हिन्दू राष्ट्रवाद समझो और समझाओ

हिन्दू राष्ट्रवादको समझो और समझाओ

पश्चीमी देशों कहते रहते है कि राष्ट्रवाद बुरा है – उसका विरोध करो। मै कहता हुं कि हर राष्ट्रवाद दूसरे राष्ट्रवाद से अलग होता है। तो बुद्धिमान मनुष्योंका कर्तव्य कि वो जाने कि कौनसा राष्ट्रवाद क्या है।

और फिर निर्णय करे कि वो राष्ट्रवाद अच्छा है या बुरा है। तो मै यहां हिन्दू राष्ट्रवाद क्या है वो बताना चाहता हुं।

हिन्दू राष्ट्रवाद का आधार हिन्दू धर्म है जिसको वेदिक धर्म या सनातन धर्म या वर्णाश्रम धर्म भी कहा जाता है। हिन्दू धर्म सबसे पुराना है, और वेद उसके आदि धर्म ग्रन्थ है। चार वेदो का नाम सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेदा  और ऋग्वेद है। कुल मिलाकर उसके २०,००० मन्त्र है। भगवद गीता ये वेदो का ७०० श्लोको मे सार है।

ईसके उपरान्त १८ पुराण है जिसमे वेदो का सन्देश है और ६ दर्शन शास्त्र है। कुछ स्मृतियां है जो हमारे ऋषिओ ने लिखी है। वेदों के अन्दर २०५७ उपनिषद् है जिसमे १०८ उपनिषद् का बहूत् महत्व है – इसलिये हमारी जपमाला के १०८ मणीका है। और रामयण और महाभारत ग्रन्थ है।

वेद का ज्ञान स्वयम् भगवान ने ब्रह्माजी को दिया, और फिर उस ज्ञानके आधारसे ब्रह्माजी ने प्रजाओ को उत्पन्न किया। ब्रह्माजी के शरीर से मनु और शतरूपा उत्पना हुवे। ब्रह्माजी ने वेदका ज्ञान अपने पुत्रों को दिया, और उन सब ने अपने पुत्रों को दिया। इस तरह गुरु-शिष्य परम्परा से वेद का ज्ञान नयी पिढीयो को मिलता रहा। और वो ब्राह्मणो के स्मृति मे था।

जब ५,००० साल पहले कली युग का आरम्भ हुवा तो भगवान व्यासदेव ने जाना कि कलीयुग मे लोगों की यादशक्ती बहूत कम होगी, और वे वेदको मस्तक मे नहि रख पायेंगे। तब व्यासदेव ने वेदको पत्र पर लिख दिये, और ब्राह्मण समाज और धर्म आचर्यों ने वेदको अबतक सम्भाल के रक्खा है।

तो भगवान ने मनुष्यों को पैदा किया, और उनको कैसे रहना, और कैसे अपनी आध्यात्मिक प्रगती करके मोक्ष पाना या भगवान को पाना, वो वेद मे स्वयं भगवान ने बताया है, जिसको धर्म कहा जाता है। तो धर्म भगवान ने मनुष्य को दिया है, कोई मनुष्यने नहि। इसलिये हर हिन्दू कोई मनुष्य के बनाये हुवे धर्म का स्विकार नहि करता, और न करना चाहिये।

तो हिन्दू धर्म के ये बहूत धर्म ग्रन्थ है, और उसमे एक विशेष बात है जो आजके कोई परदेशी धर्म मे नहि है।

कोई हिन्दु धर्म ग्रन्थ नहि कहता है कि भगवान को किसी पर द्वेष है। भगवान सब को चाहता है क्युं कि हर जीव भगवान का सन्तान है।

कोई हिन्दु धर्म ग्रन्थ नहि कहता है कि भगवानको कोई एक मनुष्य जाती या वर्ण कोई दूसरे जाती या वर्ण से अधीक पसन्द या प्यारा है।

कोई हिन्दु धर्म ग्रन्थ नहि कहता है कि भगवान ने कोई एक देश कोई अमुक जाती या वर्ण के लिये हि बनाया है।

कोई हिन्दु धर्म ग्रन्थ नहि कहता है कि कोई एक जाती या वर्ण कोई दूसरी जाती या वर्ण के लोगो को गुलाम रक्खे या धिक्कार करे।

कोई हिन्दु धर्म ग्रन्थ नहि कहता है कि आप कोई एक देव या देवी को नहि मानेंगे तो आप नर्क मे जायेन्गे।

कोई हिन्दु धर्म ग्रन्थ नहि कहता है कि आप पापी है।

हिन्दु धर्म ग्रन्थ कहते हैं कि आप ये शरीर नहि है, किन्तु उसके अन्दर रहनेवाल आत्मा है, जो परमात्मा का सत् चित् आनन्द स्वरूपहै।

वेद या गीता मे बताये हुवे कोई भी योग व साधना करने से आप पाप-मुक्त जीवन जी शकते है, और आपकी आधात्मिक प्रगती कर शकते है। आध्यात्मिक प्रगती करके ही आप परमात्माको पा शकते है या मोक्ष पा शकते है।

अब ये समज़ लो कि कोई एक मनुष्य की आधात्मिक प्रगति होवे – वो पाप-मुक्त जीवन जिए – तो उससे किसी अन्य मनुष्यको आपत्ती नहि हो शकती। जो मनुष्य पाप कर्म करता है उससे उस मनुष्यको और दूसरों को आपत्ती होती है।

तो हिन्दू राष्ट्रवादी लोग भारते देश को एक हिन्दू राष्ट बनाना चाहते है, जिस राष्ट्र मे हर एक व्यक्ति को अपनी आध्यात्मिक प्रगती करने के लिये सुविधा होगी, और वो करने मे कोई बाधा नही करेगा।

दूसरी बात ये है कि हिन्दू धर्म की कोई भी साधना या योग ऐसा नहि है जिसको करने से कोई दूसरे मनुष्यमो कोई आपत्ती होवे। हिन्दू धर्म ये भी कहता है कि किसी भी अन्य व्यक्ति का जबरदस्ती धर्म परिवर्तन मत करो। ऐसा करना पाप है।

तो जब भारत हिन्दू राष्ट्र बनेगा तो सब लोग अपने पसन्द किये हुवे धर्म का पालन करेन्गे, और उनके धर्म पालन करने से किसी अन्य को कोई आपत्ती नहि होगी। तो ऐसे हिन्दू राष्ट्रवाद को कोई नहि कहेगा कि वो बुरा है। हिन्दू राष्ट्रवाद से अच्छा कोई अन्य राष्ट्रवाद मनुष्यके लिये नहि है।

ईस्लाम और ईसाईयत परदेशी religions है जो भारत मे घुसे हुवे है, निमन्त्रित नहि किये गये।

ये दोनो religions हिन्दू धर्म के दुश्मन है, और हिन्दू धर्म को पूर्णतह मिटाना चाहते है।

हम हिन्दू धर्म का पालन करे वो उनको पसन्द नहि है। उन्हो ने जान की धमकी से लाखो हिन्दू का धर्म परिवर्तन किया है। ये दो परदेशी घुसे हुवे religion हिन्दू राष्ट्र मे प्रतिबद्ध होंगे।

हिन्दू धर्म हर मनुष्य के लिये है। वेद कि हर प्रार्थना हर जीवके कल्याण के लिये है। हमारी कोई प्रार्थना ऐसी नहि है जिसमे कहा को कि “हे भगवान सीर्फ़ हमारे उपर हि कृपा करो, दूसरे के उपर नहि।“

ईसलिये हिन्दू हिन्दू-धर्म कहलाता है , हिन्दू -religion नहि।

तो आप हिन्दू राष्ट्रवाद समझो, और दूसरों को समझाओ यही मेरी विनती है।

==

From: youtube.com/watch?v=eF-da4gI0Wc

By Lakhan Sahu

मोदीजी, आपको विकास करना है करिए, परन्तु पहले इन निम्न मुद्दों का समाधान करिए, क्योंकि इन मुद्दों का समाधान यदि न हुआ तो आपके विकास का फायदा हम नहीं किन्तु इन जेहादियों की आने वाली पीढ़ियां उठाएंगी ! 1947 और कश्मीर एक बार फिर दोहराया जाएगा वह अलग।

यह BJP कि ज़ीत नहीं है, ये हिन्दुत्व कि ज़ीत है…

इस बार चुप नहीं बैठना है…पहले दिन से ही करो…

  1. जनसँख्या नियंत्रण कानून । जो ज्यादा बच्चे पैदा करे उन परिवार का मताधिकार छीन लो।
  2. सामान नागरिक संहिता
  3. धारा 370 और धारा 35A खत्म
  4. भगाये हुवे काश्मिरी पण्डितो को वापस उनके घरों मे रक्खो।
  5. राम मंदिर
  6. पूरे देश में NRC लागू
  7. रोहिंग्या ओर बागलादेशी मुसलमानों को निकाल।
    1. जो म्यानमार से आये है उनको भेजो वापस वहा। बुद्धों को कहो उनके स्वागत के लिये तैयार रहे।
    2. उनका आधार कार्ड रद करो। उन का मताधिकार छील लो।
  8. गौरक्षा (Make laws that will provide incentives for cow protection)
  9. गौ हत्या पर कडड दण्ड कानुन। उन का मताधिकार छील लो।
  10. मस्जिद में से लाउड स्पीकर पर प्रतिबंद्ध। मस्जिद मे कोई अरबी भाषा ना बोले।
  11. रास्ते पे नमाज़ पर प्रतिबंद्ध।
  12. बलात्कारी को सर्जरी से नपुंशक बनाओ।
  13. बुर्खा पर प्रतिबंद्ध।
  14. हर CM और PM को विनती कि कृपया वे एक हिन्दू धर्मगुरु के शिष्य बने।
  15. एक कायदा बनाओ कि जिसको CM या PM बनना है वो ब्रह्मचारी या सन्यासी ही होना चाहिये।
  16. पूरे हिंदुस्तान में एक ही शिक्षा प्रणाली
  17. Indian Administrative Service(IAS) के पाठ्यक्रम का हिन्दूकरण करो.
  18. अलिघर मुस्लिम युनिवरसिटी और JNU का हिन्दू राष्ट्रिय करण करो।
  19. उच्चा न्यायालय में से देश व धर्म के दुश्मनो को हटाओ।
  20. परदेशी NGO पर प्रतिबंध
  21. हिन्दू राष्ट्र घोषणापत्र (Narrative), हिन्दू संविधान, हिन्दू राष्ट्र, हिन्दू राज्य (सिकुलर नहि)

*जयतु जयतु हिन्दुराष्ट्रम्…*🚩

हर हिन्दू यह मेसेज मोदीजी तक पहुँचाओ।

जय श्री कृष्ण !

Hinduunation.com

 

ढोल, गवाँर, शुद्र, पशु और नारी के प्रति ताड़न का क्या तात्पर्य

पुरी के शंकाराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती को सुनो.

देवभूमि कश्मीर का अ-हिंदुकरण

From: Vinod Kumar Gupta < >

“देवभूमि कश्मीर का अहिंदुकरण”➖

▶1947 की  शरणार्थी समस्या➖

हिन्दुओं के लिये स्वर्ग कहलाने वाली देवभूमि जम्मू-कश्मीर में देश विभाजन के समय 1947 में पाकिस्तान से प्रताड़ित होकर आये हिन्दू शरणार्थी जो सीमान्त क्षेत्रो में रह रहें है, को भारत के नागरिक होने के उपरान्त भी वहां की नागरिकता से 70 वर्ष बाद भी वंचित किया हुआ है। जिस कारण उनको राशन व आधार कार्ड , गैस कनेक्शन,सरकारी नौकरी,राज्य में स्थानीय चुनावों व उच्च शिक्षा,संपप्ति का क्रय-विक्रय आदि से वंचित होना पड़ रहा है। जबकि 1947 में यहां से पाकिस्तान गये हुए मुसलमानों को वापस बुला कर पुनः ससम्मान जम्मू-कश्मीर में बसाया जा रहा है। समाचारों के अनुसार विभाजन के समय लगभग 2 लाख शरणार्थी लगभग (37000 परिवार) जम्मू व घाटी में आकर बसे थे जो अब अखनूर, जम्मू, आरएस पुरा, बिश्नाह, सांबा, हीरानगर तथा कठुआ आदि के सीमान्त क्षेत्रो में रह रहें है। इनकी चार पीढियां हो चुकी है और संख्या भी अब कई लाखों में होगी फिर भी ये अभी शरणार्थी जीवन का दंश झेल रहें है। इनमें अधिकाँश दलित, अनुसूचित जाति व पिछड़ा वर्ग के हिन्दू-सिख है। ये अभी तक जम्मु-कश्मीर राज्य के नागरिक नही है , क्योंकि 1953 में राज्य सरकार ने निर्वाचन कानून में एक संशोधन किया था जिसके अनुसार जम्मू-कश्मीर की विधान सभा में वही मतदाता होगा जो वहां का स्थायी नागरिक होगा और स्थायी नागरिक वही होगा जो  1944  से पहले राजा हरिसिंह के राज्य की प्रजा होगी। अर्थात इस राज्य में जो 1944 के पहले से रह रहा है वही वहां का स्थायी नागरिक कहलायेगा। इसके पीछे वहां के तत्कालीन “प्रधानमंत्री”  ( उस समय वहां मुख्य मंत्री नहीं होता था) शेख अब्दुल्ला की हिन्दू विरोधी मानसिकता थी क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि इन हिंदू शरणार्थियों को यहां बसाया जायें। जबकि 1948 में मध्य एशिया से आये मुस्लिम समुदाय को वहां बसाया गया और उन्हें नागरिकता भी दी गयी। “पश्चिमी पाकिस्तान रिफ्यूजी संघर्ष समिति” के पदाधिकारी  निरंतर भारत सरकार से अपनी समस्याओं के लिए चक्कर काटते रहें है फिर भी अभी तक कोई समाधान नही हो पा रहा है। लगभग ढाई वर्ष पूर्व समिति के अध्यक्ष श्री लब्बा राम गांधी को प्रधानमंत्री मोदी , गृहमंत्री राजनाथ सिंह व बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह आदि ने आश्वासन दिया था कि इनकी समस्याओं का शीघ्र हल निकाला जायेगा, पर अभी तक कोई समाधान नहीं हुआ है। विश्व मे नागरिको के  मुलभूत मौलिक मानवीय अधिकारों के हनन की संभवतः यह एकमात्र त्रासदी हो।

▶”देवभूमि कश्मीर का अहिंदुकरण”➖

वर्ष 1990 में 19 जनवरी की वह काली भयानक रात वहां के हिन्दुओं के लिए मौत का मंजर बन गयी थी। वहां की मस्जिदों से ऐलान हो रहा था कि हिंदुओं “कश्मीर छोडो” । उनके घरों को लूटा जा रहा था, जलाया जा रहा था ,उनकी बहन-बेटियों के बलात्कार हो रहे थे, प्रतिरोध करने पर कत्ल किये जा रहें थे। मुग़ल काल की बर्बरता का इतिहास दोहराया जा रहा था। देश की प्रजा कश्मीरी हिन्दुओ को अपनी ही मातृभूमि (कश्मीर) में इन धर्मांधों की घिनौनी जिहादी मानसिकता का शिकार बनाया जा रहा था। उस समय सौ करोड़ हिन्दुओं का देश व लाखों की पराक्रमी सेना अपने ही बंधुओं को काल के ग्रास से बचाने में असमर्थ हो रही थी ।भारतीय संविधान ने भी अपने नागरिकों की सुरक्षा का दायित्व नहीं निभाया , क्यों..? क्या उनका स्वतंत्रता , समानता और स्वाभिमान से जीने का मौलिक व संवैधानिक अधिकार नही ? क्या मुस्लिम वोटों से सत्ता की चाहत ने तत्कालीन शासको को अंधा व बहरा कर दिया था कि जो उन्हें कश्मीरी हिन्दुओं का बहता लहू दिखाई नहीं दिया और न ही रोते-बिलखते निर्दोषो व मासूमों की चीत्कार सुनाई दी ? परिणाम सबके सामने है सैकड़ो-हज़ारों का धर्म के नाम पर रक्त बहा , लगभग 5 लाख हिन्दुओं को वहां से पलायन करना पड़ा और ये लुटे-पिटे भारतीय नागरिक जगह-जगह भटकने को विवश हो गये। सरकारी व सामाजिक सहानुभूति पर आश्रित विस्थापित समाज इस आत्मग्लानि में कब तक जी सकेगा ? स्वाभिमान व अस्तित्व के लिए संघर्ष करते हुए बच्चे आज युवा हो गये जबकि युवाओं के बालो की सफेदी ने उनको बुजुर्ग बना दिया। छोटे-छोटे शिविरों में रहने वाले अनेक कश्मीरी परिवारों में जन्म दर घटने से उनके वंश ही धीरे धीरे लुप्त हो रहें है।
इस मानवीय धर्मांध त्रासदी की पिछले 27 वर्षों से यथास्थिति के  इस इतिहास पर तथाकथित “मानवाधिकारियों व धर्मनिर्पेक्षवादियों” का उदासीन रहना क्या इसके उत्तरदायी कट्टरवादी मुस्लिमो को प्रोत्साहित नहीं कर रहा है ? “निज़ामे-मुस्तफा” की स्थापना की महत्वाकांक्षा मुस्लिम समुदाय के जिहादी दर्शन का एक  विशिष्ट अध्याय है। ऐसी विकट परिस्थितियों में हिंदुओं को वहां पुनः बसा कर उनके सामान्य जीवन को सुरक्षित करने का आश्वासन कैसे दे सकते है ? यह भी सोचना होगा कि विभाजनकारी अस्थायी अनुच्छेद 370 के रहते उनको पुनः वहां बसा कर जिहादी जनुनियो के कोप का भाजन बनने देना क्या उचित होगा ? जबकि आज वहां की बीजेपी -पीडीपी गठबंधन सरकार धीरे धीरे सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफस्पा ) को हटाने की ओर बढ़ रही है और कुछ स्थानों से सुरक्षाबलो को भी हटाना आरम्भ किया जा चुका है। आज यह सोचना होगा कि कश्मीर में “हिन्दू” रहेगा का ज्वलंत प्रश्न तो है ही पर क्या कश्मीर में “भारत” रहेगा या नही ?

▶विस्थापित कश्मीरी हिन्दुओं की वापसी➖

आज कश्मीर के विस्थापित हिंदुओं में कश्मीरी हिन्दू या कश्मीरी पंडित की भावना से बाहर निकाल कर भारतीय हिन्दू या  “हिन्दू-हिन्दू सब एक” का संगठनात्मक भाव बनाने की भी परम आवश्यकता है। यह सत्य है कि धर्म के कारण जो भयानक पीड़ा कश्मीरी हिंदू सह रहे है उससे उनकी एक अलग पहचान बन चुकी है । परंतु अगर हम सब अपने को प्रदेश वाद से जोड़कर कोई हिमाचली, पंजाबी, बिहारी, मराठी, गुजराती, बंगाली, मद्रासी आदि में बाट कर देखने लगेंगे तो यह एक बहुत बड़ा आत्मघाती कदम होगा। अतः विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं के दर्द से द्रवित होने वाले सभी हिंदुओं के समर्थन से चलने वाले आंदोलनो को राज्यस्तरीय विभाजन से भी बचाना होगा। लेकिन यह झुठलाया नहीं जा सकता कि कश्मीरी हिंदुओं की त्रासदी हमारे लिए एक बहुत बड़ी जीवंत चुनौती है। पुरे देश में जगह जगह बनने वाली मुस्लिम बस्तियों के बढ़ने से मिनी पाकिस्तान का बनना हम सभी को कश्मीर के भयंकर संकट का अभास करा रहा है। अतः ये मुस्लिम जिहाद केवल कश्मीरी हिंदुओं का ही नहीं पुरे भारत के हिन्दुओ की आस्थाओं व अस्तित्व पर भी भारी संकट है। सभी अलग अलग राज्यों में रहने वाले हिन्दू आपस में एकजुट है तभी संगठित शक्ति प्रदर्शन से ही हम विस्थापितों की समस्या को हल कर सकते है व भविष्य में बढ़ते जिहाद को रोकने की सामर्थ जुटा सकेगें। यह भी विचार किया जा सकता है कि विस्थापित हिंदुओं का पूरे भारत पर उतना ही अधिकार है जितना अन्य किसी हिन्दू का अतः यह कहना कहा तक उचित है कि कश्मीरियों को अलग होमलैंड देना चाहिए या वे अलग होमलैंड मांग रहे है। भारत के समस्त हिंदुओं को यह सोचना होगा कि अगर वे अपने अपने प्रदेशवासी या ग्रामवासी विचार के अहम को छोड़ कर एक हिन्दुत्वादी राष्ट्रीय  विचारधारा को नहीं अपनाएंगे तो उनका संकट घटेगा नहीं उल्टा बढेंगा। क्योंकि इससे हम हिंदुओं की ही एकजुटता पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है ?

▶अतःकश्मीरी हिन्दुओं को पुनः कश्मीर में बसाने के लिये व पाकिस्तान से आये शरणार्थी हिन्दुओं को वहां के सामान्य नागरिक अधिकार दिलवाने के लिये अनेक कठोर उपाय करने होंगे।अलगाववादियों व आतंकवादियों के कश्मीर व पीओके आदि के सभी ठीकानों व प्रशिक्षण केंद्रों को नष्ट करना होगा।  बंग्ला देशी ,म्यंमार, पाकिस्तान,अफगानिस्तान आदि के  मुस्लिम घुसपैठियों व आतंकियों को कठोरता से बाहर निकालना होगा। वहां के आतंकियो के स्लीपिंग सेलो व ओवर ग्राउंड वर्कर्स को भी चिन्हित करके उनको बंदी बनाना होगा। यह भी ध्यान रहें कि जम्मू कश्मीर से जब तक अनुच्छेद 370 नहीं हटाया जाता तब तक वहां से अफस्पा कानून व सेना को भी नहीं हटाया जाना चाहिये। इसके साथ साथ केंद्र सरकार को  जम्मू-कश्मीर में प्रस्तावित सैनिक कालोनी व विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं के लिए कालोनियों के निर्माण की योजनाओं को अविलंब आरम्भ करना चाहिये । साथ ही कश्मीर को भारत की मुख्य धारा में लाने के लिए व उसको अहिंदुकरण होने से बचाने के लिये संविधान का विवादित आत्मघाती अनुच्छेद 370 को हटाने की केंद्र व राज्य सरकारों सहित सभी भारतीयों की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिये।

विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक एवं लेखक)
ग़ाज़ियाबाद

नोट: यह लेख पूर्व में 5.5.2017 में भी प्रेषित किया गया था… पुनः प्रेषित कर रहा हूं… आज भी प्रसांगिक है।

Modi ji,अनुच्छेद 35ए तथा 370को संविधान से समाप्त करो

From: Vinod Kumar Gupta < >

सेवा में
माननीय प्रधानमंत्री जी                        25.2.2019
भारत सरकार
नई दिल्ली

आदरणीय महोदय

आज देश का सम्पूर्ण जनमानस शोकाकुल और आक्रोशित है। आतंकवादी वर्षों से जम्मू-कश्मीर को लहुलूहान किये जा रहें है। निःसंदेह इसका मुख्य कारण है कि भारतीय संविधान के अस्थायी व विवादित अनुच्छेद 35 ए  और अनुच्छेद 370  के समस्त प्रावधान जो अभी तक यथावत बनें हुए है। राष्ट्रीय एकता और संप्रभुता को बनाये रखने के लिए इन अनुच्छेदों को भारतीय संविधान से पूर्णतः हटाया जाना अति आवश्यक है। आज केंद्रीय सरकार आपके नेतृत्व में राष्ट्रनीति की सर्वोच्चता के मापदंडों को अपनाने में क्यों असमर्थ है?

आप भलीभांति परिचित ही है कि “जम्मू-कश्मीर” की धरती दशकों से भारतभक्तों के रक्त से लाल हो रही है। देशद्रोहियों व आतंकवादियों के भयावह अत्याचारों से वहां के हज़ारों मूल निवासियों के हत्याकांडों की पीड़ा और लाखों के पलायन की हृदयविदारक घटनाएं निरंतर उद्वेलित करती आ रही है। सन् 1947 के देश विभाजन से उखड़े व उजड़े पश्चिमी पाकिस्तान से आये कुछ हज़ार हिन्दू-सिख परिवारों को, जिनकी संख्या अब लाखों में हो चुकी है, अभी तक अपने प्रादेशीय मूलभूत अधिकारों से वंचित है।

अतः आपसे देश व देशवासियों के हित के लिए विनम्र अनुरोध है कि अनुच्छेद 35  ए  तथा अनुच्छेद 370 को भारतीय संविधान से समाप्त कर जम्मू-कश्मीर व अन्य राज्यों में एक समानता बना कर अखण्ड भारत की धारणा को सुदृढ़ बनाये। इससे भारतीय संस्कृति पर आक्रामक इस्लामिक जिहादियों पर भी नियंत्रण हो सकेगा। मोदी जी आपके “मन की बात”  बहुत बार सुन चुकें है कृपया अब “हमारे मन की बात” भी सुनें और अनेक समस्याओं के समाधान के लिए इस दशकों पुरानी संवैधानिक व्यवस्था को हटवा कर करोड़ों देशवासियों के हितों की रक्षा करें।

सधन्यवाद

निवेदक

विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
गाज़ियाबाद

नोट:  मैने यह पत्र प्रधानमंत्री जी को ईमेल किया है।
आप भी अपने अनुसार ऐसा करके राष्ट्रीय दायित्व निभाये। अपने समाचार पत्र में प्रकाशित करके अधिक प्रचार करें तो सक्रियता बढ़ेगी और लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल्य बढेगा।
==
कश्मीर का बिना शर्त भारत में पूर्ण विलय , फिर अनुच्छेद 370 का क्या औचित्य…❔

▶कश्मीर का भारत में विलय➖

26 अक्टूबर 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 ( इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 )  के अनुसार जिस विलय पत्र पर कश्मीर के राजा हरिसिंह ने हस्ताक्षर किये थे वह पूर्णतः बिना किसी शर्त के था। इस अधिनियम के अनुसार किसी भी राज्य के भारत में विलय के निर्णय का संपूर्ण अधिकार केवल वहाँ के शासक का ही होता था। इस पर भी राजा हरिसिंह ने यह स्पष्ट कर दिया था कि इस विलय पत्र में कोई भी परिवर्तन या संशोधन हो तो उनकी स्वीकृति आवश्यक होगी । भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन ने 27 अक्टूबर 1947 को उस विलय पत्र पर अपने हस्ताक्षर करके उसी रूप में उसे स्वीकार किया था । लेकिन माउंटबेटन ने जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान के कबाइलियों व सेना ने आक्रमण कर देने के कारण वहाँ की असामान्य स्थिति का अनुचित लाभ उठाते हुए अपनी कुटिल चाल चलते हुए राजा हरिसिंह को एक अलग पत्र द्वारा यह बताया कि भविष्य में जब कश्मीर राज्य की स्थिति सामान्य हो जाएगी और आक्रमणकारी निकाल दिए जाएँगे तो इस विलय पर वहाँ की जनता से राय ली जाएगी । पर “इस पत्र का कोई वैधानिक अधिकार नहीं था क्योंकि इस प्रकार के सशर्त विलय का भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम में कोई प्रावधान नहीं था”। ध्यान रहे देश की अन्य समस्त 568 देशी रियासतों के समान ही जम्मू-कश्मीर का बिना शर्त भारत में विलय हुआ था। अतः जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय अन्य रियासतों के समान ही अविवादित,  बिना शर्त व पूर्ण था । आज जो लोग अपनी कुटिल राजनीति के कारण देश को भ्रमित कर रहे हैं वे भारत विरोधी ही हो सकते हैं।

▶विभाजनकारी ‘अनुच्छेद 370’ ➖

भारतीय संविधान का अनुछेद 370 कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देता है , जिसके अनुसार  रक्षा, विदेश व संचार नीति जैसे महत्वपूर्ण विषयों को छोड़कर बाकी सभी विषयों पर राज्य सरकार की सहमति आवश्यक होगी । कश्मीर के लोग भारत के किसी भी भाग में भूमि खरीद सकते हैं, चुनाव लड़ सकते हैं परंतु शेष भारत के लोग वहाँ न तो भूमि खरीद सकते हैं और न ही वहाँ कोई चुनाव लड़ सकते हैं । जम्मू-कश्मीर के लोग भारत के नागरिक हैं, परंतु शेष भारत के लोग इस राज्य के नागरिक नहीं माने जाते। इससे भारत व कश्मीर के नागरिकों के विरुद्ध आपसी भेदभाव बढ़ता जा रहा है । यही कारण है कि  भारत विरोधी व अलगाववादी मानसिकता को प्रोत्साहन भी मिलता आ रहा है। यहाँ के लोगों को एक प्रकार से राज्य व केंद्र की दोहरी नागरिकता मिली हुई है।

इस अनुच्छेद के कारण देश के 134 कानून जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं हो पा रहे हैं। यदि ये कानून शेष देश के नागरिकों के हितों पर चोट नहीं करते तो जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के लिये कैसे हानिकारक हो सकते हैं ? इस अनुच्छेद के कारण वहां का क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ रहा है क्योंकि जम्मू व लददाख के लोगों से सरकारी नौकरियों व विकास कार्यों में भेदभाव करते हुए कश्मीर घाटी को प्रमुखता दी जाती रही है। इसके रहते यहाँ की अधिकांश हिन्दू जातियों को जो पिछड़ी हुई हैं भारतीय संविधान के अनेक प्रावधानों के लागू न होने कारण आरक्षण भी नहीं मिलता जिससे इन हिन्दुओं के और अधिक पिछड़ने से गरीबों की संख्या भी बढ़ती जा रही है।
इस अनुच्छेद का अधिकांश  लाभ सामान्य जनता को नही केवल वहां के सत्ताधारियों व अलगाववादियों को ही मिल रहा है । इसके कारण अलगाववादियों, आतंकियों एवं भारतीय ध्वज व संविधान का अपमान करने वालों पर कठोर कार्यवाही भी नहीं हो पाती । सन् 2002 में पूरे देश मे लोकसभा क्षेत्रों का पुनर्गठन हुआ था पर इस विवादित अनुच्छेद के चलते यह जम्मू-कश्मीर में नही हो सका। क्या ऐसे में भारतीय संसद की भूमिका वहाँ अप्रासंगिक नहीं हो गई ? अतः यह विचार करना होगा कि अनुच्छेद 370 के होते वहाँ के सामान्य नागरिकों को क्या लाभ हुआ और अगर देश के अन्य कानून वहां लागू होते तो उन्हें कितना लाभ होता ?
वास्तव में जम्मू-कश्मीर से सम्बंधित भारत के संविधान में अनुच्छेद 370 जोड़ने का विरोध सभी राजनीतिक दलों , संविधान सभा व कांग्रेस कार्य समिति के सभी सदस्यों एवं जम्मू-कश्मीर के चारों प्रतिनिधियों ने भी किया था । संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ भीमराव अंबेडकर ने भी इस अनुच्छेद के पक्षधर पं जवाहरलाल नेहरु को समझाया था कि इस प्रकार के विशेष दर्जे से कश्मीर घाटी में भारतीय राष्ट्रवाद की पकड़ समाप्त हो जाएगी और भविष्य में कश्मीर के युवा अलगाववाद के रास्ते पर चलकर पाकिस्तान की गोद में चले जाएंगे । डॉ अंबेडकर ने अनुच्छेद 370 की फिरकापरस्ती जिद्द पर अड़े शेख अब्दुल्ला से भी स्पष्ट कहा था ” तुम यह तो चाहते हो कि भारत कश्मीर की रक्षा करे , कश्मीरियों को पूरे भारत में समान अधिकार हो, पर भारत और भारतीयों को तुम कश्मीर में कोई अधिकार देना नहीं चाहते। मैं भारत का कानून मंत्री हूँ और मैं अपने देश के साथ इस प्रकार की धोखाधड़ी और विश्वासघात में शामिल नहीं हो सकता”।  इतने विरोध के उपरान्त भी जम्मू-कश्मीर के एक विशेष समुदाय (मुस्लिम) व शेख अब्दुल्ला को प्रसन्न रखने के लिये इस विभाजनकारी अनुच्छेद को नेहरु जी ने स्वीकार करके देश में  धर्मनिरपेक्षता , लोकतंत्र और संघीय ढाँचे के स्वरूप को अपनी अड़ियल व अधिनायकवादी प्रवृत्ति के कारण  बिगाड़ने का कार्य किया था।

▶अनुच्छेद 370 को हटाना कठिन नहीं➖

उस समय ऐसा भी कहा गया था कि पाकिस्तानी आक्रमण की पृष्ठभूमि में शेख अब्दुल्ला की कुटिल सलाह पर इस विशेष अनुच्छेद का प्रावधान नेहरु जी ने स्वीकारा, जिससे जनमत संग्रह की स्थिति में स्थानीय नेता होने के कारण शेख अब्दुल्ला भारत के पक्ष में रहेगा। शेख अब्दुल्ला ने भी यह माना था कि यह अनुच्छेद अपरिवर्तनीय नहीं है। जम्मू-कश्मीर के एक पूर्व मुख्यमंत्री जी.एम. सादिक़ ने भी सार्वजनिक रूप से इसको समाप्त करने को कहा था। कश्मीर की संविधान सभा के 1957 में समाप्त होते ही इस अनुच्छेद की प्रासंगिकता शेष नहीं रहती और वैसे भी इस सभा के निरस्त होने के बाद इसके सारे अधिकार लोकसभा को दिये गये हैं । अतः जो लोग जम्मू कश्मीर की संविधान सभा को पुनर्गठित करने की बात करते हैं,  वह बिल्कुल निराधार है।संविधान निर्माताओं ने  अनुच्छेद 370 के शीर्षक में “जम्मू-कश्मीर के बारे में अस्थायी उपबंध” लिखकर इसे निहायत अस्थायी व्यवस्था के रूप में लिखा था। विधि-विशेषज्ञों के अनुसार इसके उपखंड (3) में इसको समाप्त करने की साफ साफ व्यवस्था है कि इसे संविधान से खारिज करने के लिए लोकसभा की किसी बैठक की आवश्यकता नहीं है । राष्ट्रपति एक साधारण उद्घोषणा द्वारा इसे समाप्त कर सकते हैं।प्रसिद्ध विधिवेत्ता डॉ सुब्रमणियन् स्वामी ने भी यह  स्पष्ट बताया था कि केंद्रीय मंत्रिमंडल भी अगर  इस अस्थायी अनुच्छेद 370  को समाप्त करने की विधिवत् अनुशंसा राष्ट्रपति को भेजे तो वह उसे स्वीकार करके इस दशकों पुरानी विवादित समस्या का निदान करने में सक्षम हैं। इस विवादकारी अनुच्छेद  के कारण ही पाकिस्तान  जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग नही मानता। अतः इसको हटाने की माँग को सांप्रदायिक रंग देना दुःखद है। बल्कि वास्तविकता यह है कि इस अनुच्छेद के हटने से जम्मू-कश्मीर के भारत मे पूर्ण  विलय सम्बन्धित सभी भ्रम दूर हो जाएंगे। वैसे भी जम्मू-कश्मीर के दोहरे स्तर को समाप्त करके मूलधारा से जोड़कर सशक्त भारत के निर्माण के लिये इसको हटाना अति आवश्यक है।

विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक एवं लेखक)
गाज़ियाबाद

नोट: यह लेख मैने  04.5.2017  को भी प्रेषित किया था। आज भी सर्वाधिक प्रसांगिक है…उचित समझें तो अवश्य प्रकाशित करें।
धन्यवाद