झांसी की रानी के वंशज

From: Chander Kohli < >

Vishwas Pitke < > wrote:

झांसी की रानी के वंशज
झांसी के अंतिम संघर्ष में महारानी की पीठ पर बंधा उनका बेटा दामोदर राव (असली नाम आनंद राव) सबको याद है । रानी की चिता जल जाने के बाद उस बेटे का क्या हुआ ??
वो कोई कहानी का किरदार भर नहीं था, 1857 के विद्रोह की सबसे महत्वपूर्ण कहानी को जीने वाला राजकुमार था जिसने उसी गुलाम भारत में जिंदगी काटी, जहां उसे भुला कर उसकी मां के नाम की कसमें खाई जा रही थी ।
अंग्रेजों ने दामोदर राव को कभी झांसी का वारिस नहीं माना था, सो उसे सरकारी दस्तावेजों में कोई जगह नहीं मिली थी । ज्यादातर भारतीयों ने सुभद्रा कुमारी चौहान के कुछ सही, कुछ गलत आलंकारिक वर्णन को ही इतिहास मानकर इतिश्री कर ली ।
1959 में छपी वाई एन केलकर की मराठी किताब ‘इतिहासाच्य सहली’ (इतिहास की सैर) में दामोदर राव का इकलौता वर्णन छपा ।
महारानी की मृत्यु के बाद दामोदार राव ने एक तरह से अभिशप्त जीवन जिया । उनकी इस बदहाली के जिम्मेदार सिर्फ फिरंगी ही नहीं भारत के लोग भी बराबरी से थे ।
आइये, दामोदर की कहानी दामोदर की जुबानी सुनते हैं –~~~~~
15 नवंबर 1849 को नेवलकर राजपरिवार की एक शाखा में मैं पैदा हुआ । ज्योतिषी ने बताया कि मेरी कुंडली में राज योग है और मैं राजा बनूंगा । ये बात मेरी जिंदगी में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से सच हुई । तीन साल की उम्र में महाराज ने मुझे गोद ले लिया । गोद लेने की औपचारिक स्वीकृति आने से पहले ही पिताजी नहीं रहे ।
मां साहेब (महारानी लक्ष्मीबाई) ने कलकत्ता में लॉर्ड डलहॉजी को संदेश भेजा कि मुझे वारिस मान लिया जाए । मगर ऐसा नहीं हुआ ।
डलहॉजी ने आदेश दिया कि झांसी को ब्रिटिश राज में मिला लिया जाएगा । मां साहेब को 5,000 सालाना पेंशन दी जाएगी । इसके साथ ही महाराज की सारी सम्पत्ति भी मां साहेब के पास रहेगी । मां साहेब के बाद मेरा पूरा हक उनके खजाने पर होगा मगर मुझे झांसी का राज नहीं मिलेगा ।
इसके अलावा अंग्रेजों के खजाने में पिताजी के सात लाख रुपए भी जमा थे । फिरंगियों ने कहा कि मेरे बालिग होने पर वो पैसा मुझे दे दिया जाएगा ।
मां साहेब को ग्वालियर की लड़ाई में शहादत मिली । मेरे सेवकों (रामचंद्र राव देशमुख और काशी बाई) और बाकी लोगों ने बाद में मुझे बताया कि मां ने मुझे पूरी लड़ाई में अपनी पीठ पर बैठा रखा था । मुझे खुद ये ठीक से याद नहीं । इस लड़ाई के बाद हमारे कुल 60 विश्वासपात्र ही जिंदा बच पाए थे ।
नन्हें खान रिसालेदार, गनपत राव, रघुनाथ सिंह और रामचंद्र राव देशमुख ने मेरी जिम्मेदारी उठाई । 22 घोड़े और 60 ऊंटों के साथ बुंदेलखंड के चंदेरी की तरफ चल पड़े । हमारे पास खाने, पकाने और रहने के लिए कुछ नहीं था । किसी भी गांव में हमें शरण नहीं मिली । मई-जून की गर्मी में हम पेड़ों तले खुले आसमान के नीचे रात बिताते रहे । शुक्र था कि जंगल के फलों के चलते कभी भूखे सोने की नौबत नहीं आई ।
असल दिक्कत बारिश शुरू होने के साथ शुरू हुई । घने जंगल में तेज मानसून में रहना असंभव हो गया । किसी तरह एक गांव के मुखिया ने हमें खाना देने की बात मान ली । रघुनाथ राव की सलाह पर हम 10-10 की टुकड़ियों में बंटकर रहने लगे ।
मुखिया ने एक महीने के राशन और ब्रिटिश सेना को खबर न करने की कीमत 500 रुपए, 9 घोड़े और चार ऊंट तय की । हम जिस जगह पर रहे वो किसी झरने के पास थी और खूबसूरत थी ।
देखते-देखते दो साल निकल गए । ग्वालियर छोड़ते समय हमारे पास 60,000 रुपए थे, जो अब पूरी तरह खत्म हो गए थे । मेरी तबियत इतनी खराब हो गई कि सबको लगा कि मैं नहीं बचूंगा । मेरे लोग मुखिया से गिड़गिड़ाए कि वो किसी वैद्य का इंतजाम करें ।
 
मेरा इलाज तो हो गया मगर हमें बिना पैसे के वहां रहने नहीं दिया गया । मेरे लोगों ने मुखिया को 200 रुपए दिए और जानवर वापस मांगे । उसने हमें सिर्फ 3 घोड़े वापस दिए । वहां से चलने के बाद हम 24 लोग साथ हो गए ।
ग्वालियर के शिप्री में गांव वालों ने हमें बागी के तौर पर पहचान लिया । वहां तीन दिन उन्होंने हमें बंद रखा, फिर सिपाहियों के साथ झालरपाटन के पॉलिटिकल एजेंट के पास भेज दिया । मेरे लोगों ने मुझे पैदल नहीं चलने दिया । वो एक-एक कर मुझे अपनी पीठ पर बैठाते रहे ।
हमारे ज्यादातर लोगों को पागलखाने में डाल दिया गया । मां साहेब के रिसालेदार नन्हें खान ने पॉलिटिकल एजेंट से बात की ।
उन्होंने मिस्टर फ्लिंक से कहा कि झांसी रानी साहिबा का बच्चा अभी 9-10 साल का है । रानी साहिबा के बाद उसे जंगलों में जानवरों जैसी जिंदगी काटनी पड़ रही है । बच्चे से तो सरकार को कोई नुक्सान नहीं । इसे छोड़ दीजिए पूरा मुल्क आपको दुआएं देगा ।
फ्लिंक एक दयालु आदमी थे, उन्होंने सरकार से हमारी पैरवी की । वहां से हम अपने विश्वस्तों के साथ इंदौर के कर्नल सर रिचर्ड शेक्सपियर से मिलने निकल गए । हमारे पास अब कोई पैसा बाकी नहीं था ।
सफर का खर्च और खाने के जुगाड़ के लिए मां साहेब के 32 तोले के दो तोड़े हमें देने पड़े । मां साहेब से जुड़ी वही एक आखिरी चीज हमारे पास थी ।
इसके बाद 5 मई 1860 को दामोदर राव को इंदौर में 10,000 सालाना की पेंशन अंग्रेजों ने बांध दी । उन्हें सिर्फ सात लोगों को अपने साथ रखने की इजाजत मिली । ब्रिटिश सरकार ने सात लाख रुपए लौटाने से भी इंकार कर दिया ।
दामोदर राव के असली पिता की दूसरी पत्नी ने उनको बड़ा किया । 1879 में उनको एक लड़का लक्ष्मण राव हुआ । दामोदर राव के दिन बहुत गरीबी और गुमनामी में बीते । इसके बाद भी अंग्रेज उन पर कड़ी निगरानी रखते थे । दामोदर राव के साथ उनके बेटे लक्ष्मणराव को भी इंदौर से बाहर जाने की इजाजत नहीं थी ।
इनके परिवार वाले आज भी इंदौर में ‘झांसीवाले’ सरनेम के साथ रहते हैं । रानी के एक सौतेला भाई चिंतामनराव तांबे भी था । तांबे परिवार इस समय पूना में रहता है । झाँसी के रानी के वंशज इंदौर के अलावा देश के कुछ अन्य भागों में रहते हैं । वे अपने नाम के साथ झाँसीवाले लिखा करते हैं । 
जब दामोदर राव नेवालकर 5 मई 1860 को इंदौर पहुँचे थे तब इंदौर में रहते हुए उनकी चाची जो दामोदर राव की असली माँ थी । बड़े होने पर दामोदर राव का विवाह करवा देती है । लेकिन कुछ ही समय बाद दामोदर राव की पहली पत्नी का देहांत हो जाता है । दामोदर राव की दूसरी शादी से लक्ष्मण राव का जन्म हुआ । दामोदर राव का उदासीन तथा कठिनाई भरा जीवन 28 मई 1906 को इंदौर में समाप्त हो गया ।
अगली पीढ़ी में लक्ष्मण राव के बेटे कृष्ण राव और चंद्रकांत राव हुए । कृष्ण राव के दो पुत्र मनोहर राव, अरूण राव तथा चंद्रकांत के तीन पुत्र अक्षय चंद्रकांत राव, अतुल चंद्रकांत राव और शांति प्रमोद चंद्रकांत राव हुए ।
दामोदर राव चित्रकार थे उन्होंने अपनी माँ के याद में उनके कई चित्र बनाये हैं जो झाँसी परिवार की अमूल्य धरोहर हैं । लक्ष्मण राव तथा कृष्ण राव इंदौर न्यायालय में टाईपिस्ट का कार्य करते थे ।
अरूण राव मध्यप्रदेश विद्युत मंडल से बतौर जूनियर इंजीनियर 2002 में सेवानिवृत्त हुए हैं । उनका बेटा योगेश राव सॅाफ्टवेयर इंजीनियर है । वंशजों में प्रपौत्र अरुणराव झाँसीवाला, उनकी धर्मपत्नी वैशाली, बेटे योगेश व बहू प्रीति धन्वंतरिनगर इंदौर में रह रहे हैं ।…..

Islam’s BLITZKRIEG in 1947

BLITZKRIEG.

Everyone has heard this word. “Blitzkrieg” literally means “lightning war”. Used in World War 2 it radically changed the mode of static warfare of World War 1 when the front hardly moved one way or the other for years, with millions of soldiers losing their lives trying to move over the enemy trenches.
It has two elements: SURPRISE & SPEED. The aim was to capture TERRITORY with such stunning speed that the adversary had no time to retaliate. It was used to devastating effect in western Europe where the Allies were pushed back to the beaches of Dunkirk and in the attack on Russia – Operation Barbarossa.
That’s what I knew & thought till today morning when I woke up with the horrible thought, “1947 was the year of Blitzkrieg by the followers of Mohammed of Mecca in my own Hindusthan of Sri Krishna and Guru Nanak when the Muslim onslaught unfolded so rapidly that we had no choice but to flee in all directions, leaving our LAND (our sacred “Dharti Mata”) behind to the ENEMY.
We were “led” by the revered worldwide renowned freedom fighter (holy cow or gentle goat) MK Gandhi and the charismatic barrister (fox or wolf) JL Nehru whose conduct and role at the worst ever unconditional surrender of India in 1947 has yet to be examined closely by our nation of conditioned and brainwashed mental slaves out to “appease, surrender and FORGET” as the highest virtues of human life. Overnight one third of India vanished from the map!
Recall how our father of nation, Bapu Gandhi, groveling before “brother” JINN in panic, suggested sharing political power with the fundamentalist separatist Mohammed Ali Jinnah instead of mentioning “secularism, democracy and unity”, or “HIGH TREASON”!
Undoubtedly, deserving entry in Guinness Book of Records, “Partition of India” was the quickest and the most effective ever “Blitzkrieg” when the Indian Muslims, led by barrister Mohammed Ali Jinnah captured ONE THIRD OF INDIA (literally) overnight.
On August 14, 1947 we lived in “Akhand Bharat” with frontier at KHYBER, and on August 15, a day later, India became “Partitioned Indian Secular State” with her Western border down at WAGAH where provocative confrontation between the two countries takes place every evening in the shape of “Changing of Guard” when the two sides remind each other of the CEASE-FIRE that stretched from Karachi to Gilgit in the West and from Chittagong to Sylhet in the East.
Technically our Partitioned India is STILL AT WAR with its ISLAM that began in 712 AD. The last major Islamic offensive of 1947 did not end in any formal treaty of peace but the smoldering fires of conflict in Kashmir with the Islamic forces trying to use it as a new BRIDGEHEAD,  trying to expand and push deeper into Bharat with the aim of capturing of Delhi once again in order to recreate the Mogul Empire that was smashed in 1857 AD (capture of Delhi by the forces under East India Company that banished the last Mogul Emperor, Bahadur Shah Zafar, into exile in Burma).
During World War 2 the Allies in the West quickly recovered their wits and guts in order to confront and overpower the Evil. They did not rest till Berlin, Hamburg, Cologne, Frankfurt and Dresden were reduced to rubble. But the previous centuries of slavery had left the Hindu nation in a Power VACUUM that was no match for the Islamic FORCES of EVIL.
No Hindu (or Sikh) stalwart has ever said during the last seven decades, “The grand COUNTER ATTACK is about to begin to wipe out the Fraud called Partition and shift the frontier from Wagah to Khyber again.”
What made the ISLAMIC “Blitzkrieg” succeed so brilliantly in 1947 with its poisonous after-effect still seen in Kashmir, has never been discussed in Partitioned India’s Parliament or by her President, leave aside any idea of recovering our sacred soil from the crude enemy that is still trapped in the savage sectarian separatist mind-set of the “Jaahil” Arabs of the 7th  century AD.
What do we make out of the charge that there is NO breath left in the body of Bharat to think of the countless ingenious ways and means to shift the frontier from Wagah to Khyber, or to look at the “Indian” Muslims in a new constitutional light or manner?
Now look at the Constitution of “FOX” Nehru written up by DALIT Ambedkar that makes it criminal for anyone to say, “Unite this one billion weak RABBLE, or mob, into a strong united HINDU nation in order to match the Islamic threat to ensure peace & prosperity on the sub continent.”
We should never forget that our immaculately “secular & superior” Constitution came about only after conceding (upon our knees) the full force of ISLAM in Lahore, Karachi and Dhaka!
We wish Dr Ambedkar, whose name is being proposed for the International Airport at New Delhi in preference to that of Guru Tegh Bahadur, had realized that “OUR SECULARISM IN DELHI IS DECENT ONLY IF IMPOSED ON LAHORE FIRST!”
And what are we going to do with the sheep in New Delhi who move about in the ancient capital of Prithvi Raj Chauhan, wearing the lion’s coat, who still don’t call Pakistan “occupied India” and Bangladesh “Bogus Desh”, and fear that recovering North Kashmir by BLITZKRIEG will be inviting own death?
The idea of a new Constitution for “Hindu Rashtra” (so long as we have the two ISLAMIC Rashtras on EITHER side of our MIDDLE India) seems light years away to these “sheep” ruling the land of Shivaji and Guru Gobind Singhji!
Is it not time to disregard this treacherous “Hindu bashing Constitution of Coolies” in order to recall what Sri Krishna said to Arjun at the battle of Kurukshetra and what Guru Gobind Singhji meant by
“Choon kaar az hameh heeleh darguzasht,
halaal ist burden be-shamseer dast!”?*
Rajput
27 May, 2018.
*When all means (to recover our own territory that was surrendered as a result of Islamic “Blitzkrief” of 1947) fail, then it is righteous to draw the sword.”
(NB: “Sword” can be a metaphor for the many intellectual ways of undoing that bogus, undemocratic sectarian Partition that left more Muslims back in Bharat who can be made to do more to undo Partition, than those who got away with their territorial loot in 1947!)

भारतीय सेना में मुसलमान और ओवैसी का बयान

From: Vivek Arya < >

भारतीय सेना में मुसलमान और ओवैसी का बयान

(ओवैसी ने बयान दिया कि भारतीय सेना में मुसलमानों की भर्ती बड़ी संख्या में क्यों नहीं होती? इस सवाल का जवाब आपको इतिहास की विस्मृत घटनाओं से देंगे। ये घटनाएं 1947 में भारत-पाकिस्तान के विभाजन से सम्बंधित है। उस समय में बलूचिस्तान रेजिमेंट में सभी मुस्लिम सिपाही थे। उन्होंने हिन्दुओं के साथ जो बर्ताव किया उसे जानकर पाठकों के रोंगटे खड़े हो जायेंगे। )

अरुण लवनिया

” उन्नीस बीस अगस्त को बलूच फौज आई और हम हिंदुओं को मारना शुरू कर दिया।किसी तरह जान बचाकर हम भारत आ गये।”

विभाजन की पीड़ा याद करते हुये कृष्ण खन्ना ने यह बात पिछले साल स्वतंत्रता दिवस पर जी टी वी पर कही। खन्ना जी के दशकों के प्रयास के बाद उन्हें पाकिस्तान का वीसा मिला था ताकि वो अपने पुश्तैनी घर को देखने की इच्छा पूरी कर सकें। ध्यान दीजिये बलूच फौज जिसे विभाजन के समय हिंदुओं की सुरक्षा करनी थी उसी ने हिंदुओं को मारना शुरू कर दिया था । यही रवैया बलूच रेजिमेंट का हर जगह हिंदू-सिखों के लिये रहा।

देश में पिछले स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी जी के भाषण के पश्चात् देश भर में हिंदी-बलूची भाई-भाई चल रहा है। बलूची भी सोशल मीडिया और अन्य मंचों से हमारा सहयोग पाकिस्तान से आजाद होने के लिये मांग रहे हैं। दोनों पक्षों द्वारा भाईचारे की बात करना प्रशंसनीय है। हो सकता है कि भारत के हित में बलूचिस्तान की आजादी हो या फिर हमारी मदद पाकिस्तान को वहां और उलझा दे ताकि काश्मीर पर दबाव कम हो। वैसे भी जहां अत्याचार हो रहा हो उसके खिलाफ खड़े होना ठीक ही है। भावनाओं से अलग होकर बस राष्ट्र हित में बलूचियों का जितना उपयोग किया जा सके वही उत्तम कूटनीति है।इस प्रयास में साझा हित भी है।

देश के विभाजन के समय बलूचिस्तान का पाकिस्तान में विलय नहीं हुआ था।जब पाकिस्तान ने ऐसा बलपूर्वक किया तो बलूचियों ने बगावत की। बगावत कुचल दी गई तो उन्हें भारत याद आने लगा। तो आइये आज देश के स्वतंत्रता दिवस पर हम भी इतिहास की भूली बिसरी स्मृतियों पर प्रामाणिक दस्तावेजों के माध्यम से दृष्टिपात करें जब देश ने 15 अगस्त 1947 के दिन स्वतंत्र होकर विभाजन का दंश झेला था। इतिहास से सबक सीखकर ही सभी पक्ष आज के इस पावन पर्व पर हिंसा से दूर रहने का संकल्प ले सकते हैं।

विभाजन पश्चात भारत सरकार ने एक तथ्यान्वेषी संगठन बनाया जिसका कार्य था पाकिस्तान छोड़ भारत आये लोगों से उनकी जुबानी अत्याचारों का लेखा जोखा बनाना। इसी लेखा जोखा के आधार पर गांधी हत्याकांड की सुनवाई कर रहे उच्च न्यायालय के जज जी डी खोसला लिखित, 1949 में प्रकाशित , पुस्तक ‘ स्टर्न रियलिटी’ विभाजन के समय दंगों , कत्लेआम,हताहतों की संख्या और राजनैतिक घटनाओं को दस्तावेजी स्वरूप प्रदान करती है। हिंदी में इसका अनुवाद और समीक्षा ‘ देश विभाजन का खूनी इतिहास (1946-47 की क्रूरतम घठनाओं का संकलन)’ नाम से सच्चिदानंद चतुर्वेदी ने किया है। नीचे दी हुयी चंद घटनायें इसी पुस्तक से ली गई हैं जो ऊंट के मुंह में जीरा समान हैं।

* 11 अगस्त 1947 को सिंध से लाहौर स्टेशन पह़ुंचने वाली हिंदुओं से भरी गाड़ियां खून का कुंड बन चुकी थीं।अगले दिन गैर मुसलमानों का रेलवे स्टेशन पहुंचना भी असंभव हो गया।उन्हें रास्ते में ही पकड़कर कत्ल किया जाने लगा।इस नरहत्या में बलूच रेजिमेंट ने प्रमुख भूमिका निभाई।14और 15 अगस्त को रेलवे स्टेशन पर अंधाधुंध नरमेध का दृश्य था।एक गवाह के अनुसार स्टेशन पर गोलियों की लगातार वर्षा हो रही थी। मिलिट्री ने गैर मुसलमानों को स्वतंत्रता पूर्वक गोली मारी और लूटा।

* 19 अगस्त तक लाहौर शहर के तीन लाख गैर मुसलमान घटकर मात्र दस हजार रह गये थे। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति वैसी ही बुरी थी।पट्टोकी में 20 अगस्त को धावा बोला गया जिसमें ढाई सौ गैर मुसलमानों की हत्या कर दी गई।गैर मुसलमानों की दुकानों को लूटकर उसमें आग लगा दी गई।इस आक्रमण में बलूच मिलिट्री ने भाग लिया था।

* 25 अगस्त की रात के दो बजे शेखपुरा शहर जल रहा था। मुख्य बाजार के हिंदू और सिख दुकानों को आग लगा दी गई थी।सेना और पुलिस घटनास्थल पर पहुंची। आग बुझाने के लिये अपने घर से बाहर निकलने वालों को गोली मारी जाने लगी। उपायुक्त घटनास्थल पर बाद में पहुंचा। उसने तुरंत कर्फ्यू हटाने का निर्णय लिया और उसने और पुलिस ने यह निर्णय घोषित भी किया।लोग आग बुझाने के लिये दौड़े।पंजाब सीमा बल के बलूच सैनिक, जिन्हें सुरक्षा के लिए लगाया गया था, लोगों पर गोलियाँ बरसाने लगे।एक घटनास्थल पर ही मर गया , दूसरे हकीम लक्ष्मण सिंह को रात में ढाई बजे मुख्य गली में जहाँ आग जल रही थी , गोली लगी।अगले दिन सुबह सात बजे तक उन्हें अस्पताल नहीं ले जाने दिया गया।कुछ घंटों में उनकी मौत हो गई।

* गुरुनानक पुरा में 26 अगस्त को हिंदू और सिखों की सर्वाधिक व्यवस्थित वध की कार्यवाही हुई।मिलिट्री द्वारा अस्पताल में लाये जाने सभी घायलों ने बताया कि उन्हें बलूच सैनिकों द्वारा गोली मारी गयी या 25 या 26 अगस्त को उनकी उपस्थिति में मुस्लिम झुंड द्वारा छूरा या भाला मारा गया। घायलों ने यह भी बताया कि बलूच सैनिकों ने सुरक्षा के बहाने हिंदू और सिखों को चावल मिलों में इकट्ठा किया।इन लोगों को इन स्थानों में जमा करने के बाद बलूच सैनिकों ने पहले उन्हें अपने कीमती सामान देने को कहा और फिर निर्दयता से उनकी हत्या कर दी।घायलों की संख्या चार सौ भर्ती वाले और लगभग दो सौ चलंत रोगियों की हो गई। इसके अलावा औरतें और सयानी लड़कियाँ भी थीं जो सभी प्रकार से नंगी थीं।सर्वाधिक प्रतिष्ठित घरों की महिलाएं भी इस भयंकर दु:खद अनुभव से गुजरी थीं।एक अधिवक्ता की पत्नी जब अस्पताल में आई तब वस्तुतः उसके शरीर पर कुछ भी नहीं था।पुरुष और महिला हताहतों की संख्या बराबर थी।हताहतों में एक सौ घायल बच्चे थे।

* शेखपुरा में 26 अगस्त की सुबह सरदार आत्मा सिंह की मिल में करीब सात आठ हजार गैर मुस्लिम शरणार्थी शहर के विभिन्न भागों से भागकर जमा हुये थे। करीब आठ बजे मुस्लिम बलूच मिलिट्री ने मिल को घेर लिया।उनके फायर में मिल के अंदर की एक औरत की मौत हो गयी।उसके बाद कांग्रेस समिति के अध्यक्ष आनंद सिंह मिलिट्री वालों के पास हरा झंडा लेकर गये और पूछा आप क्या चाहते हैं। मिलिट्री वालों ने दो हजार छ: सौ रुपये की मांग की जो उन्हें दे दिया गया।इसके बाद एक और फायर हुआ ओर एक आदमी की मौत हो गई। पुन: आनंद सिंह द्वारा अनुरोध करने पर बारह सौ रुपये की मांग हुयी जो उन्हें दे दिया गया। फिर तलाशी लेने के बहाने सबको बाहर निकाला गया।सभी सात-आठ हजार शरणार्थी बाहर निकल आये।सबसे अपने कीमती सामान एक जगह रखने को कहा गया।थोड़ी ही देर में सात-आठ मन सोने का ढेर और करीब तीस-चालीस लाख जमा हो गये।मिलिट्री द्वारा ये सारी रकम उठा ली गई।फिर वो सुंदर लड़कियों की छंटाई करने लगे।विरोध करने पर आनंद सिंह को गोली मार दी गयी।तभी एक बलूच सैनिक द्वारा सभी के सामने एक लड़की को छेड़ने पर एक शरणार्थी ने सैनिक पर वार किया।इसके बाद सभी बलूच सैनिक शरणार्थियों पर गोलियाँ बरसाने लगे।अगली पांत के शरणार्थी उठकर अपनी ही लड़कियों की इज्जत बचाने के लिये उनकी हत्या करने लगे।

* 1अक्टूबर की सुबह सरगोधा से पैदल आने वाला गैर मुसलमानों का एक बड़ा काफिला लायलपुर पार कर रहा था।जब इसका कुछ भाग रेलवे फाटक पार कर रहा था अचानक फाटक बंद कर दिया गया।हथियारबंद मुसलमानों का एक झुंड पीछे रह गये काफिले पर टूट पड़ा और बेरहमी से उनका कत्ल करने लगा।रक्षक दल के बलूच सैनिकों ने भी उनपर फायरिंग शुरु कर दी।बैलगाड़ियों पर रखा उनका सारा धन लूट लिया गया।चूंकि आक्रमण दिन में हुआ था , जमीन लाशों से पट गई।उसी रात खालसा कालेज के शरणार्थी शिविर पर हमला किया गया। शिविर की रक्षा में लगी सेना ने खुलकर लूट और हत्या में भाग लिया।गैर मुसलमान भारी संख्या में मारे गये और अनेक युवा लड़कियों को उठा लिया गया।

* अगली रात इसी प्रकार आर्य स्कूल शरणार्थी शिविर पर हमला हुआ। इस शिविर के प्रभार वाले बलूच सैनिक अनेक दिनों से शरणार्थियों को अपमानित और उत्पीड़ित कर रहे थे।नगदी और अन्य कीमती सामानों के लिये वो बार बार तलाशी लेते थे। रात में महिलाओं को उठा ले जाते और बलात्कार करते थे। 2अक्टूबर की रात को विध्वंश अपने असली रूप में प्रकट हुआ।शिविर पर चारों ओर से बार-बार हमले हुये।सेना ने शरणार्थियों पर गोलियाँ बरसाईं। शिविर की सारी संपत्ति लूट ली गई।मारे गये लोगों की सही संख्या का आकलन संभव नहीं था क्योंकि ट्रकों में बड़ी संख्या में लादकर शवों को रात में चेनाब में फेक दिया गया था।

* करोर में गैर मुसलमानों का भयानक नरसंहार हुआ। 7 सितंबर को जिला के डेढ़ेलाल गांव पर मुसलमानों के एक बड़े झुंड ने आक्रमण किया।गैर मुसलमानों ने गांव के लंबरदार के घर शरण ले ली। प्रशासन ने मदद के लिये दस बलूच सैनिक भेजे। सैनिकों ने सबको बाहर निकलने के लिये कहा।वो ओरतों को पुरूषों से अलग रखना चाहते थे। परंतु दो सौ रूपये घूस लेने के बाद औरतों को पुरूषों के साथ रहने की अनुमति दे दी। रात मे सैनिकों ने औरतों से बलात्कार किया।9 सितंबर को सबसे इस्लाम स्वीकार करने को कहा गया। लोगों ने एक घर में शरण ले ली। बलूच सैनिकों की मदद से मुसलमानों ने घर की छत में छेद कर अंदर किरोसिन डाल आग लगा दी।पैंसठ लोग जिंदा जल गये।

यह लेख तो केवल कुछ चुनिंदा विस्मृत घटनाओं का संकलन हैं। पाकिस्तान के पंजाब में तो प्राय: हर हिन्दू-सिख के घरों मैं यह मौत का तांडव 1947 में हुआ था। हिन्दू तो सदा से ही अपनी पीड़ा भूलकर मानव मात्र के हित के लिये संघर्ष करता रहा है। पिछले 1200 वर्षों से लगातार अराजकता और मतान्ध संकीर्णता को झेलते आये हैं।

मुसलमानों द्वारा हिन्दू हत्याएं

From: Chandar Kohli < >

मुसलमानों द्वारा हिन्दू हत्याएं—

१. सन् 1018 में मुस्लिम तुर्कीयों का आक्रमण और मुस्लिम अब्दुल कासिम महमुद(महमुद गजनी) के द्वारा 50 हजार हिन्दुओं का कत्ल, हजारो स्त्रियों के साथ दुराचार व लगभग १ हजार मन्दिरो को नष्ट करना।।।

२. सन् 1024 मे महमुद गजनी का पुन: आक्रमण और 50 हजार हिन्दुओं का कत्ल, सोमनाथ मन्दिर की लुट, और मन्दिर को तोड़ देना ।।।
३. सन् 1193 मे मुहमद गौरी का आक्रमण और 1 लाख हिन्दुओं का कत्ल ।
४. सन् 1196 कुतुब अल दीन ऐबक का आक्रमण और 1 लाख से ज्यादा हिन्दुओं का कत्ल ।।
५. सन् 1197 मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी का अाक्रमण करके नालन्दा विश्वविधालय को धव्स्त करना और 10 हजार हिन्दु और बौद्धष्ठो का कत्ल।।
६. गयासुद्दीन बलबन का आक्रमण और मेवात के 1 लाख राजपुतो का कत्ल करना।।
७. सन् 1323 मे मुहम्मद बिन तुगलक के द्वारा 12 हजार हिन्दुओं का कत्ल ।।
८. सन् 1353 मे फिरोज शाह तुगलक के द्वारा 1 लाख 80 हजार हिन्दुओं का कत्ल ।।
९. सन् 1366 में बहमनी सल्तनत के द्वारा 5 लाख हिन्दुओं का कत्ल, गर्भवती स्त्रियों का पेट काटना, और हिन्दु महिलाओं के साथ दुराचार ।।
१०. सन् 1398 तैमुर का भारत पर आक्रमण करके 45 लाख हिन्दुओं का हरियाणा मे कत्ल करना।।
११. सन् 1398 मे तैमुर द्वारा पर भटनेर के किले पर आक्रमण करके सम्पुर्ण आबादी का सफाया।
१२. सन् 1398 मे ही तैमुर द्वारा गाजियाबाद के निकट लगभग 1 लाख स्त्रियों और बच्चो का दुराचार के बाद कत्ल करना।। ।
१३. सन् 1398 मे तैमुर द्वारा दिल्ली मे 1.5 लाख हिन्दु समेत अन्य धर्मो के लोगो का कत्ल।।
१४. सन् 1399 में तैमुर मेरठ में द्वारा 3 लाख हिन्दुओं का कत्ल, और लाखो स्त्रियों के साथ दुराचार ।।
१५. मार्च 1527 खानवा के युद्ध मे बाबर की सेना द्वारा 20 हजार हिन्दुओं की हत्या, जिसमे से 10 हजार राजपुत सैनिक बलिदान हुये।।
१६. सन् 1560 मे अकबर द्वारा नरसिंहपुर जिले मे 48 हजार हिन्दुओं की हत्या, मुख्यत: राजपुत मारे गये।।
१७. सन् 1565 मे दक्कन के सुलतान द्वारा 1 लाख से अधिक हिन्दुओं का नरसंहार और सभी मुख्य मन्दिरो को ध्वस्त करना।।
१८. सन् 1568 अकबर द्वारा किये गये आक्रमण मे चितौड़ केे 30 हजार राजपुतो का नरसंहार, और 8 हजार स्त्रियों का हरम मे जाने से बचने के लिये स्वयं को समापत कर लेना।।

१९. सन् 1618 से 1707 के मध्य मुगल साम्रज्य और ओरंगजेब के द्वारा 46 लाख हिन्दुओं की हत्या, लगभग 15 लाख ब्राहम्ण की हत्या काशी, हरिद्वार व अन्य स्थानो पर।।
२०. सन् 1738 से लेकर 1740 के मध्य नादिर शाह( फारसीयो द्वारा) के द्वारा 3 लाख हिन्दुओं की हत्या।।

२१. सन् १७६१ मे अफगानो के आक्रमण पर मराठो के साथ युद्ध मे 70 हजार मराठों का बलिदान होना, और 22 हजा

अनुसूचित जाति ब्राह्मण व क्षत्रियों के वंशज है .

Vishwas Pitke < >

 

डॉ सुब्रहमनियन स्वामी लिखते हैं,

 

” अनुसूचित जाति उन्हीं बहादुर ब्राह्मण व क्षत्रियों के वंशज है, जिन्होंने जाति से बाहर होना स्वीकार किया, लेकिन मुगलों के जबरन धर्म परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया। आज के हिंदू समाज को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए, उन्हें कोटिश: प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि उन लोगों ने हिंदू के भगवा ध्वज को कभी झुकने नहीं दिया, भले ही स्वयं अपमान व दमन झेला।”

 

★ प्रख्यात साहित्यकार अमृत लाल नागर ने अनेक वर्षों के शोध के बाद पाया कि जिन्हें “भंगी”, “मेहतर” आदि कहा गया, वे ब्राहम्ण और क्षत्रिय थे।

 

★ स्टेनले राइस ने अपने पुस्तक “हिन्दू कस्टम्स एण्ड देयर ओरिजिन्स” में यह भी लिखा है कि अछूत मानी जाने वाली जातियों में प्राय: वे बहादुर जातियां भी हैं, जो मुगलों से हारीं तथा उन्हें अपमानित करने के लिए मुसलमानों ने अपने मनमाने काम करवाए थे।

★ गाजीपुर के श्री देवदत्त शर्मा चतुर्वेदी ने सन् 1925 में एक पुस्तक लिखी थी जिसका नाम ‘पतित प्रभाकर’ अर्थात मेहतर जाति का इतिहास था।

★ इस छोटी-सी पुस्तक में “भंगी”, “मेहतर”, “हलालखोर”, “चूहड़” आदि नामों से जाने गए लोगों की किस्में दी गई हैं,

जो इस प्रकार हैं (पृ. 22-23) नाम जाति भंगी- वैस, वैसवार, बीर गूजर (बग्गूजर), भदौरिया, बिसेन, सोब, बुन्देलिया, चन्देल, चौहान, नादों, यदुबंशी, कछवाहा, किनवार-ठाकुर, बैस, भोजपुरी राउत, गाजीपुरी राउत, गेहलौता, मेहतर, भंगी, हलाल, खरिया, चूहड़- गाजीपुरी, राउत, दिनापुरी राउत, टांक, गेहलोत, चन्देल, टिपणी।

★ इन जातियों के जो यह सब भेद हैं, वह सबके सब क्षत्रिय जाति के ही भेद या किस्म हैं।

(देखिए ट्राइब एण्ड कास्ट आफ बनारस, छापा सन् 1872 ई.)

 

यह भी देखिए कि सबसे अधिक इन अनुसूचित जातियों के लोग आज के उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्य भारत में है, जहां मुगलों के शासन का सीधा हस्तक्षेप था और जहां सबसे अधिक धर्मांतरण हुआ।

 

आज सबसे अधिक मुस्लिम आबादी भी इन्हीं प्रदेशों में है, जो धर्मांतरित हो गये थे। हमलोगों ने जिन भंगी और मेहतर जाति को अछूत करार दिया और जिनके हाथ का छुआ तक आज भी बहुत सारे हिंदू नहीं खाते, उनका पूरा इतिहास साहस, त्याग और बलिदान से भरा पड़ा है।

 

मुगल काल में ब्राह्मणों और क्षत्रियों को दो रास्ते दिए गए, या तो इस्लाम कबूल करो या फिर मुसलमानों का मैला ढोओ क्योंकि तब भारतीय समाज में इन दोनों समुदायों का अत्यंत सम्मान था और इनके लिए ऐसा घृणित कार्य करना मर जाने के समान था। इसीलिए मुगलों ने इनके धर्मान्तरण के लिए यह तरीका अपनाया।

 

आप किसी भी मुगल किले में चले जाओ वहां आपको शौचालय नहीं मिलेगा। जबकि हजारों साल पुरानी हिंदुओं की उन्नत सिंधु घाटी सभ्यता के खण्डहरों में रहने वाले कमरे से सटा शौचालय मिलता है।

 

सुल्तानों और मुगलों को शौचालय निर्माण का ज्ञान तक नहीं था। दिल्ली सल्तनत में बाबर, अकबर, शाहजहाँ से लेकर सभी मुगल बादशाह बर्तनों में शौच करते थे, जिन्हें उन ब्राहम्णों और क्षत्रियों के परिजनों से फिकवाया जाता था,

जिन्होंने मरना तो स्वीकार कर लिया था, लेकिन इस्लाम को अपनाना नहीं। जिन ब्राहमणों और क्षत्रियों ने मैला ढोने की प्रथा को स्वीकार करने के उपरांत अपने जनेऊ को तोड़ दिया, अर्थात उपनयन संस्कार को भंग कर दिया, वो भंगी कहलाए।

 

और मेहतर- इनके उपकारों के कारण। तत्कालिन हिंदू समाज ने इनके मैला ढोने की नीच प्रथा को भी ‘महत्तर’ अर्थात महान और बड़ा करार दिया था, जो अपभ्रंश रूप में ‘मेहतर’ हो गया।

 

भारत में 1000 ईस्वी में केवल 1 फीसदी अछूत जाति थी, लेकिन मुगल वंश की समाप्ति होते-होते इनकी संख्या 14 फीसदी हो गई। आपने सोचा कि ये 13 प्रतिशत की बढोत्तरी मुगल शासन में कैसे हो गई। जो हिंदू डर और अत्याचार के मारे इस्लाम धर्म स्वीकार करते चले गए, उन्हीं के वंशज आज भारत में मुस्लिम आबादी हैं।

 

जिन ब्राह्मणों और क्षत्रियों ने मरना स्वीकार कर लिया उन्हें काट डाला गया और उनके असहाय परिजनों को इस्लाम कबूल नहीं करने की सजा के तौर पर अपमानित करने के लिए नीच मैला ढोने के कार्य में धकेल दिया गया।

वही लोग भंगी और मेहतर कहलाए। क्या आप सभी खुद को हिंदू कहने वाले लोग उस अनुसूचित जाति के लोगों को आगे

बढ़कर गले लगाएंगे, उनसे रोटी का संबंध रखेंगे। यदि आपने यह नहीं किया तो समझिए, हिंदू समाज कभी एक नहीं हो पाएगा और एक अध्ययन के मुकाबले 2061 से आप इसी देश में अल्पसंख्यक होना शुरू हो जाएंगे। इसलिए भारतीय व हिंदू मानसिकता का विकास कीजिए और अपने सच्चे इतिहास से जुड़िए आज हिंदू समाज को अंग्रेजों और वामपंथियों के लिखे पर इतना भरोसा हो गया कि उन्होंने खुद ही अपना स्वाभिमान कुचल लिया और अपने ही भाईयों को अछूत बना डाला। आज भी पढे लिखे और उच्च वर्ण के हिंदू जातिवादी बने हुए हैं, लेकिन वह नहीं जानते कि यदि आज यदि वह बचे हुए हैं तो अपने ऐसे ही भाईयों के कारण जिन्होंने नीच कर्म करना तो स्वीकार किया, लेकिन इस्लाम को नहीं अपनाया।

 

आज भारत में 23 करोड़ मुसलमान हैं और लगभग 30 करोड़ अनुसूचित जातियों के लोग हैं। जरा सोचिये इन लोगों ने भी मुगल अत्याचारों के आगे हार मान ली होती और मुसलमान बन गये होते तो आज भारत में मुस्लिम जनसंख्या 50 करोड़ के पार होती और आज भारत एक मुस्लिम राष्ट्र बन चुका होता। यहाँ भी जेहाद का बोलबाला होता और ईराक, सीरिया, सोमालिया, पाकिस्तान और अफगानिस्तान आदि देशों की तरह बम-धमाके, मार-काट और खून-खराबे का माहौल होता। हम हिन्दू या तो मार डाले जाते या फिर धर्मान्तरित कर दिये जाते या फिर हमें काफिर के रूप में अत्यंत ही गलीज जिन्दगी मिलती। कृपया अपना वास्तविक इतिहास जानिए और इससे सबक लीजिए क्योंकि इतिहास खुद को दोहराता जरूर है। धन्य हैं हमारे ये भाई जिन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी अत्याचार और अपमान सहकर भी हिन्दुत्व का गौरव बचाये रखा और तरह-तरह से भारतवासियों की सेवा की। हमारे अनुसूचित जाति के भाइयों को मेरी तरफ से शत्-शत् प्रणाम और दिल से सैल्यूट।

 

1921 में केरल में मोपला के दंगे हुए।

From: Vivek Arya < >

मालाबार और आर्यसमाज

1921 में केरल में मोपला के दंगे हुए। मालाबार में रहने वाले मुसलमान जिन्हें मोपला कहा जाता था मस्जिद के मौलवी के आवाहन पर जन्नत के लालच में हथियार लेकर हिन्दू बस्तियों पर आक्रमण कर देते हैं। पहले इस्लाम ग्रहण करने का प्रलोभन दिया जाता हैं और हिन्दुओं की चोटी-जनेऊ को काट कर अपनी जिहादी पिपासा को शांत किया गया और जिस हिन्दू ने धर्मान्तरण से इंकार कर दिया उसे मार दिया गया, उसकी संपत्ति लूट ली गई और उसके घर को जला दिया गया। करीब 5000 हिन्दुओं का कत्लेआम करने एवं हज़ारों हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षित करने के बाद मालाबार में मुसलमानों ने समानांतर सरकार चलाई और अंग्रेज सरकार वहां नामोनिशान तक नहीं था। गांव के गांव का यही हाल था। अंत में अंग्रेजों की विशाल टुकड़ी मुसलमानों का मुकाबला करने मैदान में उतरी और इस्लामिक शरिया के इलाके को मुक्त किया गया। हिन्दुओं की व्यापक हानि हुई। उनकी धन सम्पत्ति लूट ली गई, उनके खेत जला दिए गए, उनके परिवार के सदस्यों को मार डाला गया एवं बचे खुचो को मुसलमान बना दिया गया था। त्रासदी इतनी व्यापक थी कि हिन्दुओं की लाशों से कुँए भर गए। केरल में हुई इस घटना की जानकारी अनेक हफ़्तों तक उत्तर भारत नहीं पहुंची। आर्यसमाज के शीर्घ नेताओं को लाहौर में जब इस घटना के विषय में मालूम चला तो पंडित ऋषिराम जी एवं महात्मा आनंद स्वामी जी को राहत सामग्री देकर सुदूर केरल भेजा गया। वहां पर उन्होंने आर्यसमाज की और से राहत शिविर की स्थापना करी जिसमें भोजन की व्यवस्था करी गई, जिन्हें जबरन मुसलमान बनाया गया था उन्हें शुद्ध कर वापिस से हिन्दू बनाया गया। आर्यसमाज के रिकार्ड्स के अनुसार करीब 5000 हिन्दुओं को वापिस से शुद्ध किया गया। इस घटना का यह परिणाम हुआ की हिन्दू समाज में आर्यसमाज को धर्म रक्षक के रूप में पहचाना गया। जो लोग आर्यसमाज के द्वारा करी गई शुद्धि का विरोध करते थे वे भी आर्यसमाज के हितैषी एवं प्रशंसक बन गए। सुदूर दक्षिण में करीब 4000 किलोमीटर दूर जाकर हिन्दू समाज के लिए जो सेवा करी उसके लिए मदन मोहन मालवीया जी, अनेक शंकराचार्यों, धर्माचार्यों आदि ने आर्यसमाज की प्रशंसा करी। समय की विडंबना देखिये केरल में 1947 के पश्चात बनी सेक्युलर कम्युनिस्ट सरकार ने मोपला के दंगों में अंग्रेजों द्वारा मारे गए मुसलमानों को क्रांतिकारी की परिभाषा देकर उन्हें स्वतंत्रता सैनानी की सुविधा जैसे पेंशन आदि देकर हिन्दुओं के जख्मों पर नमक लगाने का कार्य किया। आज भी केरल में उन अनेक मंदिरों में उन अवशेषों को जिनमें इस्लामिक दंगाइयों ने नष्ट किया था सुरक्षित रखा गया हैं ताकि आने वाली पीढ़ियां उस अत्याचार को भूल न सके।

आर्यसमाज द्वारा एक पुस्तक मालाबार और आर्यसमाज प्रकाशित की गई जिसमें मालाबार में हिन्दुओं पर हुए अत्याचार, कत्लेआम, राहत , शुद्धि आदि पर प्रामाणिक जानकारी देकर जनसाधारण को धर्म रक्षा के लिए संगठित होने की प्रेरणा दी गई।

डॉ विवेक आर्य

इस पुस्तक के पीडीएफ को नीचे दिए गए लिंक पर जाकर (Download) डाउनलोड किया जा सकता है।

https://archive.org/details/AryasamajAndMalabar

https://archive.org/details/MoplahRebellion1921_201806

सलंग्न चित्र- मोपला दंगों में हिन्दू समाज की आप्तकाल में रक्षा हेतु लगाये गए रक्षा शिविर का दृश्य।

A Yogi Defied Alexander (the Great?)

From: Guvindra Singh < >

 

Alexander III of Macedonia, in his belief that it was his destiny to conquer and rule the world, caused much destruction and misery.

Its unfortunate that historians and many leaders glorify pillaging, death and destruction, even referring to him as ‘Alexander the Great’.

Aristotle the teacher and guide of Alexander had told him that, in India lived great mystical, intellectual and spiritual super beings called Yogis. He told Alexander if he ever got the opportunity, to go and meet a Yogi, and if possible to even bring one back to Greece for Aristotle to meet.

Upon enquiry, whilst in India, Alexander learnt about the great and wise sage, Yogi Dandini, who dwelled deep in a forest.

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Alexander sent numerous summons to Yogi Dandini, which he promptly ignored.
Alexander who could strike fear in the hearts and minds of great armies and kings was intrigued. He became desperate to meet this being who assigned no importance to Alexander.

Alexander next sent messengers with lavish gifts and an invitation to Yogi Dandini for a discourse and discussion on philosophy. Yogi Dandini, politely declined both the gifts and the invitation.

Though angry Alexander, a pupil of the great philosopher and teacher Aristotle, knew very well that, great beings could rarely be lured or coerced.

Finally Alexander sent his helmsman, Onesicritus, to invite Dandini, who lavished praise and gifts on Yogi Dandini. When Yogi Dandini declined his invitation and gifts, Onesicritus threatened the yogi. He said that Alexander had ordered the beheading of the yogi should the orders of the emperor be disobeyed.

Yogi Dandini remained unperturbed, stating, he had no fear of death. Onesicritus couldn’t muster the courage to kill the Yogi, and, instead, paid his respects to the Yogi and went back to report the incident to Alexander.

Livid at being rejected by a naked forest-dweller, Alexander decided to go to Dandini himself. With his Marshal and a large entourage, Alexander made his way deep into the forest.
Even though he experienced the powerful aura of Yogi Dandini, Alexander grew furious when the sage did not get up to welcome him.

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Sadhu with activated Anjana Chakra m2v

Yogi ji

“How dared you refuse my gifts?” Alexander demanded.
“They were smeared in blood.” replied the yogi.

The chilling truth, and fearless conviction in Dandini’s voice, rattled Alexander. Alexander could not let his men overhear the embarrassing exchange, so he ordered them to move some distance away.

Then, when he was alone with Yogi Dandini, Alexander dismounted from his horse, walked towards the sitting sage and menacingly stood over him.

“Do you know who I am?” Alexander roared.
“I don’t think even you know, who you are.” replied Yogi Dandini.

Alexander felt deeply insulted. He drew his sword and swung it at Yogi Dandini, stopping just before it struck the Yogi’s neck.

“I am Alexander, the world conqueror,” he shouted. “You are sitting on my land. Submit or I’ll kill y­ou … ”

“Your land?” Dandini chuckled as he cut him off. “The land belongs to no one, O King!”
“Before you, there were others who claimed it as theirs,” he continued. “After you, there’ll be others who will say it’s theirs.

All creation belongs to the Creator alone, Alexander. And no one has any right to destroy what they haven’t created. You have blood on your hands,

O Emperor! You may have a temporary claim on the land, but you have permanent scars on your soul.”

Clearing his throat, a flustered and uncomfortable Alexander lowered his sword and adjusted his posture.

“The whole world is mine, Dandini,” Alexander exclaimed. “History will remember me as the mightiest king! My men can die for me!”

“What good is your ambition or their remembrance, O King? You drown yourself in alcohol every evening so you may forget about your crimes and sins. These men who surround you, they are tired of you. You will see it, they’ll give up on you one day, in fact very soon.”

“Besides,” Dandini continued, “what will you do with the world? All you need is two yards. Two yards long and two yards deep. Ultimately that’s all that will belong to you.”

Confused, humbled and defeated, Alexander sheathed his sword, bobbed his head before Yogi Dandini and left.

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Barely a few months had passed when his army mutinied bringing an abrupt end to his campaign in India. Three years later, Alexander died at the age of thirty-three as he tried to return to Greece.

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Readers interested in getting full details of the conversation between the Sage Yogi Dandini and Alexander may refer to the historical account provided in the work, ‘The Legends of Alexander the Great’ by Richard Stoneman

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Written and posted : June 2018 by Gurvinder Singh

भारतीय मुसल्मानों के हिन्दु पूर्वज मुसलमान कैसे बने?

From: Vivek Arya < >

भारतीय मुसल्मानों के हिन्दु पूर्वज मुसलमान कैसे बने?

दुबई में मैरियट होटल के विश्व प्रसिद्द भारतीय शेफ अतुल कोचर ने प्रियंका चोपड़ा के क्वांटिको नाटक में हिन्दुओं को आतंकवादी के रूप में प्रदर्शित करने पर प्रतिक्रिया रूप में अपना ट्वीट किया। इस ट्वीट में अतुल ने प्रियंका को पिछले 2000 वर्षों में हिन्दुओं पर मुसलमानों द्वारा किये गए अत्याचारों को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया। इस्लामिक देश में अतुल के ट्वीट के बदले उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया और उन पर क़ानूनी कार्यवाही करने पर विचार किया जा रहा हैं। देखा जाये तो यह प्रयास एक प्रकार से केवल अतुल कोचर ही नहीं अपितु समस्त हिन्दू समाज को आतंकित करने का प्रयास हैं। अतुल ने कुछ भी गलत नहीं कहा। अगर आप हमारे देश के इतिहास को उठाकर देखेंगे तो आपको ज्ञात होगा कि किस प्रकार से हमारे पूर्वजों ने अनगिनत अत्याचार इस्लाम के नाम पर सहे हैं। और आज भी सह रहे है। इस लेख के माध्यम से उन अत्याचारों का बखान किया जायेगा जिन्हें हमारे देश के पाठयक्रम में न तो पढ़ाया जाता हैं।  न हो बताया जाता है। यह एक प्रकार से हिन्दू समाज के मानवाधिकारों की अनदेखी ही हैं।

इस लेख में हम इस्लमिक आक्रान्ताओं के अत्याचारों को सप्रमाण देकर यह सिद्ध करेंगे की भारतीय मुसलमानों के पूर्वज हिन्दू थे एवं उनके पूर्वजों पर इस्लामिक आक्रान्ताओं ने अनेक अत्याचार कर उन्हें जबरन धर्म परिवर्तन के लिए विवश किया था। अनेक मुसलमान भाइयों का यह कहना हैं कि भारतीय इतिहास मूलत: अंग्रेजों द्वारा रचित हैं। इसलिए निष्पक्ष नहीं है। यह असत्य है। क्यूंकि अधिकांश मुस्लिम इतिहासकार आक्रमणकारियों अथवा सुल्तानों के वेतन भोगी थे। उन्होंने अपने आका की अच्छाइयों को बढ़ा-चढ़ाकर लिखना एवं बुराइयों को छुपाकर उन्होंने अपनी स्वामी भक्ति का भरपूर परिचय दिया हैं। तथापि इस शंका के निवारण के लिए हम अधिकाधिक मुस्लिम इतिहासकारों के आधार पर रचित अंग्रेज लेखक ईलियट एंड डाउसन द्वारा संगृहीत एवं प्रामाणिक समझी जाने वाली पुस्तकों का इस लेख में प्रयोग करेंगे।

भारत पर 7वीं शताब्दी में मुहम्मद बिन क़ासिम से लेकर 18वीं शताब्दी में अहमद शाह अब्दाली तक करीब 1200 वर्षों में अनेक आक्रमणकारियों ने हिन्दुओं पर अनगिनत अत्याचार किये। धार्मिक, राजनैतिक एवं सामाजिक रूप से असंगठित होते हुए भी हिन्दू समाज ने मतान्ध अत्याचारियों का भरपूर प्रतिकार किया। सिंध के राजा दाहिर और उनके बलिदानी परिवार से लेकर वीर मराठा पानीपत के मैदान तक अब्दाली से टकराते रहे। आक्रमणकारियों का मार्ग कभी भी निष्कंटक नहीं रहा अन्यथा सम्पूर्ण भारत कभी का दारुल इस्लाम (इस्लामिक भूमि) बन गया होता। आरम्भ के आक्रमणकारी यहाँ आते, मारकाट -लूटपाट करते और वापिस चले जाते। बाद की शताब्दियों में उन्होंने न केवल भारत को अपना घर बना लिया अपितु राजसत्ता भी ग्रहण कर ली। इस लेख में हम कुछ आक्रमणकारियों जैसे मौहम्मद बिन कासिम,महमूद गजनवी, मौहम्मद गौरी और तैमूर के अत्याचारों की चर्चा करेंगे।

मौहम्मद बिन कासिम

भारत पर आक्रमण कर सिंध प्रान्त में अधिकार प्रथम बार मुहम्मद बिन कासिम को मिला था।उसके अत्याचारों से सिंध की धरती लहूलुहान हो उठी थी। कासिम से उसके अत्याचारों का बदला राजा दाहिर की दोनों पुत्रियों ने कूटनीति से लिया था।

1. प्रारंभिक विजय के पश्चात कासिम ने ईराक के गवर्नर हज्जाज को अपने पत्र में लिखा-‘दाहिर का भतीजा, उसके योद्धा और मुख्य मुख्य अधिकारी कत्ल कर दिये गये हैं। हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षित कर लिया गया है, अन्यथा कत्ल कर दिया गया है। मूर्ति-मंदिरों के स्थान पर मस्जिदें खड़ी कर दी गई हैं। अजान दी जाती है। [i]

2. वहीँ मुस्लिम इतिहासकार आगे लिखता है- ‘मौहम्मद बिन कासिम ने रिवाड़ी का दुर्ग विजय कर लिया। वह वहाँ दो-तीन दिन ठहरा। दुर्ग में मौजूद 6000 हिन्दू योद्धा वध कर दिये गये, उनकी पत्नियाँ, बच्चे, नौकर-चाकर सब कैद कर लिये (दास बना लिये गये)। यह संख्या लगभग 30 हजार थी। इनमें दाहिर की भानजी समेत 30 अधिकारियों की पुत्रियाँ भी थी[ii]।

महमूद गजनवी

मुहम्मद गजनी का नाम भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वी राज चौहान को युद्ध में हराने और बंदी बनाकर अफगानिस्तान लेकर जाने के लिए प्रसिद्द है। गजनी मजहबी उन्माद एवं मतान्धता का जीता जागता प्रतीक था।

1. भारत पर आक्रमण प्रारंभ करने से पहले इस 20 वर्षीय सुल्तान ने यह धार्मिक शपथ ली कि वह प्रति वर्ष भारत पर आक्रमण करता रहेगा, जब तक कि वह देश मूर्ति और बहुदेवता पूजा से मुक्त होकर इस्लाम स्वीकार न कर ले। अल उतबी इस सुल्तान की भारत विजय के विषय में लिखता है-‘अपने सैनिकों को शस्त्रास्त्र बाँट कर अल्लाह से मार्ग दर्शन और शक्ति की आस लगाये सुल्तान ने भारत की ओर प्रस्थान किया। पुरुषपुर (पेशावर) पहुँचकर उसने उस नगर के बाहर अपने डेरे गाड़ दिये[iii]।

2. मुसलमानों को अल्लाह के शत्रु काफिरों से बदला लेते दोपहर हो गयी। इसमें 15000 काफिर मारे गये और पृथ्वी पर दरी की भाँति बिछ गये जहाँ वह जंगली पशुओं और पक्षियों का भोजन बन गये। जयपाल के गले से जो हार मिला उसका मूल्य 2 लाख दीनार था। उसके दूसरे रिद्गतेदारों और युद्ध में मारे गये लोगों की तलाशी से 4 लाख दीनार का धन मिला। इसके अतिरिक्त अल्लाह ने अपने मित्रों को 5 लाख सुन्दर गुलाम स्त्रियाँ और पुरुष भी बखशो[iv]।

3. कहा जाता है कि पेशावर के पास वाये-हिन्द पर आक्रमण के समय महमूद ने महाराज जयपाल और उसके 15 मुख्य सरदारों और रिश्तेदारों को गिरफ्तार कर लिया था। सुखपाल की भाँति इनमें से कुछ मृत्यु के भय से मुसलमान हो गये। भेरा में, सिवाय उनके, जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया, सभी निवासी कत्ल कर दिये गये। स्पष्ट है कि इस प्रकार धर्म परिवर्तन करने वालों की संखया काफी रही होगी[v]।

4. मुल्तान में बड़ी संख्या में लोग मुसलमान हो गये। जब महमूद ने नवासा शाह पर (सुखपाल का धर्मान्तरण के बाद का नाम) आक्रमण किया तो उतवी के अनुसार महमूद द्वारा धर्मान्तरण का अभूतपूर्व प्रदर्शन हुआ[vi]। काश्मीर घाटी में भी बहुत से काफिरों को मुसलमान बनाया गया और उस देश में इस्लाम फैलाकर वह गजनी लौट गया[vii]।

5. उतबी के अनुसार जहाँ भी महमूद जाता था, वहीं वह निवासियों को इस्लाम स्वीकार करने पर मजबूर करता था। इस बलात्‌ धर्म परिवर्तन अथवा मृत्यु का चारों ओर इतना आतंक व्याप्त हो गया था कि अनेक शासक बिना युद्ध किये ही उसके आने का समाचार सुनकर भाग खड़े होते थे। भीमपाल द्वारा चाँद राय को भागने की सलाह देने का यही कारण था कि कहीं राय महमूद के हाथ पड़कर बलात्‌ मुसलमान न बना लिया जाये जैसा कि भीमपाल के चाचा और दूसरे रिश्तेदारों के साथ हुआ था[viii]।

6. 1023 ई. में किरात, नूर, लौहकोट और लाहौर पर हुए चौदहवें आक्रमण के समय किरात के शासक ने इस्लाम स्वीकार कर लिया और उसकी देखा-देखी दूसरे बहुत से लोग मुसलमान हो गये। निजामुद्‌दीन के अनुसार देश के इस भाग में इस्लाम शांतिपूर्वक भी फैल रहा था, और बलपूर्वक भी`[ix]। सुल्तान महमूद कुरान का विद्वान था और उसकी उत्तम परिभाषा कर लेता था। इसलिये यह कहना कि उसका कोई कार्य इस्लाम विरुद्ध था, झूठा है।

7. हिन्दुओं ने इस पराजय को राष्ट्रीय चुनौती के रूप में लिया। अगले आक्रमण के समय जयपाल के पुत्र आनंद पाल ने उज्जैन, ग्वालियर, कन्नौज, दिल्ली और अजमेर के राजाओं की सहायता से एक बड़ी सेना लेकर महमूद का सामना किया। फरिश्ता लिखता है कि 30,000 खोकर राजपूतों ने जो नंगे पैरों और नंगे सिर लड़ते थे, सुल्तान की सेना में घुस कर थोड़े से समय में ही तीन-चार हजार मुसलमानों को काट कर रख दिया। सुल्तान युद्ध बंद कर वापिस जाने की सोच ही रहा था कि आनंद पाल का हाथी अपने ऊपर नेपथा के अग्नि गोले के गिरने से भाग खड़ा हुआ। हिन्दू सेना भी उसके पीछे भाग खड़ी हुई[x]।

8. सराय (नारदीन) का विध्वंस- सुल्तान ने (कुछ समय ठहरकर) फिर हिन्द पर आक्रमण करने का इरादा किया। अपनी घुड़सवार सेना को लेकर वह हिन्द के मध्य तक पहुँच गया। वहाँ उसने ऐसे-ऐसे शासकों को पराजित किया जिन्होंने आज तक किसी अन्य व्यक्ति के आदेशों का पालन करना नहीं सीखा था। सुल्तान ने उनकी मूर्तियाँ तोड़ डाली और उन दुष्टों को तलवार के घाट उतार दिया। उसने इन शासकों के नेता से युद्ध कर उन्हें पराजित किया। अल्लाह के मित्रों ने प्रत्येक पहाड़ी और वादी को काफिरों के खून से रंग दिया और अल्लाह ने उनको घोड़े, हाथियों और बड़ी भारी संपत्ति मिली[xi]।

9. नंदना की विजय के पश्चात् सुल्तान लूट का भारी सामान ढ़ोती अपनी सेना के पीछे-पीछे चलता हुआ, वापिस लौटा। गुलाम तो इतने थे कि गजनी की गुलाम-मंडी में उनके भाव बहुत गिर गये। अपने (भारत) देश में अति प्रतिष्ठा प्राप्त लोग साधारण दुकानदारों के गुलाम होकर पतित हो गये। किन्तु यह तो अल्लाह की महानता है कि जो अपने महजब को प्रतिष्ठित करता है और मूति-पूजा को अपमानित करता है[xii]।

10. थानेसर में कत्ले आम- थानेसर का शासक मूर्ति-पूजा में घोर विश्वास करता था और अल्लाह (इस्लाम) को स्वीकार करने को किसी प्रकार भी तैयार नहीं था। सुल्तान ने (उसके राज्य से) मूर्ति पूजा को समाप्त करने के लिये अपने बहादुर सैनिकों के साथ कूच किया। काफिरों के खून से, नदी लाल हो गई और उसका पानी पीने योग्य नहीं रहा। यदि सूर्य न डूब गया होता तो और अधिक शत्रु मारे जाते। अल्लाह की कृपा से विजय प्राप्त हुई जिसने इस्लाम को सदैव-सदैव के लिये सभी दूसरे मत-मतान्तरों से श्रेष्ठ स्थापित किया है, भले ही मूर्ति पूजक उसके विरुद्ध कितना ही विद्रोह क्यों न करें। सुल्तान, इतना लूट का माल लेकर लौटा जिसका कि हिसाब लगाना असंभव है। स्तुति अल्लाह की जो सारे जगत का रक्षक है कि वह इस्लाम और मुसलमानों को इतना सम्मान बख्शता है[xiii]।

11. अस्नी पर आक्रमण- जब चन्देल को सुल्तान के आक्रमण का समाचार मिला तो डर के मारे उसके प्राण सूख गये। उसके सामने साक्षात मृत्यु मुँह बाये खड़ी थी। सिवाय भागने के उसके पास दूसरा विकल्प नहीं था। सुल्तान ने आदेश दिया कि उसके पाँच दुर्गों की बुनियाद तक खोद डाली जाये। वहाँ के निवासियों को उनके मल्बे में दबा दिया अथवा गुलाम बना लिया गया।चन्देल के भाग जाने के कारण सुल्तान ने निराश होकर अपनी सेना को चान्द राय पर आक्रमण करने का आदेश दिया जो हिन्द के महान शासकों में से एक है और सरसावा दुर्ग में निवास करता है[xiv]।

12. सरसावा (सहारनपुर) में भयानक रक्तपात- सुल्तान ने अपने अत्यंत धार्मिक सैनिकों को इकट्‌ठा किया और द्गात्रु पर तुरन्त आक्रमण करने के आदेश दिये। फलस्वरूप बड़ी संख्या में हिन्दू मारे गये अथवा बंदी बना लिये गये। मुसलमानों ने लूट की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जब तक कि कत्ल करते-करते उनका मन नहीं भर गया। उसके बाद ही उन्होंने मुर्दों की तलाशी लेनी प्रारंभ की जो तीन दिन तक चली। लूट में सोना, चाँदी, माणिक, सच्चे मोती, जो हाथ आये जिनका मूल्य लगभग तीस लाख दिरहम रहा होगा। गुलामों की संखया का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रत्येक को 2 से लेकर 10 दिरहम तक में बेचा गया। द्गोष को गजनी ले जाया गया। दूर-दूर के देशों से व्यापारी उनको खरीदने आये। मवाराउन-नहर ईराक, खुरासान आदि मुस्लिम देश इन गुलामों से पट गये। गोरे, काले, अमीर, गरीब दासता की समान जंजीरों में बँधकर एक हो गये[xv]।

13. सोमनाथ का पतन- अल-काजवीनी के अनुसार ‘जब महमूद सोमनाथ के विध्वंस के इरादे से भारत गया तो उसका विचार यही था कि (इतने बड़े उपसाय देवता के टूटने पर) हिन्दू (मूर्ति पूजा के विश्वास को त्यागकर) मुसलमान हो जायेंगे[xvi]।दिसम्बर 1025 में सोमनाथ का पतना हुआ। हिन्दुओं ने महमूद से कहा कि वह जितना धन लेना चाहे ले ले, परन्तु मूर्ति को न तोड़े। महमूद ने कहा कि वह इतिहास में मूर्ति-भंजक के नाम से विखयात होना चाहता है, मूर्ति व्यापारी के नाम से नहीं। महमूद का यह ऐतिहासिक उत्तर ही यह सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है कि सोमनाथ के मंदिर को विध्वंस करने का उद्‌देश्य धार्मिक था, लोभ नहीं।मूर्ति तोड़ दी गई। दो करोड़ दिरहम की लूट हाथ लगी, पचास हजार हिन्दू कत्ल कर दिये गये[xvii]। लूट में मिले हीरे, जवाहरातों, सच्चे मोतियों की, जिनमें कुछ अनार के बराबर थे, गजनी में प्रदर्शनी लगाई गई जिसको देखकर वहाँ के नागरिकों और दूसरे देशों के राजदूतों की आँखें फैल गई[xviii]।

मौहम्मद गौरी

मुहम्मद गौरी नाम नाम गुजरात के सोमनाथ के भव्य मंदिर के विध्वंश के कारण सबसे अधिक कुख्यात है। गौरी ने इस्लामिक जोश के चलते लाखों हिन्दुओं के लहू से अपनी तलवार को रंगा था।

1. मुस्लिम सेना ने पूर्ण विजय प्राप्त की। एक लाख नीच हिन्दू नरक सिधार गये (कत्ल कर दिये गये)। इस विजय के पश्चात्‌ इस्लामी सेना अजमेर की ओर बढ़ी-वहाँ इतना लूट का माल मिला कि लगता था कि पहाड़ों और समुद्रों ने अपने गुप्त खजानें खोल दिये हों। सुल्तान जब अजमेर में ठहरा तो उसने वहाँ के मूर्ति-मंदिरों की बुनियादों तक को खुदावा डाला और उनके स्थान पर मस्जिदें और मदरसें बना दिये, जहाँ इस्लाम और शरियत की शिक्षा दी जा सके[xix]।

2. फरिश्ता के अनुसार मौहम्मद गौरी द्वारा 4 लाख ‘खोकर’ और ‘तिराहिया’ हिन्दुओं को इस्लाम ग्रहण कराया गया[xx]।

3. इब्ल-अल-असीर के द्वारा बनारस के हिन्दुओं का भयानक कत्ले आम हुआ। बच्चों और स्त्रियों को छोड़कर और कोई नहीं बक्शा गया[xxi]।स्पष्ट है कि सब स्त्री और बच्चे गुलाम और मुसलमान बना लिये गये।

तैमूर लंग

तैमूर लंग अपने समय का सबसे अत्याचारी हमलावर था। उसके कारण गांव के गांव लाशों के ढेर में तब्दील हो गए थे।लाशों को जलाने वाला तक बचा नहीं था।

1. 1399 ई. में तैमूर का भारत पर भयानक आक्रमण हुआ। अपनी जीवनी ‘तुजुके तैमुरी’ में वह कुरान की इस आयत से ही प्रारंभ करता है ‘ऐ पैगम्बर काफिरों और विश्वास न लाने वालों से युद्ध करो और उन पर सखती बरतो।’ वह आगे भारत पर अपने आक्रमण का कारण बताते हुए लिखता है। ‘हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने का मेरा ध्येय काफिर हिन्दुओं के विरुद्ध धार्मिक युद्ध करना है (जिससे) इस्लाम की सेना को भी हिन्दुओं की दौलत और मूल्यवान वस्तुएँ मिल जायें[xxii]।

2. कश्मीर की सीमा पर कटोर नामी दुर्ग पर आक्रमण हुआ। उसने तमाम पुरुषों को कत्ल और स्त्रियों और बच्चों को कैद करने का आदेश दिया। फिर उन हठी काफिरों के सिरों के मीनार खड़े करने के आदेश दिये। फिर भटनेर के दुर्ग पर घेरा डाला गया। वहाँ के राजपूतों ने कुछ युद्ध के बाद हार मान ली और उन्हें क्षमादान दे दिया गया। किन्तु उनके असवाधान होते ही उन पर आक्रमण कर दिया गया। तैमूर अपनी जीवनी में लिखता है कि ‘थोड़े ही समय में दुर्ग के तमाम लोग तलवार के घाट उतार दिये गये। घंटे भर में दस हजार लोगों के सिर काटे गये। इस्लाम की तलवार ने काफिरों के रक्त में स्नान किया। उनके सरोसामान, खजाने और अनाज को भी, जो वर्षों से दुर्ग में इकट्‌ठा किया गया था, मेरे सिपाहियों ने लूट लिया। मकानों में आग लगा कर राख कर दिया। इमारतों और दुर्ग को भूमिसात कर दिया गया[xxiii]।

3. दूसरा नगर सरसुती था जिस पर आक्रमण हुआ। ‘सभी काफिर हिन्दू कत्ल कर दिये गये। उनके स्त्री और बच्चे और संपत्ति हमारी हो गई। तैमूर ने जब जाटों के प्रदेश में प्रवेश किया। उसने अपनी सेना को आदेश दिया कि ‘जो भी मिल जाये, कत्ल कर दिया जाये।’ और फिर सेना के सामने जो भी ग्राम या नगर आया, उसे लूटा गया।पुरुषों को कत्ल कर दिया गया और कुछ लोगों, स्त्रियों और बच्चों को बंदी बना लिया गया[xxiv]।’

4. दिल्ली के पास लोनी हिन्दू नगर था। किन्तु कुछ मुसलमान भी बंदियों में थे। तैमूर ने आदेश दिया कि मुसलमानों को छोड़कर शेष सभी हिन्दू बंदी इस्लाम की तलवार के घाट उतार दिये जायें। इस समय तक उसके पास हिन्दू बंदियों की संखया एक लाख हो गयी थी। जब यमुना पार कर दिल्ली पर आक्रमण की तैयारी हो रही थी उसके साथ के अमीरों ने उससे कहा कि इन बंदियों को कैम्प में नहीं छोड़ा जा सकता और इन इस्लाम के शत्रुओं को स्वतंत्र कर देना भी युद्ध के नियमों के विरुद्ध होगा। तैमूर लिखता है- ‘इसलिये उन लोगों को सिवाय तलवार का भोजन बनाने के कोई मार्ग नहीं था। मैंने कैम्प में घोषणा करवा दी कि तमाम बंदी कत्ल कर दिये जायें और इस आदेश के पालन में जो भी लापरवाही करे उसे भी कत्ल कर दिया जाये और उसकी सम्पत्ति सूचना देने वाले को दे दी जाये। जब इस्लाम के गाजियों (काफिरों का कत्ल करने वालों को आदर सूचक नाम) को यह आदेश मिला तो उन्होंने तलवारें सूत लीं और अपने बंदियों को कत्ल कर दिया। उस दिन एक लाख अपवित्र मूर्ति-पूजक काफिर कत्ल कर दिये गये[xxv]।

इसी प्रकार के कत्लेआम, धर्मांतरण का विवरण कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्लतुमिश, ख़िलजी,तुगलक से लेकर तमाम मुग़लों तक का मिलता हैं। अकबर और औरंगज़ेब के जीवन के विषय में चर्चा हम अलग से करेंगे। भारत के मुसलमान आक्रमणकारियों बाबर, मौहम्मद बिन-कासिम, गौरी, गजनवी इत्यादि लुटेरों को और औरंगजेब जैसे साम्प्रदायिक बादशाह को गौरव प्रदान करते हैं और उनके द्वारा मंदिरों को तोड़कर बनाई गई मस्जिदों व दरगाहों को इस्लाम की काफिरों पर विजय और हिन्दू अपमान के स्मृति चिन्ह बनाये रखना चाहते हैं। संसार में ऐसा शायद ही कहीं देखने को मिलेगा जब एक कौम अपने पूर्वजों पर अत्याचार करने वालों को महान सम्मान देते हो और अपने पूर्वजों के अराध्य हिन्दू देवी देवताओं, भारतीय संस्कृति एवं विचारधारा के प्रति उसके मन में कोई आकर्षण न हो।

(नोट- इस लेख को लिखने में “भारतीय मुसल्मानों के हिन्दु पूरवज (मुसलमान कैसे बने)” नामक पुस्तक लेखक पुरुषोत्तम, प्रकाशक कर्ता हिन्दू राइटर फोरम, राजौरी गार्डन, दिल्ली का प्रयोग किया गया है।)

डॉ विवेक आर्य

[i] इलियटएंड डाउसन खंड-1 पृ.164

[ii] इलियटएंड डाउसन खंड-1 पृ.164

[iii] इलियटएंड डाउसन खंड-1 पृ 24-25

[iv] उपरोक्त पृ. 26

[v] के. एस. लाल : इंडियन मुस्लिम : व्हू आर दे, पृ. 6

[vi] अनेक स्थानों पर महमूद द्वारा धर्मान्तरण के लिये देखे-उतबी की पुस्तक ‘किताबें यामिनी’ का अनुवाद जेम्स रेनाल्ड्‌स द्वारा पृ. 451-463

[vii] जकरिया अल काजवीनी, के. एस. लाल, उपरोक्त पृ. 7

[viii] ईलियट एंड डाउसन, खंड-2, पृ.40 / के. एस. लाल, पूर्वोद्धत पृ. 7-8

[ix] के. एस. लाल, पूर्वोद्धत पृ. 7

[x] प्रो. एस. आर. द्गार्मा, द क्रीसेन्ट इन इंडिया, पृ. 43

[xi] ईलियट एंड डाउसन, खण्ड-2, पृ. 36

[xii] उपरोक्त, पृ.39

[xiii] उपरोक्त, पृ. 40-41

[xiv] उपरोक्त, पृ. 47

[xv] उपरोक्त, पृ. 49-50

[xvi] के. एस. लाल : इंडियन मुस्लिम व्यू आर दे, पृ. 7

[xvii] प्रो. एस. आर. शर्मा, द क्रीसेन्ट इन इंडिया, पृ. 47

[xviii] ईलियट एंड डाउसन, खण्ड-2, पृ. 35

[xix] उपरोक्त पृ. 215

[xx] के. एस. लाल : इंडियन मुस्लिम व्यू आर दे, पृ. 11

[xxi] उपरोक्त पृ.23

[xxii] सीताराम गोयल द्वारा ‘स्टोरी ऑफ इस्लामिक इम्पीरियलिज्म इन इंडिया में उद्धत, पृ. 48

[xxiii]उपरोक्त

[xxiv] उपरोक्त, पृ.49-50

[xxv] सीताराम गोयल द्वारा ‘स्टोरी ऑफ इस्लामिक इम्पीरियलिज्म इन इंडिया में उद्धत, पृ. 48

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सलंग्न चित्र- बनारस में हिन्दू मंदिर पर बनी ज्ञानव्यापी मस्जिद

1947 Partition Has Created Enemy At Hindustan’s NW Border

BJP (and Snatanis) must accept the fact that partition has created two nations; India for Hindus and Pakistan for Muslims.

From: Chandra Segaran Krishnan Nair < >

Saturday June 2018.

 

BJP has to come to term with the fact that on partition Pakistan was created to satisfy the demand of Ali Jinnah that the Muslims cannot co-habit with Hindus due to cultural differences and wanted a separate country for the Muslims and it was supported by all the Muslims in 1947. Thus, partition took place creating Pakistan for the Muslims and India for the Hindus. Yet the Muslims continue to live in Hindu India which is illegal and unacceptable as such the onus is on the BJP government to terminate their voting rights and other privileges currently they enjoy which are illegal and must be brought to an end and these parasites deported.

I am unable to comprehend how come BJP is oblivious to this fact and has failed to correct it. Is it not the responsibility of BJP to resurrect Hindu Rastra as its first duty, correcting the injustice committed to the Hindus by the Congress and other corrupt political parties? In fact, Muslim political parties should have ceased to exist in India the moment Muslims successfully got what they demanded a new Islamic nation Pakistan in 1947

Thus, the issue of Muslim vote bank would not have ever arisen and had become a non-issue for younger generations to face it.