अनुसूचित जाति ब्राह्मण व क्षत्रियों के वंशज है .

Vishwas Pitke < >

 

डॉ सुब्रहमनियन स्वामी लिखते हैं,

 

” अनुसूचित जाति उन्हीं बहादुर ब्राह्मण व क्षत्रियों के वंशज है, जिन्होंने जाति से बाहर होना स्वीकार किया, लेकिन मुगलों के जबरन धर्म परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया। आज के हिंदू समाज को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए, उन्हें कोटिश: प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि उन लोगों ने हिंदू के भगवा ध्वज को कभी झुकने नहीं दिया, भले ही स्वयं अपमान व दमन झेला।”

 

★ प्रख्यात साहित्यकार अमृत लाल नागर ने अनेक वर्षों के शोध के बाद पाया कि जिन्हें “भंगी”, “मेहतर” आदि कहा गया, वे ब्राहम्ण और क्षत्रिय थे।

 

★ स्टेनले राइस ने अपने पुस्तक “हिन्दू कस्टम्स एण्ड देयर ओरिजिन्स” में यह भी लिखा है कि अछूत मानी जाने वाली जातियों में प्राय: वे बहादुर जातियां भी हैं, जो मुगलों से हारीं तथा उन्हें अपमानित करने के लिए मुसलमानों ने अपने मनमाने काम करवाए थे।

★ गाजीपुर के श्री देवदत्त शर्मा चतुर्वेदी ने सन् 1925 में एक पुस्तक लिखी थी जिसका नाम ‘पतित प्रभाकर’ अर्थात मेहतर जाति का इतिहास था।

★ इस छोटी-सी पुस्तक में “भंगी”, “मेहतर”, “हलालखोर”, “चूहड़” आदि नामों से जाने गए लोगों की किस्में दी गई हैं,

जो इस प्रकार हैं (पृ. 22-23) नाम जाति भंगी- वैस, वैसवार, बीर गूजर (बग्गूजर), भदौरिया, बिसेन, सोब, बुन्देलिया, चन्देल, चौहान, नादों, यदुबंशी, कछवाहा, किनवार-ठाकुर, बैस, भोजपुरी राउत, गाजीपुरी राउत, गेहलौता, मेहतर, भंगी, हलाल, खरिया, चूहड़- गाजीपुरी, राउत, दिनापुरी राउत, टांक, गेहलोत, चन्देल, टिपणी।

★ इन जातियों के जो यह सब भेद हैं, वह सबके सब क्षत्रिय जाति के ही भेद या किस्म हैं।

(देखिए ट्राइब एण्ड कास्ट आफ बनारस, छापा सन् 1872 ई.)

 

यह भी देखिए कि सबसे अधिक इन अनुसूचित जातियों के लोग आज के उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्य भारत में है, जहां मुगलों के शासन का सीधा हस्तक्षेप था और जहां सबसे अधिक धर्मांतरण हुआ।

 

आज सबसे अधिक मुस्लिम आबादी भी इन्हीं प्रदेशों में है, जो धर्मांतरित हो गये थे। हमलोगों ने जिन भंगी और मेहतर जाति को अछूत करार दिया और जिनके हाथ का छुआ तक आज भी बहुत सारे हिंदू नहीं खाते, उनका पूरा इतिहास साहस, त्याग और बलिदान से भरा पड़ा है।

 

मुगल काल में ब्राह्मणों और क्षत्रियों को दो रास्ते दिए गए, या तो इस्लाम कबूल करो या फिर मुसलमानों का मैला ढोओ क्योंकि तब भारतीय समाज में इन दोनों समुदायों का अत्यंत सम्मान था और इनके लिए ऐसा घृणित कार्य करना मर जाने के समान था। इसीलिए मुगलों ने इनके धर्मान्तरण के लिए यह तरीका अपनाया।

 

आप किसी भी मुगल किले में चले जाओ वहां आपको शौचालय नहीं मिलेगा। जबकि हजारों साल पुरानी हिंदुओं की उन्नत सिंधु घाटी सभ्यता के खण्डहरों में रहने वाले कमरे से सटा शौचालय मिलता है।

 

सुल्तानों और मुगलों को शौचालय निर्माण का ज्ञान तक नहीं था। दिल्ली सल्तनत में बाबर, अकबर, शाहजहाँ से लेकर सभी मुगल बादशाह बर्तनों में शौच करते थे, जिन्हें उन ब्राहम्णों और क्षत्रियों के परिजनों से फिकवाया जाता था,

जिन्होंने मरना तो स्वीकार कर लिया था, लेकिन इस्लाम को अपनाना नहीं। जिन ब्राहमणों और क्षत्रियों ने मैला ढोने की प्रथा को स्वीकार करने के उपरांत अपने जनेऊ को तोड़ दिया, अर्थात उपनयन संस्कार को भंग कर दिया, वो भंगी कहलाए।

 

और मेहतर- इनके उपकारों के कारण। तत्कालिन हिंदू समाज ने इनके मैला ढोने की नीच प्रथा को भी ‘महत्तर’ अर्थात महान और बड़ा करार दिया था, जो अपभ्रंश रूप में ‘मेहतर’ हो गया।

 

भारत में 1000 ईस्वी में केवल 1 फीसदी अछूत जाति थी, लेकिन मुगल वंश की समाप्ति होते-होते इनकी संख्या 14 फीसदी हो गई। आपने सोचा कि ये 13 प्रतिशत की बढोत्तरी मुगल शासन में कैसे हो गई। जो हिंदू डर और अत्याचार के मारे इस्लाम धर्म स्वीकार करते चले गए, उन्हीं के वंशज आज भारत में मुस्लिम आबादी हैं।

 

जिन ब्राह्मणों और क्षत्रियों ने मरना स्वीकार कर लिया उन्हें काट डाला गया और उनके असहाय परिजनों को इस्लाम कबूल नहीं करने की सजा के तौर पर अपमानित करने के लिए नीच मैला ढोने के कार्य में धकेल दिया गया।

वही लोग भंगी और मेहतर कहलाए। क्या आप सभी खुद को हिंदू कहने वाले लोग उस अनुसूचित जाति के लोगों को आगे

बढ़कर गले लगाएंगे, उनसे रोटी का संबंध रखेंगे। यदि आपने यह नहीं किया तो समझिए, हिंदू समाज कभी एक नहीं हो पाएगा और एक अध्ययन के मुकाबले 2061 से आप इसी देश में अल्पसंख्यक होना शुरू हो जाएंगे। इसलिए भारतीय व हिंदू मानसिकता का विकास कीजिए और अपने सच्चे इतिहास से जुड़िए आज हिंदू समाज को अंग्रेजों और वामपंथियों के लिखे पर इतना भरोसा हो गया कि उन्होंने खुद ही अपना स्वाभिमान कुचल लिया और अपने ही भाईयों को अछूत बना डाला। आज भी पढे लिखे और उच्च वर्ण के हिंदू जातिवादी बने हुए हैं, लेकिन वह नहीं जानते कि यदि आज यदि वह बचे हुए हैं तो अपने ऐसे ही भाईयों के कारण जिन्होंने नीच कर्म करना तो स्वीकार किया, लेकिन इस्लाम को नहीं अपनाया।

 

आज भारत में 23 करोड़ मुसलमान हैं और लगभग 30 करोड़ अनुसूचित जातियों के लोग हैं। जरा सोचिये इन लोगों ने भी मुगल अत्याचारों के आगे हार मान ली होती और मुसलमान बन गये होते तो आज भारत में मुस्लिम जनसंख्या 50 करोड़ के पार होती और आज भारत एक मुस्लिम राष्ट्र बन चुका होता। यहाँ भी जेहाद का बोलबाला होता और ईराक, सीरिया, सोमालिया, पाकिस्तान और अफगानिस्तान आदि देशों की तरह बम-धमाके, मार-काट और खून-खराबे का माहौल होता। हम हिन्दू या तो मार डाले जाते या फिर धर्मान्तरित कर दिये जाते या फिर हमें काफिर के रूप में अत्यंत ही गलीज जिन्दगी मिलती। कृपया अपना वास्तविक इतिहास जानिए और इससे सबक लीजिए क्योंकि इतिहास खुद को दोहराता जरूर है। धन्य हैं हमारे ये भाई जिन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी अत्याचार और अपमान सहकर भी हिन्दुत्व का गौरव बचाये रखा और तरह-तरह से भारतवासियों की सेवा की। हमारे अनुसूचित जाति के भाइयों को मेरी तरफ से शत्-शत् प्रणाम और दिल से सैल्यूट।

 

1921 में केरल में मोपला के दंगे हुए।

From: Vivek Arya < >

मालाबार और आर्यसमाज

1921 में केरल में मोपला के दंगे हुए। मालाबार में रहने वाले मुसलमान जिन्हें मोपला कहा जाता था मस्जिद के मौलवी के आवाहन पर जन्नत के लालच में हथियार लेकर हिन्दू बस्तियों पर आक्रमण कर देते हैं। पहले इस्लाम ग्रहण करने का प्रलोभन दिया जाता हैं और हिन्दुओं की चोटी-जनेऊ को काट कर अपनी जिहादी पिपासा को शांत किया गया और जिस हिन्दू ने धर्मान्तरण से इंकार कर दिया उसे मार दिया गया, उसकी संपत्ति लूट ली गई और उसके घर को जला दिया गया। करीब 5000 हिन्दुओं का कत्लेआम करने एवं हज़ारों हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षित करने के बाद मालाबार में मुसलमानों ने समानांतर सरकार चलाई और अंग्रेज सरकार वहां नामोनिशान तक नहीं था। गांव के गांव का यही हाल था। अंत में अंग्रेजों की विशाल टुकड़ी मुसलमानों का मुकाबला करने मैदान में उतरी और इस्लामिक शरिया के इलाके को मुक्त किया गया। हिन्दुओं की व्यापक हानि हुई। उनकी धन सम्पत्ति लूट ली गई, उनके खेत जला दिए गए, उनके परिवार के सदस्यों को मार डाला गया एवं बचे खुचो को मुसलमान बना दिया गया था। त्रासदी इतनी व्यापक थी कि हिन्दुओं की लाशों से कुँए भर गए। केरल में हुई इस घटना की जानकारी अनेक हफ़्तों तक उत्तर भारत नहीं पहुंची। आर्यसमाज के शीर्घ नेताओं को लाहौर में जब इस घटना के विषय में मालूम चला तो पंडित ऋषिराम जी एवं महात्मा आनंद स्वामी जी को राहत सामग्री देकर सुदूर केरल भेजा गया। वहां पर उन्होंने आर्यसमाज की और से राहत शिविर की स्थापना करी जिसमें भोजन की व्यवस्था करी गई, जिन्हें जबरन मुसलमान बनाया गया था उन्हें शुद्ध कर वापिस से हिन्दू बनाया गया। आर्यसमाज के रिकार्ड्स के अनुसार करीब 5000 हिन्दुओं को वापिस से शुद्ध किया गया। इस घटना का यह परिणाम हुआ की हिन्दू समाज में आर्यसमाज को धर्म रक्षक के रूप में पहचाना गया। जो लोग आर्यसमाज के द्वारा करी गई शुद्धि का विरोध करते थे वे भी आर्यसमाज के हितैषी एवं प्रशंसक बन गए। सुदूर दक्षिण में करीब 4000 किलोमीटर दूर जाकर हिन्दू समाज के लिए जो सेवा करी उसके लिए मदन मोहन मालवीया जी, अनेक शंकराचार्यों, धर्माचार्यों आदि ने आर्यसमाज की प्रशंसा करी। समय की विडंबना देखिये केरल में 1947 के पश्चात बनी सेक्युलर कम्युनिस्ट सरकार ने मोपला के दंगों में अंग्रेजों द्वारा मारे गए मुसलमानों को क्रांतिकारी की परिभाषा देकर उन्हें स्वतंत्रता सैनानी की सुविधा जैसे पेंशन आदि देकर हिन्दुओं के जख्मों पर नमक लगाने का कार्य किया। आज भी केरल में उन अनेक मंदिरों में उन अवशेषों को जिनमें इस्लामिक दंगाइयों ने नष्ट किया था सुरक्षित रखा गया हैं ताकि आने वाली पीढ़ियां उस अत्याचार को भूल न सके।

आर्यसमाज द्वारा एक पुस्तक मालाबार और आर्यसमाज प्रकाशित की गई जिसमें मालाबार में हिन्दुओं पर हुए अत्याचार, कत्लेआम, राहत , शुद्धि आदि पर प्रामाणिक जानकारी देकर जनसाधारण को धर्म रक्षा के लिए संगठित होने की प्रेरणा दी गई।

डॉ विवेक आर्य

इस पुस्तक के पीडीएफ को नीचे दिए गए लिंक पर जाकर (Download) डाउनलोड किया जा सकता है।

https://archive.org/details/AryasamajAndMalabar

https://archive.org/details/MoplahRebellion1921_201806

सलंग्न चित्र- मोपला दंगों में हिन्दू समाज की आप्तकाल में रक्षा हेतु लगाये गए रक्षा शिविर का दृश्य।

A Yogi Defied Alexander (the Great?)

From: Guvindra Singh < >

 

Alexander III of Macedonia, in his belief that it was his destiny to conquer and rule the world, caused much destruction and misery.

Its unfortunate that historians and many leaders glorify pillaging, death and destruction, even referring to him as ‘Alexander the Great’.

Aristotle the teacher and guide of Alexander had told him that, in India lived great mystical, intellectual and spiritual super beings called Yogis. He told Alexander if he ever got the opportunity, to go and meet a Yogi, and if possible to even bring one back to Greece for Aristotle to meet.

Upon enquiry, whilst in India, Alexander learnt about the great and wise sage, Yogi Dandini, who dwelled deep in a forest.

________

Alexander sent numerous summons to Yogi Dandini, which he promptly ignored.
Alexander who could strike fear in the hearts and minds of great armies and kings was intrigued. He became desperate to meet this being who assigned no importance to Alexander.

Alexander next sent messengers with lavish gifts and an invitation to Yogi Dandini for a discourse and discussion on philosophy. Yogi Dandini, politely declined both the gifts and the invitation.

Though angry Alexander, a pupil of the great philosopher and teacher Aristotle, knew very well that, great beings could rarely be lured or coerced.

Finally Alexander sent his helmsman, Onesicritus, to invite Dandini, who lavished praise and gifts on Yogi Dandini. When Yogi Dandini declined his invitation and gifts, Onesicritus threatened the yogi. He said that Alexander had ordered the beheading of the yogi should the orders of the emperor be disobeyed.

Yogi Dandini remained unperturbed, stating, he had no fear of death. Onesicritus couldn’t muster the courage to kill the Yogi, and, instead, paid his respects to the Yogi and went back to report the incident to Alexander.

Livid at being rejected by a naked forest-dweller, Alexander decided to go to Dandini himself. With his Marshal and a large entourage, Alexander made his way deep into the forest.
Even though he experienced the powerful aura of Yogi Dandini, Alexander grew furious when the sage did not get up to welcome him.

________

Sadhu with activated Anjana Chakra m2v

Yogi ji

“How dared you refuse my gifts?” Alexander demanded.
“They were smeared in blood.” replied the yogi.

The chilling truth, and fearless conviction in Dandini’s voice, rattled Alexander. Alexander could not let his men overhear the embarrassing exchange, so he ordered them to move some distance away.

Then, when he was alone with Yogi Dandini, Alexander dismounted from his horse, walked towards the sitting sage and menacingly stood over him.

“Do you know who I am?” Alexander roared.
“I don’t think even you know, who you are.” replied Yogi Dandini.

Alexander felt deeply insulted. He drew his sword and swung it at Yogi Dandini, stopping just before it struck the Yogi’s neck.

“I am Alexander, the world conqueror,” he shouted. “You are sitting on my land. Submit or I’ll kill y­ou … ”

“Your land?” Dandini chuckled as he cut him off. “The land belongs to no one, O King!”
“Before you, there were others who claimed it as theirs,” he continued. “After you, there’ll be others who will say it’s theirs.

All creation belongs to the Creator alone, Alexander. And no one has any right to destroy what they haven’t created. You have blood on your hands,

O Emperor! You may have a temporary claim on the land, but you have permanent scars on your soul.”

Clearing his throat, a flustered and uncomfortable Alexander lowered his sword and adjusted his posture.

“The whole world is mine, Dandini,” Alexander exclaimed. “History will remember me as the mightiest king! My men can die for me!”

“What good is your ambition or their remembrance, O King? You drown yourself in alcohol every evening so you may forget about your crimes and sins. These men who surround you, they are tired of you. You will see it, they’ll give up on you one day, in fact very soon.”

“Besides,” Dandini continued, “what will you do with the world? All you need is two yards. Two yards long and two yards deep. Ultimately that’s all that will belong to you.”

Confused, humbled and defeated, Alexander sheathed his sword, bobbed his head before Yogi Dandini and left.

________

Barely a few months had passed when his army mutinied bringing an abrupt end to his campaign in India. Three years later, Alexander died at the age of thirty-three as he tried to return to Greece.

***

Readers interested in getting full details of the conversation between the Sage Yogi Dandini and Alexander may refer to the historical account provided in the work, ‘The Legends of Alexander the Great’ by Richard Stoneman

________

Written and posted : June 2018 by Gurvinder Singh

How to Easily Remove Article 370

How to Easily Remove Article 370

by Subramanian Swamy

 

(Please share with all the Hindus you know, request them that they demand from the Gov’t to remove Article 370. – Jaya sri Krishna!  – Skanda987)

So many people think that both assembly of J&K and Parliament need approval to abolish for Art370. I think we all are wrong.

 

Anyone who says Art 370 abolition needs Parliament approval is either ignorant of the Constitution or an illiterate. It just needs a Presidential Notification of a Cabinet Resolution.

 

I have sent a Note to PMO along with photocopies of the Constituent Assembly Debates and my legal arguments on why Art 370 can be deleted without Parliament concurrence, and by a Presidential Notification. I want it timed for mid-September.

भारतीय मुसल्मानों के हिन्दु पूर्वज मुसलमान कैसे बने?

From: Vivek Arya < >

भारतीय मुसल्मानों के हिन्दु पूर्वज मुसलमान कैसे बने?

दुबई में मैरियट होटल के विश्व प्रसिद्द भारतीय शेफ अतुल कोचर ने प्रियंका चोपड़ा के क्वांटिको नाटक में हिन्दुओं को आतंकवादी के रूप में प्रदर्शित करने पर प्रतिक्रिया रूप में अपना ट्वीट किया। इस ट्वीट में अतुल ने प्रियंका को पिछले 2000 वर्षों में हिन्दुओं पर मुसलमानों द्वारा किये गए अत्याचारों को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया। इस्लामिक देश में अतुल के ट्वीट के बदले उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया और उन पर क़ानूनी कार्यवाही करने पर विचार किया जा रहा हैं। देखा जाये तो यह प्रयास एक प्रकार से केवल अतुल कोचर ही नहीं अपितु समस्त हिन्दू समाज को आतंकित करने का प्रयास हैं। अतुल ने कुछ भी गलत नहीं कहा। अगर आप हमारे देश के इतिहास को उठाकर देखेंगे तो आपको ज्ञात होगा कि किस प्रकार से हमारे पूर्वजों ने अनगिनत अत्याचार इस्लाम के नाम पर सहे हैं। और आज भी सह रहे है। इस लेख के माध्यम से उन अत्याचारों का बखान किया जायेगा जिन्हें हमारे देश के पाठयक्रम में न तो पढ़ाया जाता हैं।  न हो बताया जाता है। यह एक प्रकार से हिन्दू समाज के मानवाधिकारों की अनदेखी ही हैं।

इस लेख में हम इस्लमिक आक्रान्ताओं के अत्याचारों को सप्रमाण देकर यह सिद्ध करेंगे की भारतीय मुसलमानों के पूर्वज हिन्दू थे एवं उनके पूर्वजों पर इस्लामिक आक्रान्ताओं ने अनेक अत्याचार कर उन्हें जबरन धर्म परिवर्तन के लिए विवश किया था। अनेक मुसलमान भाइयों का यह कहना हैं कि भारतीय इतिहास मूलत: अंग्रेजों द्वारा रचित हैं। इसलिए निष्पक्ष नहीं है। यह असत्य है। क्यूंकि अधिकांश मुस्लिम इतिहासकार आक्रमणकारियों अथवा सुल्तानों के वेतन भोगी थे। उन्होंने अपने आका की अच्छाइयों को बढ़ा-चढ़ाकर लिखना एवं बुराइयों को छुपाकर उन्होंने अपनी स्वामी भक्ति का भरपूर परिचय दिया हैं। तथापि इस शंका के निवारण के लिए हम अधिकाधिक मुस्लिम इतिहासकारों के आधार पर रचित अंग्रेज लेखक ईलियट एंड डाउसन द्वारा संगृहीत एवं प्रामाणिक समझी जाने वाली पुस्तकों का इस लेख में प्रयोग करेंगे।

भारत पर 7वीं शताब्दी में मुहम्मद बिन क़ासिम से लेकर 18वीं शताब्दी में अहमद शाह अब्दाली तक करीब 1200 वर्षों में अनेक आक्रमणकारियों ने हिन्दुओं पर अनगिनत अत्याचार किये। धार्मिक, राजनैतिक एवं सामाजिक रूप से असंगठित होते हुए भी हिन्दू समाज ने मतान्ध अत्याचारियों का भरपूर प्रतिकार किया। सिंध के राजा दाहिर और उनके बलिदानी परिवार से लेकर वीर मराठा पानीपत के मैदान तक अब्दाली से टकराते रहे। आक्रमणकारियों का मार्ग कभी भी निष्कंटक नहीं रहा अन्यथा सम्पूर्ण भारत कभी का दारुल इस्लाम (इस्लामिक भूमि) बन गया होता। आरम्भ के आक्रमणकारी यहाँ आते, मारकाट -लूटपाट करते और वापिस चले जाते। बाद की शताब्दियों में उन्होंने न केवल भारत को अपना घर बना लिया अपितु राजसत्ता भी ग्रहण कर ली। इस लेख में हम कुछ आक्रमणकारियों जैसे मौहम्मद बिन कासिम,महमूद गजनवी, मौहम्मद गौरी और तैमूर के अत्याचारों की चर्चा करेंगे।

मौहम्मद बिन कासिम

भारत पर आक्रमण कर सिंध प्रान्त में अधिकार प्रथम बार मुहम्मद बिन कासिम को मिला था।उसके अत्याचारों से सिंध की धरती लहूलुहान हो उठी थी। कासिम से उसके अत्याचारों का बदला राजा दाहिर की दोनों पुत्रियों ने कूटनीति से लिया था।

1. प्रारंभिक विजय के पश्चात कासिम ने ईराक के गवर्नर हज्जाज को अपने पत्र में लिखा-‘दाहिर का भतीजा, उसके योद्धा और मुख्य मुख्य अधिकारी कत्ल कर दिये गये हैं। हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षित कर लिया गया है, अन्यथा कत्ल कर दिया गया है। मूर्ति-मंदिरों के स्थान पर मस्जिदें खड़ी कर दी गई हैं। अजान दी जाती है। [i]

2. वहीँ मुस्लिम इतिहासकार आगे लिखता है- ‘मौहम्मद बिन कासिम ने रिवाड़ी का दुर्ग विजय कर लिया। वह वहाँ दो-तीन दिन ठहरा। दुर्ग में मौजूद 6000 हिन्दू योद्धा वध कर दिये गये, उनकी पत्नियाँ, बच्चे, नौकर-चाकर सब कैद कर लिये (दास बना लिये गये)। यह संख्या लगभग 30 हजार थी। इनमें दाहिर की भानजी समेत 30 अधिकारियों की पुत्रियाँ भी थी[ii]।

महमूद गजनवी

मुहम्मद गजनी का नाम भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वी राज चौहान को युद्ध में हराने और बंदी बनाकर अफगानिस्तान लेकर जाने के लिए प्रसिद्द है। गजनी मजहबी उन्माद एवं मतान्धता का जीता जागता प्रतीक था।

1. भारत पर आक्रमण प्रारंभ करने से पहले इस 20 वर्षीय सुल्तान ने यह धार्मिक शपथ ली कि वह प्रति वर्ष भारत पर आक्रमण करता रहेगा, जब तक कि वह देश मूर्ति और बहुदेवता पूजा से मुक्त होकर इस्लाम स्वीकार न कर ले। अल उतबी इस सुल्तान की भारत विजय के विषय में लिखता है-‘अपने सैनिकों को शस्त्रास्त्र बाँट कर अल्लाह से मार्ग दर्शन और शक्ति की आस लगाये सुल्तान ने भारत की ओर प्रस्थान किया। पुरुषपुर (पेशावर) पहुँचकर उसने उस नगर के बाहर अपने डेरे गाड़ दिये[iii]।

2. मुसलमानों को अल्लाह के शत्रु काफिरों से बदला लेते दोपहर हो गयी। इसमें 15000 काफिर मारे गये और पृथ्वी पर दरी की भाँति बिछ गये जहाँ वह जंगली पशुओं और पक्षियों का भोजन बन गये। जयपाल के गले से जो हार मिला उसका मूल्य 2 लाख दीनार था। उसके दूसरे रिद्गतेदारों और युद्ध में मारे गये लोगों की तलाशी से 4 लाख दीनार का धन मिला। इसके अतिरिक्त अल्लाह ने अपने मित्रों को 5 लाख सुन्दर गुलाम स्त्रियाँ और पुरुष भी बखशो[iv]।

3. कहा जाता है कि पेशावर के पास वाये-हिन्द पर आक्रमण के समय महमूद ने महाराज जयपाल और उसके 15 मुख्य सरदारों और रिश्तेदारों को गिरफ्तार कर लिया था। सुखपाल की भाँति इनमें से कुछ मृत्यु के भय से मुसलमान हो गये। भेरा में, सिवाय उनके, जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया, सभी निवासी कत्ल कर दिये गये। स्पष्ट है कि इस प्रकार धर्म परिवर्तन करने वालों की संखया काफी रही होगी[v]।

4. मुल्तान में बड़ी संख्या में लोग मुसलमान हो गये। जब महमूद ने नवासा शाह पर (सुखपाल का धर्मान्तरण के बाद का नाम) आक्रमण किया तो उतवी के अनुसार महमूद द्वारा धर्मान्तरण का अभूतपूर्व प्रदर्शन हुआ[vi]। काश्मीर घाटी में भी बहुत से काफिरों को मुसलमान बनाया गया और उस देश में इस्लाम फैलाकर वह गजनी लौट गया[vii]।

5. उतबी के अनुसार जहाँ भी महमूद जाता था, वहीं वह निवासियों को इस्लाम स्वीकार करने पर मजबूर करता था। इस बलात्‌ धर्म परिवर्तन अथवा मृत्यु का चारों ओर इतना आतंक व्याप्त हो गया था कि अनेक शासक बिना युद्ध किये ही उसके आने का समाचार सुनकर भाग खड़े होते थे। भीमपाल द्वारा चाँद राय को भागने की सलाह देने का यही कारण था कि कहीं राय महमूद के हाथ पड़कर बलात्‌ मुसलमान न बना लिया जाये जैसा कि भीमपाल के चाचा और दूसरे रिश्तेदारों के साथ हुआ था[viii]।

6. 1023 ई. में किरात, नूर, लौहकोट और लाहौर पर हुए चौदहवें आक्रमण के समय किरात के शासक ने इस्लाम स्वीकार कर लिया और उसकी देखा-देखी दूसरे बहुत से लोग मुसलमान हो गये। निजामुद्‌दीन के अनुसार देश के इस भाग में इस्लाम शांतिपूर्वक भी फैल रहा था, और बलपूर्वक भी`[ix]। सुल्तान महमूद कुरान का विद्वान था और उसकी उत्तम परिभाषा कर लेता था। इसलिये यह कहना कि उसका कोई कार्य इस्लाम विरुद्ध था, झूठा है।

7. हिन्दुओं ने इस पराजय को राष्ट्रीय चुनौती के रूप में लिया। अगले आक्रमण के समय जयपाल के पुत्र आनंद पाल ने उज्जैन, ग्वालियर, कन्नौज, दिल्ली और अजमेर के राजाओं की सहायता से एक बड़ी सेना लेकर महमूद का सामना किया। फरिश्ता लिखता है कि 30,000 खोकर राजपूतों ने जो नंगे पैरों और नंगे सिर लड़ते थे, सुल्तान की सेना में घुस कर थोड़े से समय में ही तीन-चार हजार मुसलमानों को काट कर रख दिया। सुल्तान युद्ध बंद कर वापिस जाने की सोच ही रहा था कि आनंद पाल का हाथी अपने ऊपर नेपथा के अग्नि गोले के गिरने से भाग खड़ा हुआ। हिन्दू सेना भी उसके पीछे भाग खड़ी हुई[x]।

8. सराय (नारदीन) का विध्वंस- सुल्तान ने (कुछ समय ठहरकर) फिर हिन्द पर आक्रमण करने का इरादा किया। अपनी घुड़सवार सेना को लेकर वह हिन्द के मध्य तक पहुँच गया। वहाँ उसने ऐसे-ऐसे शासकों को पराजित किया जिन्होंने आज तक किसी अन्य व्यक्ति के आदेशों का पालन करना नहीं सीखा था। सुल्तान ने उनकी मूर्तियाँ तोड़ डाली और उन दुष्टों को तलवार के घाट उतार दिया। उसने इन शासकों के नेता से युद्ध कर उन्हें पराजित किया। अल्लाह के मित्रों ने प्रत्येक पहाड़ी और वादी को काफिरों के खून से रंग दिया और अल्लाह ने उनको घोड़े, हाथियों और बड़ी भारी संपत्ति मिली[xi]।

9. नंदना की विजय के पश्चात् सुल्तान लूट का भारी सामान ढ़ोती अपनी सेना के पीछे-पीछे चलता हुआ, वापिस लौटा। गुलाम तो इतने थे कि गजनी की गुलाम-मंडी में उनके भाव बहुत गिर गये। अपने (भारत) देश में अति प्रतिष्ठा प्राप्त लोग साधारण दुकानदारों के गुलाम होकर पतित हो गये। किन्तु यह तो अल्लाह की महानता है कि जो अपने महजब को प्रतिष्ठित करता है और मूति-पूजा को अपमानित करता है[xii]।

10. थानेसर में कत्ले आम- थानेसर का शासक मूर्ति-पूजा में घोर विश्वास करता था और अल्लाह (इस्लाम) को स्वीकार करने को किसी प्रकार भी तैयार नहीं था। सुल्तान ने (उसके राज्य से) मूर्ति पूजा को समाप्त करने के लिये अपने बहादुर सैनिकों के साथ कूच किया। काफिरों के खून से, नदी लाल हो गई और उसका पानी पीने योग्य नहीं रहा। यदि सूर्य न डूब गया होता तो और अधिक शत्रु मारे जाते। अल्लाह की कृपा से विजय प्राप्त हुई जिसने इस्लाम को सदैव-सदैव के लिये सभी दूसरे मत-मतान्तरों से श्रेष्ठ स्थापित किया है, भले ही मूर्ति पूजक उसके विरुद्ध कितना ही विद्रोह क्यों न करें। सुल्तान, इतना लूट का माल लेकर लौटा जिसका कि हिसाब लगाना असंभव है। स्तुति अल्लाह की जो सारे जगत का रक्षक है कि वह इस्लाम और मुसलमानों को इतना सम्मान बख्शता है[xiii]।

11. अस्नी पर आक्रमण- जब चन्देल को सुल्तान के आक्रमण का समाचार मिला तो डर के मारे उसके प्राण सूख गये। उसके सामने साक्षात मृत्यु मुँह बाये खड़ी थी। सिवाय भागने के उसके पास दूसरा विकल्प नहीं था। सुल्तान ने आदेश दिया कि उसके पाँच दुर्गों की बुनियाद तक खोद डाली जाये। वहाँ के निवासियों को उनके मल्बे में दबा दिया अथवा गुलाम बना लिया गया।चन्देल के भाग जाने के कारण सुल्तान ने निराश होकर अपनी सेना को चान्द राय पर आक्रमण करने का आदेश दिया जो हिन्द के महान शासकों में से एक है और सरसावा दुर्ग में निवास करता है[xiv]।

12. सरसावा (सहारनपुर) में भयानक रक्तपात- सुल्तान ने अपने अत्यंत धार्मिक सैनिकों को इकट्‌ठा किया और द्गात्रु पर तुरन्त आक्रमण करने के आदेश दिये। फलस्वरूप बड़ी संख्या में हिन्दू मारे गये अथवा बंदी बना लिये गये। मुसलमानों ने लूट की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जब तक कि कत्ल करते-करते उनका मन नहीं भर गया। उसके बाद ही उन्होंने मुर्दों की तलाशी लेनी प्रारंभ की जो तीन दिन तक चली। लूट में सोना, चाँदी, माणिक, सच्चे मोती, जो हाथ आये जिनका मूल्य लगभग तीस लाख दिरहम रहा होगा। गुलामों की संखया का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रत्येक को 2 से लेकर 10 दिरहम तक में बेचा गया। द्गोष को गजनी ले जाया गया। दूर-दूर के देशों से व्यापारी उनको खरीदने आये। मवाराउन-नहर ईराक, खुरासान आदि मुस्लिम देश इन गुलामों से पट गये। गोरे, काले, अमीर, गरीब दासता की समान जंजीरों में बँधकर एक हो गये[xv]।

13. सोमनाथ का पतन- अल-काजवीनी के अनुसार ‘जब महमूद सोमनाथ के विध्वंस के इरादे से भारत गया तो उसका विचार यही था कि (इतने बड़े उपसाय देवता के टूटने पर) हिन्दू (मूर्ति पूजा के विश्वास को त्यागकर) मुसलमान हो जायेंगे[xvi]।दिसम्बर 1025 में सोमनाथ का पतना हुआ। हिन्दुओं ने महमूद से कहा कि वह जितना धन लेना चाहे ले ले, परन्तु मूर्ति को न तोड़े। महमूद ने कहा कि वह इतिहास में मूर्ति-भंजक के नाम से विखयात होना चाहता है, मूर्ति व्यापारी के नाम से नहीं। महमूद का यह ऐतिहासिक उत्तर ही यह सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है कि सोमनाथ के मंदिर को विध्वंस करने का उद्‌देश्य धार्मिक था, लोभ नहीं।मूर्ति तोड़ दी गई। दो करोड़ दिरहम की लूट हाथ लगी, पचास हजार हिन्दू कत्ल कर दिये गये[xvii]। लूट में मिले हीरे, जवाहरातों, सच्चे मोतियों की, जिनमें कुछ अनार के बराबर थे, गजनी में प्रदर्शनी लगाई गई जिसको देखकर वहाँ के नागरिकों और दूसरे देशों के राजदूतों की आँखें फैल गई[xviii]।

मौहम्मद गौरी

मुहम्मद गौरी नाम नाम गुजरात के सोमनाथ के भव्य मंदिर के विध्वंश के कारण सबसे अधिक कुख्यात है। गौरी ने इस्लामिक जोश के चलते लाखों हिन्दुओं के लहू से अपनी तलवार को रंगा था।

1. मुस्लिम सेना ने पूर्ण विजय प्राप्त की। एक लाख नीच हिन्दू नरक सिधार गये (कत्ल कर दिये गये)। इस विजय के पश्चात्‌ इस्लामी सेना अजमेर की ओर बढ़ी-वहाँ इतना लूट का माल मिला कि लगता था कि पहाड़ों और समुद्रों ने अपने गुप्त खजानें खोल दिये हों। सुल्तान जब अजमेर में ठहरा तो उसने वहाँ के मूर्ति-मंदिरों की बुनियादों तक को खुदावा डाला और उनके स्थान पर मस्जिदें और मदरसें बना दिये, जहाँ इस्लाम और शरियत की शिक्षा दी जा सके[xix]।

2. फरिश्ता के अनुसार मौहम्मद गौरी द्वारा 4 लाख ‘खोकर’ और ‘तिराहिया’ हिन्दुओं को इस्लाम ग्रहण कराया गया[xx]।

3. इब्ल-अल-असीर के द्वारा बनारस के हिन्दुओं का भयानक कत्ले आम हुआ। बच्चों और स्त्रियों को छोड़कर और कोई नहीं बक्शा गया[xxi]।स्पष्ट है कि सब स्त्री और बच्चे गुलाम और मुसलमान बना लिये गये।

तैमूर लंग

तैमूर लंग अपने समय का सबसे अत्याचारी हमलावर था। उसके कारण गांव के गांव लाशों के ढेर में तब्दील हो गए थे।लाशों को जलाने वाला तक बचा नहीं था।

1. 1399 ई. में तैमूर का भारत पर भयानक आक्रमण हुआ। अपनी जीवनी ‘तुजुके तैमुरी’ में वह कुरान की इस आयत से ही प्रारंभ करता है ‘ऐ पैगम्बर काफिरों और विश्वास न लाने वालों से युद्ध करो और उन पर सखती बरतो।’ वह आगे भारत पर अपने आक्रमण का कारण बताते हुए लिखता है। ‘हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने का मेरा ध्येय काफिर हिन्दुओं के विरुद्ध धार्मिक युद्ध करना है (जिससे) इस्लाम की सेना को भी हिन्दुओं की दौलत और मूल्यवान वस्तुएँ मिल जायें[xxii]।

2. कश्मीर की सीमा पर कटोर नामी दुर्ग पर आक्रमण हुआ। उसने तमाम पुरुषों को कत्ल और स्त्रियों और बच्चों को कैद करने का आदेश दिया। फिर उन हठी काफिरों के सिरों के मीनार खड़े करने के आदेश दिये। फिर भटनेर के दुर्ग पर घेरा डाला गया। वहाँ के राजपूतों ने कुछ युद्ध के बाद हार मान ली और उन्हें क्षमादान दे दिया गया। किन्तु उनके असवाधान होते ही उन पर आक्रमण कर दिया गया। तैमूर अपनी जीवनी में लिखता है कि ‘थोड़े ही समय में दुर्ग के तमाम लोग तलवार के घाट उतार दिये गये। घंटे भर में दस हजार लोगों के सिर काटे गये। इस्लाम की तलवार ने काफिरों के रक्त में स्नान किया। उनके सरोसामान, खजाने और अनाज को भी, जो वर्षों से दुर्ग में इकट्‌ठा किया गया था, मेरे सिपाहियों ने लूट लिया। मकानों में आग लगा कर राख कर दिया। इमारतों और दुर्ग को भूमिसात कर दिया गया[xxiii]।

3. दूसरा नगर सरसुती था जिस पर आक्रमण हुआ। ‘सभी काफिर हिन्दू कत्ल कर दिये गये। उनके स्त्री और बच्चे और संपत्ति हमारी हो गई। तैमूर ने जब जाटों के प्रदेश में प्रवेश किया। उसने अपनी सेना को आदेश दिया कि ‘जो भी मिल जाये, कत्ल कर दिया जाये।’ और फिर सेना के सामने जो भी ग्राम या नगर आया, उसे लूटा गया।पुरुषों को कत्ल कर दिया गया और कुछ लोगों, स्त्रियों और बच्चों को बंदी बना लिया गया[xxiv]।’

4. दिल्ली के पास लोनी हिन्दू नगर था। किन्तु कुछ मुसलमान भी बंदियों में थे। तैमूर ने आदेश दिया कि मुसलमानों को छोड़कर शेष सभी हिन्दू बंदी इस्लाम की तलवार के घाट उतार दिये जायें। इस समय तक उसके पास हिन्दू बंदियों की संखया एक लाख हो गयी थी। जब यमुना पार कर दिल्ली पर आक्रमण की तैयारी हो रही थी उसके साथ के अमीरों ने उससे कहा कि इन बंदियों को कैम्प में नहीं छोड़ा जा सकता और इन इस्लाम के शत्रुओं को स्वतंत्र कर देना भी युद्ध के नियमों के विरुद्ध होगा। तैमूर लिखता है- ‘इसलिये उन लोगों को सिवाय तलवार का भोजन बनाने के कोई मार्ग नहीं था। मैंने कैम्प में घोषणा करवा दी कि तमाम बंदी कत्ल कर दिये जायें और इस आदेश के पालन में जो भी लापरवाही करे उसे भी कत्ल कर दिया जाये और उसकी सम्पत्ति सूचना देने वाले को दे दी जाये। जब इस्लाम के गाजियों (काफिरों का कत्ल करने वालों को आदर सूचक नाम) को यह आदेश मिला तो उन्होंने तलवारें सूत लीं और अपने बंदियों को कत्ल कर दिया। उस दिन एक लाख अपवित्र मूर्ति-पूजक काफिर कत्ल कर दिये गये[xxv]।

इसी प्रकार के कत्लेआम, धर्मांतरण का विवरण कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्लतुमिश, ख़िलजी,तुगलक से लेकर तमाम मुग़लों तक का मिलता हैं। अकबर और औरंगज़ेब के जीवन के विषय में चर्चा हम अलग से करेंगे। भारत के मुसलमान आक्रमणकारियों बाबर, मौहम्मद बिन-कासिम, गौरी, गजनवी इत्यादि लुटेरों को और औरंगजेब जैसे साम्प्रदायिक बादशाह को गौरव प्रदान करते हैं और उनके द्वारा मंदिरों को तोड़कर बनाई गई मस्जिदों व दरगाहों को इस्लाम की काफिरों पर विजय और हिन्दू अपमान के स्मृति चिन्ह बनाये रखना चाहते हैं। संसार में ऐसा शायद ही कहीं देखने को मिलेगा जब एक कौम अपने पूर्वजों पर अत्याचार करने वालों को महान सम्मान देते हो और अपने पूर्वजों के अराध्य हिन्दू देवी देवताओं, भारतीय संस्कृति एवं विचारधारा के प्रति उसके मन में कोई आकर्षण न हो।

(नोट- इस लेख को लिखने में “भारतीय मुसल्मानों के हिन्दु पूरवज (मुसलमान कैसे बने)” नामक पुस्तक लेखक पुरुषोत्तम, प्रकाशक कर्ता हिन्दू राइटर फोरम, राजौरी गार्डन, दिल्ली का प्रयोग किया गया है।)

डॉ विवेक आर्य

[i] इलियटएंड डाउसन खंड-1 पृ.164

[ii] इलियटएंड डाउसन खंड-1 पृ.164

[iii] इलियटएंड डाउसन खंड-1 पृ 24-25

[iv] उपरोक्त पृ. 26

[v] के. एस. लाल : इंडियन मुस्लिम : व्हू आर दे, पृ. 6

[vi] अनेक स्थानों पर महमूद द्वारा धर्मान्तरण के लिये देखे-उतबी की पुस्तक ‘किताबें यामिनी’ का अनुवाद जेम्स रेनाल्ड्‌स द्वारा पृ. 451-463

[vii] जकरिया अल काजवीनी, के. एस. लाल, उपरोक्त पृ. 7

[viii] ईलियट एंड डाउसन, खंड-2, पृ.40 / के. एस. लाल, पूर्वोद्धत पृ. 7-8

[ix] के. एस. लाल, पूर्वोद्धत पृ. 7

[x] प्रो. एस. आर. द्गार्मा, द क्रीसेन्ट इन इंडिया, पृ. 43

[xi] ईलियट एंड डाउसन, खण्ड-2, पृ. 36

[xii] उपरोक्त, पृ.39

[xiii] उपरोक्त, पृ. 40-41

[xiv] उपरोक्त, पृ. 47

[xv] उपरोक्त, पृ. 49-50

[xvi] के. एस. लाल : इंडियन मुस्लिम व्यू आर दे, पृ. 7

[xvii] प्रो. एस. आर. शर्मा, द क्रीसेन्ट इन इंडिया, पृ. 47

[xviii] ईलियट एंड डाउसन, खण्ड-2, पृ. 35

[xix] उपरोक्त पृ. 215

[xx] के. एस. लाल : इंडियन मुस्लिम व्यू आर दे, पृ. 11

[xxi] उपरोक्त पृ.23

[xxii] सीताराम गोयल द्वारा ‘स्टोरी ऑफ इस्लामिक इम्पीरियलिज्म इन इंडिया में उद्धत, पृ. 48

[xxiii]उपरोक्त

[xxiv] उपरोक्त, पृ.49-50

[xxv] सीताराम गोयल द्वारा ‘स्टोरी ऑफ इस्लामिक इम्पीरियलिज्म इन इंडिया में उद्धत, पृ. 48

#WeStandwithAtulKochar

सलंग्न चित्र- बनारस में हिन्दू मंदिर पर बनी ज्ञानव्यापी मस्जिद

सहिष्णुता का कल्पनालोक

From: Vivek Arya < >

सहिष्णुता का कल्पनालोक

बलबीर पुंज, पूर्व राज्यसभा सदस्य

आखिर गत चार वर्षों में ऐसा क्या हुआ है जिसने चर्च को इतना बेचैन कर दिया है? क्या पर्दे के पीछे कुछ और ही खेल है?
पहले दिल्ली के प्रधान पादरी अनिल काउटो तो अब गोवा के आर्कबिशप फिलिप नेरी फेराओ द्वारा ईसाई समाज को लिखा पत्र चर्चा में है। इन चिट्ठियों के अनुसार देश में बहुलतावाद, लोकतंत्र और संविधान खतरे में है। दलितों- अल्पसंख्यकों पर अत्याचार निरंतर बढ़ रहे हैं। चर्च ने स्वयं को मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया है। आखिर गत चार वर्षों में ऐसा क्या हुआ है या क्या हो रहा है जिसने चर्च को बेचैन कर दिया है? क्या पर्दे के पीछे कुछ और ही खेल है या फिर अपने वास्तविक मंतव्य को लच्छेदार बातों के अनावरण में छिपाने का प्रयास हो रहा है? 2018 की शुरुआत में पुणे स्थित भीमा-कोरेगांव में हुई जातीय हिंसा को लेकर जो हालिया खुलासा हुआ है वह भारत में देशविरोधी ताकतों की कुंठा और बौखलाहट को दर्शाता है। प्रारंभ में इर्स हिंसा के लिए सीधे तौर पर्र हिंदुत्व से जुड़े संगठनों को जिम्मेदार ठहराया गया, फिर भाजपा- संघ को कलंकित करने का प्रयास हुआ। अब जांच में पता चला है कि नक्सलियों ने ही पूर्वनियोजित योजना के तहत हिंसा भड़काई थी और वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश भी रच रहे थे।

किसी भी संप्रभु देश में सख्त कानून व्यवस्था होने के बाद भी आपराधिक मामले सामने आते हैं और भारत भी इसका अपवाद नहीं है। अपने देश में जब ऐसी कोई आपराधिक घटना सामने आती है जिसमें दलित, ईसाई और मुस्लिम पीड़ित होते है तब उस पर कानूनी कार्रवाई की जाती है। आखिर इसके बावजूद चर्च आगामी चुनावों से पहले एक व्यक्ति/पार्टी विशेष को ध्यान में रखकर राजनीतिक रूप से सक्रिय हो क्यों हो गया? उसे इसके लिए किसने प्रेरित किया? भारत में प्रधान-पादरियों की नियुक्ति पोप करते है और उनकी जवाबदेही केवल वेटिकन सिटी के प्रति होती है। इटली के रोम में स्थित वेटिकन स्वयं को संप्रभु और स्वतंत्र इकाई मानता है। कैथोलिक चर्च का घोषित एजेंडा, ‘जिस प्रकार पहली सहस्नाब्दी में यूरोप और दूसरी में अमेरिका अफ्रीका को ईसाई बनाना था उसी तरह तीसरी सहस्नाब्दी में एशिया का ईसाइकरण करना है।’ इस पृष्ठभूमि में एशिया में ईसाइयों की स्थिति देखें : औपनिवेशिक-काल से चर्च को भारत में जैसी सुविधा प्राप्त है क्या वैसी ही चीन, पाकिस्तान, ईरान, इराक, बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे एशियाई देशों में है, जहां ईसाई सहित अन्य अल्पसंख्यक दोयम दर्जे के नागरिक हैं? क्या वर्तमान विवाद तीसरी सहस्नाब्दी के निर्धारित लक्ष्यों को पाने से संबंधित तो नहीं? भारत की कालजयी सनातनी परंपरा सदियों से भय, लालच और छल की शिकार रही है। इस रूग्ण चिंतन का संज्ञान गांधीजी ने अपने जीवनकाल में अनेक बार लिया। स्वतंत्रता के बाद ईसाई मिशनरियों और चर्चों की अनैतिक गतिविधियों को लेकर अप्रैल 1955 में मध्य प्रदेश की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पूर्व न्यायाधीश भवानी शंकर नियोगी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था जिसने मतांतरण पर कानूनी रूप से प्रतिबंध की अनुशंसा की थी।

अपनी चिट्ठियों में चर्च लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता और बहुलतावाद की दुहाई देकर भारत के संविधान को खतरे में बता रहे हैं। क्या 1947 में स्वतंत्रता और आपातकाल के समय संविधान में 42वें संशोधन के अंतर्गत ‘सेक्युलर’ शब्द जोड़ने से पहले-भारत पंथनिरपेक्ष नहीं था? भारत आज पंथनिरपेक्ष और सहिष्णु है तो वह अपनी कालजयी सनातन संस्कृति और बहुलतावादी दर्शन के कारण है जिसने ‘एक सत विप्रा: बहुधा वदंति’ की प्रेरणा दी और सारे संसार को एक परिवार (वसुधैव कुटुंबकम) माना।

भारत में चर्च का क्या इतिहास रहा है? प्राचीनकाल में अपने उद्गम स्थान पर प्रताड़ना के शिकार हुए जो लोग भारतीय तटों पर पहुंचे उनमें यहूदियों के बाद सीरियाई ईसाई भी शामिल थे जो कैथोलिक चर्च की प्रताड़ना के साक्षी थे। भारतीय परंपरा के अनुरूप इन सभी का तत्कालीन स्थानीय हिंदू शासकों और जनता ने न केवल स्वागत किया, बल्कि सारी सुविधाएं देते हुए उन्हें उनकी रीति-रिवाजों के अंतर्गत पूजा और जीवन-यापन का अवसर भी दिया। कई शताब्दियों की सुख-शांति के बाद स्थिति तब बिगड़ी जब रोमन कैथोलिक चर्च का पुर्तगाली साम्राज्यवाद के साथ भारत में प्रवेश हुआ। 16वीं-17वीं शताब्दी में जब उत्तर भारत क्रूर मुगल शासक औरंगजेब के आतंक का शिकार हो रहा था तब उसी समय दक्षिण में फ्रांसिस जेवियर ‘गोवा इंक्विजीशन’ की भयावह पटकथा तैयार कर रहे थे। ईसाइयत के प्रचार के लिए 1541-42 में भारत पहुंचे जेवियर ने पाया कि गैर-ईसाइयों की भांति मतांतरित ईसाई अपनी मूल परंपराओं और पूजा-पद्धति का अनुसरण कर रहे थे और ईसाइयत (रोमन कैथोलिक स्वरूप) के प्रति गंभीर नहीं थे। उन्होंने पुर्तगाली शासक किंग जॉन-तृतीय को पत्र लिखकर गोवा में ‘इंक्वीजीशन’ प्रारंभ करने का अनुरोध किया जिसके स्वीकृत होने पर हजारों गैर-ईसाइयों को अमानवीय यातनाएं सहनी पड़ी जिसमें लोगों की जीभ काटना और चमड़ी उतारना तक शामिल था। हिंदुओं के सभी रीति-रिवाजों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। फ्रांसिस जेवियर को 1662 में तत्कालीन पोप ग्रेगरी-15 ने ईसाइयत के प्रचार- प्रसार हेतु ‘संत’ की उपाधि प्रदान की।

यदि आज भारत में चर्चों को असुरक्षा और खतरे का अनुभव हो रहा है तो उसका मुख्य कारण वह विदेशी चंदा है जो मई 2014 से पहले उन्हें और उनके समर्थित गैर- सरकारी संगठनों को आसानी से पहुंच रहा था, जिसका अधिकांश उपयोग वे राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में करते थे। मोदी सरकार विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम का उल्लंघन करने वाले 18 हजार 868 स्वयंसेवी संगठनों का पंजीकरण रद कर चुकी है। इसके चलते वित्त वर्ष 2016- 17 में गैर-सरकारी संगठनों को विदेश से प्राप्त राशि 6,499 करोड़ रुपये रही, जबकि 2015-16 में 18 हजार करोड़ रुपये थी। ऐसे संगठनों का काला चेहरा समय-समय पर सामने आता रहा है। जब दुनिया दावोस के आर्थिक मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सुन रही थी तब ब्रिटिश गैर-सरकारी संगठन ऑक्सफैम ने घोषित एजेंडे के तहत देश में आर्थिक असमानता संबंधी एक रिपोर्ट सार्वजनिक की थी। लगभग उसी समय ऑक्सफैम के अधिकारियों द्वारा भूकंप प्रभावित हैती में आर्थिक सहायता के बदले महिलाओं से यौन-संबंध बनाने का खुलासा हुआ। यदि भारत की बहुलतावादी संस्कृति को किसी से खतरा है तो वह नक्सलवाद, इस्लामी कट्टरता, विदेशी हितों की पूर्ति करने वाले तथाकथित पर्यावरणविद् और वह रूग्ण विचारधारा है जिनका जन्म इस भूखंड से बाहर हुआ। चर्च का इन शक्तियों से कैसा संबंध है, यह जांच का विषय है।

साभार-दैनिक जागरण, दैनिक हिंदी समाचार पत्र

सब धर्म अच्छे हैं ? जानो क्या फ़र्क है।

From: Chander Kohli < >

 ” सब धर्म अच्छे हैं ”
जो लोग कहते है कि ” सब धर्म अच्छे हैं ” ; ” सब धर्म अच्छी बातें सिखाते है —  वे सब लोग हिन्दुओं के महान शत्रु हैं   और अनुचित प्रचार कर रहे हैं तथा झुठ बोल रहें हैं  और झूड़ बोलते  हैं ———–
१ . क्या हिन्दू धर्म मॉस – खाने का प्रचार करता है — नहीं ; 
किन्तु इस्लाम और ईसाई धर्म करते हैं
२ .  क्या हिन्दू धर्म गऊ मॉस – खाने का प्रचार करता है — नहीं ; 
किन्तु इस्लाम और ईसाई धर्म करते हैं
३ .  क्या हिन्दू धर्म जो लोग हिन्दू नहीं हैं उन्हें काफिर या पेगन कहता है — नहीं – नहीं ; 
किन्तु इस्लाम और ईसाई धर्म कहते हैं   
और काफिर और पेगन को धर्म परिवर्तन करवाते  है किसी भी अनुचित ढंग आदि आदि से ———
४ .  क्या हिन्दू धर्म चार पत्निया करने का प्रचार करता है — नहीं ;
किन्तु इस्लाम करता  हैं  ——-
५  . क्या हिन्दू धर्म जो हिन्दू नहीं उस को धर्म परिवर्तन करने या  उस की ह्त्या करने को कहता है  —  — नहीं ;
किन्तु इस्लाम और ईसाई धर्म  कहते हैं और करते हैं  ——-
६  . क्या हिन्दू धर्म कहता है कि —–
 केवल ईश्वर   में विशवास करने वाला  ही 
 केवल गीता  में विशवास करने वाला  ही 
 केवल  मंदिर  में विशवास करने  वाला ही  हिन्दू है अन्यथा नहीं ———नहीं कहता —–
जैसे इस्लाम कहता है 
 केवल अल्लाह में विशवास करने वाला  ही 
 केवल कुरान   में विशवास करने वाला  ही 
 केवल मुहम्मद  में विशवास करने वाला  ही ——-  मुसलमान है ——– और कोई नहीं
ईसाई कहते हैं —
 केवल क्राइस्ट   में विशवास करने वाला  ही 
 केवल बाइबल   में विशवास करने वाला  ही 
 केवल चर्च   में विशवास करने वाला  ही ———-  ईसाई है ——— और कोई नहीं
७ . केवल मुस्लिम आदमी ही तीन बार कहने से ”तालाक” दे सकता है महिला नहीं ——-
क्या हिन्दू धर्म ऐसा कहता है — नहीं ——-
८ . क्या हिन्दू धर्म , धर्म परिवर्तन में विशवास करता है —- नहीं , नहीं —–
किन्तु मुसलमान  और ईसाई धर्म करते  है —-
ऐसे अनेक अनेक उदाहरण हैं ———-
९ . इन सब कारणों के कारण इस्लाम और ईसाई ”धर्म” ;
”धर्म” नहीं ”मत” हैं ————
१० . कई हिन्दू लोग मांस खातें हैं , कई हिन्दू लोग ”तालाक ” देते हैं आदि आदि —-   किन्तु हिन्दू धर्म ऐसा करने को नहीं कहता जब की कुरान कहता है   

मुसलमान कहते हैं —- जो हिन्दू मांस खातें हैं —– जो लोग तलाक देते हैं —- आदि आदि वे सब हिन्दू नहीं वे सब मुसलमान या ईसाई बन जाएं ——

उन  सब मुसलमान और ईसाई  लोगों को  उत्तर ——
1 . बहुत सारे मुसलमान शराब पीते हैं — जो कुरआन में वर्जित है ,  उन  मुसलमानों को हिन्दू बन जाना चाहिए ——————
बहुत मुस्लिम महिलाएं ”मेक अप = make up ”करती हैं जो कुरआन में वर्जित है , उन   मुस्लमानियों  को हिन्दू बन जाना चाहिए ——————
बहुत मुस्लिम महिलाएं हिजाब और बुरखा नहीं पहनती — कुरआन के कारण उन्हें पहनना चाहिए —– उन   मुस्लमानियों को हिन्दू बन जाना चाहिए —-
संगीत , नृत्य , गाना बजाना कुरान में वर्जित है   तो सब गाने  बजाने , नृत्य करने वाले मुसलमानों को हिन्दू बन जाना चाहिए ——————
ऐसे अनेक अनेक उदाहरण हैं ———-

Hindus Couples Require At Least Three Children For Survival of Culture

From: Vishvapriya Vedanuragi < >

लघुकथा
एक माँ – एक बेटा 
गली में कुतिया ने नौ बच्चे दिए 
बेटा माँ से बोला :- माँ ! एक पिल्ले को मैं घर लेकर आऊं ?
माँ बोली :- नहीं बेटा ! 
बेटे ने पूछा :-क्यों?
माँ :- यदि तुमको कोई मेरे पास से अपने घर ले जाये तो मुझे कैसा लगेगा ?
बेटा :- हम्म ………ठीक है 
(थोड़ी देर बाद)
लेकिन माँ ! कुतिया के पास तो कई हैं 
माँ :- लेकिन मेरे पास तो एक ही है 
बेटा :- तो फिर हम “कई” क्यों नहीं ले आते 
माँ :- निरुत्तर , असहाय 
.
(कथा-सार :- कृपया यदि अब भी अवसर है तो एक से अधिक सन्तान करें,
एक सेना में (शस्त्र) के लिए दें, एक धर्म कार्य में (शास्त्र) के लिए दें 
और  एक अपने पास रखें 
तब ही जा कर वेद मन्त्र यजुर्वेद 20/25 सफल होगा |)

यजुर्वेद 20/25 :-
यत्र ब्रह्म च क्षत्रं च सम्यञ्चौ चरतः सह |
तं लोकं पुण्यं प्रज्ञेषं यत्र देवा: सहाग्निना || 
.
जिस राष्ट्र/समाज में ब्रह्म-शक्ति (ज्ञान/ब्राह्मण)और क्षत्र-शक्ति (बल/क्षत्रिय) दोनों समन्वित सुसंगठित हो, एक साथ चलती हों उसी राष्ट्र/समाज में पुण्यलोक = सुराष्ट्र व दर्शनीय जनसमाज निर्मित होता है | और जहाँ विद्वान अधिकारी शासकगण अपने नायक के साथ एकमत हो व्यवहार करते हैं |

सादर धन्यवाद
विदुषामनुचर 
विश्वप्रिय वेदानुरागी

वेदों में पर्यावरण विज्ञान

From: Vivek Arya < >

 

वेदों में पर्यावरण विज्ञान

लेखक- स्वर्गीय डॉ रामनाथ वेदालंकार
प्रस्तोता- प्रियांशु सेठ
सहयोगी- डॉ विवेक आर्य

(आज 5 जून “विश्व पर्यावरण दिवस” पर विशेष रूप से प्रकाशित)

वेद का सन्देश है कि मानव शुद्ध वायु में श्वास ले, शुद्ध जल को पान करे, शुद्ध अन्न का भोजन करे, शुद्ध मिट्टी में खेले-कूदे, शुद्ध भूमि में खेती करे। ऐसा होने पर ही उसे वेद-प्रतिपादित सौ वर्ष या सौ से भी अधिक वर्ष की आयु प्राप्त हो सकती है। परन्तु आज न केवल हमारे देश में, अपितु विदेशों में भी प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि मनुष्य को न शुद्ध वायु सुलभ है, न शुद्ध जल सुलभ है, न शुद्ध अन्न सुलभ है, न शुद्ध मिट्टी और शुद्ध भूमि सुलभ है। कल-कारखानों से निकले अपद्रव्य, धुओं, गैस, कूड़ा-कचरा, वन-विनाश आदि इस प्रदूषण के कारण हैं। प्रदूषण इस स्थिति तक पहुंच गया है कि कई स्थानों पर तेजाबी वर्षा तक हो रही है। 18 जुलाई, 1983 के दिन भारत के बम्बई शहर में तेजाबयुक्त वर्षा हो चुकी है। यदि प्रदूषण निरन्तर बढ़ता गया तो वह दिन दूर नहीं जब यह भूमि मानव तथा अन्य प्राणियों के निवासयोग्य नहीं रह जायेगी।
पर्यावरण-प्रदूषण की चिन्ताजनक स्थिति को देखकर 5 जून, 1972 को बारह संयुक्त राष्ट्रों की एक बैठक इस विषय पर विचार करने के लिए स्टाकहोम (स्वीडन) में आयोजित हुई थी, जिसके फलस्वरूप विभिन्न राष्ट्रों द्वारा पर्यावरण-सुरक्षा हेतु प्रभावशाली कदम उठाए गए। उक्त गोष्ठी में भारत की तीसरी प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने भी ‘पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति एवं उसका विश्व के भविष्य पर प्रभाव’ विषय पर भाषण दिया था। उसके पश्चात् भारत में पर्यावरण-प्रदूषण का अध्ययन करने, उसे रोकने के उपाय सुझाने एवं उनके क्रियान्वयन करने हेतु अनेक सरकारी तथा व्यक्तिगत या जनता की ओर से सामूहिक प्रयास होते रहे हैं तथा आज भी अनेक संस्थाएं इस दिशा में कार्यरत हैं। प्रस्तुत लेख में हम यह दर्शायेंगे कि वेद का पर्यावरण के सम्बन्ध में क्या विचार है!

  1. वायु- स्वच्छ वायुमण्डल का महत्त्व

स्वच्छ वायु का सेवन ही प्राणियों के लिए हितकर है यह बात वेद के निम्न मन्त्रों से प्रकट होते हैं-

वात आ वातु भेषजं शम्भु मयोभु नो हृदे।
प्र ण आयूंषि तारिषत्।। -ऋ० १०/१८६/१

वायु हमें ऐसा ओषध प्रदान करे, जो हमारे हृदय के लिए शांतिकर एवं आरोग्यकर हो, वायु हमारे आयु के दिनों को बढ़ाए।

यददो वात ते गृहेऽमृतस्य निधिर्हित:।
ततो नो देहि जीवसे।। -ऋ० १०/१८६/३

हे वायु! जो तेरे घर में अमृत की निधि रखी हुई है, उसमें से कुछ अंश हमें भी प्रदान कर, जिससे हम दीर्घजीवी हों।

यह वायु के अन्दर विद्यमान अमृत की निधि ओषजन या प्राणवायु है, जो हमें प्राण देती है तथा शारीरिक मलों को विनष्ट करती है। उक्त मन्त्रों से यह भी सूचित होता है कि प्रदूषित वायु में श्वास लेने से मनुष्य अल्पजीवी तथा स्वच्छ वायु में कार्बन-द्विओषिद की मात्रा कम तथा ओषजन की मात्रा अधिक होती है। उसमें श्वास लेने से हमें लाभ कैसे पहुंचता है, इसका वर्णन वेद के निम्नलिखित मन्त्रों में किया गया है-

द्वाविमौ वातौ वात आ सिन्धोरा परावत:।
दक्षं ते अन्य आ वातु परान्यो वातु यद्रप:।।
आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद्रप:।
त्वं हि विश्वभेषजो देवानां दूत ईयसे।। -ऋ० १०/१३७/२,३ अथर्व० ४/१३/२,३

ये श्वास-निःश्वास रूप दो वायुएँ चलती हैं, एक बाहर से फेफड़ों के रक्त-समुद्र तक और दूसरी फेफड़ों से बाहर के वायुमंडल तक। इनमें से पहली, हे मनुष्य तुझे बल प्राप्त कराए और दूसरी रक्त में जो दोष है उसे अपने साथ बाहर ले जाये। हे शुद्ध वायु, तू अपने साथ ओषध को ला। हे वायु, शरीर में जो मल है उसे तू बाहर निकाल। तू सब रोगों की दवा है, तू देवों का दूत होकर विचरता है।

वनस्पतियों द्वारा वायु-शोधन-

कार्बन-द्विओषिद की मात्रा आवश्यकता से अधिक बढ़ने पर वायु प्रदूषित हो जाता है। वैज्ञानिक लोग बताते हैं कि प्राणी ओषजन ग्रहण करते हैं तथा कार्बन-द्विओषिद छोड़ते हैं, किन्तु वनस्पतियां कार्बन-द्विओषिद ग्रहण करती हैं तथा ओषजन छोड़ती हैं। वनस्पतियों द्वारा ओषजन छोड़ने की यह प्रक्रिया प्रायः दिन में ही होती है, रात्रि में वे भी ओषजन ग्रहण करती तथा कार्बन-द्विओषिद छोड़ती हैं। पर कुछ वनस्पतियां ऐसी भी हैं जो रात्रि में भी ओषजन ही छोड़ती हैं। कार्बन-द्विओषिद को चूसने के कारण वनस्पतियां वायु-शोधन का कार्य करती हैं। वायु-प्रदूषण से बचाव के लिए सबसे कारगर उपाय वनस्पति-आरोपण है। वेद भगवन् का सन्देश है “वनस्पति वन आस्थापयध्वम् अर्थात् वन में वनस्पतियाँ उगाओ -ऋ० १०/१०१/११”। यदि वनस्पति को काटना भी पड़े तो ऐसे काटें कि उसमें सैकड़ों स्थानों पर फिर अंकुर फूट आएं। वेद का कथन है-

अयं हि त्वा स्वधितिस्तेतिजान: प्रणिनाय महते सौभगाय।
अतस्त्वं देव वनस्पते शतवल्शो विरोह, सहस्रवल्शा वि वयं रुहेम।। -यजु० ५/४३

हे वनस्पति, इस तेज कुल्हाड़े ने महान सौभाग्य के लिए तुझे काटा है, तू शतांकुर होती हुई बढ़, तेरा उपयोग करके हम सहस्रांकुर होते हुए वृद्धि को प्राप्त करें।

अथो त्वं दीर्घायुर्भूत्वा शतवल्शा विरोहतात्। -यजु० १२/१००

हे ओषधि, तू दीर्घायु होती हुई शत अंकुरों से बढ़।

वेद सूचित करता है कि सूर्य और भूमि से वनस्पतियां में मधु उत्पन्न होता है, जिससे वे हमारे लिए लाभदायक होती हैं-

मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ अस्तु सूर्य्य:।
माध्वीर्गावो भवन्तु न:।। -यजु० १३/२९

वनस्पति हमारे लिए मधुमान हो, सूर्य हमारे लिए मधुमान् हो, भूमियाँ हमारे लिए मधुमती हों।

फूलों-फलों से लदी हुई ओषधियां नित्य भूमि पर लहलहाती रहें, ऐसा वर्णन भी वेद में मिलता है- “ओषधी: प्रतिमोदध्वं पुष्पवती: प्रसूवरी: -ऋ० १०/९७/३”। वेद यह भी कहता है “मधुमन्मूलं मधुमदग्रमासां मधुमन्मध्यं वीरुधां बभूव। मधुमत्पर्णं मधुमत्पुष्पमासां अर्थात् ओषधियों का मूल, मध्य, अग्र, पत्ते, फूल सभी कुछ मधुमय हों -अथर्व० ८/७/१२”।

वेद मनुष्य को प्रेरित करता है “मापो मौषधीहिंसी: अर्थात् तू जलों की हिंसा मत कर, ओषधियों की हिंसा मत कर -यजु० ६/२२”। जलों की हिंसा से अभिप्राय है उन्हें प्रदूषित करना तथा ओषधियों की हिंसा का तात्पर्य है उन्हें विनष्ट करना।

अथर्ववेद के एक मन्त्र में ओषधियों के पांच वर्ग बताए गए हैं तथा यह भी कहा गया है कि ये हमें प्रदूषण (अहंस्) से छुड़ाए-

पञ्च राज्यानि वीरूधां सोमश्रेष्ठानि ब्रूम:।
दर्भो भङ्गो यव: सहस्ते नो मुञ्चन्त्वंहस:।। -अथर्व० ११/६/१५

‘सोम, दर्भ, भंग, यव, सहस्’ आदि ओषधियों का ज्ञानपूर्वक प्रयोग करते हुए हम रोगों का समूल विनाश करते हैं।

वेद में घरों के समीप कमल-पुष्पों से अलंकृत छोटे-छोटे सरोवर बनाने का विधान मिलता है- उप त्वा तिष्ठन्तु पुष्करिणी: समन्ता: -अथर्व ४/३४/५,-७। फव्वारों का विधान इस हेतु किया गया प्रतीत होता है कि ऊपर उठती तथा चतुर्दिक् फैलती जल-धाराओं पर जब सूर्य-किरणें पड़ती हैं, तब उनमें प्रदूषण को हरने की विशेष शक्ति आ जाती है।

अथर्ववेद के भूमिसूक्त में भूमि को कहा गया है, “अरण्यं ते पृथिवी स्योनमस्तु अर्थात् तेरे जंगल हमारे लिए सुखदाई हों। -अथर्व० १२/१/११,१७”।

  1. शुद्ध जलों का महत्त्व

वेद का कथन है “अप्स्वन्तरमृतम् अप्सु भेषजम् अर्थात् शुद्ध जलों के अन्दर अमृत होता है, ओषध का निवास रहता है -ऋ० १/२३/१९”। “आपो अद्यान्वचारिषं रसेन समगस्महि अर्थात् शुद्ध जल के सेवन से मनुष्य रसवान् हो जाता है -ऋ० १/२३/२३”। “उर्जं वहन्तीरमृतं घृतं पय: कीलालं परिस्त्रुतम् अर्थात् शुद्ध जलों में ऊर्जा, अमृत, तेज एवं पोषक रस का निवास होता है -यजु० २/३४”। “शुद्ध जल पान किये जाने पर पेट के अंदर पहुंचकर पाचन-क्रिया को तीव्र करते हैं। वे दिव्यगुणयुक्त, अमृतमय, स्वादिष्ट जल रोग न लानेवाले, रोगों को दूर करनेवाले, शरीर के प्रदूषण को दूर करनेवाले तथा जीवन-यज्ञ को बढ़ानेवाले होते हैं -यजु० ४/१२”।

आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन।
महे रणाय चक्षसे।। -ऋ० १०/९/१

शुद्ध जल आरोग्यदायक होते हैं, शरीर में ऊर्जा उत्पन्न करते हैं, वृद्धि प्रदान करते हैं, कण्ठस्वर को ठीक करते हैं तथा दृष्टि-शक्ति बढ़ाते हैं।

शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।
शं योरभि स्त्रवन्तु न:।। -ऋ० १०/९/४

शुद्ध जलों का पान करके एवं उन्हें अपने चारों ओर बहाकर अर्थात् उनमें डुबकी लगाकर या कटि-स्नान करके हम अपना स्वास्थ्यरूप अभीष्ट प्राप्त कर सकते हैं।

जलों के प्रकार-

वेदों में जल कई प्रकार के वर्णित किये गए हैं और उनके सम्बन्ध में यह कहा गया है कि वे सबके लिए प्रदूषणशामक एवं रोगशामक हों:

शं त आपो हैमवती: शमु ते सन्तूत्स्या:।
शं ते सनिष्यदा आप: शमु ते सन्तु वर्ष्या:।।
शं त आपो धन्वन्या: शं ते सन्त्वनूष्या:।
शं ते खनित्रिमा आप: शं या: कुम्भेभिराभृता:।। -अथर्व० १९/२/१-२

इन मन्त्रों में जलों के निम्नलिखित प्रकारों का उल्लेख हुआ है:

१. हिमालय के जल (हेमवती: आप:)- ये हिमालय पर बर्फ-रूप में रहते हैं अथवा चट्टानों के बीच में बने कुंडों में भरे रहते हैं, अथवा पहाड़ी झरनों के रूप में झरते रहते हैं।

२. स्त्रोतों के जल (उत्स्या: आप:)- ये पहाड़ी या मैदानी भूमि को फोड़कर चश्मों के रूप में निकलते हैं। कई चश्मों में गन्धक होता है, गन्धक का एक चश्म देहरादून के समीप सहस्रधारा में है।

३. सदा बहते रहनेवाले जल (सनिष्यदा: आप:)- ये सदा बहते रहने के कारण अधिक प्रदूषित नहीं हो पाते हैं।

४. वर्षाजल (वर्ष्या: आप:)- वर्षा से मिलनेवाले जल शुद्धि तथा ओषधि-वनस्पतियों एवं प्राणियों को जीवन देनेवाले होते हैं। अथर्ववेद के प्राण-सूक्त (११/४/५) में कहा है कि जब वर्षा के द्वारा प्राण पृथिवी पर बरसता है तब सब प्राणी प्रमुदित होने लगते हैं।

५. मरुस्थलों के जल (धन्वन्या: आप:)- मरुस्थलों की रेती में अभ्रक, लोहा आदि पाए जाते हैं, उनके सम्पर्क से वहां के जलों में भी ये पदार्थ विद्यमान होते हैं।

६. आर्द्र प्रदेशों के जल (अनूप्या: आप:)- जहां जल की बहुतायत होती है वे प्रदेश अनूप कहलाते हैं, तथा उन प्रदेशों में होनेवाले जल अनूप्य। यहां के जल कृमि-दूषित भी हो सकते हैं।

७. भूमि खोदकर प्राप्त किये जल (खनित्रिमा: आप:)- कुएं, हाथ के नलों आदि के जल इस कोटि में आते हैं।

८. घड़ों में रखे जल (कुम्भेभि: आभृता: आप:)- घड़े विभिन्न प्रकार की मिट्टी के तथा सोना, चांदी, तांबा आदि धातुओं के भी हो सकते हैं।

जल-शोधन-

जलों को प्रदूषित न होने देने तथा प्रदूषित जलों को शुद्ध करने के कुछ उपायों का संकेत भी वेदों में मिलता है।

यासु राजा वरुणो यासु सोमो विश्वेदेवा यासूर्जं मदन्ति।
वैश्वानरो यास्वग्नि: प्रविष्टस्ता आपो देवीरिह मामवन्तु।। -ऋ० ७/४९/४

वे दिव्य जल हमारे लिए सुखदायक हों, जिनमें वरुण, सोम, विश्वेदेवा: तथा वैश्वानर अग्नि प्रविष्ट हैं।

यहां वरुण शुद्ध वायु या कोई जलशोधक गैस है, सोम चन्द्रमा या सोमलता है, विश्वेदेवा: सूर्यकिरणें हैं तथा वैश्वानर अग्नि सामान्य आग या विद्युत् है।

ऋग्वेद में लिखा है “यन्नदीषु यदोषधीभ्य: परि जायते विषम्। विश्वेदेवा निरितस्तत्सुवन्तु अर्थात् यदि नदियों में विष उत्पन्न हो गया है तो सब विद्वान् जन मिलकर उसे दूर कर लें -ऋ० ७/५०/३”।

  1. भूमि

भूमि को वेद में माता कहा गया है “माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या: -अथर्व० १२/१/१२”, “उपहूता पृथिवी माता -यजु० २/१०”। वेद कहता है-
यस्यामाप: परिचरा: समानीरहोरात्रे अप्रमादं क्षरन्ति।
सा नो भूमिर्भूरिधारा पयो दुहामथो उक्षतु वर्चसा।। -अथर्व० १२/१/९

जिस भूमि की सेवा करनेवाली नदियां दिन-रात समान रूप से बिना प्रमाद के बहती रहती हैं वह भूरिधारा भूमिरुप गौ माता हमें अपना जलधार-रूप दूध सदा देती रहें।

भूमि की हिंसा न करें

वेद मनुष्य को प्रेरित करते हुए कहता है “पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृंह, पृथिवीं मा हिंसी: अर्थात् तू उत्कृष्ट खाद आदि के द्वारा भूमि को पोषक तत्त्व प्रदान कर, भूमि को दृढ़ कर, भूमि की हिंसा मत कर”। भूमि की हिंसा करने का अभिप्राय है उसके पोषक तत्वों को लगातार फसलों द्वारा इतना अधिक खींच लेना कि फिर वह उपजाऊ न रहे। भूमि पोषकतत्त्वविहीन न हो जाये एतदर्थ एक ही भूमि में बार-बार एक ही फसल को न लगाकर विभिन्न फसलों को अदल-बदलकर लगाना, उचित विधि से पुष्टिकर खाद देना आदि उपाय हैं। आजकल कई रासायनिक खाद ऐसे चल पड़े हैं, जो भूमि की उपजाऊ-शक्ति को चूस लेते हैं या भूमि की मिट्टी को दूषित कर देते हैं।

भूमि में या भूतल की मिट्टी में यदि कोई कमी आ जाये तो उस कमी को पूर्ण किये जाने की ओर भी वेद ने ध्यान दिलाया है “यत्त ऊनं तत्त आ पूरयाति प्रजापति: प्रथमजा ऋतस्य अर्थात् प्रजापति राजा विभिन्न उपायों द्वारा उस कमी को पूरा करे -अथर्व० १२/१/६१”। यजुर्वेद के एक मन्त्र में कहा गया है “सं ते वायुर्मातरिश्वा दधातु उत्तानाया हृदयं यद् विकस्तम् अर्थात् उत्तान लेटी हुई भूमि का हृदय यदि क्षतिग्रस्त हो गया है तो मातरिश्वा वायु उसमें पुनः शक्ति-संधान कर दे -यजु० ११/३९”। मातरिश्वा वायु का अर्थ है अंतरिक्षसंचारी पवन, जो जल, तेज आदि अन्य प्राकृतिक तत्त्वों का भी उपलक्षक है। परन्तु यदि जल, वायु आदि ही प्रदूषित हो गए हों तो उनसे भूमि की क्षति-पूर्ति कैसे हो सकेगी?

  1. अग्निहोत्र द्वारा पर्यावरण-शोधन

वैदिक संस्कृति में अग्निहोत्र या यज्ञ का बहुत महत्त्व है। प्रत्येक गृहस्थ एवं वानप्रस्थ के करने योग्य पंच यज्ञों में अग्निहोत्र का भी स्थान है, जिसे देवयज्ञ कहा जाता है। अग्निहोत्र यज्ञाग्नि में शुद्ध घृत एवं सुगन्धित, वायुशोधक, रोगनिवारक पदार्थों की आहुति द्वारा सम्पन्न किया जाता है। एक अग्निहोत्र वह है जो धार्मिक विधि-विधानों के साथ मन्त्रपाठपूर्वक होता है, दूसरे उसे भी अग्निहोत्र कह सकते हैं जिसमें मन्त्रपाठ आदि न करके विशुद्ध वैज्ञानिक या चिकित्साशास्त्रीय दृष्टि से अग्नि में वायुशोधक या रोगकृमिनाशक पदार्थों का होम किया जाता है। आयुर्वेद के चरक, बृहन्निघन्टुरत्नाकर, योगरत्नाकर, गदनिग्रह आदि ग्रन्थों में ऐसे कई योग वर्णित हैं, जिनकी आहुति अग्नि में देने से वायुमण्डल शुद्ध होता है तथा श्वास द्वारा धूनी अन्दर लेने से रोग दूर होते हैं। वेद में अनेक स्थानों पर अग्नि को पावक, अमीवचातन, पावकशोचिष्, सपत्नदंभन आदि विशेषणों से विशेषित करके उसकी शोधकता प्रदर्शित की गई है। यज्ञ का फल चतुर्दिक् फैलता है (यज्ञस्य दोहो वितत: पुरुत्रा) -यजु० ८/६२। अग्निहोत्र ओषध का काम करता है (अग्निष्कृणोतु भेषजम्) -अथर्व० ६/१०६/३। अग्निहोत्र से शरीर की न्यूनता पूर्ण होती है (अग्ने यन्मे तत्त्वा ऊनं तन्म आपृण) -यजु० ३/१७। अग्नि वायुमण्डल से समस्त दूषक तत्त्वों का उन्मूलन करता है (अग्निर्वृत्राणि दयते पुरुणि) -ऋ० १०/८०/२। वेद मनुष्यों को आदेश देता है “आ जुहोता हविषा मर्जयध्वम् अर्थात् तुम अग्नि में शोधक द्रव्यों की आहुति देकर वायुमण्डल को शुद्ध करो -साम० ६३”।

अग्निहोत्र की अवश्यकर्तव्यता की ओर संकेत करते हुए वेद कहते हैं-

स्वाहा यज्ञं कृणोतन अर्थात् स्वाहापूर्वक यज्ञ करो -ऋ० १/१३/१२, सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन अर्थात् सुसमिद्ध अग्निज्वाला पर पिघले घी की आहुति दो -यजु० ३/२, अग्निमिन्धीत मर्त्य: अर्थात् मनुष्य को चाहिए कि वह अग्नि प्रज्वलित करे -साम० ८२, सम्यञ्चोऽग्निं सपर्यत अर्थात् सब मिलकर अग्निहोत्र किया करो -अथर्व० ३/३०/६।

सायं सायं गृहपतिर्नो अग्नि: प्रातः प्रातः सौमनसस्य दाता।
प्रातः प्रातः गृहपतिर्नो अग्नि: सायं सायं सौमनसस्य दाता।। -अथर्व० १९/५५/३-४

अग्निहोत्र का समय सायं और प्रातः है। सायं किया हुआ अग्निहोत्र प्रातःकाल तक वायुमण्डल को प्रभावित करता रहता है और प्रातः किये गए अग्निहोत्र का प्रभाव सायंकाल तक वायुमण्डल पर पड़ता है।

सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम्।
दैवीं नावं स्वरित्रामनागसमस्त्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये।। -यजु० २१/६

अग्निहोत्र ऐसी विशाल, दिव्य, दीप्तिमयी, निश्छिद्र, कल्याणदायिनी, अखण्डित, निश्चित रूप से आगे ले जानेवाली, विधिविधानरूप सुन्दर चप्पुओं वाली, निर्दोष, न चूनेवाली नौका है जो सदा यजमान की रक्षा ही करती है।

आयुर्यज्ञेन कल्पतां, प्राणो यज्ञेन कल्पतां, चक्षुर्यज्ञेन कल्पतां,
श्रोत्रंयज्ञेन कल्पतां, वाग् यज्ञेन कल्पतां, मनो यज्ञेन कल्पतामात्मा यज्ञेन कल्पताम्।। -यजु० १८/२९

अग्निहोत्र-रूप यज्ञ से आयु बढ़ती है, प्राण सबल होता है, चक्षु सशक्त होती है, श्रोत्र और वाणी सामर्थ्ययुक्त होते हैं, मन और आत्मा बलवान् बनते हैं।

ऋग्वेद में कहा है- सो अग्ने धत्ते सुवीर्यं स पुष्यति अर्थात् जो अग्निहोत्र करता है उसे सुवीर्य प्राप्त होता है, वह पुष्ट होता है -ऋ० ३/१०/३।

  1. आंधी, वर्षा और सूर्य द्वारा पर्यावरण-शोधन

प्राकृतिक रूप से आंधी, वर्षा और सूर्य द्वारा कुछ अंशों में स्वतः प्रदूषण-निवारण होता रहता है।

वातस्य नु महिमानं रथस्य रुजन्नेति स्तनयन्नस्य घोष:।
दिविस्पृग् यात्यरुणानि कृण्वन्नुतो एति पृथिव्या रेणुमस्यन्।। -ऋ० १०/१६८/१

वायु-रथ की महिमा को देखो। यह बाधाओं को तोड़ता-फोड़ता हुआ चला आ रहा है। कैसा गरजता हुआ इसका घोष है! आकाश को छूता हुआ, दिक्प्रांतों को लाल करता हुआ, भूमि की धूल को उड़ाता हुआ वेग से जा रहा है।

मानसून पवन रूप मरुत् मेह बरसाते हैं – वपन्ति मरुतो मिहम् -ऋ० ८/७/४। ये वर्षा द्वारा प्रदूषण को दूर करते हैं।

आ पर्जन्यस्य वृष्ट्योदस्थामामृता वयम्।
व्यहं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा।। -अथर्व० ३/३१/१

बदल की वृष्टि से हम उत्कृष्ट स्थिति को पा लेते हैं, सब पेड़-पौधे, पर्वत, भूप्रदेश धुलकर स्वच्छ हो जाते हैं, रोग दूर हो जाते हैं, प्राणियों की आयु लम्बी हो जाती है।

उभाम्यां देव सवित: पवित्रेण सवेन च।
मां पुनीहि विश्वत:।। -यजु० १९/४३

प्रकृति में सूर्य भी प्रदूषण का निवारक है। वह अपने रश्मिजाल से तथा अपने द्वारा की जानेवाली वर्षा से पवित्रता प्रदान करता है।

येन सूर्य ज्योतिषा बाधसे तमो जगच्च विश्वमुदियर्षि भानुना।
तेनास्मद् विश्वामनिरामनाहुतिमपामीवामप दुष्वप्न्यं सुव।। -ऋ० १०/३७/४

सूर्य अपनी ज्योति से अन्धकार को बांधता है, समस्त अन्नाभाव को, अन्नाहुति को, रोग को और दुःस्वप्न को दूर करता है।

वेद में कहा है “सा घा नो देवः सविता साविषदमृतानि भूरि अर्थात् सूर्य अमृत बरसाता है -अथर्व० ६/१/३”, “सूर्य यत् ते तपस्तेन तं प्रति तप। योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्म: अर्थात् हे सूर्य, जो तेरा ताप है उससे तू उसे तपा डाल जो हमसे द्वेष करता है और जिससे हम द्वेष करते हैं -अथर्व० २/२१/१”।

अंत में उपसंहार-रूप में हम कह सकते हैं कि वायु, जल, भूमि, आकाश, अन्न आदि पर्यावरण के सभी पदार्थों की शुद्धि के लिए वेद भगवन् हमें जागरूक करते हैं तथा आई हुई अस्वच्छता को दूर करने का आदेश देते हैं। पर्यावरण की शुद्धि के लिए वेद भगवन् वनस्पति उगाना, अग्निहोत्र करना, विद्युत, अग्नि, सूर्य एवं ओषधियों का उपयोग करना आदि उपायों को सुझाते हैं।

।।आओ लौटें वेदों की ओर।।


 

Hindus, Know Thy Enemy

From: hitaya < >
———- Forwarded message ———-
From: VSK Chennai <vskutn@gmail.com>
Date: Wed, May 23, 2018 at 11:12 AM
Subject: {UnitedHinduFront}

RSS Statement by Dr, Manmohan Vaidya, National Joint Secretary

Statement by Dr. ManmohanVaidya, Sah Sarkaryavah
on the irresponsible utterings of Sri Rahul Gandhi naming the RSS for violence in Tamilnadu
and the unfortunate firing in Thoothukudi.
Highly condemning this, RSS National Joint Secretary Dr. Manmohan Vaidya has stated that, “RSS is tirelessly working for unifying the people of Bharat rising above the caste, regional and religious identities to work in the interest of the nation. The political parties playing divisive politics are being rejected by the people of Bharat. Frustrated Congress and it’s President Rahul Gandhi are trying to create more divisions in the society to regain their lost support”.
We request you to kindly publish the above statement in your esteemed dailies and magazines.

VANDE MATARAM
——————————————
12, M V NAIDU STREET,
CHETPUT,
CHENNAI – 600 031
VISIT: https://rsschennai.blogspot.in/
——————————
————–
==