उर्दू के शब्दों को त्याग कर मातृभाषा का प्रयोग करें.

Source https://www.youtube.com/watch?v=pgDy2QifZWw

Comment byKIn Jong Un Koriyaawaale

उर्दू हिंदी 01 ईमानदार – निष्ठावान 02 इंतजार – प्रतीक्षा 03 इत्तेफाक – संयोग 04 सिर्फ – केवल, मात्र 05 शहीद – बलिदान 06 यकीन – विश्वास, भरोसा 07 इस्तकबाल – स्वागत 08 इस्तेमाल – उपयोग, प्रयोग 09 किताब – पुस्तक 10 मुल्क – देश 11 कर्ज़ – ऋण 12 तारीफ़ – प्रशंसा 13 तारीख – दिनांक, तिथि 14 इल्ज़ाम – आरोप 15 गुनाह – अपराध 16 शुक्रीया – धन्यवाद, आभार 17 सलाम – नमस्कार, प्रणाम 18 मशहूर – प्रसिद्ध 19 अगर – यदि 20 ऐतराज़ – आपत्ति 21 सियासत – राजनीति 22 इंतकाम – प्रतिशोध 23 इज्ज़त – मान, प्रतिष्ठा 24 इलाका – क्षेत्र 25 एहसान – आभार, उपकार 26 अहसानफरामोश – कृतघ्न 27 मसला – समस्या 28 इश्तेहार – विज्ञापन 29 इम्तेहान – परीक्षा 30 कुबूल – स्वीकार 31 मजबूर – विवश 32 मंजूरी – स्वीकृति 33 इंतकाल – मृत्यु, निधन 34 बेइज्जती – तिरस्कार 35 दस्तखत – हस्ताक्षर 36 हैरानी – आश्चर्य 37 कोशिश – प्रयास, चेष्टा 38 किस्मत – भाग्य 39 फै़सला – निर्णय 40 हक – अधिकार 41 मुमकिन – संभव 42 फर्ज़ – कर्तव्य 43 उम्र – आयु 44 साल – वर्ष 45 शर्म – लज्जा 46 सवाल – प्रश्न 47 जवाब – उत्तर 48 जिम्मेदार – उत्तरदायी 49 फतह – विजय 50 धोखा – छल 51 काबिल – योग्य 52 करीब – समीप, निकट 53 जिंदगी – जीवन 54 हकीकत – सत्य 55 झूठ – मिथ्या, असत्य 56 जल्दी – शीघ्र 57 इनाम – पुरस्कार 58 तोहफ़ा – उपहार 59 इलाज – उपचार 60 हुक्म – आदेश 61 शक – संदेह 62 ख्वाब – स्वप्न 63 तब्दील – परिवर्तित 64 कसूर – दोष 65 बेकसूर – निर्दोष 66 कामयाब – सफल 67 गुलाम – दास 68 जन्नत -स्वर्ग 69 जहन्नुम -नरक 70 खौ़फ -डर 71 जश्न -उत्सव 72 मुबारक -बधाई/शुभेच्छा 73 लिहाजा़ -इसलीए 74 निकाह -विवाह/शादि 75 आशिक -प्रेमी 76 माशुका -प्रेमिका 77 हकीम -वैध 78 नवाब -राजसाहब 79 रुह -आत्मा 80 खु़दकुशी -आत्महत्या 81 इज़हार -प्रस्ताव 82 बादशाह -राजा/महाराजा 83 ख़्वाहिश -महत्वाकांक्षा 84 जिस्म -शरीर/अंग 85 हैवान -दैत्य/असुर 86 रहम -दया 87 बेरहम -बेदर्द/दर्दनाक 88 खा़रिज -रद्द 89 इस्तीफ़ा -त्यागपत्र 90 रोशनी -प्रकाश 91मसीहा -देवदुत 92 पाक -पवित्र 93 क़त्ल -हत्या 94 कातिल -हत्यारा 95 मुहैया – उपलब्ध 96 फ़ीसदी – प्रतिशत 97 कायल – प्रशंसक 98 मुरीद – भक्त 99 कींमत – मूल्य (मुद्रा में) 100 वक्त – समय 101 सुकून – शाँति 102 आराम – विश्राम 103 मशरूफ़ – व्यस्त 104 हसीन – सुंदर 105 कुदरत – प्रकृति 106 करिश्मा – चमत्कार 107 इजाद – आविष्कार 108 ज़रूरत – आवश्यक्ता 109 ज़रूर – अवश्य 110 बेहद – असीम 111 तहत – अनुसार

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Comment by The Awqaken Hindus

मैंने इसको लिखने में 30 मिनट का मूल्यवान समय व्यय किया , आप 2 min निकालकर पढ़िए। पिछले दो -तीन महीनों में मुसलमानों ने हिन्दुओ को क्या शिक्षा दी है ..इसको हिन्दुओ को मालूम होना अत्यंत आवश्यक है। 1.यदि तुम जमातियों पर टिप्पणी करोगे तो तुम्हारी हत्या कर दी जाएगी। (उदाहरण: लोटन निषाद , करेली प्रयागराज ,up) 2.यदि रामनवमी पर तुम अपने पड़ोस में रह रहे हम मुसलमानों के घरों के सामने दिया जलाओगे तो तुम्हारी निर्दयतापूर्वक हत्या कर दी जाएगी। (उदा: रेवन्त सिंह, पोखरण, मांडवा राजस्थान) 3.यदि हम मुस्लिम lockdown का उल्लंघन करते है और पुलिस हमें पकड़ने आती है तो हम बिना तुम हिन्दुओ से पूछे तुम्हारे घर मे घुस जाएंगे और यदि विरोध किया तो हत्या कर दूंगा। (उदा:- सनी गुप्ता, पटना ,बिहार) 4.यदि हम मौलाना तुम्हारे बच्चो के मुँह पर पानी छिड़कते है तो कुछ बोलना नही, अन्यथा क्रिकेट खेलने के बहाने हम बच्चे को तुम्हारे घर भेजेंगे और तुम्हारे बच्चे की गला रेतकर हत्या करते हैं तो हम जिम्मेदार नही। (उदा:-रोहित जायसवाल, कटैया, गोपालगंज, बिहार) 5.यदि कोई व्यक्ति साइकिल से कहीं जाता है और गलती से उसकी साइकिल हम मुसलमानों के कार को खरोंच भी मार देती है तो हम उस काफ़िर की हत्या कर देंगे। (उदा:-सनातन डेका -महाकुची, असम) 6.यदि हिन्दू कुर्सी बनवाने के लिये हम मुस्लिम के फर्नीचर की दुकान पर जाता है औऱ किसी कारण से विवाद बढ़ जाता है तो मैं उस हिन्दू की सारेआम बाजार मे निर्दयता काट कर हत्या कर दूंगा । (उदाहरण:- रितुपर्णा पेगू , गुवाहाटी, असम) 7.यदि हम मुस्लिम अपने कार से जा रहे है और अचानक कोई हिन्दू बाइक से थोड़ा खरोंच मार देता है औऱ ऐसे उस हिन्दू का मोबाइल गिरने पर हम मुसलमान यदि अपने घर पर लेकर भाग जाते हैं तो ऐसे में यदि वह व्यक्ति उसे मांगने मेरे गाँव मे आता है तो उसको मैं पहले बेल्ट को उसके गले मे बांधकर जमीन पर लेटाऊंगा और तबतक नही छोडूंगा जबतक उसकी मौत न हो जाये। ( उदाहरण:-विवेक जाटव, गाजियाबाद, up) 8.हम मुसलमान भले ही हिन्दू लड़कियो को लव जिहाद में फंसाये, लेकिन यदि कोई काफिर हमारी लड़की से प्यार करेगा तो वह कुत्ते की तरह मरने के लिए तैयार रहे । (उदाहरण:- सहारनपुर, up) 9.यदि हम अपने क्षेत्रों में बहुसंख्यक है तो हिन्दुओ को जैसे सतायेंगे वह सहना होगा, हिंदुओ की चोटी काट देंगे, उन्हें अग्नि में पेशाब करने लिये बोलेंगे(जिस अग्नि को हिन्दू शुद्ध मानते हैं और वह उनके लिए पूजनीय है) यदि इनकार करोगे तो हत्या कर देंगे। (उदाहरण:- रामजीलाल, मेवात ,हरियाणा) 10.जिस राज्य में हम बहुसंख्यक है वहां हमे कोई भी गैर मुस्लिम संवैधानिक पदों पर स्वीकार नही। (उदाहरण:- अजय पण्डिता, जो कि कश्मीर में इकलौता हिन्दू सरपंच था) 11. यदि हिन्दू लड़की को मैंने लव जिहाद मे फँसाया और बाद मे उसकी शादी उसके घर वाले किसी और जगह कर देते हैं तो मैं उसकी हत्या कर दूंगा। ( उदाहरण:- वैष्णवी ,मठा गाँव, महाराष्ट्र) 12. यदि लव जिहाद करते समय कोई भी हिन्दू लडक़ी मेरे निकाह का प्रपोजल अस्वीकार करती है तो उसकी हत्या कर दूंगा (उदाहरण:-शिवानी , रोहतक, हरियाणा) 13.हम मुसलमान यदि किसी भी हिन्दू लडक़ी से जबरन शादी करना चाहे और यदि वह लड़की मुझे अस्वीकार कर देती है तो उसको चाकू घोंप मार डालूंगा। (उदाहरण:-नेहा कौंर, टिलामोड, थाना क्षेत्र, गाजियाबाद, up) 14.यदि हम मुसलमानो के बच्चे आपके भैसों पर पत्थर मारे और उसका आप विरोध करोगे तो तुम्हारी हत्या जायज़ है। (उदाहरण:- जयप्रकाश कुशवाहा, चंदौली गावँ, देवरिया up) 15.यदि कोई भी हिन्दू बच्ची हमारे नल पर पानी पीने आती है तो उसको इतना मारेंगे कि अगले कुछ दिन में तो वह मर जाएंगी। (उदारहण:- 8 वर्ष की बच्ची अनीता पांडे , प्रतापगढ़ ,up) 16. यदि तुम हिंदू साधू भगवा कपड़ा पहनोगे और यदि हमारा बच्चा कोई तुम पर टिप्पणी कर देता है तो यदि तुम इसका विरोध करोगे तो हम तुम्हारी हत्या कर देंगे। (उदाहरण:- पूजारी कांति प्रसाद, मेरठ, up) यह सब वह घटनाएं है जिनको मैंने सुना और बताया इसके अतिरिक्त और भी घटनाये है हुई है जहाँ हिन्दुओ की हत्या और बालिकाओ का रेप हुआ है। हिन्दुओ को मुसलमानों के जितना शांत बनना होगा, तभी हिन्दुओ की रक्षा हों सकेगी।। अन्यथा हम कुछ नही कर सकते… पुलिस प्रशासन, कोर्ट, न्यायपालिका सब हमारे लिए नही है… हमने कश्मीर में देखा हिन्दुओ के साथ क्या हुआ?? इनका पूरा आर्थिक बहिष्कार करें और इनके दुकान से कुछ भी न खरीदें। इनको अपने कंपनी में जॉब न दें तथा किसी भी तरह के लिए सहायता न दे। यदि कोई डॉक्टर है तो इनका उपचार न करे। देखी सारी अकड़ इनके अंदर बाहर आएगी।आपके समर्थन की आवश्यकता है🙏🙏

वेदों में नारी के बारे मे   –  डॉ विवेक आर्य

From: Vivek Arya < >

 वेदों में नारी   –  डॉ विवेक आर्य

नारी जाति के विषय में वेदों को लेकर अनेक भ्रांतियां हैं। भारतीय समाज में वेदों पर यह दोषारोपण किया जाता हैं की वेदों के कारण नारी जाति को सती प्रथा, बाल विवाह, देवदासी प्रथा, अशिक्षा, समाज में नीचा स्थान, विधवा का अभिशाप, नवजात कन्या की हत्या आदि अत्याचार हुए हैं। किसी ने यह प्रचलित कर दिया गया था की जो नारी वेद मंत्र को सुन ले तो उसके कानों में गर्म सीसा डाल देना चाहिए और जो वेदमंत्र को बोल दे तो उसकी जिव्हा को अलग कर देना चाहिए। 

 
कोई नारी को पैर की जूती कहने में अपना बड़प्पन समझता था तो कोई उसे ताड़न की अधिकारी बताने में समझता था [द्रष्टव्य – ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी – तुलसीदास]। 
 
इतिहास इस बात का साक्षी हैं की नारी की अपमानजनक स्थिति पश्चिम से लेकर पूर्व तक के सभी देशों के इतिहास में देखने को मिलती हैं। इस विषय में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह हैं की वेद इन अत्याचारों में से एक का भी समर्थन नहीं करते अपितु वेदों में नारी को इतना उच्च स्थान प्राप्त हैं की विश्व की किसी भी धर्म पुस्तक में उसका अंश भर भी देखने को नहीं मिलता । कुछ लेखकों द्वारा वेदों में भी नारी की स्थिति को निकृष्ट रूप में दर्शाया गया है[।

1. वेदों में नारी के कर्तव्यों एवं अधिकारों के विषय में क्या कहा गया हैं?

समाधान- वेदों में नारी की स्थिति अत्यंत गौरवास्पद वर्णित हुई हैं। वेद की नारी देवी हैं, विदुषी हैं, प्रकाश से परिपूर्ण हैं, वीरांगना हैं, वीरों की जननी हैं, आदर्श माता हैं, कर्तव्यनिष्ट धर्मपत्नी हैं, सद्गृहणी हैं, सम्राज्ञी हैं, संतान की प्रथम शिक्षिका हैं, अध्यापिका बनकर कन्याओं को सदाचार और ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देनेवाली हैं, उपदेशिका बनकर सबको सन्मार्ग बतानेवाली हैं ,मर्यादाओं का पालन करनेवाली हैं, जग में सत्य और प्रेम का प्रकाश फैलानेवाली हैं। यदि गुण-कर्मानुसार क्षत्रिया हैं,तो धनुर्विद्या में निष्णात होकर राष्ट्र रक्षा में भाग लेती हैं। यदि वैश्य के गुण कर्म हैं उच्चकोटि कृषि, पशुपालन, व्यापार आदि में योगदान देती हैं और शिल्पविद्या की भी उन्नति करती हैं। वेदों की नारी पूज्य हैं, स्तुति योग्य हैं, रमणीय हैं, आह्वान-योग्य हैं, सुशील हैं, बहुश्रुत हैं, यशोमयी हैं।

पुरुष और नारी के संबंधों के विषय में वेदों में आलंकारिक वर्णन हैं। पुरुष धुलोक हैं तो नारी पृथ्वी हैं दोनों के सामंजस्य से हो सौर जगत बना हैं ,पुरुष साम हैं तो नारी ऋक हैं दोनों के सामंजस्य से ही सृष्टि का सामगान होता हैं,पुरुष वीणा-दंड हैं तो नारी वीणा तन्त्री हैं, दोनों के सामंजस्य से ही जीवन के संगीत की नि:सृत झंकार होती हैं, पुरुष नदी का एक तट हैं, तो नारी दूसरा तट हैं, दोनों के बीच में ही वैयविक्त और सामाजिक विकास की धारा बहती हैं। पुरुष दिन हैं, तो नारी रजनी हैं। पुरुष प्रभात हैं तो नारी उषा हैं। पुरुष मेघ हैं तो नारी विद्युत हैं। पुरुष अग्नि हैं, तो नारी ज्वाला हैं। पुरुष आदित्य हैं तो नारी प्रभा हैं। पुरुष तरु हैं, तो नारी लता हैं। पुरुष फूल हैं, तो नारी पंखुड़ी हैं। पुरुष धर्म हैं, तो नारी धीरता हैं। पुरुष सत्य हैं, तो नारी श्रद्धा हैं। पुरुष कर्म हैं, तो नारी विद्या हैं। पुरुष सत्व हैं, तो नारी सेवा हैं। पुरुष स्वाभिमान हैं, तो नारी क्षमा हैं। दोनों के सामंजस्य में ही पूर्णता हैं। विवाह इसी सामंजस्य का एक प्रतीक हैं।

वेदों में नारी के दो जन्म माने गए हैं। एक शरीरत: और एक विद्यात: । विद्यात: जन्म होने पर नारी का पदार्पण जैसे ही विवाह-वेदी पर होता हैं, वैसे ही उसका कुल,व्रत, यज्ञ आदि सब-कुछ बदल जाता हैं। उसके नाम,काम,रिश्ते-नाते सब बदल जाते हैं। उसके दो कुल हो जाते हैं। एक पितृकुल और एक पति कुल। वह दोनों कुलों को जोड़ने वाली कड़ी हैं। पितृकुल में नारी कन्या,पुत्री, भगिनी, ननद, बुआ हैं तो पतिकुल में नारी वधु, गृहिणी, पत्नी, भार्या, जाया, दारा, जननी, अम्बा, माता, श्वश्रु हैं। वेदों में इन सभी दायित्वों के अनुरूप नारी के कर्तव्यों का विस्तार से वर्णन हैं। वैदिक मन्त्रों में नारी को उसके कर्तव्यों का पालन करने के प्रेरणा देते हुए महान बनने के प्रेरणा हैं।

2. स्वामी दयानंद के नारी जाति के उत्थान के विषय में क्या विचार हैं?

समाधान- स्वामी दयानंद नारी जाति को न केवल शिक्षित करने के पक्षधर थे अपितु नारी जाति को गृह स्वामिनी से लेकर प्राचीनकाल की महान विदुषी गार्गी और मैत्रयी के समान विद्वान बनाना चाहते थे। स्वामी जी के अनुसार नारी ताड़न की नहीं अपितु सम्मान करने योग्य हैं।

सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी दयानंद क्रान्तिकारी उद्घोष करते हुए लिखते हैं

“जन्म से पांचवे वर्ष तक के बालकों को माता तथा छ: से आठवें वर्ष तक पिता शिक्षा करे और नौवें के प्रारंभ में द्विज अपने संतानों का उपनयन करके जहाँ पूर्ण विद्वान तथा पूर्ण विदुषी स्त्री, शिक्षा और विद्या-दान करने वालो हो वहां लड़के तथा लडकियों को भेज दे।[सत्यार्थ प्रकाश]”

“लड़कों को लड़कों की तथा लड़कियों को लकड़ियों की शाला में भेज देवें, लड़के तथा लड़कियों की पाठशालाएँ एक दुसरे से कम से कम दो कोस की दुरी पर हो।[सत्यार्थ प्रकाश]”

जो वहां अध्यापिका और अध्यापक अथवा भृत्य, अनुचर हों, वे कन्यायों की पाठशाला में सब स्त्री तथा पुरुषों की पाठशाला में सब पुरुष रहें। स्त्रियों की पाठशाला में पांच वर्ष का लड़का और पुरुषों की पाठशाला में पांच वर्ष की लड़की भी न जाने पाए।[सत्यार्थ प्रकाश]

जब तक वे ब्रहाम्चारिणी रहे, तब तक पुरुष का दर्शन, स्पर्शन, एकांत सेवन, भाषण, विषय-कथा, परस्पर क्रीरा, विषय का ध्यान और संग इन आठ प्रकार के मैथुनों से अलग रहे।[सत्यार्थ प्रकाश]

इसमें राजनियम और जाती नियम होना चाहिए कि पांचवे अथवा आठवें वर्ष से आगे अपने लड़के और लड़कियों को घर में न रख सकें, पाठशाला में अवश्य भेज देवें। जो न भेजे वह दंडनीय हो ।[सत्यार्थ प्रकाश]

स्वामी दयानंद नारी शिक्षा के महत्व को यथार्थ में समझते थे क्यूंकि माता ही शिशु की प्रथम गुरु होती हैं इसलिए नारी का शिक्षित होना अत्यंत महत्व पूर्ण होता है। स्वामी जी शिक्षा के प्रबल पक्षधर थे परन्तु सहशिक्षा के पक्षधर नहीं थे इसलिए उन्होंने लड़के लड़कियों की पाठशाला को न केवल अलग होने का सन्देश दिया हैं अपितु उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए भी यही नियम बताया था की केवल पुरुष अध्यापक लड़कों को पढ़ाये एवं स्त्री अध्यापिका लड़कियों को पढ़ाये। देखा जाये तो यह नियम समाज में होने वाले दुराचार, बलात्कार, शारीरिक शोषण, चरित्रहीनता आदि से युवक-युवतियों की रक्षा कर उन्हें राष्ट्र के लिए तैयार करने की दूरगामी सोच हैं। स्वामी जी दुराचार की भावना को मनुष्य के लिए विनाशकारी मानते थे इसीलिए उनका मानना था की अगर माता और पिता का चरित्र उज्जवल होगा तभी संतान भी सुयोग्य एवं चरित्रवान होगी। स्वामी जी के चिंतन में अशिक्षित रखने वाले माता-पिता को राजा द्वारा दण्डित करना प्रशंसनीय हैं क्यूंकि अगर देश की अगली पीढ़ी का विकास उचित प्रकार से होगा और उनकी नींव विधिवत रूप से रखी जाएगी तभी वे समाज के लिए जिम्मेदार नागरिक बनेगे। जिसका नींव में ही दोष होगा वह समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का कैसे निर्वाहन कर पायेगा।

आज से 150 वर्ष पूर्व स्वामी दयानंद के विचारों से शिक्षा चेतना का प्रचार हुआ जिसके कारण देश में हज़ारों शिक्षण संस्थाएं खुली, अनेक विद्यालय, गुरुकुल आदि प्रारम्भ हुए जिससे शिक्षा क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई। यह स्वामी दयानंद के चिंतन का परिणाम था।[1 ]

3. शंका – क्या वेद नारी जाति को शिक्षा का अधिकार देते हैं?

समाधान – स्वामी दयानंद ने “स्त्रीशूद्रो नाधियातामिति श्रुते:” – स्त्री और शूद्र न पढे यह श्रुति हैं को नकारते हुए वैदिक काल की गार्गी, सुलभा, मैत्रयी, कात्यायनी आदि सुशिक्षित स्त्रियों का वर्णन किया जो ऋषि- मुनिओं की शंकाओं का समाधान करती थी। उनका प्रयास नारी जाति को शिक्षित, स्वालम्बी, आत्मनिर्भर बनाने का था इसीलिए वे नारी को शिक्षा दिलवाने के पक्षधर थे। वेदों में नारी को शिक्षित करने के लिए अनेक मंत्र हैं जैसे-

1.ऋग्वेद 6/44/18 का भाष्य करते हुए स्वामी दयानंद लिखते हैं राजा ऐसा यत्न करे जिससे सब बालक और कन्यायें ब्रहमचर्य से विद्यायुक्त होकर समृधि को प्राप्त हो सत्य, न्याय और धर्म का निरंतर सेवन करे।

2. राजा को प्रयत्नपूर्वक अपने राज्य में सब स्त्रियों को विदुषी बनाना चाहिए – यजुर्वेद 10/7।

3. विद्वानों को यही योग्यता हैं की सब कुमार और कुमारियों को पुन्दित बनावे, जिससे सब विद्या के फल को प्राप्त होकर सुमति हों- ऋग्वेद 6/44/18।

4. जितनी कुमारी हैं वे विदुषियों से विद्या अध्ययन करे और वे कुमारी ब्रह्मचारिणी उन विदुषियों से ऐसी प्रार्थना करें की आप हम सबको विद्या और सुशिक्षा से युक्त करें -ऋग्वेद 2/41/16।

इस प्रकार यजुर्वेद 11/36,6/14,11/59 एवं ऋग्वेद 1/152/6 में भी नारी को शिक्षा का अधिकार दिया गया हैं। इतने स्पष्ट प्रमाण होने के बाद भी मध्य काल में नारी जाति को शिक्षा से वंचित रखना न केवल उनपर अत्याचार था अपितु वेदों के प्रचलन से सामान्य समाज की अनभिज्ञता का प्रदर्शन भी था।

4. क्या वेद सती प्रथा का समर्थन करते हैं?

समाधान- 1875 में स्वामी दयानंद ने पूना [2] में दिए गए अपने प्रवचन में स्पष्ट घोषणा की थी की “सती होने के लिए वेद की आज्ञा नहीं हैं” ।

वैदिक काल के इतिहास में कहीं भी सती होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता। महाभारत में माद्री के पाण्डु के मृत शरीर के साथ आत्मदाह का उल्लेख हैं जिसका सती प्रथा से कोई सम्बन्ध नहीं हैं। मध्य काल में जब अवनति का दौर चला तब नारी जाति की दुर्गति आरम्भ हुई। सती प्रथा उसी काल के देन हैं।

जहाँ तक वेदों का प्रश्न हैं सायण ने अथर्ववेद 18/3/1 में सती प्रथा दर्शाने का प्रयास किया हैं। सायण के अनुसार यहाँ पर वेद नारी को आदेश दे रहे हैं की “यह नारी अनादीशिष्टाचारसिद्ध, स्मृति पुराण आदि में प्रसिद्द सहमरणरूप धर्म का परी पालन करती हुई पतिलोक को अर्थात जिस लोक में पति गया हैं उस स्वर्गलोक को वरण करना चाहती हुई ,तुझ मृत के पास सहमरण के लिए पहुँच रही हैं। अगले जन्म में तू इसे पुत्र- पौत्रादि प्रजा और धन प्रदान करना। अगले मंत्र में सायण कहते हैं अगले जन्म में भी उसे वही पति मिलेगा। इसलिए ऐसा कहा गया हैं।

यहाँ पर सायण के अर्थों को देखकर अनेक शंका उत्पन्न होती हैं। इस मंत्र का सही अर्थ इस प्रकार हैं – यह नारी पुरातन धर्म का पालन करती हुई पतिगृह को पसंद करती हुई। हे मरण धर्मा मनुष्य , तुझ मृत के समीप नीचे भूमि पर बैठी हुई हैं। उसे संतान और सम्पति यहाँ सौप। अर्थात पति की मृत्यु होने के पश्चात पत्नी का उसकी सम्पति और संतान पर अधिकार हैं।

हमारे कथन की पुष्टि अथर्ववेद 18/3/2 मंत्र में स्वयं सायण करते हुए कहते हैं “हे मृत पति की धर्मपत्नी ! तू मृत के पास से उठकर जीवलोक में आ, तू इस निष्प्राण पति के पास क्यों पड़ी हुई हैं? पाणीग्रहणकर्ता पति से तू संतान पा चुकी हैं, उसका पालन पोषण कर.’

सायण के इस अर्थ से हमें कोई शंका नहीं हैं। दोनों मन्त्रों में विरोधाभास होना हमारे पक्ष को भी सिद्ध करता हैं।

मध्यकाल के बंगाल के कुछ पंडितो ने ऋग्वेद 10/18/7 में अग्रे के स्थान पर अग्ने पढकर सती प्रथा को वैदिक सिद्ध करना चाहा था, परन्तु यह केवल असत्य कथन हैं।

इस मंत्र में वधु को अग्नि नहीं अपितु अग्रे अर्थात गृह में प्रवेश के समय आगे चलने को कहा गया हैं।

इस प्रकार से वेद के मन्त्रों के असत्य अर्थ निकाल कर सती प्रथा को वैदिक सिद्ध किया गया था। धन्य हैं आधुनिक भारत के विचारक राजा राममोहन राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद जिनके प्रयासों से सती प्रथा का प्रचलन बंद हुआ।

5. शंका- क्या नारी जाति को वेदाध्ययन करने का अधिकार नहीं हैं?

समाधान- कुछ अज्ञानी लोगों ने यह प्रचलित कर दिया हैं की नारी और शूद्रों को वेदाध्ययन का अधिकार नहीं हैं परन्तु आज तक ऐसा मानने वाले वेद मन्त्रों में एक भी मंत्र इस कथन के समर्थन में नहीं दिखा पाये हैं। इसके विपरीत वेदों में नारी को वेदाध्ययन करने का स्पष्ट सन्देश हैं।

ऋग्वेद 10/191/3 में ईश्वर सन्देश देते हुए कह रहे हैं की हे समस्त नर नारियों! तुम्हारे लिए ये मंत्र समान रूप से दिए गए हैं तथा तुम्हारा परस्पर विचार भी समान रूप से हो। मैं तुम्हें समान रूप से ग्रंथों का उपदेश करता हूँ।

अथर्ववेद 11/6/18 में स्पष्ट सन्देश हैं की ब्रह्मचर्य का पालन कर कन्या वर का ग्रहण करे। यहाँ पर ,ब्रह्मचर्य का अर्थ हैं ब्रह्म अर्थात वेद में चर अर्थात गमन, ज्ञान या प्राप्ति करना।

अथर्ववेद 14/1/64 में नववधू को सम्बोधित करते हुए उपदेश दिया गया हैं की हे वधु! तेरे आगे, पीछे,मध्य में, अंत में सर्वत्र वेद विषयक ज्ञान रहे। और वेदज्ञान को प्राप्त करके तदनुसार तुम अपना सारा जीवन बना।

इसी प्रकार से यजुर्वेद 14/2 में स्त्री को उपदेश हैं की “इमा ब्रह्मा पीपिही ” अर्थात सौभाग्य की प्राप्ति के लिए वेदमंत्रों के अमृत का बार बार अच्छी प्रकार से पान कर।

ऋग्वेद 1/1/5 में स्वामी दयानंद लिखते हैं जो कन्या 24 वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य पूर्वक अंग-उपांग सहित वेद विद्याओं को पढ़ती हैं, वे मनुष्य जाति को सुशोभित करने वाली होती हैं।

यजुर्वेद 14/14 के भाष्य में स्वामी दयानंद लिखते हैं यदि मनुष्य इस सृष्टि में ब्रह्मचर्य आदि से कुमार और कुमारियों को द्विज बनाएं तो वे शीघ्र विद्वान हो जाएं।

ऋग्वेद 1/71/21 के भाष्य में स्वामी दयानंद लिखते हैं जिस प्रकार वैश्य लोग धर्म धारण करके धनोपार्जन करते हैं, उसी प्रकार कन्याओं को चाहिए की विवाह से पहले शुभ ब्रह्मचर्य व्रत धारण करके विदुषी अध्यापिकाओं को प्राप्त करके सुशिक्षा और (वेद ) विद्या संचय करके विवाह करें।

ऋग्वेद 1/119/5 के भाष्य में स्वामी दयानंद लिखते हैं जैसे ब्रह्मचर्य करके यौवनावस्था को प्राप्त हुई विदुषी कुमारी कन्या अपने पति को पा निरंतर उसकी सेवा करती हैं और जैसे ब्रह्मचर्य को किये हुए जवान पुरुष अपनी प्रीति के अनुकूल चाही हुई स्त्री को पाकर आनंदित होता हैं, वैसा ही सभा और सेनापति सदा होवें।

ऐसा ही आशय ऋग्वेद 5/32/11 में मिलता हैं।

महाभारत आदिपर्व 131/10 में स्पष्ट रूप से लिखा हैं की जिनका धन समान हो और वेदशास्त्रविषयक ज्ञान समान हो, उनमें मित्रता और विवाह आदि हो सकते हैं ,बलवान और सर्वथा निर्बल व्यक्तियों में नहीं।

वेदों में स्त्री को विदुषी बनने का और अपने गुण, कर्म और स्वभाव के अनुसार गुणशाली वर चुनने का अधिकार दिया गया हैं। इस प्रकार से वेदों में अनेक मंत्र स्त्रियों को वेदाध्ययन की प्रेरणा देते हैं।

वेदों में अनेक सूक्त हैं जैसे ऋग्वेद 10 /134, 10/40, 8/91, 10/95,10/107, 10/109, 10/154, 10/159,5/28 आदि जिनकी ऋषिकाएँ गोधा,घोषा, विश्ववारा, अपाला, उपनिषत्, निषत्, रोमशा आदि हुई हैं। यह ऋषिकाएँ न केवल वेदों को पढ़ती थी, उनके रहस्य को समझती थी अपितु उनका प्रचार भी करती थी [3 ]।

इन ऋषिकाओं [4] की सूची बृहद देवता 24/84-86अध्याय में मिलती हैं। ऋषिकायों को ब्रह्मवादिनी भी कहा जाता था और इनका नियमपूर्वक उपनयन, वेदाध्ययन, वेदाध्यापन, गायत्री मंत्र का उपदेश प्रदान आदि होता था।

6. शंका- क्या नारी जाति को यज्ञ में भाग लेने का अधिकार नहीं हैं?

समाधान- वैदिक काल में नारी जाति को यज्ञ में भाग लेने का पूर्ण अधिकार था जिसे मध्य काल में वर्जित कर दिया गया था। कुछ ग्रंथों में इस बात को प्रचलित कर दिया गया की नारी का स्थान यज्ञवेदी से बाहर है [शतपथ ब्रह्मण 27/4] अथवा कन्या और युवती अग्निहोत्र की होता नहीं बन सकती । वेद परम प्रमाण हैं इसलिए इस शंका का समाधान भी वेद भली प्रकार से करते हैं। वेद नारी जाति को यज्ञ में भाग लेने का पूर्ण अधिकार देते हैं।

ऋग्वेद 8/31/5-8 में कहा गया हैं की जो पति-पत्नी समान मनवाले होकर यज्ञ करते हैं उन्हें अन्न, पुष्प, हिरण्य आदि की कमी नहीं रहती हैं।

ऋग्वेद 10/85/47 में कहा गया हैं की विवाह यज्ञ में वर वधु उच्चारण करते हुए एक दुसरे का ह्रदय-स्पर्श करते हैं।

ऋग्वेद 1/72/5 में कहा गया हैं की विद्वान लोग पत्नी सहित यज्ञ में बैठते हैं और नमस्करणीय (नमन करने योग्य जैसे ईश्वर, विद्वान आदि) को नमस्कार करते हैं।

इस प्रकार यजुर्वेद 3/44,3/45,3/47,3/60,11/5,15/50 और अथर्ववेद 3/28/6, 3/30/6, 14/2/18,14/2/23,14/2/24 में भी यज्ञ में नारी के भाग लेने के स्पष्ट प्रमाण हैं।

7. शंका – क्या नारी को यज्ञ में ब्रह्मा बनने का अधिकार हैं?

समाधान- यज्ञ में ब्रह्मा का पद सबसे ऊँचा होता है। ऐतरेय ब्राह्मण 5/33 के अनुसार ज्ञान, कर्म और उपासना तीनों विद्याओं के प्रतिपादक वेदों के पूर्ण ज्ञान से ही मनुष्य ब्रह्मा बन सकता हैं। शतपथ ब्राह्मण 11/5/7 में इसी तथ्य का समर्थन किया गया हैं। गोपथ ब्राह्मण 1/3 के अनुसार जो सबसे अधिक परमेश्वर और

वेदों का ज्ञाता हो उसे ब्रह्मा बनाना चाहिए।

ऋग्वेद 8/33 में नारी को कहा गया है कि “स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ” अर्थात इस प्रकार से उचित सभ्यता के नियमों का पालन करती हुई नारी निश्चित रूप से ब्रह्मा के पद को पाने योग्य बन सकती है।

जब वेदों में स्पष्ट रूप से नारी जाति को यज्ञ में ब्रह्मा बनने का आदेश हैं तो अन्य ग्रंथों से इसके विरोध में अगर कोई प्रमाण प्रस्तुत किया जाता है तो वह अमान्य है

क्यूंकि मनुस्मृति 2/13में लिखा है कि धर्म को जानने की इच्छा रखने वालों के लिए वेद ही परम प्रमाण है।

8. शंका- क्या वेदों में दहेज देने की प्रथा का विधान हैं जिसके कारण नारी जाति पर अनेक अत्याचार हो रहे है?

समाधान- वेदों में पुत्री को दहेज से अलंकृत करने का सन्देश दिया गया है परन्तु यहाँ पर दहेज का वास्तिक अर्थ उससे भिन्न है जैसा प्राय: प्रचलित है।

अथर्ववेद 14/1/8 के मंत्र में पिता द्वारा कन्या को स्तुति वृति वाला बना देना ही पुत्री के लिए सच्चा दहेज़ है। यहाँ पर स्तुति वृति का भाव है पुत्री सदा दूसरों के गुणों की प्रशंसा करने वाली हो, किसी के भी अवगुणों की और ध्यान नहीं देने वाली हो अर्थात परनिंदा नहीं करने वाली हो एवं उसके गहने उसकी भद्रता , उसका शिष्टाचार और उसकी प्रभु के गुणगान करने की वृति हो।

यहाँ पर पुत्री को गुणों से सुशोभित करना एक पिता के लिए सच्चा दहेज देने के समान हैं। कालांतर में कुछ लोभी लोगो ने दहेज का अर्थ धन समझ लिया जिसके कारण उनका लालच बढ़ता गया एवं उसका परिणाम नारी जाति पर अत्याचार के रूप में आया हैं जो निश्चित रूप से सभ्य समाज के माथे पर कलंक के समान हैं।

9. शंका- क्या वेदों में केवल पुत्र की कामना करी गई हैं?

समाधान- आज समाज में कन्या भ्रूण हत्या का महापाप प्रचलित हो गया है। जिसका मुख्य कारण नारी जाति का समाज में उचित सम्मान न होना, धन आदि के रूप में दहेज जैसी कुरीतियों का होना ,समाज में बलात्कार जैसी घटनाओं का बढ़ना ,चरित्र दोष आदि हैं जिससे नारी जाति की रक्षा कर पाना कठिन हो गया हैं। ऐसे में समाज में पुत्र की कामना अधिक बलवती हो उठी हैं एवं पुत्री को बोझ समझा जाने लगा हैं। कुछ लोगो ने यह कुतर्क देना प्रारम्भ कर दिया है कि वेद नारी को हीन दृष्टी से देखते है और वेदों में सर्वत्र पुत्र ही मांगे गई है। सत्य यह है कि वेदों में पत्नी को उषा के सामान प्रकाशवती [ऋग्वेद 4/14/3, ऋग्वेद 7/78/3, ऋग्वेद 1/124/3, ऋग्वेद 1/48/8], वीरांगना [अथर्ववेद14/1/47, यजुर्वेद 5/10, यजुर्वेद 10/26, यजुर्वेद 13/16, यजुर्वेद 13/18], वीरप्रसवा [ऋग्वेद 10/47/2-5, ऋग्वेद 4/2/5, ऋग्वेद 7/56/24, ऋग्वेद 9/98/1], विद्या अलंकृता [यजुर्वेद 20/84, यजुर्वेद 20/85, ऋग्वेद 1/164/49, ऋग्वेद 6/49/7], स्नेहमयी माँ [ऋग्वेद 10/17/10, ऋग्वेद 6/61/7, यजुर्वेद 6/17, यजुर्वेद 6/31, अथर्ववेद 3/13/7], पतिंवरा (पति का वरण करने वाली) [ऋग्वेद 5/32/11, यजुर्वेद 37/10, यजुर्वेद 37/19, यजुर्वेद 8/7, अथर्ववेद 2/36/5] , अन्नपूर्णा [ अथर्ववेद 7/60/5, अथर्ववेद 3/24/4, अथर्ववेद 3/12/2, यजुर्वेद 8/42, ऋग्वेद 1/92/8], सदगृहणी और सम्राज्ञी [अथर्ववेद14/1/17, अथर्ववेद 14/1/42, यजुर्वेद 11/63, यजुर्वेद 11/64, यजुर्वेद 15/63] आदि से संबोधित किया गया हैं जो निश्चित रूप से नारी जाति को उचित सम्मान प्रदान करते हैं।

उदहारण के लिए वेदों में नारी जाति की यशगाथा के लिए कुछ वेद मंत्र प्रस्तुत कर रहे हैं।

1. मेरे पुत्र शत्रु हन्ता हों और पुत्री भी तेजस्वनी हो।[ऋग्वेद 10/159/3]

2. यज्ञ करने वाले पति-पत्नी और कुमारियों वाले होते है।[ऋग्वेद 8/31/8]

3. प्रति प्रहर हमारी रक्षा करने वाला पूषा परमेश्वर हमें कन्यायों का भागी बनायें अर्थात कन्या प्रदान करे।[ऋग्वेद 9/67/10]

4. हमारे राष्ट्र में विजयशील सभ्य वीर युवक पैदा हो, वहां साथ ही बुद्धिमती नारियों के उत्पन्न होने की भी प्रार्थना हैं।[यजुर्वेद 22/22 ]

5. जैसा यश कन्या में होता हैं वैसा यश मुझे प्राप्त हो ।[अथर्ववेद 10/3/20]

इस प्रकार से नारी जाति की वेदों में महिमामंडन हैं नाकि उन्हें अवांछनीय मान कर केवल पुत्रों की कामना की गई हैं।

10. शंका- क्या वेदों में बहु-विवाह आदि का विधान हैं?

समाधान- वेदों के विषय में एक भ्रम यह भी फैलाया गया हैं की वेदों में बहुविवाह की अनुमति दी गयी है [5 ]।

वेदों में स्पष्ट रूप से एक ही पत्नी होने का विधान बताया गया हैं।

ऋग्वेद 10/85 को विवाह सूक्त के नाम से जाना चाहता हैं। इस सूक्त के मंत्र ४२ में कहा गया हैं तुम दोनों इस संसार व गृहस्थ आश्रम में सुख पूर्वक निवास करो। तुम्हारा कभी परस्पर वियोग न हो और सदा प्रसन्नतापूर्वक अपने घर में रहो। यहाँ पर हर मंत्र में “तुम दोनों” अर्थात पति और पत्नी आया हैं। अगर बहुपत्नी का सन्देश वेदों में होता तो “तुम सब” आता।

ऋग्वेद 10/85/47 में हम दोनों (वर-वधु) सब विद्वानों के सम्मुख घोषणा करते हैं की हम दोनों के ह्रदय जल के समान शांत और परस्पर मिले हुए रहेंगे।

अथर्ववेद 7/35/4 में पति पत्नी के मुख से कहलाया गया हैं की तुम मुझे अपने ह्रदय में बैठा लो , हम दोनों का मन एक ही हो जाये।

अथर्ववेद 7/38/4 पत्नी कहती हैं तुम केवल मेरे बनकर रहो और अन्य स्त्रियों का कभी कीर्तन व व्यर्थ प्रशंसा आदि भी न करो।

ऋग्वेद 10/101/11 में बहु विवाह की निंदा करते हुए वेद कहते हैं जिस प्रकार रथ का घोड़ा दोनों धुराओं के मध्य में दबा हुआ चलता हैं वैसे ही एक समय में दो स्त्रियाँ करनेवाला पति दबा हुआ होता हैं अर्थात परतंत्र हो जाता हैं.इसलिए एक समय दो व अधिक पत्नियाँ करना उचित नहीं हैं।

इस प्रकार वेदों में बहुविवाह के विरुद्ध स्पष्ट उपदेश हैं। वेदों की अलंकारिक भाषा को समझने में गलती करने से इस प्रकार की भ्रान्ति होती हैं।

11. शंका- क्या वेद बाल विवाह का समर्थन करते हैं?

समाधान- हमारे देश पर विशेषकर मुस्लिम आक्रमण के पश्चात बाल विवाह की कुरीति को समाज ने अपना लिया जिससे न केवल ब्रहमचर्य आश्रम लुप्त हो गया बल्कि शरीर की सही ढंग से विकास न होने के कारण एवं छोटी उम्र में माता पिता बन जाने से संतान भी कमजोर पैदा होती गयी जिससे हिन्दू समाज दुर्बल से दुर्बल होता गया।

अथर्ववेद के ब्रहमचर्य सूक्त के 11/5/18 मंत्र में कहा गया हैं की ब्रहमचर्य (सादगी, संयम और तपस्या) का जीवन बिता कर कन्या युवा पति को प्राप्त करती हैं। इस मंत्र में नारी को युवा पति से ही विवाह करने का प्रावधान बताया गया हैं जिससे बाल विवाह करने की मनाही स्पष्ट सिद्ध होती हैं।

ऋग्वेद 10/183 सूक्त में वर वधु मिलकर संतान उत्पन्न करने की बात कह रहे हैं। वधु वर से मिलकर कह रही हैं की तो पुत्र काम हैं अर्थात तू पुत्र चाहता हैं वर वधु से कहता हैं की तू पुत्र कामा हैं अर्थात तू पुत्र चाहती हैं अत: हम दोनों मिलकर उत्तम संतान उत्पन्न करे। पुत्र अर्थात संतान उत्पन्न करने की कामना युवा पुरुष और युवती नारी में ही उत्पन्न हो सकती हैं। छोटे छोटे बालक और बालिकाओं में नहीं हो सकती हैं।

इसी प्रकार से अथर्ववेद 2/30/5 में भी परस्पर युवक और युवती एक दुसरे को प्राप्त करके कह रहे हैं की मैं पतिकामा अर्थात पति की कामना वाली और यह तू जनीकाम अर्थात पत्नी की कामना वाला दोनों मिल गए हैं। युवा अवस्था में ही पति-पत्नी की कामना की इच्छा हो सकती हैं छोटे छोटे बालक और बालिकाओं में यह इच्छा नहीं होती हैं। इन प्रमाणों से यही सिद्ध होता हैं की वेद बालविवाह का समर्थन नहीं करते।

12. शंका- वेदों में नारी की महिमा का संक्षेप में वर्णन बताये?

समाधान- संसार की किसी भी धर्म पुस्तक में नारी जाति की महिमा [6] का इतना सुंदर गुण गान नहीं मिलता जितना वेदों में मिलता हैं। कुछ उद्हारण देकर हम अपने कथन को सिद्ध करेगे।

1. उषा के समान प्रकाशवती – हे राष्ट्र की पूजा योग्य नारी! तुम परिवार और राष्ट्र में सत्यम, शिवम्, सुंदरम की अरुण कान्तियों को छिटकती हुई आओ , अपने विस्मयकारी सद्गुणगणों के द्वारा अविद्या ग्रस्त जनों को प्रबोध प्रदान करो। जन-जन को सुख देने के लिए अपने जगमग करते हुए रथ पर बैठ कर आओ।[ऋग्वेद 4/14/3]

2. वीरांगना- हे नारी! तू स्वयं को पहचान ।तू शेरनी हैं, तू शत्रु रूप मृगों का मर्दन करनेवाली हैं, देवजनों के हितार्थ अपने अन्दर सामर्थ्य उत्पन्न कर। हे नारी ! तू अविद्या आदि दोषों पर शेरनी की तरह टूटने वाली हैं, तू दिव्य गुणों के प्रचारार्थ स्वयं को शुद्ध कर! हे नारी ! तू दुष्कर्म एवं दुर्व्यसनों को शेरनी के समान विश्वंस्त करनेवाली हैं, धार्मिक जनों के हितार्थ स्वयं को दिव्य गुणों से अलंकृत कर।[यजुर्वेद 5/10]

3. वीर प्रसवा- राष्ट्र को नारी कैसी संतान दे- हमारे राष्ट्र को ऐसी अद्भुत एवं वर्षक संतान प्राप्त हो, जो उत्कृष्ट कोटि के हथियारों को चलाने में कुशल हो, उत्तम प्रकार से अपनी तथा दूसरों की रक्षा करने में प्रवीण हो, सम्यक नेतृत्व करने वाली हो, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूप चार पुरुषार्थ- समुद्रों का अवगाहन करनेवाली हो, विविध संपदाओं की धारक हो, अतिशय क्रियाशील हो, प्रशंशनीय हो, बहुतों से वरणीय हो, आपदाओं की निवारक हो।[ ऋग्वेद 10/47/3]

4. विद्या अलंकृता-विदुषी नारी अपने विद्या-बलों से हमारे जीवनों को पवित्र करती रहे। वह कर्मनिष्ठ बनकर अपने कर्मों से हमारे व्यवहारों को पवित्र करती रहे। अपने श्रेष्ठ ज्ञान एवं कर्मों के द्वारा संतानों एवं शिष्यों में सद्गुणों और सत्कर्मों को बसाने वाली वह देवी गृह आश्रम-यज्ञ एवं ज्ञान-यज्ञ को सुचारू रूप से संचालित करती रहे। [यजुर्वेद 20/84]

5. स्नेहमयी माँ- हे प्रेमरसमयी माँ! तुम हमारे लिए मंगल कारिणी बनो, तुम हमारे लिए शांति बरसाने वाली बनो, तुम हमारे लिए उत्कृष्ट सुख देने वाली बनो। हम तुम्हारी कृपा-दृष्टि से कभी वंचित न हो।[अथर्वेद 7/68/2]

6. अन्नपूर्णा- इस गृह आश्रम में पुष्टि प्राप्त हो, इस गृह आश्रम में रस प्राप्त हो. इस गिरः आश्रम में हे देवी! तू दूध-घी आदि सहस्त्रों पोषक पदार्थों का दान कर। हे यम- नियमों का पालन करने वाली गृहणी! जिन गाय आदि पशु से पोषक पदार्थ प्राप्त होते हैं उनका तू पोषण कर।[अथर्ववेद 3/28/4]

अंत में मनुस्मृति के प्रचलित श्लोक से इस विषय को विराम देना चाहेंगे।संसार में नारी जाति को सम्मान देने के लिए इससे सुन्दर शब्द शायद हो कहीं मिलेंगे।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: । यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।।

जिस कुल में नारियो कि पूजा, अर्थात सत्कार होता हैं, उस कुल में दिव्यगुण , दिव्य भोग और उत्तम संतान होते हैं और जिस कुल में स्त्रियो कि पूजा नहीं होती, वहां जानो उनकी सब क्रिया निष्फल हैं।

[1] Census Report of 1901 on Female literacy rate in united provinces was 15/10,000 for common population while for members of Arya Samaj it was 674/10,000.

[2] पूना प्रवचन उपदेश मंजरी 12 वां प्रवचन

[3] आधुनिक भारतीय विद्वानों में से स्वामी दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश में, पंडित सत्यव्रत जी सामश्रमी ने ऐतरेयालोचन में, श्री रमेशचन्द्र दत्त ने History of civilization of India में, श्री भगवत शरण उपाध्याय Women in Rigveda में, डॉ ऐतलेकर The education in ancient India में, पंडित शिवदत्त शर्मा महामहोपाध्याय आर्य विद्या सुधाकर में, श्री काणे महोदय History of Dharam Shastras में, श्री महादेव जी शास्त्री The Vedic Law of Marriage में मानते हैं की प्राचीन काल में कन्याओं का उपनयन होता था और नारी न केवल वेदाध्ययन करती थी अपितु ऋषिकाएँ भी बनती थी।

[4] डॉ मिज़ Dharma and Society में लिखते हैं In Rigvedic India there were women Rishis, the wives participated in the ceremonies with their husbands. They were highly honored and respected and could even perform the function of a priest at a sacrifice.

[5] Vedic Age page 390

[6] वैदिक नारी रचियता रामनाथ वेदालंकार

Who Is an Aryan Really?

From: Suresh Vyas < >

I request all readers of this comment to share this comment with others, especially with the KKKs, so that they too know the truth about who is an Arya or Aryan. According to the greatest epic Mahaabhaarat, which is 5000+ years old, and describes a great war that was fought in India, Arya or Aryan is not a race at all. Arya or Aryan is a person who understands that the Veda is given to mankind by God in the beginning of creation; the Veda provides complete spiritual science providing several processes living per which any human can advance spiritually. As one advances spiritually, one lives more and more sin-free. Therefore, when one strives to live per a Vedic process to advance spiritually, then he/she is an Arya or Aryan.

Thus all Hindus are Aryans, and all Hare Krishnas, and all who do yoga or meditation are Aryans. Thus, any race that claims to be Aryan is not an Aryan if he/she does not live per the Vedic or Hindu Dharma, which is universal religion for mankind. The short summary of the 20,000 mantra Veda is 700-verse Bhagavad Gita, which is a chapter in Mahabharat.
The god that is described in the Veda is not partial to any race, and loves all the living beings He created. Therefore, in the eyes of god, no race is superior or inferior. The Vedic god is not jealous of anyone because He is the Supreme, all powerful, all knowing, and who is everywhere, within every living being and out as well. So, please help any Supremacist to understand this, and encourage him/her to become a real Aryan, not fake as defined by Hitler.
jaya sri krishna!
hinduunation.com

To Win the Civil War

To Win the Civil War

From: Rajput < >

Now from the realm of Sociology and Psychology:  To motivate a people to break away from deeply entrenched tradition of non violence and submission, to get ready to fight, they need to be made aware of the dangers ahead. Purpose, or need, determines motivation.
 
Up to now no leader has told the Hindus that dangers lie ahead, or our future will be our past (centuries’ long slavery). No wonder, most Hindus yawn when we mention the most devastating Islamic aggression in 1947 (Partition) or seem perturbed when we mention the destruction of all the temples by a certain vicious community who has set their eyes on DELHI! 
 
When World War 2 started, within days people took up arms and were ready to fight! Germans and Japanese were called “enemies”.  In OUR case “Islam” struck again and again, and finally captured one third of India (five provinces) on one day and yet the Muslims were “bhai bhai”! There was NO resistance, NO retaliation, NO backlash! NO counter attack!
 
This points to an important area that has been badly neglected so far. We forget our defeats. We forget our dead. The others do not. Bosnian Muslims are still clamouring for “justice” against the Serbs. Palestinians have not ceased fire in Israel. World War 1 and 2 are recalled regularly in Europe. Right now Battle of Britain, that took place in 1941, is being commemorated in the UK. There are memorials galore to the heroes and to the dead. 
 
In our case (BHARAT) even the two million massacred in 1947 have NO Memorial to honour their memory! At the time of Guru Gobind Singhji, the Hindu nation was in the middle of “bloodbath” (daily 100,000 “janyu” burnt!). Hence he could find volunteers to take on the mighty Mogul Emperor. 
 
At this time, however, most Hindus, and all the millions of Sadhus and Sants, do NOT perceive any threat or danger from any side. False sense of security prevails in the Lok Sabha and across Bharat, too. TEN MILLION “Sadhus and Sants” who gather at KUMBH, come and go without leaving a trace behind! Such a vast number, if made AWARE of Mohammed bin Qasim, Abdali, Babur and Aurangzeb, Partition and the KORAN, will be 10 million strong “ARMY” of Sri Ram. But we face a formidable obstacle!
 
It is the pseudo-secular anti national CONSTITUTION, enacted AFTER the “man-eating” Islamic TIGER had been let out of the cage. It makes it ILLEGAL for the defeated (the HINDUS) to prepare them for the next (ISLAMIC) onslaught! 
 
TRAITOR Nehru’s Law dictates, “Muslims will enjoy the same rights as the Hindus in Bharat.” It means that if you militarise the Hindus, then you must also militarise the Muslims!
 
So we must, 
1.  Make the Hindus, living in the fools’ world, realise that DELHI CAN GO THE WAY OF LAHORE unless we learn to FIGHT.
 
2.  Change the Constitution. In the new Constitution the rights of the Muslims and the Hindus will NOT be the same. Muslims, under the leadership of barrister Mohammed Ali Jinnah, broke up India in order to establish a separate Islamic homeland for themselves (“Pakistan”) while India (Bharat) suffered a crushing defeat and came under threat from THREE sides (Pakistan, Bangladesh and China).  Therefore, the present Constitution is only good for the pre-Partition India. For the post-Partition India (Bharat) there must be a new Constitution in which EQUAL RIGHTS for the Muslims will be subject to DISSOLUTION of Pakistan. Hindu nation (the majority community in Bharat) cannot be treated as voiceless slaves or “taken for a ride”.
Let us show guts and openly declare, “Muslims will have the SAME Constitutional rights in Bharat as the Hindus have in Pakistan and Bangladesh.”
 
GIVEN THE UNLIKELINESS OF ACCEPTANCE OF THE ABOVE, THE NATION SHOULD MILITARISE ITSELF AT FASTEST PACE. 
rajput
12 July 2020

।। राष्ट्र चेतना के आयाम ।।

From Leena Mehendale < >

।। राष्ट्र चेतना के आयाम ।।

 सारतत्व – देश व राष्ट्र क्या हैं ? राष्ट्र शब्दमें ही वैभव, समृद्धि इत्यादि अर्थ अंतर्भूत हैं। यह सत्यकी अन्वेषणा, ज्ञान, श्रद्धा, पुरुषार्थ, व साझेदारीसे बनता है। राष्ट्रके संस्कार प्रत्येक देशमें अलग होंगे। भारतवर्षके संस्कार यहाँ उपजी राष्ट्रचेतनासे बने। वह चेतना आनेवाली हजारों पीढीयोंके लिये चिरंतन अविरल बनी रहे इसके लिये असिधाराव्रत चला सकें ऐसे नागरिक चाहिये । यह गरज तब भी थी जब राष्ट्रचेतना उदित हो रही थी और आज भी है। आइये, उस असिधाराको समझकर उसके व्रती बनें। और हम यह न भूलें कि हमारी भाषाओं व उनकी शब्दावलियोंके माध्यमसे ही हम राष्ट्रचेतनाको समझ सकते हैं तथा उसमें दृढ हो सकते हैं। भाषाएँ बिसरा दीं तो हमारी राष्ट्रचेतनापर भयंकर संकट होगा।

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ॐ असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय

मृत्योर्मा अमृतं गमय ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।

 

सहनाववतु सहनौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै।

तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।।

 

मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्य देवोभव, अतिथी देवोभव, राष्ट्र देवोभव ।।

गुरुर्ब्रम्हा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात् परब्रम्ह तस्मै श्री गुरुवे नमः।।

 

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्या जगत्।

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथः मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।।

 

उत्तिष्ठत, जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।

क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया

दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ।।

 

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

 

सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चित् दुःखभाग्भवेत् ।।

 

मित्रों, मैं आपके साथ कुछ संवाद करने आयी हूँ कि राष्ट्रकी चेतना क्या होती है। यह जो कुछ श्लोक मैंने उद्धृत किये हैं उनका उपयोग पूर्वकालमें भारतराष्ट्रकी चेतना बनानेमें और व्याख्यायित करनेमें हुआ है ऐसा मैं मानती हूँ।  तो आईये, पहले समझते हैं कि राष्ट्र क्या है, राष्ट्रचेतना क्या है  और उससे क्या नियमित होता है।

लेकिन पहले ये समझते है कि भारतदेश क्या है। वर्तमानमें यह लगभग १४० करोड जैसी प्रचंड जनशक्ति रखनेवाला लगभग ३३ लाख वर्ग किलोमीटरमें फैला हुआ भूभाग है जो सप्त महापर्वत और सप्त महानदियोंसे अलंकृत है। विश्वकी सर्वाधिक जनसंख्या रखनेवाला चीन हमसे केवल १० करोडसे आगे है और विश्वमें तिसरा स्थान रखनेवाले अमेरिकाकी जनसंख्या ३५ करोड अर्थात हमसे एक चौथाई ही है।  पूरे विश्वमें ९७ भाषाओंकी जनसंख्या १ करोडसे अधिक है और इनमेंसे १६ भाषाएँ भारतकी हैं। बोलियाँ, जो कि स्थानीय ज्ञानसंग्रहका आधार है, उनकी संख्या तो ५००० से अधिक है। विश्वकी सर्वाधिक वनस्पति प्रजातियाँ और प्राणी प्रजातियाँ हमारे देश में है। सर्वाधिक सौर ऊर्जा प्राप्त करनेवाला हमारा ही देश है।

एक देश को, उसकी जनसंख्याको जब पुरुषार्थसे ज्ञान और बौद्धिक विकासकी प्राप्ती होती है, तब देशकी संज्ञासे आगे राष्ट्रकी संज्ञाकी ओर यात्राका आरंभ होता है। जब ज्ञान एवं संस्कार साझे किये जाते हैं, साझा पुरुषार्थ होता है, तब राष्ट्र बनता है। राजते इति राष्ट्रः अर्थात् जो हर प्रकारसे शोभायमान है, प्रभामय है, वैभवशाली है, वह देश राष्ट्र है। ऐसा राष्ट्र सर्वदा समष्टिगत (साझेदारीसे प्राप्त) एवं पुरुषार्थसिद्ध ही रहेगा।

ज्ञानी व्यक्ति विचारते हैं कि हमें अपनी भावी पीढीयाँ कैसी चाहियें – उनके अस्तित्वका अधिष्ठान क्या हो? फिर वैसी व्यवस्था बनानेके लिये जो साझा पुरुषार्थ प्रकट होता है उसे राष्ट्रचेतना कहते हैं।  हमारे मनीषियोंने चार पुरुषार्थ बताये – धर्म अर्थ काम व मोक्ष ।

तो यह स्फटिकमणिके समान स्वच्छ है कि किसी देशमें ज्ञानका विस्तार और उसकी साझेदारी जिस प्रकार अग्रेसर होगी और उसी प्रकार उसकी राष्ट्रचेतना होगी।

ज्ञानका आदिमूल है असत् और सत् को जानना। उस परमात्माके अस्तित्वका बोध जो सृष्टिके पहले भी था, सृष्टिके दौरान भी होगा और सृष्टिके लयके बाद भी होगा, वह सत् है और प्रकारान्तरसे वही सत्य है। असत् का अर्थ है वह बोध न होना। तो अबोधतासे बोधकी ओर, असत्य से सत्य की ओर, अज्ञानके अंधेरेसे प्रकाशकी ओर ले चलनेकी प्रार्थना हम करते हैं। इसी क्रममें ज्ञानके प्रकाशसे हम अमृतकी ओर चलते है जो शांतिदायक भी है। यह प्रार्थना भारत की सांस्कृतिक चेतना की परिचायक है। यह सहस्त्रों वर्ष पुरातन है, सनातन है। सत्य, ज्ञान व अमृतत्वकी अन्वेषणा ही भारतराष्ट्रकी पहचान व अधिष्ठान है और इस पहचानकी अनुभूति ही राष्ट्रचेतना है।

जब हम भारतदेशसे अलग भारतराष्ट्रकी बात करते है तो क्यों? क्या अंतर है दोनों में? यह जो चेतना है, ज्ञानकी व सत्यकी अन्वेषणासे उत्पन्न होनेवाली यह चेतना जब जनजीवनकी साझा अन्वेषणा बनती है तब देशसे राष्ट्रका निर्माण होता है।

ऐसा राष्ट्र हमारे देशमें सहस्त्रों वर्षपूर्व उदित हुआ। वह ज्ञानकी पिपासा, वह खोज जो इस प्रार्थनामें एक व्यक्तिकी थी, वह जब संपूर्ण जनगणकी अन्वेषणाका विषय बनी, तब राष्ट्र उदय हुआ। लेकिन यह प्रवास सरल नही था। व्यक्ति व समष्टि दोनोंकी अन्वेषणा सत्य और ज्ञानके साथ जुडे इसके लिये कई अनिवार्यताएँ होती हैं। इसका पहला तत्व है साझेदारीका। इसीकारण हमारी यह प्रार्थना सहनाववतु कहती है – आओ, हम दोनों साथसाथ खायें, साथसाथ उपभोग लें, साथ  रहकर अपना शौर्य और वीरता दिखायें,  बुलन्दियोंको छुएँ । और सबसे महत्वपूर्ण कि यह करते हुए हमारे मनमें एक दूसरेका विद्वेष उत्पन्न न हो।

कितनी कठिन शर्त है यह। जब भी दो क्षमतावान व्यक्ति किसी ध्येयको पहुँच रहे होते हैं, तो उनमें आगे-पीछे, उन्नीस-बीस होना अत्यंत स्वाभाविक है। ऐसी स्थितिमें दूसरा व्यक्ति मुझसे आगे निकल जाये और फिर भी मेरे मनमें जलन, ईर्ष्या, मत्सर, कुढन, या विद्वेष उत्पन्न ना हो ! यह तभी संभव है जब तीन तत्वोंका अभ्यास मुझे हो। पहला कि मुझमें सत्ता लालसा न हो। दूसरा  मुझे सर्वदा भान रहे कि मैं समष्टिकी ध्येयपूर्ती के लिये समर्पित हूँ। तिसरा कि मैं अपने आप में इतना संतोषी रहूँ कि दूसरेके यशसे मुझे ईर्ष्या-विद्वेष न हो, वरन् प्रसन्नता हो। यही है राष्ट्रचेतनाका चरित्र।

यह समष्टिभाव जागृत हो सके इसके लिये हमारे मनीषयोंने कई पथ्यापथ्य बताये। इनमेंसे एक पथ्य है कृतज्ञताके साथ आदरकी भावना जिसमें माता, पिता, आचार्य, अतिथी तथा राष्ट्रको सदैव देवतारूप बताया गया। इनका सम्मान करेंगे तभी पूरे राष्ट्रका विकास होगा। यहॉं अतिथी देवो भव एवं राष्ट्रदेवो भवका विशेष चिंतन आवश्यक है ।

गुरु महिमाको हमारे मनीषियोंने अति प्राचीन कालसे ही जाना था। गुरुमें ही हमारे ब्रम्हा-विष्णु-महेश वास करते है। सद्गुरु ही हमें अमृतकी राह दिखा सकता है  क्यों कि वह अमृतयात्रा अनुभूतिजन्य यात्रा है जिसके साक्षात्कारके गुर बताने  हेतु  गुरु आवश्यक है।

गुरुद्वारा दिये गये ऐसे ज्ञानको अधोक्षज ज्ञानकी संज्ञा है। यह श्रद्धाके बिना प्राप्त नही हो सकता।

राष्ट्र उत्थानकी दिशामें सबका योगदान भी होता है और सबका उत्थान भी। लेकिन जहॉं नवनिर्माणके लिये सत्यके ज्ञानकी आवश्यकता है, वही संरक्षण हेतु अचौर्य का अस्तेयका  बोध आवश्यक है। हमारे प्रथम उपनिषत् की प्रथम पंक्तियाँ हैं – ईशावास्यमिदं सर्वं….। चराचरको ईश्वरने व्याप्त कर रखा है। उसमें वह वास करता है। तुम उसे भोगो, उसका उपभोग करो – भुञ्जीथः। लेकिन कैसे? अपने परिश्रमसे। दूसरेके धनको मत ग्रहण करो। क्योंकि उपभोगके लिए जो परिश्रम तुमने किया वही तुम्हारा ईश्वरसे साक्षात्कार भी करवायेगा। उस परिश्रमके बिना, कोई साक्षात्कार संभव नही है। वह परिश्रम और वह कौशल्य है तभी योग है, तभी साक्षात्कार है। उसे पानेके लिए उठो, जागो। वरं क्या है, श्रेष्ठ क्या है, उसे जानो और उसे पानेके लिये श्रम भी करो। लेकिन वह क्षुरस्य धारा है – तलवारकी धारपर चलनेके समान हे, कठिन है वह रास्ता। लेकिन राष्ट्रभावना है तो उसी कठिन पथपर चलना है।

हमारे मनीषीयोंने राष्ट्रपुरुषकी एक उदात्त कल्पना   की है। अन्वेषणा, सरंक्षण, समृध्दि और गति ये चार अंग हैं राष्ट्रपुरुषके। समाजमें जो मेधाका धनि है उसे अन्वेषणा, अध्ययन व अध्यापनका काम देकर कहा गया कि आपको अपरिग्रह रखना है – अर्थात् भोगोंका त्याग। हमारे ऋषियोंने इस बातको समझा कि अन्वेषणाके  लिये आवश्यक तीव्र मेधा रखनेवाला व्यक्ति यदि धनसंचय और भोगमें प्रवृत्त हो जाये तो उसका ज्ञान समष्टि उपयोगी नही रहेगा, वह राष्ट्रोत्थानसे पहले अपने धनकी सोचेगा। ज्ञान व मेधा रखते हुए भी अपरिग्रही होना उस छुरेकी धारपर चलने जैसा है। इस व्रतको असिधाराव्रत कहा गया है।

जो समाजका संरक्षण करता है उसे हमारे मनीषियोंने सत्ताका अधिकार व दण्ड देनेका अधिकार दिया। लेकिन बहुत बडा भार भी दिया — न्याय करनेका और प्रजाके हर नागरिकको खुश रखनेका। रामराज्यका वर्णन करते हुए रामका कथन है कि एक भी नागरिक दुखी हो और अन्यायग्रस्त हो तो राजाको अपना पद त्याग देना चाहिये। यह असिधाराप्रत है।

जो उत्तम व्यवस्थापन अर्थात पाचनसे पोषण कर सके वह राष्ट्रपुरुषका उदर है और समष्टिका वैश्य है। वह कृषि, गोपालन और व्यापार करे औऱ इस प्रकार राष्ट्रको समृद्ध करे। उसपर भी एक उत्तरदायित्व है कि हर स्थितिमें वह  अपरिग्रही ब्राम्हणके योगक्षेमकी व्यवस्था अपनी ओरसे बिना अपेक्षाके करता रहे। इस प्रकार असिधाराव्रत उसके लिये भी है।  इन तीनों समूहोंके कार्योंको सुचारूरूपसे चलानेमें जो जो सहायक है वही राष्ट्रपुरुषको गति देते हैं। वे कुशल कारीगरी सीखकर हर प्रकारकी सेवा देते हैं। वे सबको आदर सन्मान दें और उनके कार्योंमें सहायक बने यही उनका असिधाराव्रत है।

इस प्रकार जिसके पास जो गुण है उसीके माध्यमसे वह ऊँचाईतक पहुँचे और असिधाराव्रत निभाते हुए अपना पुरुषार्थ प्रकट करे और राष्ट्रपुरुषको वैभवशाली बनाये।

एक साक्षात्कारकी कथा हमारे भृगूपनिषत् में आती है। अपने पिता व गुरुसे मार्गदर्शित भृगुने ब्रम्ह जाननेके हेतू तपस्या की और जाना कि अन्न ब्रम्ह है। फिर क्रमशः अपने तपको अधिकाधिक बढाते हुए जाना कि प्राण ब्रम्ह है, मन ब्रम्ह है, विज्ञान ब्रम्ह है और आनन्द ब्रम्ह है। यह आनन्दब्रह्म समाजके हर व्यक्तितक पहुँचाना है।

तब भृगुने समाजका प्रबोधन किया – अन्नं न निंद्यात्, न परिचक्षीत। अन्नं बहु कुर्यात्, बहु प्राप्नुयात्। और न कञ्चनवसतौ प्रत्याचक्षीत। अर्थात् बहुत अन्न उपजाओ, उसका अच्छा भंडारण करो और घर आये किसीको भरपेट भोजनसे विमुख ना रखो। इस प्रकार समाजके प्रत्येक व्यक्तिका भरण पोषण होनेसे उनके शरीरकी रक्षा, पर्यावरणकी शुद्धतासे प्राणोंकी रक्षा, अंतःशुद्धिसे मनकी रक्षा, विवेकयुक्त बुद्धिसे विज्ञानकी रक्षा होती रहे तो मनुष्य और समाज स्थैर्य, समृद्धि व आनन्दको प्राप्त होते हैं।

समाज या देश बनता है उसके नागरिकोंसे और यह आवश्यक नही कि हर नागरिक असिधाराव्रतका पालन  करे।  समाजमें ऐसे भी व्यक्ति होंगे जो स्वयंको समष्टिसे ऊपर माने। यदि उनके पास ज्ञान है या बल है या धन है तो उसका प्रयोग उनके स्वयंके उपभोगके लिये करना चाहेंगे। ऐसे व्यक्ति उन्नतिकी ओर बढते हुए शीघ्रही सत्ताकी ओर चलेंगे। इस पूरी श्रृंखलाको आसुरी संपत्ति कहा गया है। दैवी संपदाकी रक्षा और आसुरी प्रवृत्तिका विनाश वारंवार होता रहा तो राष्ट्रचेतना अविरल रहेगी। इसके हेतु ही पुरुषार्थपूर्वक असिधाराव्रत निभानेके लिये हमारे मनीषियोंने कहा – उत्तिष्ठत, जाग्रत ।

ऐसे व्रतीजनोंके  संबलस्वरूप जगदंबाका आवाहन किया गया है।  इस विश्वको चलानेवाली विभिन्न आयामोंमें प्रकट होनेवाली वरदायिनी देवीका महत्व राष्ट्रचेतनामें कैसे अलक्षित रह सकता है? वह जो देवी है, जो विष्णुमाया है, वही हमें अपने चारों ओर दृग्गोचर हो रही है। यह सारा  उसीका प्रकटन है। वह पूरी सृष्टिमें और चेतनामें अलग अलग रुपोंमे संस्थित है और प्रकट होती रहती है। कभी वह विद्या है तो कभी क्षुधा, कभी निद्रा है, तो  कभी तुष्टि, कभी कीर्ति है तो कभी लक्ष्मी, कभी दया है तो कभी बुद्धि, कभी तृष्णा है तो कभी स्वधा (आपूर्ति), कभी तृप्ति है तो कभी शांति। यों कहे कि राष्ट्रवैभवमें जिन गुणोंकी आवश्यकता है वे सारे जगदंबाके ही प्रकटन हैं और उस जगदम्बाको उपासनासे जानना ही राष्ट्रचेतना है।

जब यह भारतराष्ट्र विराजेगा तब वह सर्वोच्च प्रार्थना भी सिद्ध होगी – सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चित् दुःखभाग्भवेत् ।। इस प्रार्थनाके माध्यमसे भारतीय मनीषियोंने कामना करी है एक सर्वमान्य और सबके हृदयंगम प्रणालीकी जो चिरंतन और शाश्वत रूपसे सबके उत्थानका कारण बने। सबको मोक्षदायी हो।

मित्रों इस प्रकार मैंने राष्ट्रतेजकी वृद्धि कर सकें ऐसे कुछ नियमोंको तुम्हारे सम्मुख रखा । ये पुरातन कालसे हमारे जनमन व संस्कृतिमें उतर चुके हैं। इन सहस्रों वर्षोंमें हमने एक विशाल चिंतन किया – उसके आदानप्रदानहेतु हमारी भाषाएँ व शब्दावलियाँ बनीं। उनसे परिचित रहेंगे तभी वह चिंतन हमारी अगली सैंकडों पीढीयोंके लिये पथदर्शक बनेगा।

यह उदाहरण समझो कि एक बार व्यक्ति कार चलानेमें माहिर हो जाये तो वह विनासायास ही कार चला लेता है। उसे प्रतिपल बहुत सोचविचारना नही पडता क्योंकि उसका संस्कार गढ चुका है। वैसे ही हमारी चिरपरिचित शब्दावलियोंके कारण अपने पूर्वजोंके गहन चिन्तनसे हम परिचित होते हैं और विनासायास हम उनका पालन करते आ रहे हैं।

भाषाओं व शब्दावलियोंका महत्व  विश्वप्रसिद्ध लेखक जॉर्ज  ऑरवेलके उपन्यास 1984 में वर्णित है।उपन्यासकी पार्श्वभूमी आरंभमें ही बताई जाती है। एक पुरातन परंपरासे चलने वाला देश जिसमें रक्तरंजित क्रांति हो जाती है और जो नया शासक आता है उसका नाम है बिग ब्रदर। बिग ब्रदरको अब यह चिंता है कि देशमें दुबारा क्रांति ना हो और उसका कोई विरोध ना करे। वह एनालिसिस करता है – क्रांतिके लिए सबसे पहले भाव और विचार चाहिए। लेकिन जब तक वे किसी व्यक्तिके दिमागके अंदर ही रहेंगे तब तक कोई संकट नहीं है ।जब भावोंको और विचारोंको शब्द मिलते हैं तब वे अभिव्यक्त होते हैं। दूसरे व्यक्तियों तक अभिव्यक्ति पहुंचती है तो उनके मनमें भी उसी प्रकारके भाव और विचार जागते हैं। इस प्रकार जब कई लोगोंके विचार मिलते हैं तो क्रांतिकी संभावना बनती है। अर्थात यदि देशमें क्रांतिको रोकना है तो देशमें शब्दोंको रोकना होगा। शब्द संख्या जितनी कम, क्रांतिकी संभावना भी उतनी ही कम। अतः बिग ब्रदर के आदेश पर सारी डिक्शनरीयाँ जला दी जाती हैं और शब्दोंकी संख्या कम करने का आदेश निकलता है ! अब इस आदेशके अनुसार good शब्द तो रहेगा लेकिन उसकी जो विभिन्न छटाएँ अन्य शब्दोंसे व्यक्त होती हैं जैसे better, best, awesome, excellent, superb, sublime या bad, awful, ये शब्द उपयोगमें नहीं लाए जाएंगे। उनकी जगह good plus या good plus plus या good minus या good minus minus कहना होगा। इस प्रकार उस देशमें जन सामान्यके पास बोलनेके लिए केवल 2000 शब्दोंके उपयोगकी ही अनुमति है। अन्य शब्द बोलने पर या सीखनेका प्रयास करने पर भारी दंडकी सजा दी जाएगी !

हमारे आत्मचिंतनमें यह कथा सटीक लागू होती है।  आज एक फॅशनसी बन गई है जिसमें ये संस्कार  और उनके लिये नियमोंका पालन दकियानूसी कहलाने लगा है। अतः आवश्यकता इस बातकी है कि इन संकल्पनाओंको हम फिरसे समझें। हम जानें कि भारतराष्ट्रका अधिष्ठान क्या है।  किस प्रकारका समाज हम अपने लिये, अपने बच्चोंके लिये, उनकी कई एक अगली पीढियोंके लिये चाहते हैं? उसके निर्माणहेतु हमारे लिये नियत असिधाराव्रत क्या है और जिस आत्मबलके आधारसे हम उसे निभा सकते हैं उस आत्मबलको, उस पुरुषार्थको हम कैसे प्राप्त करें।


 

Present Indo-China crisis & desh-drohies’ role

From: Rajput < >

Shri Ravi Dev Gupta,

Your 4C’s are perfect. But the list of “deshdrohis” is not complete without “M”.

CONGRESS, COMMUNIST, CHRISTIANS & NOW CHINESE PRODUCTS  make your poetic 4Cs very convincing. But please notice the absence of the deadliest of them all in this list, M.

Basically most wars are for LAND. All the FOUR mentioned by you have not captured any LAND of Bharat except the Chinese.

Please compare the LAND captured by the Chinese with the LAND captured illegally (without logic, reason, reciprocal condition, or referendum) by the INDIAN Muslims, that is now called “Pakistan”! Furthermore, Chinese goal is not Delhi (nor the Hindu girls and women) but Islamic goal, it most certainly is!

Hence I submit, even if I disturb the soul of MK Gandhi or annoy 300 MILLION Muslims still in Partitioned India in direct VIOLATION of the stipulation of “TRANSFER OF POPULATION”, to add “M” for MUSLIMS to your List.

Lok Sabha may not mention “Partition” and UNO couldn’t care less whether Multan and Mymensing are in India, Pakistan or Bangladesh but under the inspiration of Sri Krishna and Sri Raam, and sticking to RIGHT as against MIGHT, there has to be “M” added to your List unless the MUSLIM AGGRESSION of 1947 is invisible to you, or has conveniently slipped out of the unconscious nation’s memory.

Please rest assured, any patriotic Muslim in Bharat who puts “AKHAND BHARAT” above “Broken Bharat”, will fully agree. In fact, seeing our fervour, they may also unite and rise with us in order to achieve the impossible. Why should we, small and scared individuals, here today and GONE tomorrow, put an END to that possibility, obliterate that Vision?

Today (4 July 2020) is America’s Independence Day. God willing there will also be the Independence Day for occupied Lahore and East Bengal.

Nation’s strategic goals do not depend on the capabilities of the weak, the confused and the  intimidated, but can stay on, in collective consciousness, for one decade, one century, even one millennium.

And please let us raise the flag of “Akhand Bharat” though we may not lift a finger beyond that act!

The Jews waited for TWO THOUSAND years for their ISRAEL. We may not have to wait even for 50 years the way Pakistan is decomposing, fracturing and perishing and her “Muslims” are fleeing in their millions in all directions, to all countries on earth – from New York to New Zealand.

Millions of starving and frustrated Pakistanis are leaving their Islamic Republic for the sake of safety and security. Their wives and children wait for years before getting visa to join them in the West. Families are broken and children are lost. Would they not prefer to live in United India like their fellow Muslims instead of drowning in leaky boats trying to reach Dover from Dunkirk?

Back in INDIA they neither have to learn Spanish, Dutch or Swedish and nor face racial discrimination as in the West. India is the “home” of their ancestors. But what a SHAME, that the Indian (HINDU) soul, patriotism, courage and vision are all DEAD, and the door to Bharat is shut upon them because, being weak and without “LIONS” (stalwarts) to inspire and lead them, the Hindu nation in Hindusthan is AFRAID!

The consequence of this NATIONAL collapse in 1947 and 2020 is that Bharat will never get back to her original frontier at Khyber Pass but enact the farcical ceremonial “RETREAT” at Wagah till eternity.

There is no need for any follower of Sri Raam or Guru Gobind Singhji to keep repeating, “Too many Muslims will eat us up raw!”, and be happy with Bharat MINUS Baluchistan and East Bengal.

Given a decent CONSTITUTION and the Will to enforce ONE LAW for all, the Muslims will be as docile and law abiding as the Hindus. That is the case today in the WEST (European Union and the United States), and that was the case in our own Bharat till August 1947 when barristers Gandhi and Nehru accepted TWO nations (Hindu & Muslim) and THREE Laws (one for the Hindus, one for the Muslims and one for Nehru Dynasty!) in ONE country, and ruined our unfortunate country for the coming generations till eternity.

Bharat is not a unique country on earth where we have divisions. The only thing needed is ONE Law for all- that is, as much for Sonia Maino Gandhi, whose immense WEALTH ought to have been investigated, and for the Muslims who had to be denied citizenship until “Pakistan” was DISSOLVED.

CONCLUSION: Bharat (Partitioned India) needs Supreme Commanders like Netaji Bose and Field Marshal Maneckshaw. They were the BEST in the 20th century. Gandhi and Nehru were the WORST.

The (Hindu) nation will keep on “wallowing in the mud (QUAGMIRE) of uncertainty, insecurity and communal strife” until we see ONE LAW FOR ALL under a new Constitution.

rajput

4 July 2020

PS:  Please don’t be scared of the Muslims. Their aggression is nothing but exact REFLECTION of the Hindu Confusion & Cowardice. Let us ask ourselves two questions:

  1. How could the army of Maharaja Ranjit Singh defeat the Afghans and capture Khyber Pass?
  1. How could mere 300,000 Britons rule in exemplary manner over 300 MILLION natives of India for more than a century?