कुरान – इस्लाम – मुसलमान – इंसानियत का अपमान

From: Kumar Arun < >

~~~~कुरान – इस्लाम – मुसलमान – इंसानियत का अपमान~~~
     बलात्कार का आरम्भ –इतिहास के अनुसार –इस्लाम (कुरान) की देन है
आखिर भारत जैसे देवियों को पूजने वाले देश में बलात्कार की गन्दी मानसिकता कहाँ से आयी? आखिर क्या बात है कि जब प्राचीन भारत के रामायण, महाभारत आदि लगभग सभी हिन्दू-ग्रंथ के उल्लेखों में अनेकों लड़ाईयाँ लड़ी और जीती गयीं, परन्तु विजेता सेना द्वारा किसी भी स्त्री का बलात्कार होने का जिक्र नहीं है।
तब आखिर ऐसा क्या हो गया ?? कि आज के आधुनिक भारत में बलात्कार, रोज की सामान्य बात बन कर रह गयी है??
प्रभु श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त की, पर न ही उन्होंने और न उनकी सेना ने पराजित लंका की स्त्रियों को हाथ लगाया । महाभारत में पांडवों की जीत हुयी लाखों की संख्या में योद्धा मारे गए। पर किसी भी पांडव सैनिक ने किसी भी कौरव सेना की विधवा स्त्रियों को हाथ तक नहीं लगाया।
अब आते हैं ईसापूर्व इतिहास में-
220-175 ईसापूर्व में यूनान के शासक “डेमेट्रियस प्रथम” ने भारत पर आक्रमण किया। 183 ईसापूर्व के लगभग उसने पंजाब को जीतकर साकल को अपनी राजधानी बनाया और पंजाब सहित सिन्ध पर भी राज किया। लेकिन उसके पूरे समयकाल में बलात्कार का कोई जिक्र नहीं।
इसके बाद “युक्रेटीदस” भी भारत की ओर बढ़ा और कुछ भागों को जीतकर उसने “तक्षशिला” को अपनी राजधानी बनाया। बलात्कार का कोई जिक्र नहीं।
“डेमेट्रियस” के वंश के मीनेंडर (ईपू 160-120) ने नौवें बौद्ध शासक “वृहद्रथ” को पराजित कर सिन्धु के पार पंजाब और स्वात घाटी से लेकर मथुरा तक राज किया परन्तु उसके शासनकाल में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं मिलता।
“सिकंदर” ने भारत पर लगभग 326-327 ई .पू आक्रमण किया जिसमें हजारों सैनिक मारे गए । इसमें युद्ध जीतने के बाद भी राजा “पुरु” की बहादुरी से प्रभावित होकर सिकंदर ने जीता हुआ राज्य पुरु को वापस दे दिया और “बेबिलोन” वापस चला गया।
विजेता होने के बाद भी “यूनानियों” (यवनों) की सेनाओं ने किसी भी भारतीय महिला के साथ बलात्कार नहीं किया और न ही “धर्म परिवर्तन” करवाया।
इसके बाद “शकों” ने भारत पर आक्रमण किया (जिन्होंने ई.78 से शक संवत शुरू किया था)। “सिन्ध” नदी के तट पर स्थित “मीननगर” को उन्होंने अपनी राजधानी बनाकर गुजरात क्षेत्र के सौराष्ट्र , अवंतिका, उज्जयिनी, गंधार, सिन्ध, मथुरा समेत महाराष्ट्र के बहुत बड़े भू भाग पर 130 ईस्वी से 188 ईस्वी तक शासन किया। परन्तु इनके राज्य में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं।
इसके बाद तिब्बत के “युइशि” (यूची) कबीले की लड़ाकू प्रजाति “कुषाणों” ने “काबुल” और “कंधार” पर अपना अधिकार कायम कर लिया। जिसमें “कनिष्क प्रथम” (127-140ई.) नाम का सबसे शक्तिशाली सम्राट हुआ। जिसका राज्य “कश्मीर से उत्तरी सिन्ध” तथा “पेशावर से सारनाथ” के आगे तक फैला था। कुषाणों ने भी भारत पर लम्बे समय तक विभिन्न क्षेत्रों में शासन किया। परन्तु इतिहास में कहीं नहीं लिखा कि इन्होंने भारतीय स्त्रियों का बलात्कार किया हो ।
इसके बाद “अफगानिस्तान” से होते हुए भारत तक आये “हूणों” ने 520 AD के समयकाल में भारत पर अधिसंख्य बड़े आक्रमण किए और यहाँ पर राज भी किया। ये क्रूर तो थे परन्तु बलात्कारी होने का कलंक इन पर भी नहीं लगा।
इन सबके अलावा भारतीय इतिहास के हजारों साल के इतिहास में और भी कई आक्रमणकारी आये जिन्होंने भारत में बहुत मार काट मचाई जैसे “नेपालवंशी” “शक्य” आदि। पर बलात्कार शब्द भारत में तब तक शायद ही किसी को पता था।
अब आते हैं मध्यकालीन भारत में, जहाँ से शुरू होता है इस्लामी आक्रमण और यहीं से शुरू होता है भारत में बलात्कार का प्रचलन-
सबसे पहले 711 ईस्वी में “मुहम्मद बिन कासिम” ने सिंध पर हमला करके राजा “दाहिर” को हराने के बाद उसकी दोनों “बेटियों” को “यौनदासियों” के रूप में “खलीफा” को तोहफा भेज दिया।
तब शायद भारत की स्त्रियों का पहली बार बलात्कार जैसे कुकर्म से सामना हुआ जिसमें “हारे हुए राजा की बेटियों” और “साधारण भारतीय स्त्रियों” का “जीती हुयी इस्लामी सेना” द्वारा बुरी तरह से बलात्कार और अपहरण किया गया।
फिर आया 1001 इस्वी में “गजनवी”। इसके बारे में ये कहा जाता है कि इसने “इस्लाम को फैलाने” के उद्देश्य से ही आक्रमण किया था।
“सोमनाथ के मंदिर” को तोड़ने के बाद इसकी सेना ने हजारों “काफिर औरतों” का बलात्कार किया फिर उनको अफगानिस्तान ले जाकर “बाजारों में बोलियाँ” लगाकर “जानवरों” की तरह “बेच” दिया ।
फिर “गौरी” ने 1192 में “पृथ्वीराज चौहान” को हराने के बाद भारत में “इस्लाम का प्रकाश” फैलाने के लिए “हजारों काफिरों” को मौत के घाट उतर दिया और उसकी “फौज” ने “अनगिनत हिन्दू स्त्रियों” के साथ बलात्कार कर उनका “धर्म-परिवर्तन” करवाया।
ये विदेशी मुस्लिम अपने साथ औरतों को लेकर नहीं आए थे।
मुहम्मद बिन कासिम से लेकर सुबुक्तगीन, बख्तियार खिलजी, जूना खाँ उर्फ अलाउद्दीन खिलजी, फिरोजशाह, तैमूरलंग, आरामशाह, इल्तुतमिश, रुकुनुद्दीन फिरोजशाह, मुइजुद्दीन बहरामशाह, अलाउद्दीन मसूद, नसीरुद्दीन महमूद, गयासुद्दीन बलबन, जलालुद्दीन खिलजी, शिहाबुद्दीन उमर खिलजी, कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी, नसरत शाह तुगलक, महमूद तुगलक, खिज्र खां, मुबारक शाह, मुहम्मद शाह, अलाउद्दीन आलम शाह, बहलोल लोदी, सिकंदर शाह लोदी, बाबर, नूरुद्दीन सलीम जहांगीर।
अपने हरम में “8000 रखैलें रखने वाला शाहजहाँ”।
इसके आगे अपने ही दरबारियों और कमजोर मुसलमानों की औरतों से अय्याशी करने के लिए “मीना बाजार” लगवाने वाला “जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर”।
मुहीउद्दीन मुहम्मद से लेकर औरंगजेब तक बलात्कारियों की ये सूची बहुत लम्बी है। जिनकी फौजों ने हारे हुए राज्य की लाखों “काफिर महिलाओं” “(माल-ए-गनीमत)” का बेरहमी से बलात्कार किया और “जेहाद के इनाम” के तौर पर कभी वस्तुओं की तरह “सिपहसालारों” में बांटा तो कभी बाजारों में “जानवरों की तरह उनकी कीमत लगायी” गई।
ये असहाय और बेबस महिलाएं “हरमों” से लेकर “वेश्यालयों” तक में पहुँची। इनकी संतानें भी हुईं पर वो अपने मूलधर्म में कभी वापस नहीं पहुँच पायीं।
एकबार फिर से बता दूँ कि मुस्लिम “आक्रमणकारी” अपने साथ “औरतों” को लेकर नहीं आए थे।
वास्तव में मध्यकालीन भारत में मुगलों द्वारा “पराजित काफिर स्त्रियों का बलात्कार” करना एक आम बात थी क्योंकि वो इसे “अपनी जीत” या “जिहाद का इनाम” (माल-ए-गनीमत) मानते थे।
केवल यही नहीं इन सुल्तानों द्वारा किये अत्याचारों और असंख्य बलात्कारों के बारे में आज के किसी इतिहासकार ने नहीं लिखा।
बल्कि खुद इन्हीं सुल्तानों के साथ रहने वाले लेखकों ने बड़े ही शान से अपनी कलम चलायीं और बड़े घमण्ड से अपने मालिकों द्वारा काफिरों को सबक सिखाने का विस्तृत वर्णन किया।
गूगल के कुछ लिंक्स पर क्लिक करके हिन्दुओं और हिन्दू महिलाओं पर हुए “दिल दहला” देने वाले अत्याचारों के बारे में विस्तार से जान पाएँगे। वो भी पूरे सबूतों के साथ।
इनके सैकड़ों वर्षों के खूनी शासनकाल में भारत की हिन्दू जनता अपनी महिलाओं का सम्मान बचाने के लिए देश के एक कोने से दूसरे कोने तक भागती और बसती रहीं।
इन मुस्लिम बलात्कारियों से सम्मान-रक्षा के लिए हजारों की संख्या में हिन्दू महिलाओं ने स्वयं को जौहर की ज्वाला में जलाकर भस्म कर लिया।
ठीक इसी काल में कभी स्वच्छंद विचरण करने वाली भारतवर्ष की हिन्दू महिलाओं को भी मुस्लिम सैनिकों की दृष्टि से बचाने के लिए पर्दा-प्रथा की शुरूआत हुई।
महिलाओं पर अत्याचार और बलात्कार का इतना घिनौना स्वरूप तो 17वीं शताब्दी के प्रारंभ से लेकर 1947 तक अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में भी नहीं दिखीं। अंग्रेजों ने भारत को बहुत लूटा परन्तु बलात्कारियों में वे नहीं गिने जाते।
1946 में मुहम्मद अली जिन्ना के डायरेक्टर एक्शन प्लान, 1947 विभाजन के दंगों से लेकर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम तक तो लाखों काफिर महिलाओं का बलात्कार हुआ या फिर उनका अपहरण हो गया। फिर वो कभी नहीं मिलीं।
इस दौरान स्थिती ऐसी हो गयी थी कि “पाकिस्तान समर्थित मुस्लिम बहुल इलाकों” से “बलात्कार” किये बिना एक भी “काफिर स्त्री” वहां से वापस नहीं आ सकती थी।
जो स्त्रियाँ वहाँ से जिन्दा वापस आ भी गयीं वो अपनी जांच करवाने से डरती थी।
जब डॉक्टर पूछते क्यों तब ज्यादातर महिलाओं का एक ही जवाब होता था कि “हमपर कितने लोगों ने बलात्कार किये हैं ये हमें भी पता नहीं”।
विभाजन के समय पाकिस्तान के कई स्थानों में सड़कों पर काफिर स्त्रियों की “नग्न यात्राएं (धिंड) “निकाली गयीं, “बाज़ार सजाकर उनकी बोलियाँ लगायी गयीं” और 10 लाख से ज्यादा की संख्या में उनको दासियों की तरह खरीदा बेचा गया।
20 लाख से ज्यादा महिलाओं को जबरन मुस्लिम बना कर अपने घरों में रखा गया। (देखें फिल्म “पिंजर” और पढ़ें पूरा सच्चा इतिहास गूगल पर)।
महत्वपूर्ण यह है कि इस विभाजन के दौर में हिन्दुओं को मारने वाले सबके सब विदेशी नहीं थे। इन्हें मारने वाले स्थानीय मुस्लिम भी थे।
वे समूहों में कत्ल से पहले हिन्दुओं के अंग-भंग करना, आंखें निकालना, नाखुन खींचना, बाल नोचना, जिंदा जलाना, चमड़ी खींचना खासकर महिलाओं का बलात्कार करने के बाद उनके “स्तनों को काटकर” तड़पा-तड़पा कर मारना आम बात थी।
अंत में कश्मीर की बात 19 जनवरी 1990
सारे कश्मीरी पंडितों के घर के दरवाजों पर नोट लगा दिया जिसमें लिखा था “या तो मुस्लिम बन जाओ या मरने के लिए तैयार हो जाओ या फिर कश्मीर छोड़कर भाग जाओ लेकिन अपनी औरतों को यहीं छोड़कर “।
लखनऊ में विस्थापित जीवन जी रहे कश्मीरी पण्डित संजय बहादुर उस मंजर को याद करते हुए आज भी सिहर जाते हैं।
वह कहते हैं कि “मस्जिदों के लाउडस्पीकर” लगातार तीन दिन तक यही आवाज दे रहे थे कि यहां क्या चलेगा, “निजाम-ए-मुस्तफा”, ‘आजादी का मतलब क्या “ला इलाहा इलल्लाह”, ‘कश्मीर में अगर रहना है, “अल्लाह-ओ-अकबर” कहना है।
और ‘असि गच्ची पाकिस्तान, बताओ “रोअस ते बतानेव सान” जिसका मतलब था कि हमें यहां अपना पाकिस्तान बनाना है, कश्मीरी पंडितों के बिना मगर कश्मीरी पंडित महिलाओं के साथ।
सदियों का भाईचारा कुछ ही समय में समाप्त हो गया जहाँ पंडितों से ही तालीम हासिल किए लोग उनकी ही महिलाओं की अस्मत लूटने को तैयार हो गए थे।
सारे कश्मीर की मस्जिदों में एक टेप चलाया गया।जिसमें मुस्लिमों को कहा गया की वो हिन्दुओं को कश्मीर से निकाल बाहर करें। उसके बाद कश्मीरी मुस्लिम सड़कों पर उतर आये।
उन्होंने कश्मीरी पंडितों के घरों को जला दिया, कश्मीर पंडित महिलाओ का बलात्कार करके, फिर उनकी हत्या करके उनके “नग्न शरीर को पेड़ पर लटका दिया गया”।
कुछ महिलाओं को बलात्कार कर जिन्दा जला दिया गया और बाकियों को लोहे के गरम सलाखों से मार दिया गया।
कश्मीरी पंडित नर्स जो श्रीनगर के सौर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में काम करती थी, का सामूहिक बलात्कार किया गया और मार मार कर उसकी हत्या कर दी गयी।
बच्चों को उनकी माँओं के सामने स्टील के तार से गला घोंटकर मार दिया गया।
कश्मीरी काफिर महिलाएँ पहाड़ों की गहरी घाटियों और भागने का रास्ता न मिलने पर ऊंचे मकानों की छतों से कूद कूद कर जान देने लगी।
लेखक राहुल पंडिता उस समय 14 वर्ष के थे। बाहर माहौल खराब था। मस्जिदों से उनके ख़िलाफ़ नारे लग रहे थे। पीढ़ियों से उनके भाईचारे से रह रहे पड़ोसी ही कह रहे थे, ‘मुसलमान बनकर आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो या वादी छोड़कर भागो’।
राहुल पंडिता के परिवार ने तीन महीने इस उम्मीद में काटे कि शायद माहौल सुधर जाए। राहुल आगे कहते हैं, “कुछ लड़के जिनके साथ हम बचपन से क्रिकेट खेला करते थे वही हमारे घर के बाहर पंडितों के ख़ाली घरों को आपस में बांटने की बातें कर रहे थे और हमारी लड़कियों के बारे में गंदी बातें कह रहे थे। ये बातें मेरे जहन में अब भी ताजा हैं।
1989 में कश्मीर में जिहाद के लिए गठित जमात-ए-इस्लामी संगठन का नारा था- ‘हम सब एक, तुम भागो या मरो’।
घाटी में कई कश्मीरी पंडितों की बस्तियों में सामूहिक बलात्कार और लड़कियों के अपहरण किए गए। हालात और बदतर हो गए थे।
कुल मिलाकर हजारों की संख्या में काफिर महिलाओं का बलात्कार किया गया।
आज आप जिस तरह दाँत निकालकर धरती के जन्नत कश्मीर घूमकर मजे लेने जाते हैं और वहाँ के लोगों को रोजगार देने जाते हैं। उसी कश्मीर की हसीन वादियों में आज भी सैकड़ों कश्मीरी हिन्दू बेटियों की बेबस कराहें गूंजती हैं, जिन्हें केवल काफिर होने की सजा मिली।
घर, बाजार, हाट, मैदान से लेकर उन खूबसूरत वादियों में न जाने कितनी जुल्मों की दास्तानें दफन हैं जो आज तक अनकही हैं। घाटी के खाली, जले मकान यह चीख-चीख के बताते हैं कि रातों-रात दुनिया जल जाने का मतलब कोई हमसे पूछे। झेलम का बहता हुआ पानी उन रातों की वहशियत के गवाह हैं जिसने कभी न खत्म होने वाले दाग इंसानियत के दिल पर दिए।
लखनऊ में विस्थापित जीवन जी रहे कश्मीरी पंडित रविन्द्र कोत्रू के चेहरे पर अविश्वास की सैकड़ों लकीरें पीड़ा की शक्ल में उभरती हुईं बयान करती हैं कि यदि आतंक के उन दिनों में घाटी की मुस्लिम आबादी ने उनका साथ दिया होता जब उन्हें वहाँ से खदेड़ा जा रहा था, उनके साथ कत्लेआम हो रहा था तो किसी भी आतंकवादी में ये हिम्मत नहीं होती कि वह किसी कश्मीरी पंडित को चोट पहुँचाने की सोच पाता लेकिन तब उन्होंने हमारा साथ देने के बजाय कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेक दिए थे या उनके ही लश्कर में शामिल हो गए थे।
अभी हाल में ही आपलोगों ने टीवी पर “अबू बकर अल बगदादी” के जेहादियों को काफिर “यजीदी महिलाओं” को रस्सियों से बाँधकर कौड़ियों के भाव बेचते देखा होगा।
पाकिस्तान में खुलेआम हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर सार्वजनिक रूप से मौलवियों की टीम द्वारा धर्म परिवर्तन कर निकाह कराते देखा होगा।
बांग्लादेश से भारत भागकर आये हिन्दुओं के मुँह से महिलाओं के बलात्कार की हजारों मार्मिक घटनाएँ सुनी होंगी।
यहाँ तक कि म्यांमार में भी एक काफिर बौद्ध महिला के बलात्कार और हत्या के बाद शुरू हुई हिंसा के भीषण दौर को देखा होगा।
केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनियाँ में इस सोच ने मोरक्को से ले कर हिन्दुस्तान तक सभी देशों पर आक्रमण कर वहाँ के निवासियों को धर्मान्तरित किया, संपत्तियों को लूटा तथा इन देशों में पहले से फल फूल रही हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता का विनाश कर दिया।
परन्तु पूरी दुनियाँ में इसकी सबसे ज्यादा सजा महिलाओं को ही भुगतनी पड़ी बलात्कार के रूप में।
आज सैकड़ों साल की गुलामी के बाद समय बीतने के साथ धीरे-धीरे ये बलात्कार करने की मानसिक बीमारी भारत के पुरुषों में भी फैलने लगी।
जिस देश में कभी नारी जाति शासन करती थीं, सार्वजनिक रूप से शास्त्रार्थ करती थीं, स्वयंवर द्वारा स्वयं अपना वर चुनती थीं, जिन्हें भारत में देवियों के रूप में श्रद्धा से पूजा जाता था आज उसी देश में छोटी-छोटी बच्चियों तक का बलात्कार होने लगा और आज इस मानसिक रोग का ये भयानक रूप देखने को मिल रहा है।। फिर भी हमारे देश के हिन्दू नेताओं को बलात्कारी को सजा देने में संकोच अथवा दर लगता है !!

Black Day of India – 31 January 1979

From: Mahabaleshwar Deshpande < >

Black Day of India – 31 January 1979 😦 😦
Deadliest massacre in the history of independent India by COMMUNISTS, which has been deleted from History books
➡ 1,700 Hindus were mercilessly gunned down in Marichjhapi by West Bengal Police on the orders of COMMUNIST CM Jyoti Basu. Many of these were children, women and elderly.
➡ More than 100 women were raped again and again by Communist cadres and policemen. After raping them, they were shot, beheaded or brutally beaten to death.
➡ 15 innocent children aged 5-10 who had taken shelter in a hut were BEHEADED with knives by Communist cadres and police who were given orders to kill all the Hindu refugees. These innocent children were preparing for the Saraswati Puja (which was on 1 February)
➡ After killing them, the communists destroyed the statue of Saraswati that was being decorated by those kids to celebrate the pooja next day.
➡ 4,128 families perished in transit, died of starvation, exhaustion, and many were killed in Kashipur, Kumirmari, and Marichjhapi by police firings. The CPIM congratulated its participant members on their successful operation at Marichjhapi
➡ Jyoti Basu (Communist) issued prohibitory orders after the murder of 1700 Hindus and blocked the entry of journalists, activists or anyone who could have shed light on this news.
➡ This is the worst state-sponsored massacre in the history of India where the government ordered cold-blooded murder of thousands of innocent, unarmed, harmless Hindu refugees just because they were turning out to be a burden.
➡ Today marks the 38 years of India’s black day – a shameful event in India’s independent history when 1700 innocent people were killed by the COMMUNIST PARTY Government and cadres of the party. This news could never come out in open. Hardly anyone in India knows about this massacre of Hindus. On this day, I pray to Maa Saraswati that may their souls rest in peace !!
➡ If you want to read more about this, read the book : “The Hungry Tide” by Amitava Ghosh. I am also attaching few links for this incident, which was never covered by any media.
PS : If you have slightest of sympathy and this story shook you, PLEASE SHARE IT ! Every Indian MUST know the atrocities of Communists and Red Terrorism !

GAMBIA and MYANMAR : POLES APART

From Rajput < >

Aung San Suu Kyi of Myanmar has been summoned to UN’s top court today to defend the country against allegations of ‘unspeakable’ crimes against Rohingya Muslims committed during 2017.

That’s what the world read in the news or heard on their radio or saw on television. But wait a minute. There is more to it than meets the eye!

First of all, Myanmar is a BUDDHIST majority country just as Germany is a Christian country. Now imagine the Muslims in Germany start killing the German police and soldiers and setting the churches ablaze! What will be the reaction of the German PEOPLE? It seems the Europeans feel the pain when the shoe pinches their own foot.

Four more reasons why the Buddhists in Myanmar are upset:
1. Muslims are a restless, disgruntled and hostile minority – more so in a non Muslim country. They get busy in Jihad to transform the peaceful secular country into ISLAMIC republic. They wish to impose SHARIA LAW on all,** as is the case in Afghanistan and Pakistan, even in Bangladesh. (** “All” means Christians, Hindus, Buddhists and anyone else who dislikes theocracy!). The world ought to be continuously reminded of the sectarian “PARTITION” of secular India that cost two million LIVES, ONE THIRD OF INDIA that had to be surrendered unconditionally and 12 million REFUGEES!

2. Myanmar is located next door to Bangladesh and they know the ORIGIN of that ISLAMIC country, too, even if the Lok Sabha in New Delhi wouldn’t dare to recall the MASSACRE in Noakhali in August 1946 and the surrender of EAST Bengal a year later.

3. Bangladesh was the result of Muslim HIGH TREASON against their own LAND OF BIRTH, i.e., secular India. Next door Myanmar would be an idiot if they did not reckon with the possibility of separation (BREAK AWAY) of the Muslim majority region for Independence IN THE SAME WAY, or even of uniting with Bangladesh!

4. A minority has to RESPECT the places of worship of the majority. Don’t the Myanmaries know how the Buddhist temples were destroyed in neighboring Chittagong and how the Buddhist population there was ethnically cleansed?

WHERE WAS GAMBIA THEN? And where was GAMBIA when the Hindus of East Bengal were massacred, converted and forced out of their homes- NOT A FEW THOUSAND BUT TENS OF MILLIONS OF THEM?

The Buddhists of Myanmar also learnt of the destruction of the two world famous ancient Buddha STATUES in Afghanistan. Shock waves struck the world conscience, not only the Buddhist hearts everywhere. Muslims were seen as extremely INTOLERANT of the others’ ways of worship and thinking.

A skeptic would say, “Why mention Bamyan which is far far away from Myanmar!” We should counter, “O Yes, BUT THEN ISN’T GAMBIA EVEN FARTHER FROM MYANMAR?”

Where was Gambia when the Hindus in South Kashmir were killed, raped and forced out of their homes?

Finally how has GAMBIA got involved with the Rohingya Muslims from Myanmar? Do the people of Gambia even know where Myanmar is located?

It seems, (and please contradict this if you know better!) that the “Organisation of Islamic countries” (There is NO counterpart of such an organisation for the Hindus because all 27 States, some like Maharashtra and Tamil Nadu, TEN TIMES the size of Gambia, are all under ONE flag and VOICELESS!) gave some precious dollars to the government of Gambia and told them to indict the Burmese leader. Gambia itself does not have money even to feed her population. So this financial help is Godsend to one of the POOREST countries on earth!

Finally, HOW MANY ROHINGYA MUSLIMS HAVE ARRIVED IN FRIENDLY GAMBIA FOR LIVING?

Now what about BHARAT? Having discovered a true friend of Rohingya Muslims, is it not the time to move the Rohingya Muslims from JAMMU to GAMBIA?

Shri Amit Shah ji, here is a new challenge for you.

rajput
12 Dec 2019

 

हम कभी भी मुसलमान राक्षसों का इस देश में आना स्वीकार नही करेंगे – यति माँ चेतनानन्द सरस्वती

 

 

पाकिस्तान में अत्याचारों से जूझता हिन्दू… 

From: Vinod Kumar Guota < >

पाकिस्तान में अत्याचारों से जूझता हिन्दू…
                              26.3.2019

यह कैसी विडंबना है कि बांग्लादेशी व म्याँमार के मुसलमानों के लिये सेक्युलर व मानवाधिकारवादी सहित देश-विदेश का मुस्लिम समाज एकजुट होकर उनके पक्ष में खड़ा रहता है,

किन्तु उन प्रताड़ित पाकिस्तानी, बंग्लादेशी व कश्मीरी हिंदुओं ने क्या अपराध किया है कि जो हम हिन्दू उनके पक्ष में कोई आंदोलन या प्रदर्शन करने से भी घबराते हैं ? (घभराते थे अब नहि। – Suresh Vyas)

परिणामतः आज भी पाकिस्तान में मुस्लिम अत्याचारों से स्वाभिमानी हिन्दू अपने धर्म की रक्षार्थ अकेले ही जूझ रहें है।

हमारे राष्ट्रीय समाचार पत्रों से ज्ञात हुआ है कि पाकिस्तानी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों के अनुसार दक्षिण सिंध के ‘हाफिज सलमान’ नाम के एक गाँव में 20 मार्च 2019 को रीना व रवीना नाम की दो सगी हिन्दू बहनों को अगवा करके उनको मुसलमान बनाया गया। तत्पश्चात मुस्लिम गुंडों से उन काफ़िर लड़कियों का निकाह करवाया गया। इस प्रकार जिहादियों का अपने सदियों पुराने अत्याचारी इस्लामिक जनून की जकड़न से बाहर न निकलने का निर्णय स्पष्ट है।

पूर्व में कुछ समाचार ऐसे भी आते रहे है कि पाकिस्तान में कर्ज के बदले हिदू लड़कियों का अपहरण किया जाता है। वर्षों से ऐसे समाचार पढ़ कर मन विचलित होता है और आक्रोशित भी। यद्यपि सम्भवतः पहली बार भारत सरकार की ओर से हमारी विदेशमंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने इस दुःखद घटना पर कड़ा विरोध जताते हुए अपने उच्चायोग को रिपोर्ट देने का आदेश दिया है।

पाकिस्तान में ऐसे अमानवीय अत्याचारों का सिलसिला वर्षों पुराना है। वहाँ रह रहें हिन्दुओं के वहाँ से पलायन करने का यह भी एक मुख्य कारण है। पिछले 20 -25  वर्षों के ही समाचारों को ध्यान से देखा जाय तो हज़ारों हिन्दू लड़कियों का अपहरण करके उनका धर्मपरिवर्तन कराकर मुसलमानों से जबरन निकाह कराया गया। हिन्दू लड़कियों को ‘मनीषा से महाविश’, ‘भारती से आयशा’, ‘लता से हफ़सा’ , ‘आशा से हलीमा’ व ‘अंजलि से सलीमा’ आदि बना कर हज़ारों-लाखों अबलाओं की जिंदगी में जहर घोलने वाले ये कट्टरपंथी जन्नत जाने के जनून में कब तक इन मासूमों को जिंदा लाश बनाते रहेंगे ? इनके अत्याचारों से पीड़ित एक हिन्दू लड़की रिंकल कुमारी की तो मीडिया में लगभग दो वर्ष पूर्व बहुत चर्चा भी रही फिर भी कोई सुनवायी न होने के उसको ‘फरयाल बीबी’ बनना पड़ा। नारकीय पीड़ा से बचने के लिये अनेक हिन्दू लड़कियाँ आत्महत्या को भी विवश होती हैं। यह भी अत्यधिक चिंताजनक हैं कि हिन्दू, सिख व अन्य काफ़िर लड़कियों की खरीद-बिक्री  मुस्लिम समाज का सदियों पुराना घिनौना धंधा यथावत जारी है। विचित्र व दुःखद यह भी है कि वहाँ के हिन्दू मुसलमानों के डर से कोई शिकायत भी नहीं कर पाते। जबकि अधिकांश पीड़ित हिन्दू-सिख दलित व गरीब होने के कारण अपनी बेटियों को ढूँढ भी नहीं पाते।

पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग के अनुसार सन् 2010 में यह भी पता चला था कि लगभग 25 हिन्दू लड़कियाँ प्रति माह पाकिस्तान में धर्मांधों का शिकार हो रही हैं। उस समय पाकिस्तानी मीडिया ने भी हिन्दू लड़कियों पर सिंध व बलूचिस्तान में हो रहें ऐसे अत्याचारों को स्वीकार किया था । धार्मिक आधार पर हिन्दू-मुस्लिम विभाजन के पश्चात बने पाकिस्तान में पूर्व के समान लाखों हिन्दू लड़कियों की दर्दनाक गाथाओं में जुड़ कर बहरी, गूँगी और अंधी दुनिया में इन दो सगी बहनों की भी दर्दनाक घटना लुप्त हो जायेगी। लाखों गैर मुस्लिम अबलाओं की तरह इन हिन्दू बहनों को भी कोई मुस्लिम नाम देकर अंधेरी कोठरी में डाल दिया जायेगा। कैसी अमानवीयता है कि मासूम व निर्दोष बालिकाओं को नारकीय जीवन जीने को विवश करने वाले जिहादियों को ऐसे पापों में ठंडक मिलती है।

इन विषम परिस्थितियों से बचने के लिए पाकिस्तान में जबरन धर्म परिवर्तन के विरोध में कानून बनाने की मांग बार-बार उठाई जाती है। सन् 2016 में सिंध प्रांत की विधानसभा में ऐसा विधेयक सर्वसम्मति से पारित भी हुआ था परंतु मुस्लिम कट्टरपंथियों के कारण उसे वापस लेना पड़ा। ‘पाकिस्तान हिन्दू काउंसिल’  के प्रमुख और पीटीआई सांसद रमेश कुमार वंकवानी ने धर्मांतरण विरोधी विधेयक को पुनः विधानसभा में लाकर पारित कराने की मांग की है।

निर्विवाद रूप से यह स्पष्ट है कि सन् 1947 में विभाजन के बाद वर्तमान पाकिस्तान में लगभग 20 प्रतिशत हिन्दू शेष थे जो अब घट कर लगभग डेढ़ प्रतिशत रह गये हैं। पूर्व के कुछ समाचारों से ज्ञात हुआ था कि सम्भवतः सन् 2017 के वैश्विक दासता सूचकांक के अनुसार 20 लाख से अधिक पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिन्दू ,सिक्ख व ईसाई आदि दासता का जीवन जीने को विवश है। जब धार्मिक वैमनस्य के कारण ही पाकिस्तान का निर्माण हुआ था तो फिर वहां गैर मुस्लिमों पर खुल कर अत्याचार होना बंद क्यों नही होता? बल्कि हिंदुओं का बलात धर्मपरिवर्तन किये जाने पर विरोध करने वालों का प्रायः कत्ल कर दिया जाता है। हिंदुओं की संपत्ति पर जबरन कब्ज़ा करना व उन्हें वहाँ से खदेड़ देने की भी घटनाऐं सामान्यतः समाचारों में समय- समय पर आती रहती हैं। कभी-कभी अपनी पहचान छुपाने के लिये मुस्लिम नाम का सहारा भी हिंदुओं को लेना पड़ता है।गरीब हिदुओं को नौकरी के लिए मुसलमान भी बनना पड़ता है।अनेक लोगों को खेत व भट्टे पर मजदूरी के लिए रखा जाने के अतिरिक्त घरेलू नौकर भी बनाया  जाता है।

कुछ वर्ष पूर्व (दिसम्बर 2011) प्राचीन चंडी देवी मंदिर, डासना (ग़ाज़ियाबाद ) में आये  लगभग 27 पाकिस्तानी हिन्दू परिवारों से मेरी व्यक्तिगत चर्चा हुई थी। उनका दुखड़ा सुनकर मानवता भी शर्मसार हो जाती है। वे अपनी लड़कियों को घर से बाहर ही नहीं निकलने देते क्योंकि वहाँ के मुसलमान हिन्दू लडकियों को छोड़ते ही नहीं। हिन्दू बच्चों को स्कूलों में अलग बैठा कर इस्लाम की शिक्षा दी जाती है।इन बच्चों के लिये पीने का पानी भी उपलब्ध नहीं होता।इसलिए अधिकांश बच्चे स्कूल ही नहीं जाते।वहाँ गरीब हिन्दू मज़दूरों को जंजीरों से बाँध कर रखते हैं और मज़दूरी पर जाते समय जंजीरें खोल दी जाती हैं और सायं वापसी होने पर पुनः बाँध दी जाती हैं। इनको मारना-पीटना व भूखा-प्यासा रखना आम बात है। लंबे समय तक मजदूरी भी नही देते। उनका पीड़ित ह्रदय इतना अधिक व्यथित था कि जब उन्हें दिसम्बर की ठिठुरती ठंडी रात में मंदिर प्रांगण से बसपा के शासन के समय तत्कालीन गाजियाबाद के जिलाधिकारी द्वारा वापस दिल्ली भेजने के आदेश का पालन हुआ तो वे बार-बार रोते-बिलखते यही कह रहे थे कि “भारत माता की गोदी में मर जाएंगे पर पाकिस्तान नहीं जायेंगे”। मैं और मेरे साथी आज सात वर्ष बाद भी उस वेदना को भूलें नही है।

कुछ वर्ष पूर्व पाकिस्तान में हुए एक सर्वे से पता चला कि लगभग 95%  मंदिरों व गुरुद्वारों को मदरसे व दरगाहों में परिवर्तित कर दिया गया , कहीं कहीं गोदाम, दूकान,स्कूल व सरकारी कार्यालय भी बनाये गये। कुछ मंदिरों में पुजारियों को मुस्लिम टोपी पहननी पड़ती है। पूजा-अर्चना धीमी आवाज में बंद दरवाजों में की जाती है। अगर हिन्दू  ईद मनाएँगे तभी होली-दिवाली मनाने की सुविधा होती है। मुस्लिम घृणा यहाँ तक हावी है कि शव दहन के समय मुसलमान ईंट-पत्थर मार कर जलती चिता को बुझा देते हैं और अधजले शव को नाले में फेंक देते हैं। इतनी अधिक धार्मिक घृणा क्यों ?  पाकिस्तान की पाठय-पुस्तकों में बालकों को आरम्भ से ही कट्टर इस्लाम पढाये जाने के अतिरिक्त यह भी बताया जाता है कि हिन्दू बुरी कौम है व भारत एक क़ाफ़िर देश है। जिसका दुष्परिणाम है कि हिन्दू बच्चों को क़ाफ़िर कुत्ता कह कर पुकारा जाता है। यह और भी दुःखद है कुछ वर्ष पूर्व हुए एक अमरीकी संगठन के सर्वे के अनुसार हर चार पाकिस्तानियों में से तीन भारत के विषय में नकारात्मक विचार रखते हैं।

भारतवासियों को आज चिंतन करना होगा कि विभाजन के समय पाकिस्तान में ही रुक कर रहने वाले स्वाभिमानी हिन्दुओं का अपने धर्म में बने रहने के लिये और कितने वर्षों तक मुस्लिम अत्याचारों से जूझना पड़ेगा?

इस शतकों पुरानी मानवविरोधी धर्मांध विभीषिका के समाधान के लिये कुछ ठोस उपाय आज सभ्य समाज की प्रमुख आवश्यकता है। अतः भारत सहित विश्व के समस्त मानवाधिकारवादियों को पाकिस्तान, बंग्ला देश व कश्मीर आदि में हो रहें लाखों हिंदुओं पर वीभत्स मुस्लिम अत्याचारों के विरुद्ध और उनके मानवाधिकारों की रक्षा के लिए एक बड़ी कूटनीतिक पहल करनी होगी।

(Gandhi and Nehru have committed such a great sin of partitioning Hindustan in 1947 that all the the curses of all the Hindus and Sikhs who suffered and are suffering, or rapped and/or killed in the past or present by Muslims fall on Nehru and Gandhi. They should be in hell because they created hell for Hindus by the partition. – Suresh Vyas)

विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक एवं लेखक)
ग़ाज़ियाबाद

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