Comparing Canada With New Zealand (A Ltr to NZ PM)

From Rajput < >

Comparing Canada With New Zealand


We saw the consoling words of the prime minister of New Zealand last Friday. While grieving with the Muslim mourners, wearing all black like Mamata Banerji, she (the PM) said, “You are us and we are you!”, a bit over the top!

Those who do not know the difference between Islam and Christianity are like cuckoos who will offer an arm and a leg while getting separatism and the possibility of terrorist attacks as in Europe and elsewhere from Pulwama to Somalia, Nigeria and New York. She should know that they (The Muslims) escaped from the “HELL” created by their fellow Muslims in Afghanistan, Syria, Iraq, Bangladesh and Pakistan, and they came to a Christian country with the same “holy” book that is mandatory reading in every Islamic country!

Please compare the compassion shown by the Christian world towards the 50 killed in mosques with the compassion shown by the ISLAMIC world to the whole community of Yazidis who were killed, raped, and forced to flee their homes.

THERE IS NO COMPARISON, Madam! You as a Prime Minister had to know the real cause of this tragedy. It began EARLIER in their own ISLAMIC countries due to their own Belief system and “way of life” that they have brought with them. They should have gone to one of the FIFTY odd Islamic countries, but not to a Christian country with their notoriety of “Islamophobia, terrorism and surprise attacks” preceding them.

The Indians get ‘creepy terror’ move up their spine on hearing such words as “We are you and you are us.” These are the exact words spoken by Gandhi and Nehru two days before the sub-continent BROKE UP in bloodshed & flames in 1947. How is it that you never heard of peaceful India’s brutal “mutilation” (the Partition)?

What you’ve got now is 50 DEAD, and one to be sent to jail for life (expected sentence for the killer) and a perennial division in your own society between those who repeat your words and the others who reject your views, recalling the conquest of Spain and Greece, the Partition of India, the massacre of Yazidis, the attack on WTC towers in New York (achieving surprise like the Japanese attack on Pearl Harbor), the massacre in Manchester and Paris, and “welcome” for Christians in Pakistan and Afghanistan, who will vehemently DISAGREE with you!

In New Zealand there is already enough of “multiculture” with the Maoris and the Christians, i.e., the natives and the Europeans, living in harmony together. The new additional “Factor Islam” is a risk that you are advised to AVOID.

Here is something, not similar but relevant from Canada.

Headline: Canadian Mayor refuses to remove pork from school canteen menu- and explains why

Muslim parents demand the abolition of pork in all the school canteens of a Montreal suburb. The mayor of the Montreal suburb of Dorval has refused, and the town-clerk sent a note to all parents to explain why. Here’s that note:

“Muslims must understand that they have to adapt to Canada and Quebec, its customs, its traditions, its way of life, because that’s where they chose to immigrate.

“They must understand that they have to integrate and learn to live in Quebec.

“They must understand that it is for them to change their lifestyle, not the Canadians who so generously welcomed them.

“They must understand that Canadians are neither racist nor xenophobic, they  accepted many immigrants before Muslims (whereas the reverse is not true, in that Muslim states do not accept non-Muslim immigrants).

“That no more than other nations, Canadians are not willing to give up their identity, their culture.

“|And if Canada is a land of welcome it’s not the Mayor of Dorval who welcomes foreigners, but the Canadian-Quebecois people as a whole.

“Finally, they must understand that in Canada (Quebec) with its Judeo-Christian roots, Christmas trees, churches and religious festivals, religion must remain in the private domain. The municipality of Dorval was right to refuse any concessions to Islam and Sharia.

“For Muslims who disagree with secularism and do not feel comfortable in Canada, there are 57 beautiful Muslim countries in the world, most of them under-populated and ready to receive them with open halal arms in accordance with Sharia

“If you left your country for Canada, and not for other Muslim countries, it is because you have considered that life is better in Canada than elsewhere.

“Ask yourself the question, just once, “Why is it better here in Canada than where you come from?” ‘A canteen with pork’ is part of the answer.”


PS:  We hope the prime minister of New Zealand knows that her Muslim subjects, too, will soon demand the ban on pork in all schools, jails, hospitals, and even in the prime minister’s own house if she has employed a Muslim cook or cleaner!


सबसे बड़ी समस्या सुप्रीम कोर्ट और सरकारों की नीतियां है


By sujeet singh

गुरु जी को मेरा प्रणाम,

गुरुजी जिहादी जो होते हैं यह इतने बड़े जाहिल धूर्त मक्कार पशु से भी नीचे दिमाग के होते हैं. इन्हें समझआए तो कौन समझाए, क्योंकि बचपन से लल्ला ताला की आसमानी किताब को पढ़करके इनके दिमाग में इतना कचरा भर जाता है कि यह दूसरे धर्म या दूसरे विचारों को मानने वाले लोगों को कभी भी बर्दाश्त कर ही नहीं सकते.

गुरुजी इन जिहादियों को समझाना बिल्कुल वैसा ही है जैसा कि भैंस के आगे बीन बजाओ और भैंस बैठ पगु राय. बस गुरु जी, आप इन मूर्ख और पथभ्रष्ट हिंदुओं को मार्गदर्शन करते रहिए. धीरे धीरे हिंदुओं में चेतना जागृत हो रही है और अब हिंदू जातिवाद से दूर हटने का प्रयास कर रहे हैं. गुरु जी आपके बताए हुए रास्ते पर अगर सारे हिंदू चलना शुरू कर दे तो निश्चित रूप से इस देश का हिंदू तो मजबूत होगा ही, पूरे विश्व का भी भला होगा.

लेकिन हमारे देश की जो धूर्त न्यायपालिका मतलब सुप्रीम कोर्ट है, हमारे देश की जो सरकारों की नीतियां है और हमारे जो मक्कार नेता है, यह इतने बड़े दुष्ट हैं जो कि हिंदुओं के मूल समस्याओं को दाल रोटी पेट्रोल गैस बेरोजगारी इन सभी की तरफ मोड़ देते हैं, जबकि सत्य है कि सबसे बड़ा खतरा जिहाद का है.

हमारे देश की जो पुलिस है यह भी बेहद दुष्ट है सरकारों के कहने पर और मक्कार न्यायपालिका के कहने पर हिंदुओं को गिरफ्तार कर लेती है जो भी हिंदू प्रतिक्रिया करते हैं,  गुरुजी सबसे बड़ी समस्या बस यही है.

इसलिए मैं तो कहता हूं सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट के जजों को सही करना आवश्यक है . उनके लिए कोई कठोरता बरतना आवश्यक है. जिस दिन सुप्रीम कोर्ट के जज ढंग से कठोरता पूर्वक किसी देशभक्त के द्वारा सुधार दिए जाएंगे उसी दिन से भारत की सुप्रीम कोर्ट के मक्कार जज सुधर जाएंगे .

सबसे बड़ी समस्या हमारे देश के सुप्रीम कोर्ट और सरकारों की नीतियां है .

वंदे मातरम जय श्री राम जय हिंदू राष्ट्र गुरु जी को मेरा प्रणाम


आत्मरक्षार्थ भारत को पराक्रमी बनना होगा… 

From: विनोद कुमार Gupta < >

आत्मरक्षार्थ पराक्रमी बनना होगा…         17.03.2019

हम अपनी ऐतिहासिक भूलों से कुछ सीखना नही चाहते। 1947-48 में हम कश्मीर से पाकिस्तानी सेना व कबाइलियों को खदेड़ने के स्थान पर संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए चले गये थे। जम्मू-कश्मीर राज्य का स्वतंत्र भारत में विलय पत्र के अनुसार पूर्ण विलय के उपरांत भी उसको विवादित बनाने में संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप के दोषी हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.जवाहरलाल नेहरू ही थे। परिणामस्वरूप आज 70 वर्ष उपरांत भी हमारी देवतुल्य भूमि के 75114 वर्ग किलोमीटर (गुलाम कश्मीर या पी.ओ.के.) पर पाकिस्तान अवैध रूप से काबिज है और जम्मू-कश्मीर की जनता अलगाववाद व आतंकवाद के कारण विस्फोटक स्थिति से जूझने को विवश है।

दशकों से कश्मीर समस्या को केंद्र बना कर पाकिस्तान
बार-बार हमको जख्म देता आ रहा है। हजार बार युद्ध की धमकी देने वाले पाकिस्तान के जिहादी संकल्पों को अवश्य समझना होगा। उसी संदर्भ में पाक स्थित आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का सरगना मौलाना मसूद अजहर हमारे लिए लगभग 25 वर्षो से बहुत बड़ी समस्या बना हुआ है। मुख्यतः जम्मू-कश्मीर में व पंजाब सहित भारत के विभिन्न क्षेत्रों में मसूद अजहर अपने प्रशिक्षित आतंकवादियों व आत्मघाती मानव बम (फिदायीन) द्वारा सैकड़ों-हज़ारों निर्दोषों का रक्त बहाने के अतिरिक्त अरबों रूपयों की भारतीय सम्पत्ति को नष्ट कर चुका है। इसी परिपेक्ष्य में देश का एक वर्ग  ‘कंधार प्लेन हाईजैक कांड 1999-2000’  में इस खूंखार आतंकी मौलाना मसूद व दो अन्य आतंकियों को भारत की जेलों से रिहा करके कंधार (अफगानिस्तान) में जाकर छोड़ने को बड़ी गलती मानता है।

इसके उचित समाधान के लिए भारत अपनी रणनीति के अनुसार मसूद अजहर को पिछले लगभग 10 वर्षों से अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कराके उसको व उसके संगठन पर पूर्णतः प्रतिबंध लगवाना चाहता है। परंतु चीन अपने स्वार्थों के कारण हमारे लिए बाधा बना हुआ है। तीन बार वर्ष 2009, 2016 व 2017 में हम पहले ही चीन के कारण यू.एन.ओ. में असफल हो चुके है। लेकिन हम पुलवामा कांड के बाद अब चौथी बार भी चीन के कारण ही ऐसा करवाने में फिर असफल हुए। चीन ने कुछ तकनीकी आधार पर इस बार अपने वीटो पावर का प्रयोग किया। जबकि इसका मुख्य कारण पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह का पीओके (गुलाम कश्मीर) से निकलने वाले मार्ग पर चीन की चल रही अरबों-खरबों की योजनाओं ही होनी चाहिये। इस क्षेत्र में जैशे-ए-मोहम्मद के अधिकांश आतंकवादियों की सक्रियता होने के कारण चीन के लगभग  दस हज़ार से अधिक कर्मचारियों की सुरक्षा की चिंता भी तो चीन की प्राथमिकता है। आज देश का प्रबुद्ध समाज स्व.नेहरू जी की अदूरदर्शिता पर भी प्रश्नचिन्ह लगा कर कह रहा है कि चीन को यू.एन.ओ. की सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य क्यों बनवाया था ? क्या चीन हमारे त्याग व उदारता को भूल गया ?

विशेष चिंतन का विषय यह है कि प्राचीन काल में चीन हमारी ज्ञानवान संस्कृति से प्रभावित होकर बड़े स्तर पर हमारे आचार्यों से अधिक ज्ञान पाने के लिए उन्हें आमंत्रित करता था। वहां के राजा हमारे आचार्यों को विशेष आतिथ्य देते थे। इतिहास से यह भी ज्ञात होता है कि एक बार एक अत्यधिक तेजस्वी आचार्य को चीन के सम्राट ने अपनी सेना भेज कर भी उठवाया था। परंतु उन महान आचार्य का सम्मान करते हुए उनके माध्यम से भारतीय संस्कृति और ज्ञान का चीन में व्यापक प्रसार व प्रचार हुआ था। आज उसी संस्कृति के उद्गम क्षेत्र भारत को जिहादियों के अत्याचारों द्वारा पददलित होते हुए चीन क्यों देखना चाहता है? जबकि वह स्वयं तो इस्लामिक आतंकवादियों से सुरक्षित रहना चाहता है फिर भी वह भारत की इनसे मुक्ति में बाधक बन रहा है।

ऐसे में हमको अपने सामर्थ्य , बल और पराक्रम पर भरोसा करना अनुचित होगा . क्या हम अमरीका द्वारा ऐवटाबाद (पाक) में मारे गए ओसामा विन लादेन के समान दाऊद इब्राहिम, अजहर मसूद व हाफिज सईद आदि मोस्ट वांटेड आतंकियों को नहीं मार सकते ? ध्यान रहे एक बार हमारे पूर्व सेना प्रमुख जनरल वी. के. सिंह (जो आज केंद्रीय सरकार में राज्य मंत्री भी है) ने कहा था कि “हमारी सेनायें ऐवटाबाद जैसी कार्यवाही करने में सक्षम है”। तो अब अवसर है कि “चीन की वीटो पावर” को चुनौती देते हुए हमें अपने पराक्रम का परिचय देना होगा। इसके लिए एक विशेष स्ट्राइक द्वारा अमरीकी रणनीति के समान मसूद अजहर का वध करके उसको समुद्र में डुबो देना चाहिये।

14 फरवरी को पुलवामा (जम्मू-कश्मीर) में सी.आर.पी.एफ. के काफिले पर फिदायीन हमले में लगभग 40 सैनिकों के बलिदान से भारतीय जनमानस का धैर्य टूट गया था। देशवासियों के आक्रोश को शांत करने के लिए केंद्र सरकार को आक्रामक होना ही था। अतः बालाकोट (पाकिस्तान) में स्थित जैश-ए-मोहम्मद के एक बड़े प्रशिक्षण केंद्र पर वायुसेना द्वारा 26 फरवरी को शक्तिशाली एयर स्ट्राइक करके भारत ने आक्रामक रूप दिखाते हुए अपने पराक्रम का परिचय दिया। इससे भयभीत होकर आज पाकिस्तान भारी दबाव में है। साथ ही इस्लामिक आतंकवाद के विरोध में अंतरराष्ट्रीय मत हमारे पक्ष में है। इसलिये वर्तमान अनुकूल परिस्थिति में हम पाकिस्तान पर और अधिक दबाव डालने की स्थिति में है। फिर भी हमने अपनी स्वयं की सामर्थ्य को कम आंका और संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर बढ़ें। जहां चीन की कुटिलता में फंस गए और मसूद अजहर पर अंकुश लगाने में असफल हुए। हमें विचार करना होगा कि क्या हम अपने ही सामर्थ्य से पाकिस्तान पर दबाव बना कर ऐसे आतंकियों पर नकेल नही डाल सकते ?

आज देश में चारों ओर मसूद अजहर के कारण चीन से व्यापार आदि संबंधों को तोड़ने की मांग उठ रही है। जबकि हमें सर्वप्रथम पाकिस्तान से सारे संबंध तोड़ कर उसे “आतंकी राष्ट्र” घोषित करना चाहिये। यह दुःखद है कि अभी हमारे जख्म भरें भी नही है कि हम “करतारपुर कॉरिडोर”  बनाने की शीघ्रता में पाकिस्तान से वार्ता कर रहे हैं। जबकि हमको पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित करना अत्यंत आवश्यक है। पाक व भारत के मध्य रेल व रोड मार्गों को बंद करने के साथ साथ सिंधु जल संधि को अपने पक्ष में करना भी पाकिस्तान पर दबाव बनाएगा। कुछ अन्य संबंध हम पहले ही तोड़ चुके हैं। इन दबावों के कारण पाकिस्तान सम्भवतः मसूद अजहर पर कोई कठोर कार्यवाही करने का विचार कर सकता है? ध्यान रहे, कि मौलाना मसूद अजहर पाकिस्तान का पाला हुआ सांप है, चीन का नही। इसलिये चीन के स्थान पर पाकिस्तान का पूर्ण बहिष्कार करना अधिक कूटनीतिज्ञ होगा।

वर्तमान स्थिति में यह भी विचार करना आवश्यक होगा कि  जिहादियों का विशेष लक्ष्य “गज़वा-ए-हिन्द” के लिए भारत की धरती को रक्तरंजित करना है। इसलिए इसका पूर्ण समाधान करना ही होगा। हमारे पास उच्च प्रशिक्षित सुरक्षाबलों व गुप्तचर संस्थाओं का बड़ा वर्ग शासकीय आदेश के प्रति बंधा हुआ है। ऐसे में विशेष रणनीति के साथ अपने सामर्थ्य का सदुपयोग करते हुए आतंकियों के नेटवर्क, स्लीपिंग सेलों व अन्य अडडों पर बार बार स्ट्राइक करके उनको नेस्तानाबूद करने से पाकिस्तान स्थित मसूद व हाफिज जैसे आतंकी सरगनाओं की भी कमर टूटेगी। पाक-परस्त संकीर्ण राजनीति करने वाले कुछ स्थानीय तत्व अपने आप देशद्रोहिता की आत्मग्लानि से पीड़ित हो जाएंगे। आज वैसे भी सत्ताहीनता की पीड़ा से जूझने वाले नेताओं की राष्ट्रभक्ति के प्रति राष्ट्रवादी समाज में अनेक संदेह उभर रहे है। इसीलिए भारतीय जनमानस आक्रोश और जोश के साथ शासन व प्रशासन से कंधे से कंधा मिला कर चलने को तैयार है, और इन विपरीत परिस्थितियों में उसने किसी वैध आह्वान पर आतंकियों पर टूटने का मन बना लिया है।

अतः आचार्य चाणक्य के शतकों पुराने संदेश को समझ कर उसे चरितार्थ करने का आज अवसर है। उन्होंने कहा था कि   “संसार में कोई किसी को जीने नही देता, प्रत्येक व्यक्ति व राष्ट्र अपने ही बल व पराक्रम से जीता है“। अब देश को आत्मरक्षार्थ अपने बल और पराक्रम का परिचय देना होगा।

✍🏻विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
गाज़ियाबाद 201001
उत्तर प्रदेश (भारत)