From: Kumar Arun < >
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From: Kumar Arun < >
From: Vinod Kumar Gupta < >
सांस्कृतिक स्वतंत्रता की आहट…
★~राजनैतिक रूप से स्वतंत्र हुए आज देश को 72 वर्ष हो चुकें है, परन्तु सम्भवतः किसी भी प्रधानमन्त्री ने सत्ता के मोह में होने के कारण इतना साहस नहीं किया होगा कि वह सार्वजनिक रूप से भारतीय संस्कृति का गुणगान करते हुए भारतीय समाज में स्वाभिमान जगाते।
★~मथुरा में एक कार्यक्रम (11.9.19) के अवसर पर जब हमारे वर्तमान सशक्त प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने अपने ओजस्वी सम्बोधन में भारतीय संस्कृति के आधार स्तंभों के “ऊँ” और “गाय” को जोड़ा तो हृदय भाव विभोर हो उठा।
★~उन्होंने विपक्ष पर प्रहार करते हुए कहा कि ” ‘ॐ’ शब्द सुनते ही कुछ लोगों के कान खड़े हो जाते हैं, कुछ लोगों के कान में ‘गाय’ शब्द पड़ता है तो उनके बाल खड़े हो जाते हैं, उनको करंट लग जाता है….ऐसे लोगों ने देश को बर्बाद कर रखा है।” मोदी जी के इस वक्तव्य ने देश-विदेश में रहने वाले सभी भारतभक्तों को प्रफुल्लित करके उनको अपने नेतृत्व की दृढ़ता का पुनः परिचय कराया।
*~अंततः राष्ट्र के सांस्कृतिक मूल्यों को स्थापित करना या उसके लिए प्रयास करना भी राष्ट्रीय नेतृत्व का एक मुख्य दायित्व बनता है।
★~दशकों से देश में “हिन्दू मन की बात करना” या “हिन्दुओं के हित में कार्य करने” को साम्प्रदायिक व संकीर्ण बुद्धि वाला बता कर उपहास उड़ाया जाता रहा है। ऐसे अनेक राष्ट्रवादी प्रबुद्ध विद्वानों व महानायकों की अवहेलना व अवमानना करके हिन्दुओं को चिढ़ाना एक फैशन बन चुका था। हमारे पूज्नीय ग्रंथो व देवी-देवताओं को मिथ्या बता कर राष्ट्रवादी समाज को भ्रमित करने वालों को प्रगतिशील माना जा रहा था।
★~हमारी गौरवशाली व जीवनदायिनी सत्य सनातन संस्कृति पर आक्रान्ताओं की संस्कृति को थोपने के लिए न जानें कितने षडयंत्र चलाये जाते है?विदेशी धन के बल पर समाज सेवा के नाम पर गठित हज़ारों स्वयं सेवी संगठनों ने अपने कुप्रयासों से भारतीयता को दूषित करने के लिए हर संभव कार्य किये।
★~माननीय मोदी जी ने अपने पूर्व कार्यकाल में ऐसे हज़ारों राष्ट्रविरोधी व धर्मद्रोही संगठनों की पूर्णतः जांच पड़ताल करके उनको प्रतिबंधित किया है। यह भी भारतीय संस्कृति की रक्षार्थ एक जटिल परंतु अति महत्वपूर्ण कार्य था। वैश्विक जिहाद के रक्तरंजित वातावरण में राष्ट्र के गौरव को “योग साधना” द्वारा विश्व में स्थापित करके हमारे प्रधानमन्त्री मोदी जी ने भारतीय संस्कृति के प्रति पूर्णतः समर्पण का भाव अपने पूर्व कार्यकाल में ही दे दिया था।*
★~आज हमारा यह भी सौभाग्य है कि जम्मू-कश्मीर को उसके विकास में अवरोधक बने प्रतिबंधों से मुक्त कराने वाले हमारे ऊर्जावान गृह मंत्री श्री अमित शाह जी ने ‘हिंदी दिवस’ पर अपने मन की बात कह कर सबके मनों को जीत लिया।
★~भारत की संस्कृति का मूल आधार हिंदी भाषा को अपना कर सम्पूर्ण राष्ट्र को एक सूत्र में पिरो कर राष्ट्रीय पहचान को विकसित करने का प्रयास होना ही चाहिये। कुछ विरोधी पक्ष व दक्षिण राज्यों के नेता गणों ने अपनी-अपनी राजनीति के कारण इसका विरोध अवश्य किया है परंतु आज देशवासियों को इसकी महत्ता समझ में आ रही है।
★~हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं के उचित सम्मान से भी भारत का स्वाभिमान अवश्य जागेगा। क्योंकि राष्ट्रीय मूल्यों की अज्ञानतावश आज भी अंग्रेजी के साथ साथ कुछ अन्य विदेशी भाषाओं का चलन धीरे-धीरे बढ़ रहा है। अपनी मातृभाषा के प्रति विमुख रहने के कारण विद्यार्थियों को कितना अधिक परिश्रम करना पड़ता है इस पर अवश्य विचार होना चाहिये।
★~निःसंदेह इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता कि किसी भी विषय का ज्ञान विदेशी भाषा के स्थान पर अपनी भाषा में अर्जित करना अत्यंत सरल होता है।
★~हम व हमारे पितामाह आदि वर्षों से प्रातः “नमस्ते सदा वत्सले मातृ भूमि…” के सारगर्भित व उत्साहवर्धक गायन से प्रेरित होकर देश की धार्मिक व सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा के लिए सतत् सक्रिय रहते रहे हैं। ऐसे में वर्तमान राष्ट्रवादी शासन द्वारा हिन्दुओं में अहिंसा व उदारता के साथ साथ वीरता और तेजस्विता का भाव उनमें स्वाभिमान जगा रहा है।
★~सांस्कृतिक स्वतंत्रता की आहट से युवाओं में शूरवीरता का संचार हो रहा है। देश-विदेश में भारतीय संस्कृति की रक्षार्थ सतत् संघर्ष करने वाले करोड़ों हिन्दुओं का मनोबल बढ़ने से उनका सम्मान भी बढ़ा है।
★~राजनैतिक रूप से स्वतंत्र होने के उपरान्त भी भारतीय संस्कृति पर निरन्तर आघात होते रहने से हमारी सांस्कृतिक स्वतंत्रता स्वार्थी व दास मनोवृत्ति की बेड़ियों में जकड़ी होने के कारण सदैव चिंता का विषय बनी रही।
★~परंतु आज चिंतित देशवासियों में यह विश्वास जगने लगा है कि वर्तमान निर्णायक शासकीय नेतृत्व में इन बेड़ियों को तोड़ने की दृढ़ इच्छाशक्ति है।
★~अतः वर्षो उपरान्त करोड़ों राष्ट्रभक्तों के अस्तित्व व सत्य सनातन वैदिक धर्म और सस्कृति की रक्षार्थ आक्रामक व सक्षम नेतृत्व के होने से ही सांस्कृतिक स्वतंत्रता की आहट हुई है।
✍🏻विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
गाज़ियाबाद – 201001
From: Vinod Kumar Gupta < >
★राष्ट्र निर्माण की चिकीर्षा 24.8.2019
★स्वतंत्र भारत के इतिहास में सत्ता में बैठे शासकों ने सम्भवतः प्रथम बार राजनीति को राष्ट्रनीति में परिवर्तन करने का संकल्प दिखाया है। तीन मूर्ति मोदी-शाह-डोभाल ने “राष्ट्र निर्माण की चिकीर्षा” का अद्भुत परिचय दिया है। देश के साथ विश्वासघात करके अनुच्छेद 35 A व 370 को संविधानिक बना कर विभाजनकारी नीतियों को अभी तक यथावत बनायें रखने में किसे लाभ हो रहा था ? यह नेहरू, शेख अब्दुल्ला व लार्ड माउंटबेटन की भारत के विकास में रोड़ा बनाये रखने की कुत्सित मानसिकता थी।
★इन विवादित अनुच्छेदों के कारण भी पाकिस्तान व पाकपरस्त इस्लामिक जिहादी कश्मीर को “गेटवे आफ आतंकवाद” बना कर भारत में इस्लामीकरण का बीजारोपण करने का दुःसाहस करते आ रहे है। भारत का मुकुट कहे जाने वाले जम्मू-कश्मीर पर आतंकवादियों, अलगाववादियों व भ्रष्टाचारियों के अनगिनत प्रहारों से दशकों से बहता हुआ लहू भारत की अस्मिता को ललकार रहा था। वह चीख चीख कर पुकार रहा था कि जब तक चोटिल व घायल माथे की चिकित्सा नहीं होगी तब तक कोई कैसे स्वस्थ रह सकोगे? फिर भी “कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है” व “कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है” आदि की पिछले 72 वर्षों में हज़ारों बार नारे लगाने वाले राजनेताओं ने एक बार भी यह नहीं सोचा कि जब तक संविधान के अनुच्छेद 35 ए व 370 को निष्प्रभावी नहीं किया जाएगा तब तक यह लुभावने नारे देशवासियों के साथ विश्वासघात है।
★इन अनुच्छेदों के दुष्परिणामों को अनेक विशेषज्ञों व लेखकों ने बार बार विस्तार से लिख कर 72 वर्षों से देशवासियों को जागरूक करने में बहुत बड़ी भूमिका निभायी है। भारतीय जनसंघ से बनी भारतीय जनता पार्टी ने भी इस विभाजनकारी व्यवस्था को निरस्त करके अपने अटूट एजेंडे को मूर्तरूप देकर करोड़ों देशवासियों के ह्रदयों में भारतभक्ति का भाव भरकर वर्षों पुराने घाव को भरने का कार्य किया है।
★स्वतंत्र भारत के इतिहास में 5 अगस्त 2019 का दिन भी स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त 1947 के पूरक के रूप में माना जाय तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। क्योंकि सन् 1947 में पश्चिम पाकिस्तान से आये हजारों हिन्दू शरणार्थियों के परिवारों की चार पीढ़ियां जिनकी संख्या अब लाखों में है,भारतीय नागरिक होकर भी सामान्य नागरिक अधिकारों से वंचित हो रही थी। अब उनको भी स्वाभिमान के साथ एक सामान्य जीवन जीने का शेष भारतीयों के समान स्वतंत्र अधिकार मिलेंगे। इसके अतिरिक्त उन लाखों विस्थापित कश्मीरी हिन्दुओं को नारकीय जीवन जीने से मुक्ति मिलेगी और वे छोटे-छोटे सहायता शिविरों में रहने के कारण हो रही वंश वृद्धि की समस्याओं से भी मुक्त हो सकेंगे।अधिक विस्तार में न जाकर मुख्यतः यह माना जाय कि जम्मू-कश्मीर और लद्धाख को वास्तविक स्वतंत्रता अब मिली है तो कदापि अनुचित न होगा।
★देश को आहत करने वाली ऐसी भयंकर गलतियों को दूर करना हमारे सत्ताधारियों का परम ध्येय होना ही चाहिये। वर्तमान शासकों की कार्य प्रणाली से इतिहास की राष्ट्रघाती भूलों को सुधारने की दृढ़ इच्छाशक्ति का आभास हो रहा है। राष्ट्रीय एकता और संप्रभुता को चुनौती देने वाली जम्मू-कश्मीर सम्बंधित ऐसी व्यवस्था को निष्प्रभावी करके भारत वासियों में मोदी सरकार ने राष्ट्रभक्ति का अद्भुत संचार किया है। मोदी सरकार ने इन विवादित अनुच्छेदों को निरस्त करके जम्मू-कश्मीर व लद्धाख को केंद्र शासित राज्य व क्षेत्र घोषित करके भारत के नव निर्माण में एक नये संकल्प का परिचय दिया है।
★यहां हमें 29 सितंबर 2016 को पुनः स्मरण करना होगा जब उरी में हुए आतंकवादी हमलों के विरोध में “सर्जिकल स्ट्राइक” की गुप्त योजना द्वारा आतंकवादियों के गढ़ (पाक अधिकृत कश्मीर) में जाकर उनके अनेक शिविरों को तहस-नहस कर दिया था। साथ ही 14 फरवरी को पुलवामा के बाद 26 फरवरी 2019 को पाकिस्तान के आतंकी गढ़ बालाकोट में हुई भयानक एयर स्ट्राइक हर भारतवासी को अभी भी गौरवान्वित कर रही है।
★यह नीतियुद्ध आज भारत सरकार की प्रशासकीय कुशलता का सफल उदाहरण बन चुका है। ध्यान रहे सेनाएं सक्षम होती है परन्तु उनका उत्साहवर्धन करने के लिए राजनैतिक संरक्षण व मार्गदर्शन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत सरकार ने दशकों पश्चात आतंकवादियों द्वारा चलाये जा रहे ऐसे अघोषित युद्धों पर आक्रामक निर्णय लेकर सेनाओं की सामर्थ्य का जो सदुपयोग किया गया उससे समस्त विश्व में भारत के सशक्त होने का स्पष्ट संदेश गया। भारतवासियों सहित सारा जगत अचानक स्तब्ध रह गया कि अब “सोया भारत चेत रहा है”।
★ऐसा होना भी स्वाभाविक था क्योंकि अब भारत में श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपार बहुमत से निर्वाचित एक सशक्त राष्ट्रवादी शासन कार्यरत है। राष्ट्र निर्माण की यह चिकीर्षा और स्वाभिमान की रक्षार्थ समर्पित मोदी सरकार के अचंभित करने वाले ऐसे ही अनेक निर्णयों ने भारत के नागरिकों को अप्रैल-मई 2019 में हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा के अतिरिक्त कोई अन्य का विकल्प ही नहीं छोड़ा। फिर भी यह सच है कि कुछ ऐसी परिस्थितियां बन गई थी जिनके कारण कुछ रुष्ट राष्ट्रभक्तों को समझा कर भाजपा के पक्ष में लाना मेरे लिए भी कठिन हो रहा था। अनेक किंतु-परन्तुओं सहित नोटा का प्रचार करने वाले वे भ्रमित राष्ट्रवादी आज अवश्य यह सोच रहे होंगे कि “उनकी हार में भी जीत हुई है”। क्योंकि कम से कम उनको यह तो मानना ही पड़ता था कि सोनियानीत शासन में राष्ट्रभक्तों का स्वाभिमान नष्ट हो रहा था।
★हमको 2004 से 2014 तक के एक दशक के इटेलियन सोनिया के एकछत्र शासन में जिस आत्मग्लानि का सामना करना पड़ा उसका विवरण विस्तार से देने की यहां आवश्यकता नहीं। लेकिन यह काल भारतभक्तों को सदैव शर्मसार करते हुए उनके स्वाभिमान को आहत करता रहेगा। जब राजनीति अपने अलग-अलग मठ बनाने में विश्वास करने लगे तो उसे राष्ट्र के हित-अहित की चिंता कैसे हो सकती है। यह कोई अतिश्योक्ति नहीं कि सोनिया काल स्वतंत्र भारत के इतिहास में काले अध्याय का हिस्सा होगा।
देश की सत्ता का सार्वधिक भोग करने वाले कांग्रेसियों ने भारत की न्यायायिक व्यवस्था को अपने अपराध कर्मों का सरंक्षक समझ लिया था।
★निर्धन देशवासियों को लूटकर अपने आप मालामाल होने वालों के मुँह से “मेरा भारत महान” के पवित्र कथन को भी इन विश्वासघातियों ने कलंकित कर दिया। साथ ही सोनिया गांधी ने जिस प्रकार धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को तिलांजलि देकर अल्पसंख्यवाद को बढ़ावा दिया था उससे राष्ट्रीय चरित्र का हनन ही हुआ। बहुसंख्यक व अल्पसंख्यक में विभाजित भारतीयों में परस्पर वैमनस्य बढ़ने से मुख्य धारा के कार्य सदा प्रभावित होते रहे।
★वसुधैव कुटुम्बकम का संदेश देने वाली भारतीय संस्कृति का अत्यधिक पतन अपनी ही भूमि पर होता रहा और कौन धर्मनिरपेक्ष है और कौन नहीं में ही उलझते रहे। जिससे भारतविरोधियों का दुःसाहस बढ़ता रहा। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि सम्पूर्ण जगत में भारत व भारतवासियों को अपमानजनक स्थितियों का सामना करना पड़ा। निःसंदेह स्वतंत्र होना जितना कठिन था उससे अधिक कठिन है उसे बनाये रखना। क्योंकि राजनैतिक स्वार्थों के कारण मानवीय अधिकारों का हनन हुआ है जिससे सामान्य नागरिकों की स्वतंत्रता भी बाधित हुई है। ऐसे में डॉ भीमराव अम्बेडकर के कुछ मर्मस्पर्शी शब्द बहुत कुछ कहते है… “भारत एक स्वतंत्र देश होगा। उसकी स्वाधीनता का क्या परिणाम होगा? क्या वह अपनी स्वाधीनता की रक्षा कर सकेगा या उसको फिर खो देगा?”
★इन्हीं निराशाजनक परिस्थितियों में जब 2014 में भाजपानीत राजग सरकार का केंद्र में गठन हुआ तो चारों ओर एक सकारात्मक वायुमंडल बनने लगा। श्री नरेंद्र मोदी की आक्रामक शैली व निर्णायक क्षमता से जन समुदाय प्रभावित हुए बिना न रह सका। निःसंदेह मोदी जी की कार्यकुशलता से आज भारत अपने लुप्त हो रहे स्वाभिमान को पुनः स्थापित करने की ओर अग्रसर हो रहा है। उसी राष्ट्र निर्माण की चिकीर्षा से अभिभूत भारतीय नागरिकों ने श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भरपूर आस्था का परिचय देते हुए 2019 में भाजपानीत राजग को भारत पर शासन करने का पुनः अवसर प्रदान करा।
★वर्तमान अनुकूल स्थितियों में विवादित राष्ट्रतोडक संविधानिक प्रावधानों पर प्रहार करके जिसप्रकार जम्मू-कश्मीर को भारत के अभिन्न अंग होने का स्थायित्व दिया है वह अपने आप में एक सशक्त शासकीय व प्रशासकीय कार्य है। इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए अब अवैध रूप से युद्ध काल में पाकिस्तान व चीन द्वारा कब्जाये गए जम्मू-कश्मीर की हज़ारों वर्ग किलोमीटर भूमि को भी मुक्त कराना भारत सरकार का एक मुख्य राष्ट्रीय दायित्व होना चाहिये।
★विश्व का प्राचीनतम राष्ट्र “भारत” आज अपने आप में गौरवान्वित हो रहा है। आज वह अपने मुकुट से पुनः सुशोभित हो रहा है। एक सुखद अनुभूति की आहट हो रही है। वर्षों से विनाशकारी और अत्याचारी षडयंत्रकारियों के आघातों से घायल “देव भूमि कश्मीर” आज पुनः अंधकार से बाहर निकल कर अपने ज्ञानरूपी प्रकाश से मानवता को लाभान्वित करने को आतुर है। हमारा आग्नेय मंत्र “वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहितः” राष्ट्र निर्माण की चिकीर्षा को इसी प्रकार हमें व हमारे राजनेताओं को सशक्त करता रहे तो एक दिन भारत विश्व गुरु बन कर मानवता की रक्षार्थ विश्व में अग्रणी भूमिका निभाएगा।
(आध्यात्मिक् विश्व गुरु बनने का खयाल अच्छा है। तो पहले सब नेता लोग और ज्यादसे ज्यादा हिन्दु समाज के लोग अपने लिये एक आध्यात्मिक् गुरु का शरण ले लें। गुरु कोई एक वेदिक सम्प्रदाय मे से होना चाहिये और् हर गुरु का गुरु होना चाहिये। जब कोई मुश्किल् निर्णय करना हो तो गुरु की सलाह के अनुसार करना। ऐसा होगा तो भारत विश्व गुरु जरूर बनेगा। – Suresh Vyas)
~विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
गाज़ियाबाद (201001)
उत्तर प्रदेश (भारत)
From: Harinder Singh Sikka < >
How to Hinduize Bhaaratiya Muslims
i.e.
How to Make Muslims Pro-Hindu
By Suresh Vyas
Here are some ideas for consideration. Some of the ideas may sound unfair or un-democratic, but understand that Islam has invaded in Bhaarat by force for 1000 years, and the Hindus have suffered immensely from Muslims beyond tolerance. It was Islam that caused the partition of India in 1947. Islam is anti-Hindu and anti-democracy. 1400 years history shows that there cannot be peace where there is Islam. The partition is the proof that Islam is not compatible with the Hindu Dharma, which is universal religion for mankind. It (Dharma) provides ways to advance spiritually; and as one advances spiritually, one lives more and more sin-free. Sin-free living cannot be a problem for anyone.
Source: https://www.youtube.com/watch?v=YHiVQXOe5zU
By raju patel
abu azmi (politician)
ahmed patel (politician)
ajam khan (politician)
akhlaak (cow butcher)
amir khan,
amir khan,
arfa khanam (journalist)
assauddin owasi brothers (politician)
atik urr rehamaan (islamic scholar)
dawood ibrahim (DON)
ezaz khan,
faruk abdulah (politician)
gohar khan (film star)
gulam nabi azad (politician)
hamid ansar (politician)
imran masood (politician)
javed akhtar,
mahmood paracha (advocate)
majeed memnon tasleem rehamani (politician)
maqbol fida hussain (artist)
md azahruddin (cricketer/politician)
mehabuba mufti (politician)
mukhtar ansari (politician)
mulana majeed rashadi (islamic scholar)
nasuruddin shah,
omar abdulah (politician)
rana ayub (social worker)
sabana aazmi,
sabnam lone (advocate)
saif ali khan (film star)
salman khan
salman khurshid (politician)
shahrukh khan (film star)
shams tahir khan (journalist)
tabrez ansari (a thief)
testa shitalvada (social worker)
umar khalid (student)
yaseen malik asiya anrabi zakir naik (islamic scholar)
zainab sikandar (social worker)
zenab sikandar
From: Karam Ramrakha < >
By Sanjeev Kullarni < >
Who is fighting for humanism, equality, freedom and fraternity? Definitely not the Kashmiri Muslims. All these things are guaranteed to them as citizens of India. Ask them a hard question: For what they are fighting that they do not get in India? Their answer will shock you. They are not interested in equality with non-believers or freedom and fraternity for those who do not consider Mohammad is the only one to be followed. They (the Muslims) cannot deny equality as exhorted in Koran to non-believers (and also) by the Indian constitution even when they (The Muslims) are in the majority; but they do, and the history is the witness. The Muslims can talk about secularism, human rights, democracy etc. only till they are in minority.
They want to create Islamic caliphate where they have the freedom to deny equality to non-believers and implement shariah law. Ask them:
If 180 million Muslims can live in Hindu majority India, why a few million Kashmiri Muslims cannot?
(We, the Bhaaratiya Hindus, must give up any desire to assimilate Muslims with Hindus. We have had plenty of suffering for a longtime while we tried it. Now we want to purge out Islam from Bhaarat. It was Islam that said in 1947 that they cannot live with Hindus; and that created partition of Bhaarat. In essence we gave them a secure land (Pak territory) where they can fearlessly plan their Islamic ways of destroying Hindus and Hindustan. The fact is that Islam cannot assimilate with any non-believer, and therefore we must purge it out from Bhaarat where it has invaded by force. – Suresh Vyas)
If Hindus are driven out of their ancestral homes where they have been living for thousands of years, we are supposed to believe that nothing can be sustained by force forever. We believe that one day the people who are trying to force them (the Muslims) out will succeed. And therefore, Kashmir’ so called ‘freedom’ struggle will never be successful. India is not an occupying force but it is there for thousands of years. If any invader alien ideology followers try to force their way, they will kiss the dust.
No force in the world can now divide India again to create one more Islamic state. Make no mistake about it. These Muslims are foolishly awakening a giant. I know they (the Muslims) are not destined to mend their ways well in time, and maybe it is a historical inevitability. But I have a premonition that they will face very dire consequences. Mark my words.
Sanjeev
From: Pramod Agrawal < >
हिंदुओं के खिलाफ ज़हर फैला रहा है बॉलीवुड, IIM के प्रोफेसर धीरज शर्मा की अहमदाबाद से आयी सनसनीखेज रिपोर्ट…
अक्सर कहा जाता है कि बॉलीवुड की फिल्में हिंदू और सिख धर्म के खिलाफ लोगों के दिमाग में धीमा ज़हर भर रही हैं। इस शिकायत की सच्चाई जानने के लिए अहमदाबाद में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (आईआईएम) के एक प्रोफेसर ने एक अध्ययन किया है,
जिसके नतीजे चौंकाने वाले हैं। आईआईएम के प्रोफेसर धीरज शर्मा ने बीते छह दशक की 50 बड़ी फिल्मों की कहानी को अपने अध्ययन में शामिल किया और पाया कि बॉलीवुड एक सोची-समझी रणनीति के तहत बीते करीब 50 साल से लोगों के दिमाग में यह बात भर रहा है कि हिंदू और सिख दकियानूसी होते हैं।
उनकी धार्मिक परंपराएं बेतुकी होती हैं। मुसलमान हमेशा नेक और उसूलों पर चलने वाले होते हैं। जबकि ईसाई नाम वाली लड़कियां बदचलन होती हैं। हिंदुओं में कथित ऊंची जातियां ही नहीं, पिछड़ी जातियों के लिए भी रवैया नकारात्मक ही है। यह पहली बार है जब बॉलीवुड फिल्मों की कहानियों और उनके असर पर इतने बड़े पैमाने पर अध्ययन किया गया है।
#ब्राह्मण_नेता_भ्रष्ट_वैश्य_बेइमान_कारोबारी!
आईआईएम के इस अध्ययन के अनुसार फिल्मों में 58 फीसदी भ्रष्ट नेताओं को ब्राह्मण दिखाया गया है। 62 फीसदी फिल्मों में बेइमान कारोबारी को वैश्य सरनेम वाला दिखाया गया है। फिल्मों में 74 फीसदी सिख किरदार मज़ाक का पात्र बनाया गया। जब किसी महिला को बदचलन दिखाने की बात आती है तो 78 फीसदी बार उनके नाम ईसाई वाले होते हैं। 84 प्रतिशत फिल्मों में मुस्लिम किरदारों को मजहब में पक्का यकीन रखने वाला, बेहद ईमानदार दिखाया गया है। यहां तक कि अगर कोई मुसलमान खलनायक हो तो वो भी उसूलों का पक्का होता है।
हैरानी इस बात की है कि यह लंबे समय से चल रहा हैऔरअलग-अलग समय की फिल्मों में इस मैसेज को बड़ी सफाई से फिल्मी कहानियों के साथ बुना जाता है। अध्ययन के तहत रैंडम तरीके से 1960 से हर दशक की 50-50 फिल्में चुनी गईं। इनमें ए से लेकर जेड तक हर शब्द की 2 से 3 फिल्में चुनी गईं। ताकि फिल्मों के चुनाव में किसी तरह पूर्वाग्रह न रहे। अध्ययन के नतीजों से साफ झलकता है कि फिल्म इंडस्ट्री किसी एजेंडे पर काम कर रही है।
#बजंरगी_भाईजान देखने के बाद अध्ययन
प्रोफेसर धीरज शर्मा कहते हैं कि “मैं बहुत कम फिल्में देखता हूं। लेकिन कुछ दिन पहले किसी के साथ मैंने बजरंगी भाईजान फिल्म देखी। मैं हैरान था कि भारत में बनी इस फिल्म में ज्यादातर भारतीयों को तंग सोच वाला, दकियानूसी और भेदभाव करने वाला दिखाया गया है। जबकि आम तौर पर ज्यादातर पाकिस्तानी खुले दिमाग के और इंसान के बीच में फर्क नहीं करने वाले दिखाए गए हैं।” यही देखकर उन्होंने एक तथ्यात्मक अध्ययन करने का फैसला किया।
वो यह जानना चाहते थे कि फिल्मों के जरिए लोगों के दिमाग में गलत सोच भरने के जो आरोप लगते हैं क्या वाकई वो सही हैं? यह अध्ययन काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि फिल्में नौजवान लोगों के दिमाग, व्यवहार, भावनाओं और उनके सोचने के तरीके को प्रभावित करती हैं। यह देखा गया है कि फिल्मों की कहानी और चरित्रों के बर्ताव की लोग निजी जीवन में नकल करने की कोशिश करते हैं।
#पाकिस्तान_और_इस्लाम का महिमामंडन
प्रोफेसर धीरज और उनकी टीम ने 20 ऐसी फिल्मों को भी अध्ययन में शामिल किया जो पिछले कुछ साल में पाकिस्तान में भी रिलीज की गईं। उनके अनुसार ‘इनमें से 18 में पाकिस्तानी लोगों को खुले दिल और दिमाग वाला, बहुत सलीके से बात करने वाला और हिम्मतवाला दिखाया गया है। सिर्फ पाकिस्तान की सरकार को इसमें कट्टरपंथी और तंग नजरिए वाला दिखाया जाता है।
ऐसे में सवाल आता है कि हर फिल्म भारतीय लोगों को पाकिस्तानियों के मुकाबले कम ओपन-माइंडेड और कट्टरपंथी सोच वाला क्यों दिखा रही है? इतना ही नहीं इन फिल्मों में भारत की सरकार को भी बुरा दिखाया जाता है।
पाकिस्तान में रिलीज़ हुई ज्यादातर फिल्मों में भारतीय अधिकारी अड़ंगेबाजी करने वाले और जनता की भावनाओं को नहीं समझने वाले दिखाए जाते हैं।’ फिल्मों के जरिए इमेज बनाने-बिगाड़ने का ये खेल 1970 के दशक के बाद से तेजी से बढ़ा है। जबकि पिछले एक दशक में यह काम सबसे ज्यादा किया गया है। 1970 के दशक के बाद ही फिल्मों में सलीम-जावेद जैसे लेखकों का असर बढ़ा, जबकि मौजूदा दशक में सलमान, आमिर और शाहरुख जैसे खान हीरो सक्रिय रूप से अपनी फिल्मों में पाकिस्तान और इस्लाम के लिए सहानुभूति पैदा करने वाली बातें डलवा रहे हैं।
#बच्चों_के_दिमाग पर बहुत बुरा असर
अध्ययन के तहत फिल्मों के असर को जानने के लिए इन्हें 150 स्कूली बच्चों के एक सैंपल को दिखाया गया। प्रोफेसर धीरज शर्मा के अनुसार ’94 प्रतिशत बच्चों ने इन फिल्मों को सच्ची घटना के तौर पर स्वीकार किया।’ यह माना जा सकता है कि फिल्म वाले पाकिस्तान, अरब देशों, यूरोप और अमेरिका में फैले भारतीय और पाकिस्तानी समुदाय को खुश करने की नीयत से ऐसी फिल्में बना रहे हों। लेकिन यह कहां तक उचित है कि इसके लिए हिंदुओं, सिखों और ईसाइयों को गलत रौशनी में दिखाया जाए?
वैसे भी इस्लाम को हिंदी फिल्मों में जिस सकारात्मक रूप से दिखाया जाता है, वास्तविक दुनिया में उनकी इमेज इससे बिल्कुल अलग है। आतंकवाद की ज्यादातर घटनाओं में मुसलमान शामिल होते हैं, लेकिन फिल्मों में ज्यादातर आतंकवादी के तौर पर हिंदुओं को दिखाया जाता है। जैसे कि शाहरुख खान की ‘मैं हूं ना’ में सुनील शेट्टी एक आतंकी संगठन का मुखिया बना है जो नाम से हिंदू है।
#सलीम_जावेद” सबसे बड़े जिहादी?
सलीम-जावेद की लिखी फिल्मों में हिंदू धर्म को अपमानित करने की कोशिश सबसे ज्यादा दिखाई देती है। इसमें अक्सर अपराधियों का महिमामंडन किया जाता है। पंडित को धूर्त, ठाकुर को जालिम, बनिए को सूदखोर, सरदार को मूर्ख कॉमेडियन आदि ही दिखाया जाता है। ज्यादातर हिंदू किरदारों की जातीय पहचान पर अच्छा खासा जोर दिया जाता था। इनमें अक्सर बहुत चालाकी से हिंदू परंपराओं को दकियानूसी बताया जाता था। इस जोड़ी की लिखी तकरीबन हर फिल्म में एक मुसलमान किरदार जरूर होता था जो बेहद नेकदिल इंसान और अल्ला का बंदा होता था। इसी तरह ईसाई धर्म के लोग भी ज्यादातर अच्छे लोग होते थे।
सलीम-जावेद की फिल्मों में मंदिर और भगवान का मज़ाक आम बात थी। मंदिर का पुजारी ज्यादातर लालची, ठग और बलात्कारी किस्म का ही होता था। फिल्म “शोले” में धर्मेंद्र भगवान शिव की आड़ लेकर हेमा मालिनी को अपने प्रेमजाल में फँसाना चाहता है, जो यह साबित करता है कि मंदिर में लोग लड़कियाँ छेड़ने जाते हैं। इसी फिल्म में एके हंगल इतना पक्का नमाजी है कि बेटे की लाश को छोड़कर, यह कहकर नमाज पढ़ने चल देता है कि उसने और बेटे क्यों नहीं दिए कुर्बान होने के लिए।
“दीवार” फिल्म का अमिताभ बच्चन नास्तिक है और वो भगवान का प्रसाद तक नहीं खाना चाहता है, लेकिन 786 लिखे हुए बिल्ले को हमेशा अपनी जेब में रखता है और वो बिल्ला ही बार-बार अमिताभ बच्चन की जान बचाता है। फिल्म “जंजीर” में भी अमिताभ बच्चन नास्तिक हैं और जया, भगवान से नाराज होकर गाना गाती है, लेकिन शेरखान एक सच्चा मुसलमान है। फिल्म ‘शान” में अमिताभ बच्चन और शशि कपूर साधु के वेश में जनता को ठगते हैं, लेकिन इसी फिल्म में “अब्दुल” ऐसा सच्चा इंसान है जो सच्चाई के लिए जान दे देता है। फिल्म “क्रान्ति” में माता का भजन करने वाला राजा (प्रदीप कुमार) गद्दार है और करीम खान (शत्रुघ्न सिन्हा) एक महान देशभक्त, जो देश के लिए अपनी जान दे देता है।
“अमर-अकबर-एंथोनी” में तीनों बच्चों का बाप किशनलाल एक खूनी स्मगलर है लेकिन उनके बच्चों (अकबर और एंथोनी) को पालने वाले मुस्लिम और ईसाई बेहद नेकदिल इंसान है। कुल मिलाकर आपको सलीम-जावेद की फिल्मों में हिंदू नास्तिक मिलेगा या फिर धर्म का उपहास करने वाला। जबकि मुसलमान शेर खान पठान, डीएसपी डिसूजा, अब्दुल, पादरी, माइकल, डेविड जैसे आदर्श चरित्र देखने को मिलेंगे।
हो सकता है आपने पहले कभी इस पर ध्यान न दिया हो, लेकिन अबकी बार ज़रा गौर से देखिएगा केवल “सलीम-जावेद” की ही नहीं, बल्कि “कादर खान, कैफ़ी आजमी, महेश भट्ट” जैसे ढेरों कलाकारों की कहानियों का भी यही हाल है। “सलीम-जावेद” के दौर में फिल्म इंडस्ट्री पर दाऊद इब्राहिम का नियंत्रण काफी मजबूत हो चुका था। हम आपको बता दें कि सलीम खान सलमान खान के पिता हैं, जबकि जावेद अख्तर आजकल सबसे बड़े सेकुलर का चोला ओढ़े हुए हैं।
#अब_तीनों_खान ने संभाली जिम्मेदारी?
मौजूदा समय में तीनों खान एक्टर फिल्मों में हिंदू किरदार करते हुए हिंदुओं के खिलाफ माहौल बनाने में जुटे हैं। इनमें सबसे खतरनाक कोई है तो वो है आमिर खान। आमिर खान की पिछली कई फिल्मों को गौर से देखें तो आप पाएंगे कि सभी का मैसेज यही है कि भगवान की पूजा करने वाले धार्मिक लोग हास्यास्पद होते हैं। इन सभी में एक मुस्लिम कैरेक्टर जरूर होता है जो बहुत ही भला इंसान होता है। “पीके” में उन्होंने सभी हिंदू देवी-देवताओं को रॉन्ग नंबर बता दिया। लेकिन अल्लाह पर वो चुप रहे।
पहलवानों की जिंदगी पर बनी “दंगल” में हनुमान की तस्वीर तक नहीं मिलेगी। जबकि इसमें पहलवानों को मांस खाने और एक कसाई का दिया प्रसाद खाने पर ही जीतते दिखाया गया है। सलमान खान भी इसी मिशन पर हैं, उन्होंने “बजरंगी भाईजान” में हिंदुओं को दकियानूसी और पाकिस्तानियों को बड़े दिलवाला बताया। शाहरुख खान तो “माई नेम इज़ खान” जैसी फिल्मों से काफी समय से इस्लामी जिहाद का काम जारी रखे हुए हैं।
#संस्कृति_को_नुकसान की कोशिश
हॉलीवुड की फिल्में पूरी दुनिया में अमेरिकी संस्कृति, हावभाव और लाइफस्टाइल को पहुंचा रही हैं। जबकि बॉलीवुड की फिल्में भारतीय संस्कृति से कोसों दूर हैं। इनमें संस्कृति की कुछ बातों जैसे कि त्यौहार वगैरह को लिया तो जाता है लेकिन उनका इस्तेमाल भी गानों में किया जाता है। लगान जैसी कुछ फिल्मों में भजन वगैरह भी डाले जाते हैं लेकिन उनके साथ ही धर्म का एक ऐसा मैसेज भी जोड़ दिया जाता है कि कुल मिलाकर नतीजा नकारात्मक ही होता है।
फिल्मों के बहाने हिंदू धर्म और भारतीय परंपराओं को अपमानित करने का खेल बहुत पुराना है। सिनेमा के शुरुआती दौर में ये होता था लेकिन खुलकर नहीं। लेकिन 70 के दशक के दौरान ज्यादातर फिल्में यही बताने के लिए बनाई जाने लगीं कि मुसलमान रहमदिल और नेक इंसान होते हैं, जबकि हिंदुओं के पाखंडी और कट्टरपंथी होने की गुंजाइश अधिक होती है।
आईआईएम के प्रोफेसर धीरज शर्मा की इस स्टडी में होने वाले खुलासों ने सारे देश को झकझोर कर रख दिया है और साथ ही बीजेपी के कद्दावर नेता डॉक्टर सुब्रमणियम स्वामी के उस दावे को भी सही साबित कर दिया, जिसमे उन्होंने कहा है कि बॉलीवुड में दाऊद का कालाधन लगता है और दाऊद के इशारों पर ही बॉलीवुड का इस्लामीकरण किया जा रहा है।
स्वामी समेत कई हिन्दू संगठन भी इस बात का दावा कर चुके हैं कि एक साजिश के तहत मोटी कमाई का जरिया बन चुके बॉलीवुड में “हिन्दू” कलाकारों को “किनारे” किया जा रहा है और मुस्लिम हीरो, गायक आदि को ज्यादा से ज्यादा काम दिया जा रहा है.पाकिस्तानी कलाकारों को काम देने के लिए भी दाऊद गैंग बॉलीवुड पर दबाव बनाता है।
सोचों और विचार करो।
From: Gurvinder Singh < >
Differences between Intellectual and Wise. We put too much emphasis on modern education. It’s actually mass education, a programming of people to think and feel identically. In this case, greatly enhance able natural human intelligence is suppressed. This human intelligence is replaced by vast amounts of data and information and a bias, to produce an intellectual. An intellectual person cannot cope, manage or adapt as effectively to changing scenarios and needs than an intelligent person. To make things worse, the status granted by popular society to intellect over intelligence breeds a not so pleasant or desirable an individual or society. Wisdom is the application of individual and collective intelligence to enhance the quality of life at individual relationship and create a better humanity and world.
To find out if one is an intellectual individual or a wise person one can go through these 14 points.