों से अय्याशी करने के लिए “मीना बाजार” लगवाने वाला “जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर”।
 ~मुहीउद्दीन मुहम्मद से लेकर औरंगजेब तक बलात्कारियों की ये सूची बहुत लम्बी है। जिनकी फौजों ने हारे हुए राज्य की लाखों “काफिर महिलाओं” “(माल-ए-गनीमत)” का बेरहमी से बलात्कार किया और “जेहाद के इनाम” के तौर पर कभी वस्तुओं की तरह “सिपहसालारों” में बांटा तो कभी बाजारों में “जानवरों की तरह उनकी कीमत लगायी” गई।
~ये असहाय और बेबस महिलाएं “हरमों” से लेकर “वेश्यालयों” तक में पहुँची। इनकी संतानें भी हुईं पर वो अपने मूलधर्म में कभी वापस नहीं पहुँच पायीं।
~एकबार फिर से बता दूँ कि मुस्लिम “आक्रमणकारी” अपने साथ “औरतों” को लेकर नहीं आए थे।
~वास्तव में मध्यकालीन भारत में मुगलों द्वारा “पराजित काफिर स्त्रियों का बलात्कार” करना एक आम बात थी क्योंकि वो इसे “अपनी जीत” या “जिहाद का इनाम” (माल-ए-गनीमत) मानते थे।
~केवल यही नहीं इन सुल्तानों द्वारा किये अत्याचारों और असंख्य बलात्कारों के बारे में आज के किसी इतिहासकार ने नहीं लिखा।
~बल्कि खुद इन्हीं सुल्तानों के साथ रहने वाले लेखकों ने बड़े ही शान से अपनी कलम चलायीं और बड़े घमण्ड से अपने मालिकों द्वारा काफिरों को सबक सिखाने का विस्तृत वर्णन किया।
~गूगल के कुछ लिंक्स पर क्लिक करके हिन्दुओं और हिन्दू महिलाओं पर हुए “दिल दहला” देने वाले अत्याचारों के बारे में विस्तार से जान पाएँगे। वो भी पूरे सबूतों के साथ।
~इनके सैकड़ों वर्षों के खूनी शासनकाल में भारत की हिन्दू जनता अपनी महिलाओं का सम्मान बचाने के लिए देश के एक कोने से दूसरे कोने तक भागती और बसती रहीं।
~इन मुस्लिम बलात्कारियों से सम्मान-रक्षा के लिए हजारों की संख्या में हिन्दू महिलाओं ने स्वयं को जौहर की ज्वाला में जलाकर भस्म कर लिया।
~ठीक इसी काल में कभी स्वच्छंद विचरण करने वाली भारतवर्ष की हिन्दू महिलाओं को भी मुस्लिम सैनिकों की दृष्टि से बचाने के लिए पर्दा-प्रथा की शुरूआत हुई।
~महिलाओं पर अत्याचार और बलात्कार का इतना घिनौना स्वरूप तो 17वीं शताब्दी के प्रारंभ से लेकर 1947 तक अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में भी नहीं दिखीं। अंग्रेजों ने भारत को बहुत लूटा परन्तु बलात्कारियों में वे नहीं गिने जाते।
~1946 में मुहम्मद अली जिन्ना के डायरेक्टर एक्शन प्लान, 1947 विभाजन के दंगों से लेकर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम तक तो लाखों काफिर महिलाओं का बलात्कार हुआ या फिर उनका अपहरण हो गया। फिर वो कभी नहीं मिलीं।
~इस दौरान स्थिती ऐसी हो गयी थी कि “पाकिस्तान समर्थित मुस्लिम बहुल इलाकों” से “बलात्कार” किये बिना एक भी “काफिर स्त्री” वहां से वापस नहीं आ सकती थी।
~जो स्त्रियाँ वहां से जिन्दा वापस आ भी गयीं वो अपनी जांच करवाने से डरती थी।
~जब डॉक्टर पूछते क्यों तब ज्यादातर महिलाओं का एक ही जवाब होता था कि “हमपर कितने लोगों ने बलात्कार किये हैं ये हमें भी पता नहीं”।
~विभाजन के समय पाकिस्तान के कई स्थानों में सड़कों पर काफिर स्त्रियों की “नग्न यात्राएं (धिंड) “निकाली गयीं, “बाज़ार सजाकर उनकी बोलियाँ लगायी गयीं”
~और 10 लाख से ज्यादा की संख्या में उनको दासियों की तरह खरीदा बेचा गया।
~20 लाख से ज्यादा महिलाओं को जबरन मुस्लिम बना कर अपने घरों में रखा गया। (देखें फिल्म “पिंजर” और पढ़ें पूरा सच्चा इतिहास गूगल पर)।
~इस विभाजन के दौर में हिन्दुओं को मारने वाले सबके सब विदेशी नहीं थे। इन्हें मारने वाले स्थानीय मुस्लिम भी थे।
~वे समूहों में कत्ल से पहले हिन्दुओं के अंग-भंग करना, आंखें निकालना, नाखुन खींचना, बाल नोचना, जिंदा जलाना, चमड़ी खींचना खासकर महिलाओं का बलात्कार करने के बाद उनके “स्तनों को काटकर” तड़पा-तड़पा कर मारना आम बात थी।
अंत में कश्मीर की बात~
~19 जनवरी 1990~
~सारे कश्मीरी पंडितों के घर के दरवाजों पर नोट लगा दिया जिसमें लिखा था~  “या तो मुस्लिम बन जाओ या मरने के लिए तैयार हो जाओ या फिर कश्मीर छोड़कर भाग जाओ लेकिन अपनी औरतों को यहीं छोड़कर “।
~लखनऊ में विस्थापित जीवन जी रहे कश्मीरी पण्डित संजय बहादुर उस मंजर को याद करते हुए आज भी सिहर जाते हैं।
~वह कहते हैं कि “मस्जिदों के लाउडस्पीकर” लगातार तीन दिन तक यही आवाज दे रहे थे कि यहां क्या चलेगा, “निजाम-ए-मुस्तफा”, ‘आजादी का मतलब क्या “ला इलाहा इलल्लाह”, ‘कश्मीर में अगर रहना है, “अल्लाह-ओ-अकबर” कहना है।
~और ‘असि गच्ची पाकिस्तान, बताओ “रोअस ते बतानेव सान” जिसका मतलब था कि हमें यहां अपना पाकिस्तान बनाना है, कश्मीरी पंडितों के बिना मगर कश्मीरी पंडित महिलाओं के साथ।
~सदियों का भाईचारा कुछ ही समय में समाप्त हो गया जहाँ पंडितों से ही तालीम हासिल किए लोग उनकी ही महिलाओं की अस्मत लूटने को तैयार हो गए थे।
~सारे कश्मीर की मस्जिदों में एक टेप चलाया गया। जिसमें मुस्लिमों को कहा गया की वो हिन्दुओं को कश्मीर से निकाल बाहर करें। उसके बाद कश्मीरी मुस्लिम सड़कों पर उतर आये।
~उन्होंने कश्मीरी पंडितों के घरों को जला दिया, कश्मीर पंडित महिलाओ का बलात्कार करके, फिर उनकी हत्या करके उनके “नग्न शरीर को पेड़ पर लटका दिया गया”।
~कुछ महिलाओं को बलात्कार कर जिन्दा जला दिया गया और बाकियों को लोहे के गरम सलाखों से मार दिया गया।
~कश्मीरी पंडित नर्स जो श्रीनगर के सौर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में काम करती थी, का सामूहिक बलात्कार किया गया और मार मार कर उसकी हत्या कर दी गयी।
~बच्चों को उनकी माँओं के सामने स्टील के तार से गला घोंटकर मार दिया गया।
~कश्मीरी काफिर महिलाएँ पहाड़ों की गहरी घाटियों और भागने का रास्ता न मिलने पर ऊंचे मकानों की छतों से कूद कूद कर जान देने लगी।
~लेखक राहुल पंडिता उस समय 14 वर्ष के थे। बाहर माहौल ख़राब था। मस्जिदों से उनके ख़िलाफ़ नारे लग रहे थे। पीढ़ियों से उनके भाईचारे से रह रहे पड़ोसी ही कह रहे थे, ‘मुसलमान बनकर आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो या वादी छोड़कर भागो’।
~राहुल पंडिता के परिवार ने तीन महीने इस उम्मीद में काटे कि शायद माहौल सुधर जाए। राहुल आगे कहते हैं, “कुछ लड़के जिनके साथ हम बचपन से क्रिकेट खेला करते थे वही हमारे घर के बाहर पंडितों के ख़ाली घरों को आपस में बांटने की बातें कर रहे थे और हमारी लड़कियों के बारे में गंदी बातें कह रहे थे। ये बातें मेरे ज़हन में अब भी ताज़ा हैं।
~1989 में कश्मीर में जिहाद के लिए गठित जमात-ए-इस्लामी संगठन का नारा था-  ‘हम सब एक, तुम भागो या मरो’।
~घाटी में कई कश्मीरी पंडितों की बस्तियों में सामूहिक बलात्कार और लड़कियों के अपहरण किए गए। हालात और बदतर हो गए थे।
~कुल मिलाकर हजारों की संख्या में काफिर महिलाओं का बलात्कार किया गया।
~आज आप जिस तरह दाँत निकालकर धरती के जन्नत कश्मीर घूमकर मजे लेने जाते हैं और वहाँ के लोगों को रोजगार देने जाते हैं। उसी कश्मीर की हसीन वादियों में आज भी सैकड़ों कश्मीरी हिन्दू बेटियों की बेबस कराहें गूंजती हैं, जिन्हें केवल काफिर होने की सजा मिली।
~घर, बाजार, हाट, मैदान से लेकर उन खूबसूरत वादियों में न जाने कितनी जुल्मों की दास्तानें दफन हैं जो आज तक अनकही हैं। घाटी के खाली, जले मकान यह चीख-चीख के बताते हैं कि रातों-रात दुनिया जल जाने का मतलब कोई हमसे पूछे। झेलम का बहता हुआ पानी उन रातों की वहशियत के गवाह हैं जिसने कभी न खत्म होने वाले दाग इंसानियत के दिल पर दिए।
~लखनऊ में विस्थापित जीवन जी रहे कश्मीरी पंडित रविन्द्र कोत्रू के चेहरे पर अविश्वास की सैकड़ों लकीरें पीड़ा की शक्ल में उभरती हुईं बयान करती हैं कि यदि आतंक के उन दिनों में घाटी की मुस्लिम आबादी ने उनका साथ दिया होता जब उन्हें वहां से खदेड़ा जा रहा था, उनके साथ कत्लेआम हो रहा था तो किसी भी आतंकवादी में ये हिम्मत नहीं होती कि वह किसी कश्मीरी पंडित को चोट पहुंचाने की सोच पाता लेकिन तब उन्होंने हमारा साथ देने के बजाय कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेक दिए थे या उनके ही लश्कर में शामिल हो गए थे।
~अभी हाल में ही आपलोगों ने टीवी पर “अबू बकर अल बगदादी” के जेहादियों को काफिर “यजीदी महिलाओं” को रस्सियों से बाँधकर कौड़ियों के भाव बेचते देखा होगा।
~पाकिस्तान में खुलेआम हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर सार्वजनिक रूप से मौलवियों की टीम द्वारा धर्मपरिवर्तन कर निकाह कराते देखा होगा।
~बांग्लादेश से भारत भागकर आये हिन्दुओं के मुँह से महिलाओं के बलात्कार की हजारों मार्मिक घटनाएँ सुनी होंगी।
~यहाँ तक कि म्यांमार में भी एक काफिर बौद्ध महिला के बलात्कार और हत्या के बाद शुरू हुई हिंसा के भीषण दौर को देखा होगा।
~केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनियाँ में इस सोच ने मोरक्को से ले कर हिन्दुस्तान तक सभी देशों पर आक्रमण कर वहाँ के निवासियों को धर्मान्तरित किया, संपत्तियों को लूटा तथा इन देशों में पहले से फल फूल रही हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता का विनाश कर दिया।
~परन्तु पूरी दुनियाँ में इसकी सबसे ज्यादा सजा महिलाओं को ही भुगतनी पड़ी…
बलात्कार के रूप में ।
~आज सैकड़ों साल की गुलामी के बाद समय बीतने के साथ धीरे-धीरे ये बलात्कार करने की मानसिक बीमारी भारत के पुरुषों में भी फैलने लगी।
~जिस देश में कभी नारी जाति शासन करती थीं, सार्वजनिक रूप से शास्त्रार्थ करती थीं, स्वयंवर द्वारा स्वयं अपना वर चुनती थीं, जिन्हें भारत में देवियों के रूप में श्रद्धा से पूजा जाता था आज उसी देश में छोटी-छोटी बच्चियों तक का बलात्कार होने लगा और आज इस मानसिक रोग का ये भयानक रूप देखने को मिल रहा है ।
सादर ✍
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जिन्नाह के जिन्न से नही, जिन्नाहवादी सोच से बचो

From: Vinod Kumar Gupta < >

~जिन्नाह के जिन्न से नही जिन्नाहवादी सोच से बचो〰

◾एक बार नेहरू जी ने कहा था कि  “एक क्या एक हज़ार जिन्नाह भी पाकिस्तान नही बना सकते”। तब जिन्नाह बोले थे कि  “पाकिस्तान का जन्म तो तभी हो गया था जब पहले हिन्दू का धर्मपरिवर्तन करके उसे मुसलमान बना दिया गया था “। अतः उनकी भविष्य में भारत को मुगलिस्तान बनाने की सोच व दूरदर्शिता स्पष्ट थी। जबकि हमारे नेतागण धर्मनिरपेक्षता की ओढ़नी में इस्लामिक मानसिकता से दबते हुए व परिस्थितियों से समझौता करते हुए आत्मसमर्पण करते आ रहे हैं। हम कभी मुस्लिम तुष्टिकरण की योजनाएं बनाकर उनपर भारी राजकोष व्यय करते हैं तो कभी उन्हें और अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए मुस्लिम सशक्तिकरण का अभियान चला कर आत्मसंतुष्ट होना चाहते हैं ।
◾परंतु अज्ञानवश इस सबसे हम आत्मघात की ओर बढ़ रहें हैं। इसी का परिणाम है कि जिन्नाह जैसे देशद्रोही को अपना आदर्श मानने वाला समाज उनकी विभाजनकारी नीतियों को आगे बढ़ाते हुए आज उसी राष्ट्र को जला रहा हैं जहां की माटी में वे सब पले-बढ़े हुए हैं। जिसके अन्न-जल ने उन्हें सींच कर भारत जैसे एक प्रमुख राष्ट्र का सम्मानित नागरिक बनाया है । क्या ऐसे समाज को भारत भूमि के लिये उसकी संस्कृति व आदर्शों के प्रति कोई सम्मान नहीं होना चाहिये ?
◾इस सत्य को मानना अनुचित नही कि मोहम्मद अली जिन्नाह ही पाकिस्तान के जनक कहलाये जाते है। उन्होंने मुस्लिम लीग के 22 मार्च 1940 के लाहौर अधिवेशन में द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत प्रतिपादित किया। उन्होंने कहा भारत में “हिन्दू-मुसलमान दो जातियां नही अपितु दो राष्ट्र है, क्योंकि दोनों का खान-पान , रीति-रिवाज व रहन-सहन बिल्कुल भिन्न है। दोनों न सहभोज कर सकते है और न ही दोनों सहविवाह कर सकते। यहां तक कि हिन्दू का महापुरुष मुसलमान के लिए खलनायक है व मुसलमान का महापुरुष हिन्दू का खलनायक है। इसलिए भारत को हिन्दू – भारत  व  मुस्लिम – भारत के रूप में विभाजित कर देना चाहिये “। 23 मार्च 1940 को इसी अधिवेशन में पाकिस्तान संबंधित प्रस्ताव पारित कर दिया गया, जिसके तुरंत बाद मुस्लिम  लीग के नेताओं ने जहां तहां भी उनसे हो सका हिन्दुओं व सिक्खों की हत्या, लूटमार व बलात्कार आदि आरम्भ कर दिये । ढाका, मुंबई व अहमदाबाद आदि में तो बल्वे अधिक भयंकर हुए थे।
◾इतिहास साक्षी है कि जिद्दी जिन्नाह को मनाने के लिए महात्मा गांधी सन 1944 में दिनांक  9 से 27 सितंबर तक निरन्तर 19 दिन जिन्नाह की कोठी पर गए थे और उनको “कायदे-आजम” ( सबसे बड़ा आदमी ) कहते हुए संबोधित करके गांधी जी ने मुस्लिम-तुष्टीकरण की सारी सीमाएं लांघ दी थी। परंतु जिन्नाह अपनी जिद्द पर अड़े रहे। यह सत्य है कि पूर्व में जिन्नाह कट्टरपंथी नही थे परंतु सत्ता पाने की होड़ने और नेहरू आदि के व्यवहारों ने उन्हें मुस्लिम लीग का नेता बना कर स्वतः इस्लामिक कट्टरता के मार्ग पर चलने को विवश कर दिया था।
◾यह भी अवश्य स्मरण होना चाहिये कि  16 अगस्त 1946 को जिन्नाह ने मुस्लिम लीग द्वारा सीधी कार्यवाही  ( डायरेक्ट एक्शन ) का आदेश देकर हिन्दू व सिक्खों को मारने का आह्वान किया था। जिसके कारण बंगाल की मुस्लिम लीग सरकार ने कलकत्ता की सड़कों को हिंदुओं के रक्त से लाल कर दिया। नोआखाली  में तो हिंदुओं की हज़ारों महिलाओं व लड़कियों का बलात्कार व अपहरण हुआ था। अखंड भारत के पश्चिमी पंजाब में हिन्दू व सिक्खों के लहू की नदियां बही थी। परिणामस्वरूप इन भयावह हत्याकांडों ने देश को एक खतरनाक स्थिति मे पहुँचाते हुए दर्दनाक मोड़ देने से भारत को विभाजन की त्रासदी झेलनी पड़ी ।
◾क्या किसी ने यह नही सोचा कि 1947 में भारत विभाजन की भूमिका के उत्तरदायी जिन्नाह व गाँधी एवं नेहरू के अड़ियल रुख के कारण हुए विभाजन की दुःखद त्रासदी में लगभग 2.5 करोड़ लोग बेघर हुए ,  10-15 लाख निर्दोष मारे गए व लगभग हज़ारों अबलाओं का बलात्कार हुआ और हज़ारों लोगों को अपना धर्म त्यागने का पाप झेलना पड़ा। यह केवल भारत के इतिहास की नही बल्कि मानव इतिहास को कलंकित करने वाली एक बड़ी दुर्घटना घटी थी। कायदे आजम कहलाने वाले जिन्नाह की ही योजना थी कि पाकिस्तान बनने के डेढ़ माह बाद ही कश्मीर के मीरपुर, मुजफ्फराबाद आदि बीसियों शहरों और गावों में  (जो अब पाक अधिकृत  कश्मीर में हैं ) हिंदुओं का नरसंहार करवाया गया। उस समय जिन्नाह ही पाकिस्तान के गवर्नर जनरल थे ।
◾धर्म के नाम यह सब क्यों हुआ और आगे भी होता जा रहा है क्योंकि हमको अपने हिन्दू धर्म की तेजस्विता का ज्ञान ही नही हैं और न ही हमारा कोई नेता इतना सक्षम है कि वह शुद्ध रूप से संविधान के अनुसार धर्मनिरपेक्षता का पालन कर सकें और भोली-भाले राष्ट्रवादियों की अस्मिता की रक्षा कर सकें। वर्षो पूर्व जब आडवाणी जी ने पाकिस्तान जाकर जिन्नाह को धर्मनिरपेक्ष कहा और जसवंत सिंह ने एक पुस्तक लिखकर जिन्नाह का पक्ष रखा तो संघ परिवार सहित भाजपा ने उन्हें शीर्ष नेतृत्व से अलग-थलग कर दिया था। ये दोनों नेता आज तक उस राष्ट्रीय अपमानजनक कृत्य का परिणाम भुगत रहे हैं।
◾यह अत्यंत दुःखद है कि देश में समान नागरिक सहिंता , अनुच्छेद 370 व 35 (ए) , विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं, बांग्ला देशी एवं रोहिंग्या मुसलमान घुसपैठियों व राम जन्मभूमि मंदिर की वर्षो पुरानी राष्ट्रीय समस्याओं पर सकारात्मक जागरण अभियान की प्राथमिक आवश्यकता के स्थान पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय में जिन्नाह के चित्र को लेकर विवाद  70 वर्ष बाद अब क्यों उछाला जा रहा है ? ◾भविष्य में राजनीति क्या रूप लें, अभी कहना शीघ्रता होगी क्योंकि जिन्नाहवादी पाकिस्तानी सोच राष्ट्रवादियों द्वारा मुसलमानों को अतिरिक्त लाभान्वित करवा के उनको और अधिक शक्तिशाली बनाने के लिये अपने एजेंडे पर कार्य कर रही हैं। हमारे तथाकथित राष्ट्रवादी नेता जब सत्ता से बाहर होते हैं तो सच्चर कमेटी व अल्पसंख्यक आयोग व मंत्रालय द्वारा मुसलमानों को मालामाल करने की योजनाओं का यथा संभव विरोध करने से नही चूकते और जब स्वयं सत्ता में हैं तो मुस्लिम सशक्तिकरण के लिए कोई भी मार्ग छोड़ना नही चाहते चाहे उसमें राष्ट्रवादियों को प्रताड़ना ही क्यों न झेलनी पड़ें ?
◾राजमद में ये नेता अपने सारे वायदे और सिद्धान्तों को भुला कर भविष्य में पुनः सत्ता पाने के लिये अल्पसंख्यकवाद की चपेट में आ चुके हैं। जबकि इतिहास साक्षी हैं की अल्पसंख्यकवाद का वास्तविक लाभ उठाने वाला मुस्लिम सम्प्रदाय राष्ट्रवादियों का पक्ष नही लेता। इस प्रकार की मुस्लिम उन्मुखी राजनीति  समस्त राष्ट्रवादियों व संघ परिवारों से संबंधित देशभक्तों को भी आहत कर रही हैं। फिर भी अधिकांश देशभक्त  इसको भाजपा की कूटनीतिज्ञता समझने को विवश हो रहें हैं।
◾लेकिन चाटुकारों से घिरा हुआ शीर्ष नेतृत्व जब चुनाव जीतने को ही सर्वोच्च लक्ष्य मानने लगेगा तो राजनीति में सिद्धान्तहीनता की जड़ें और अधिक गहरी होती रहेगी। नेताओं को यह ध्यान🏼रखना चाहिए कि कार्यकर्ता समाज का सेवक होता है न कि किसी नेता का दास और संगठन को नेताओं से अधिक कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है। क्योंकि किसी भी संगठन की शक्ति उसके कार्यकर्ताओं से ही निर्मित होती है , इसलिए उनकी इच्छाओं का सम्मान व सेवाओं का मूल्यांकन होना ही चाहिये।
◾अतः आज आवश्यकता यह है कि जिन्नाह के जिन्न से नही जिन्नाहवादी पाकिस्तानी / जिहादी सोच से बचना होगा इसलिए राष्ट्रवादी नेताओं को समझना होगा कि सफल राजनीति के लिये राष्ट्रवादी समाज व कार्यकर्ताओं को रबर के समान इतना न खींचों की वह टूट कर बिखर जाये।

विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
गाज़ियाबाद