How to Easily Remove Article 370

How to Easily Remove Article 370

by Subramanian Swamy

 

(Please share with all the Hindus you know, request them that they demand from the Gov’t to remove Article 370. – Jaya sri Krishna!  – Skanda987)

So many people think that both assembly of J&K and Parliament need approval to abolish for Art370. I think we all are wrong.

 

Anyone who says Art 370 abolition needs Parliament approval is either ignorant of the Constitution or an illiterate. It just needs a Presidential Notification of a Cabinet Resolution.

 

I have sent a Note to PMO along with photocopies of the Constituent Assembly Debates and my legal arguments on why Art 370 can be deleted without Parliament concurrence, and by a Presidential Notification. I want it timed for mid-September.

सब धर्म अच्छे हैं ? जानो क्या फ़र्क है।

From: Chander Kohli < >

 ” सब धर्म अच्छे हैं ”
जो लोग कहते है कि ” सब धर्म अच्छे हैं ” ; ” सब धर्म अच्छी बातें सिखाते है —  वे सब लोग हिन्दुओं के महान शत्रु हैं   और अनुचित प्रचार कर रहे हैं तथा झुठ बोल रहें हैं  और झूड़ बोलते  हैं ———–
१ . क्या हिन्दू धर्म मॉस – खाने का प्रचार करता है — नहीं ; 
किन्तु इस्लाम और ईसाई धर्म करते हैं
२ .  क्या हिन्दू धर्म गऊ मॉस – खाने का प्रचार करता है — नहीं ; 
किन्तु इस्लाम और ईसाई धर्म करते हैं
३ .  क्या हिन्दू धर्म जो लोग हिन्दू नहीं हैं उन्हें काफिर या पेगन कहता है — नहीं – नहीं ; 
किन्तु इस्लाम और ईसाई धर्म कहते हैं   
और काफिर और पेगन को धर्म परिवर्तन करवाते  है किसी भी अनुचित ढंग आदि आदि से ———
४ .  क्या हिन्दू धर्म चार पत्निया करने का प्रचार करता है — नहीं ;
किन्तु इस्लाम करता  हैं  ——-
५  . क्या हिन्दू धर्म जो हिन्दू नहीं उस को धर्म परिवर्तन करने या  उस की ह्त्या करने को कहता है  —  — नहीं ;
किन्तु इस्लाम और ईसाई धर्म  कहते हैं और करते हैं  ——-
६  . क्या हिन्दू धर्म कहता है कि —–
 केवल ईश्वर   में विशवास करने वाला  ही 
 केवल गीता  में विशवास करने वाला  ही 
 केवल  मंदिर  में विशवास करने  वाला ही  हिन्दू है अन्यथा नहीं ———नहीं कहता —–
जैसे इस्लाम कहता है 
 केवल अल्लाह में विशवास करने वाला  ही 
 केवल कुरान   में विशवास करने वाला  ही 
 केवल मुहम्मद  में विशवास करने वाला  ही ——-  मुसलमान है ——– और कोई नहीं
ईसाई कहते हैं —
 केवल क्राइस्ट   में विशवास करने वाला  ही 
 केवल बाइबल   में विशवास करने वाला  ही 
 केवल चर्च   में विशवास करने वाला  ही ———-  ईसाई है ——— और कोई नहीं
७ . केवल मुस्लिम आदमी ही तीन बार कहने से ”तालाक” दे सकता है महिला नहीं ——-
क्या हिन्दू धर्म ऐसा कहता है — नहीं ——-
८ . क्या हिन्दू धर्म , धर्म परिवर्तन में विशवास करता है —- नहीं , नहीं —–
किन्तु मुसलमान  और ईसाई धर्म करते  है —-
ऐसे अनेक अनेक उदाहरण हैं ———-
९ . इन सब कारणों के कारण इस्लाम और ईसाई ”धर्म” ;
”धर्म” नहीं ”मत” हैं ————
१० . कई हिन्दू लोग मांस खातें हैं , कई हिन्दू लोग ”तालाक ” देते हैं आदि आदि —-   किन्तु हिन्दू धर्म ऐसा करने को नहीं कहता जब की कुरान कहता है   

मुसलमान कहते हैं —- जो हिन्दू मांस खातें हैं —– जो लोग तलाक देते हैं —- आदि आदि वे सब हिन्दू नहीं वे सब मुसलमान या ईसाई बन जाएं ——

उन  सब मुसलमान और ईसाई  लोगों को  उत्तर ——
1 . बहुत सारे मुसलमान शराब पीते हैं — जो कुरआन में वर्जित है ,  उन  मुसलमानों को हिन्दू बन जाना चाहिए ——————
बहुत मुस्लिम महिलाएं ”मेक अप = make up ”करती हैं जो कुरआन में वर्जित है , उन   मुस्लमानियों  को हिन्दू बन जाना चाहिए ——————
बहुत मुस्लिम महिलाएं हिजाब और बुरखा नहीं पहनती — कुरआन के कारण उन्हें पहनना चाहिए —– उन   मुस्लमानियों को हिन्दू बन जाना चाहिए —-
संगीत , नृत्य , गाना बजाना कुरान में वर्जित है   तो सब गाने  बजाने , नृत्य करने वाले मुसलमानों को हिन्दू बन जाना चाहिए ——————
ऐसे अनेक अनेक उदाहरण हैं ———-

वेदों में पर्यावरण विज्ञान

From: Vivek Arya < >

 

वेदों में पर्यावरण विज्ञान

लेखक- स्वर्गीय डॉ रामनाथ वेदालंकार
प्रस्तोता- प्रियांशु सेठ
सहयोगी- डॉ विवेक आर्य

(आज 5 जून “विश्व पर्यावरण दिवस” पर विशेष रूप से प्रकाशित)

वेद का सन्देश है कि मानव शुद्ध वायु में श्वास ले, शुद्ध जल को पान करे, शुद्ध अन्न का भोजन करे, शुद्ध मिट्टी में खेले-कूदे, शुद्ध भूमि में खेती करे। ऐसा होने पर ही उसे वेद-प्रतिपादित सौ वर्ष या सौ से भी अधिक वर्ष की आयु प्राप्त हो सकती है। परन्तु आज न केवल हमारे देश में, अपितु विदेशों में भी प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि मनुष्य को न शुद्ध वायु सुलभ है, न शुद्ध जल सुलभ है, न शुद्ध अन्न सुलभ है, न शुद्ध मिट्टी और शुद्ध भूमि सुलभ है। कल-कारखानों से निकले अपद्रव्य, धुओं, गैस, कूड़ा-कचरा, वन-विनाश आदि इस प्रदूषण के कारण हैं। प्रदूषण इस स्थिति तक पहुंच गया है कि कई स्थानों पर तेजाबी वर्षा तक हो रही है। 18 जुलाई, 1983 के दिन भारत के बम्बई शहर में तेजाबयुक्त वर्षा हो चुकी है। यदि प्रदूषण निरन्तर बढ़ता गया तो वह दिन दूर नहीं जब यह भूमि मानव तथा अन्य प्राणियों के निवासयोग्य नहीं रह जायेगी।
पर्यावरण-प्रदूषण की चिन्ताजनक स्थिति को देखकर 5 जून, 1972 को बारह संयुक्त राष्ट्रों की एक बैठक इस विषय पर विचार करने के लिए स्टाकहोम (स्वीडन) में आयोजित हुई थी, जिसके फलस्वरूप विभिन्न राष्ट्रों द्वारा पर्यावरण-सुरक्षा हेतु प्रभावशाली कदम उठाए गए। उक्त गोष्ठी में भारत की तीसरी प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने भी ‘पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति एवं उसका विश्व के भविष्य पर प्रभाव’ विषय पर भाषण दिया था। उसके पश्चात् भारत में पर्यावरण-प्रदूषण का अध्ययन करने, उसे रोकने के उपाय सुझाने एवं उनके क्रियान्वयन करने हेतु अनेक सरकारी तथा व्यक्तिगत या जनता की ओर से सामूहिक प्रयास होते रहे हैं तथा आज भी अनेक संस्थाएं इस दिशा में कार्यरत हैं। प्रस्तुत लेख में हम यह दर्शायेंगे कि वेद का पर्यावरण के सम्बन्ध में क्या विचार है!

  1. वायु- स्वच्छ वायुमण्डल का महत्त्व

स्वच्छ वायु का सेवन ही प्राणियों के लिए हितकर है यह बात वेद के निम्न मन्त्रों से प्रकट होते हैं-

वात आ वातु भेषजं शम्भु मयोभु नो हृदे।
प्र ण आयूंषि तारिषत्।। -ऋ० १०/१८६/१

वायु हमें ऐसा ओषध प्रदान करे, जो हमारे हृदय के लिए शांतिकर एवं आरोग्यकर हो, वायु हमारे आयु के दिनों को बढ़ाए।

यददो वात ते गृहेऽमृतस्य निधिर्हित:।
ततो नो देहि जीवसे।। -ऋ० १०/१८६/३

हे वायु! जो तेरे घर में अमृत की निधि रखी हुई है, उसमें से कुछ अंश हमें भी प्रदान कर, जिससे हम दीर्घजीवी हों।

यह वायु के अन्दर विद्यमान अमृत की निधि ओषजन या प्राणवायु है, जो हमें प्राण देती है तथा शारीरिक मलों को विनष्ट करती है। उक्त मन्त्रों से यह भी सूचित होता है कि प्रदूषित वायु में श्वास लेने से मनुष्य अल्पजीवी तथा स्वच्छ वायु में कार्बन-द्विओषिद की मात्रा कम तथा ओषजन की मात्रा अधिक होती है। उसमें श्वास लेने से हमें लाभ कैसे पहुंचता है, इसका वर्णन वेद के निम्नलिखित मन्त्रों में किया गया है-

द्वाविमौ वातौ वात आ सिन्धोरा परावत:।
दक्षं ते अन्य आ वातु परान्यो वातु यद्रप:।।
आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद्रप:।
त्वं हि विश्वभेषजो देवानां दूत ईयसे।। -ऋ० १०/१३७/२,३ अथर्व० ४/१३/२,३

ये श्वास-निःश्वास रूप दो वायुएँ चलती हैं, एक बाहर से फेफड़ों के रक्त-समुद्र तक और दूसरी फेफड़ों से बाहर के वायुमंडल तक। इनमें से पहली, हे मनुष्य तुझे बल प्राप्त कराए और दूसरी रक्त में जो दोष है उसे अपने साथ बाहर ले जाये। हे शुद्ध वायु, तू अपने साथ ओषध को ला। हे वायु, शरीर में जो मल है उसे तू बाहर निकाल। तू सब रोगों की दवा है, तू देवों का दूत होकर विचरता है।

वनस्पतियों द्वारा वायु-शोधन-

कार्बन-द्विओषिद की मात्रा आवश्यकता से अधिक बढ़ने पर वायु प्रदूषित हो जाता है। वैज्ञानिक लोग बताते हैं कि प्राणी ओषजन ग्रहण करते हैं तथा कार्बन-द्विओषिद छोड़ते हैं, किन्तु वनस्पतियां कार्बन-द्विओषिद ग्रहण करती हैं तथा ओषजन छोड़ती हैं। वनस्पतियों द्वारा ओषजन छोड़ने की यह प्रक्रिया प्रायः दिन में ही होती है, रात्रि में वे भी ओषजन ग्रहण करती तथा कार्बन-द्विओषिद छोड़ती हैं। पर कुछ वनस्पतियां ऐसी भी हैं जो रात्रि में भी ओषजन ही छोड़ती हैं। कार्बन-द्विओषिद को चूसने के कारण वनस्पतियां वायु-शोधन का कार्य करती हैं। वायु-प्रदूषण से बचाव के लिए सबसे कारगर उपाय वनस्पति-आरोपण है। वेद भगवन् का सन्देश है “वनस्पति वन आस्थापयध्वम् अर्थात् वन में वनस्पतियाँ उगाओ -ऋ० १०/१०१/११”। यदि वनस्पति को काटना भी पड़े तो ऐसे काटें कि उसमें सैकड़ों स्थानों पर फिर अंकुर फूट आएं। वेद का कथन है-

अयं हि त्वा स्वधितिस्तेतिजान: प्रणिनाय महते सौभगाय।
अतस्त्वं देव वनस्पते शतवल्शो विरोह, सहस्रवल्शा वि वयं रुहेम।। -यजु० ५/४३

हे वनस्पति, इस तेज कुल्हाड़े ने महान सौभाग्य के लिए तुझे काटा है, तू शतांकुर होती हुई बढ़, तेरा उपयोग करके हम सहस्रांकुर होते हुए वृद्धि को प्राप्त करें।

अथो त्वं दीर्घायुर्भूत्वा शतवल्शा विरोहतात्। -यजु० १२/१००

हे ओषधि, तू दीर्घायु होती हुई शत अंकुरों से बढ़।

वेद सूचित करता है कि सूर्य और भूमि से वनस्पतियां में मधु उत्पन्न होता है, जिससे वे हमारे लिए लाभदायक होती हैं-

मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ अस्तु सूर्य्य:।
माध्वीर्गावो भवन्तु न:।। -यजु० १३/२९

वनस्पति हमारे लिए मधुमान हो, सूर्य हमारे लिए मधुमान् हो, भूमियाँ हमारे लिए मधुमती हों।

फूलों-फलों से लदी हुई ओषधियां नित्य भूमि पर लहलहाती रहें, ऐसा वर्णन भी वेद में मिलता है- “ओषधी: प्रतिमोदध्वं पुष्पवती: प्रसूवरी: -ऋ० १०/९७/३”। वेद यह भी कहता है “मधुमन्मूलं मधुमदग्रमासां मधुमन्मध्यं वीरुधां बभूव। मधुमत्पर्णं मधुमत्पुष्पमासां अर्थात् ओषधियों का मूल, मध्य, अग्र, पत्ते, फूल सभी कुछ मधुमय हों -अथर्व० ८/७/१२”।

वेद मनुष्य को प्रेरित करता है “मापो मौषधीहिंसी: अर्थात् तू जलों की हिंसा मत कर, ओषधियों की हिंसा मत कर -यजु० ६/२२”। जलों की हिंसा से अभिप्राय है उन्हें प्रदूषित करना तथा ओषधियों की हिंसा का तात्पर्य है उन्हें विनष्ट करना।

अथर्ववेद के एक मन्त्र में ओषधियों के पांच वर्ग बताए गए हैं तथा यह भी कहा गया है कि ये हमें प्रदूषण (अहंस्) से छुड़ाए-

पञ्च राज्यानि वीरूधां सोमश्रेष्ठानि ब्रूम:।
दर्भो भङ्गो यव: सहस्ते नो मुञ्चन्त्वंहस:।। -अथर्व० ११/६/१५

‘सोम, दर्भ, भंग, यव, सहस्’ आदि ओषधियों का ज्ञानपूर्वक प्रयोग करते हुए हम रोगों का समूल विनाश करते हैं।

वेद में घरों के समीप कमल-पुष्पों से अलंकृत छोटे-छोटे सरोवर बनाने का विधान मिलता है- उप त्वा तिष्ठन्तु पुष्करिणी: समन्ता: -अथर्व ४/३४/५,-७। फव्वारों का विधान इस हेतु किया गया प्रतीत होता है कि ऊपर उठती तथा चतुर्दिक् फैलती जल-धाराओं पर जब सूर्य-किरणें पड़ती हैं, तब उनमें प्रदूषण को हरने की विशेष शक्ति आ जाती है।

अथर्ववेद के भूमिसूक्त में भूमि को कहा गया है, “अरण्यं ते पृथिवी स्योनमस्तु अर्थात् तेरे जंगल हमारे लिए सुखदाई हों। -अथर्व० १२/१/११,१७”।

  1. शुद्ध जलों का महत्त्व

वेद का कथन है “अप्स्वन्तरमृतम् अप्सु भेषजम् अर्थात् शुद्ध जलों के अन्दर अमृत होता है, ओषध का निवास रहता है -ऋ० १/२३/१९”। “आपो अद्यान्वचारिषं रसेन समगस्महि अर्थात् शुद्ध जल के सेवन से मनुष्य रसवान् हो जाता है -ऋ० १/२३/२३”। “उर्जं वहन्तीरमृतं घृतं पय: कीलालं परिस्त्रुतम् अर्थात् शुद्ध जलों में ऊर्जा, अमृत, तेज एवं पोषक रस का निवास होता है -यजु० २/३४”। “शुद्ध जल पान किये जाने पर पेट के अंदर पहुंचकर पाचन-क्रिया को तीव्र करते हैं। वे दिव्यगुणयुक्त, अमृतमय, स्वादिष्ट जल रोग न लानेवाले, रोगों को दूर करनेवाले, शरीर के प्रदूषण को दूर करनेवाले तथा जीवन-यज्ञ को बढ़ानेवाले होते हैं -यजु० ४/१२”।

आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन।
महे रणाय चक्षसे।। -ऋ० १०/९/१

शुद्ध जल आरोग्यदायक होते हैं, शरीर में ऊर्जा उत्पन्न करते हैं, वृद्धि प्रदान करते हैं, कण्ठस्वर को ठीक करते हैं तथा दृष्टि-शक्ति बढ़ाते हैं।

शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।
शं योरभि स्त्रवन्तु न:।। -ऋ० १०/९/४

शुद्ध जलों का पान करके एवं उन्हें अपने चारों ओर बहाकर अर्थात् उनमें डुबकी लगाकर या कटि-स्नान करके हम अपना स्वास्थ्यरूप अभीष्ट प्राप्त कर सकते हैं।

जलों के प्रकार-

वेदों में जल कई प्रकार के वर्णित किये गए हैं और उनके सम्बन्ध में यह कहा गया है कि वे सबके लिए प्रदूषणशामक एवं रोगशामक हों:

शं त आपो हैमवती: शमु ते सन्तूत्स्या:।
शं ते सनिष्यदा आप: शमु ते सन्तु वर्ष्या:।।
शं त आपो धन्वन्या: शं ते सन्त्वनूष्या:।
शं ते खनित्रिमा आप: शं या: कुम्भेभिराभृता:।। -अथर्व० १९/२/१-२

इन मन्त्रों में जलों के निम्नलिखित प्रकारों का उल्लेख हुआ है:

१. हिमालय के जल (हेमवती: आप:)- ये हिमालय पर बर्फ-रूप में रहते हैं अथवा चट्टानों के बीच में बने कुंडों में भरे रहते हैं, अथवा पहाड़ी झरनों के रूप में झरते रहते हैं।

२. स्त्रोतों के जल (उत्स्या: आप:)- ये पहाड़ी या मैदानी भूमि को फोड़कर चश्मों के रूप में निकलते हैं। कई चश्मों में गन्धक होता है, गन्धक का एक चश्म देहरादून के समीप सहस्रधारा में है।

३. सदा बहते रहनेवाले जल (सनिष्यदा: आप:)- ये सदा बहते रहने के कारण अधिक प्रदूषित नहीं हो पाते हैं।

४. वर्षाजल (वर्ष्या: आप:)- वर्षा से मिलनेवाले जल शुद्धि तथा ओषधि-वनस्पतियों एवं प्राणियों को जीवन देनेवाले होते हैं। अथर्ववेद के प्राण-सूक्त (११/४/५) में कहा है कि जब वर्षा के द्वारा प्राण पृथिवी पर बरसता है तब सब प्राणी प्रमुदित होने लगते हैं।

५. मरुस्थलों के जल (धन्वन्या: आप:)- मरुस्थलों की रेती में अभ्रक, लोहा आदि पाए जाते हैं, उनके सम्पर्क से वहां के जलों में भी ये पदार्थ विद्यमान होते हैं।

६. आर्द्र प्रदेशों के जल (अनूप्या: आप:)- जहां जल की बहुतायत होती है वे प्रदेश अनूप कहलाते हैं, तथा उन प्रदेशों में होनेवाले जल अनूप्य। यहां के जल कृमि-दूषित भी हो सकते हैं।

७. भूमि खोदकर प्राप्त किये जल (खनित्रिमा: आप:)- कुएं, हाथ के नलों आदि के जल इस कोटि में आते हैं।

८. घड़ों में रखे जल (कुम्भेभि: आभृता: आप:)- घड़े विभिन्न प्रकार की मिट्टी के तथा सोना, चांदी, तांबा आदि धातुओं के भी हो सकते हैं।

जल-शोधन-

जलों को प्रदूषित न होने देने तथा प्रदूषित जलों को शुद्ध करने के कुछ उपायों का संकेत भी वेदों में मिलता है।

यासु राजा वरुणो यासु सोमो विश्वेदेवा यासूर्जं मदन्ति।
वैश्वानरो यास्वग्नि: प्रविष्टस्ता आपो देवीरिह मामवन्तु।। -ऋ० ७/४९/४

वे दिव्य जल हमारे लिए सुखदायक हों, जिनमें वरुण, सोम, विश्वेदेवा: तथा वैश्वानर अग्नि प्रविष्ट हैं।

यहां वरुण शुद्ध वायु या कोई जलशोधक गैस है, सोम चन्द्रमा या सोमलता है, विश्वेदेवा: सूर्यकिरणें हैं तथा वैश्वानर अग्नि सामान्य आग या विद्युत् है।

ऋग्वेद में लिखा है “यन्नदीषु यदोषधीभ्य: परि जायते विषम्। विश्वेदेवा निरितस्तत्सुवन्तु अर्थात् यदि नदियों में विष उत्पन्न हो गया है तो सब विद्वान् जन मिलकर उसे दूर कर लें -ऋ० ७/५०/३”।

  1. भूमि

भूमि को वेद में माता कहा गया है “माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या: -अथर्व० १२/१/१२”, “उपहूता पृथिवी माता -यजु० २/१०”। वेद कहता है-
यस्यामाप: परिचरा: समानीरहोरात्रे अप्रमादं क्षरन्ति।
सा नो भूमिर्भूरिधारा पयो दुहामथो उक्षतु वर्चसा।। -अथर्व० १२/१/९

जिस भूमि की सेवा करनेवाली नदियां दिन-रात समान रूप से बिना प्रमाद के बहती रहती हैं वह भूरिधारा भूमिरुप गौ माता हमें अपना जलधार-रूप दूध सदा देती रहें।

भूमि की हिंसा न करें

वेद मनुष्य को प्रेरित करते हुए कहता है “पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृंह, पृथिवीं मा हिंसी: अर्थात् तू उत्कृष्ट खाद आदि के द्वारा भूमि को पोषक तत्त्व प्रदान कर, भूमि को दृढ़ कर, भूमि की हिंसा मत कर”। भूमि की हिंसा करने का अभिप्राय है उसके पोषक तत्वों को लगातार फसलों द्वारा इतना अधिक खींच लेना कि फिर वह उपजाऊ न रहे। भूमि पोषकतत्त्वविहीन न हो जाये एतदर्थ एक ही भूमि में बार-बार एक ही फसल को न लगाकर विभिन्न फसलों को अदल-बदलकर लगाना, उचित विधि से पुष्टिकर खाद देना आदि उपाय हैं। आजकल कई रासायनिक खाद ऐसे चल पड़े हैं, जो भूमि की उपजाऊ-शक्ति को चूस लेते हैं या भूमि की मिट्टी को दूषित कर देते हैं।

भूमि में या भूतल की मिट्टी में यदि कोई कमी आ जाये तो उस कमी को पूर्ण किये जाने की ओर भी वेद ने ध्यान दिलाया है “यत्त ऊनं तत्त आ पूरयाति प्रजापति: प्रथमजा ऋतस्य अर्थात् प्रजापति राजा विभिन्न उपायों द्वारा उस कमी को पूरा करे -अथर्व० १२/१/६१”। यजुर्वेद के एक मन्त्र में कहा गया है “सं ते वायुर्मातरिश्वा दधातु उत्तानाया हृदयं यद् विकस्तम् अर्थात् उत्तान लेटी हुई भूमि का हृदय यदि क्षतिग्रस्त हो गया है तो मातरिश्वा वायु उसमें पुनः शक्ति-संधान कर दे -यजु० ११/३९”। मातरिश्वा वायु का अर्थ है अंतरिक्षसंचारी पवन, जो जल, तेज आदि अन्य प्राकृतिक तत्त्वों का भी उपलक्षक है। परन्तु यदि जल, वायु आदि ही प्रदूषित हो गए हों तो उनसे भूमि की क्षति-पूर्ति कैसे हो सकेगी?

  1. अग्निहोत्र द्वारा पर्यावरण-शोधन

वैदिक संस्कृति में अग्निहोत्र या यज्ञ का बहुत महत्त्व है। प्रत्येक गृहस्थ एवं वानप्रस्थ के करने योग्य पंच यज्ञों में अग्निहोत्र का भी स्थान है, जिसे देवयज्ञ कहा जाता है। अग्निहोत्र यज्ञाग्नि में शुद्ध घृत एवं सुगन्धित, वायुशोधक, रोगनिवारक पदार्थों की आहुति द्वारा सम्पन्न किया जाता है। एक अग्निहोत्र वह है जो धार्मिक विधि-विधानों के साथ मन्त्रपाठपूर्वक होता है, दूसरे उसे भी अग्निहोत्र कह सकते हैं जिसमें मन्त्रपाठ आदि न करके विशुद्ध वैज्ञानिक या चिकित्साशास्त्रीय दृष्टि से अग्नि में वायुशोधक या रोगकृमिनाशक पदार्थों का होम किया जाता है। आयुर्वेद के चरक, बृहन्निघन्टुरत्नाकर, योगरत्नाकर, गदनिग्रह आदि ग्रन्थों में ऐसे कई योग वर्णित हैं, जिनकी आहुति अग्नि में देने से वायुमण्डल शुद्ध होता है तथा श्वास द्वारा धूनी अन्दर लेने से रोग दूर होते हैं। वेद में अनेक स्थानों पर अग्नि को पावक, अमीवचातन, पावकशोचिष्, सपत्नदंभन आदि विशेषणों से विशेषित करके उसकी शोधकता प्रदर्शित की गई है। यज्ञ का फल चतुर्दिक् फैलता है (यज्ञस्य दोहो वितत: पुरुत्रा) -यजु० ८/६२। अग्निहोत्र ओषध का काम करता है (अग्निष्कृणोतु भेषजम्) -अथर्व० ६/१०६/३। अग्निहोत्र से शरीर की न्यूनता पूर्ण होती है (अग्ने यन्मे तत्त्वा ऊनं तन्म आपृण) -यजु० ३/१७। अग्नि वायुमण्डल से समस्त दूषक तत्त्वों का उन्मूलन करता है (अग्निर्वृत्राणि दयते पुरुणि) -ऋ० १०/८०/२। वेद मनुष्यों को आदेश देता है “आ जुहोता हविषा मर्जयध्वम् अर्थात् तुम अग्नि में शोधक द्रव्यों की आहुति देकर वायुमण्डल को शुद्ध करो -साम० ६३”।

अग्निहोत्र की अवश्यकर्तव्यता की ओर संकेत करते हुए वेद कहते हैं-

स्वाहा यज्ञं कृणोतन अर्थात् स्वाहापूर्वक यज्ञ करो -ऋ० १/१३/१२, सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन अर्थात् सुसमिद्ध अग्निज्वाला पर पिघले घी की आहुति दो -यजु० ३/२, अग्निमिन्धीत मर्त्य: अर्थात् मनुष्य को चाहिए कि वह अग्नि प्रज्वलित करे -साम० ८२, सम्यञ्चोऽग्निं सपर्यत अर्थात् सब मिलकर अग्निहोत्र किया करो -अथर्व० ३/३०/६।

सायं सायं गृहपतिर्नो अग्नि: प्रातः प्रातः सौमनसस्य दाता।
प्रातः प्रातः गृहपतिर्नो अग्नि: सायं सायं सौमनसस्य दाता।। -अथर्व० १९/५५/३-४

अग्निहोत्र का समय सायं और प्रातः है। सायं किया हुआ अग्निहोत्र प्रातःकाल तक वायुमण्डल को प्रभावित करता रहता है और प्रातः किये गए अग्निहोत्र का प्रभाव सायंकाल तक वायुमण्डल पर पड़ता है।

सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम्।
दैवीं नावं स्वरित्रामनागसमस्त्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये।। -यजु० २१/६

अग्निहोत्र ऐसी विशाल, दिव्य, दीप्तिमयी, निश्छिद्र, कल्याणदायिनी, अखण्डित, निश्चित रूप से आगे ले जानेवाली, विधिविधानरूप सुन्दर चप्पुओं वाली, निर्दोष, न चूनेवाली नौका है जो सदा यजमान की रक्षा ही करती है।

आयुर्यज्ञेन कल्पतां, प्राणो यज्ञेन कल्पतां, चक्षुर्यज्ञेन कल्पतां,
श्रोत्रंयज्ञेन कल्पतां, वाग् यज्ञेन कल्पतां, मनो यज्ञेन कल्पतामात्मा यज्ञेन कल्पताम्।। -यजु० १८/२९

अग्निहोत्र-रूप यज्ञ से आयु बढ़ती है, प्राण सबल होता है, चक्षु सशक्त होती है, श्रोत्र और वाणी सामर्थ्ययुक्त होते हैं, मन और आत्मा बलवान् बनते हैं।

ऋग्वेद में कहा है- सो अग्ने धत्ते सुवीर्यं स पुष्यति अर्थात् जो अग्निहोत्र करता है उसे सुवीर्य प्राप्त होता है, वह पुष्ट होता है -ऋ० ३/१०/३।

  1. आंधी, वर्षा और सूर्य द्वारा पर्यावरण-शोधन

प्राकृतिक रूप से आंधी, वर्षा और सूर्य द्वारा कुछ अंशों में स्वतः प्रदूषण-निवारण होता रहता है।

वातस्य नु महिमानं रथस्य रुजन्नेति स्तनयन्नस्य घोष:।
दिविस्पृग् यात्यरुणानि कृण्वन्नुतो एति पृथिव्या रेणुमस्यन्।। -ऋ० १०/१६८/१

वायु-रथ की महिमा को देखो। यह बाधाओं को तोड़ता-फोड़ता हुआ चला आ रहा है। कैसा गरजता हुआ इसका घोष है! आकाश को छूता हुआ, दिक्प्रांतों को लाल करता हुआ, भूमि की धूल को उड़ाता हुआ वेग से जा रहा है।

मानसून पवन रूप मरुत् मेह बरसाते हैं – वपन्ति मरुतो मिहम् -ऋ० ८/७/४। ये वर्षा द्वारा प्रदूषण को दूर करते हैं।

आ पर्जन्यस्य वृष्ट्योदस्थामामृता वयम्।
व्यहं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा।। -अथर्व० ३/३१/१

बदल की वृष्टि से हम उत्कृष्ट स्थिति को पा लेते हैं, सब पेड़-पौधे, पर्वत, भूप्रदेश धुलकर स्वच्छ हो जाते हैं, रोग दूर हो जाते हैं, प्राणियों की आयु लम्बी हो जाती है।

उभाम्यां देव सवित: पवित्रेण सवेन च।
मां पुनीहि विश्वत:।। -यजु० १९/४३

प्रकृति में सूर्य भी प्रदूषण का निवारक है। वह अपने रश्मिजाल से तथा अपने द्वारा की जानेवाली वर्षा से पवित्रता प्रदान करता है।

येन सूर्य ज्योतिषा बाधसे तमो जगच्च विश्वमुदियर्षि भानुना।
तेनास्मद् विश्वामनिरामनाहुतिमपामीवामप दुष्वप्न्यं सुव।। -ऋ० १०/३७/४

सूर्य अपनी ज्योति से अन्धकार को बांधता है, समस्त अन्नाभाव को, अन्नाहुति को, रोग को और दुःस्वप्न को दूर करता है।

वेद में कहा है “सा घा नो देवः सविता साविषदमृतानि भूरि अर्थात् सूर्य अमृत बरसाता है -अथर्व० ६/१/३”, “सूर्य यत् ते तपस्तेन तं प्रति तप। योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्म: अर्थात् हे सूर्य, जो तेरा ताप है उससे तू उसे तपा डाल जो हमसे द्वेष करता है और जिससे हम द्वेष करते हैं -अथर्व० २/२१/१”।

अंत में उपसंहार-रूप में हम कह सकते हैं कि वायु, जल, भूमि, आकाश, अन्न आदि पर्यावरण के सभी पदार्थों की शुद्धि के लिए वेद भगवन् हमें जागरूक करते हैं तथा आई हुई अस्वच्छता को दूर करने का आदेश देते हैं। पर्यावरण की शुद्धि के लिए वेद भगवन् वनस्पति उगाना, अग्निहोत्र करना, विद्युत, अग्नि, सूर्य एवं ओषधियों का उपयोग करना आदि उपायों को सुझाते हैं।

।।आओ लौटें वेदों की ओर।।


 

Vedic Dharma From God To Mankind

From: Prem Sabhlok < >
God has only ordained Vedic Dharma for the mankind through Thy Divine Guidance. All other religions are man-made and cause of social disorder in the world.
Four Divine Varna (Chatvar Varnasharm) and Role of Women as described in Vedas.
 
 Rig Veda mentions that the greatest service to God is to spread the spirit of Vedas with honesty, straight-forwardness, without deceit of any kind, for all to enjoy true and spiritual happiness.  
 
Dear Seekers of Vedic knowledge,
Subject: The origin of divine four varnas- not based on Birth
Rig Veda 1-113-6, X-90-11 and 12, Y.V. 31-11 and A.V. 19-6-6 explain the origin of four Varna to formless and ineffable Brahman. HE is described as the entire universe visible to the eyes and all other subtle worlds invisible to the eyes, where six communities of divine people, like angels, pitries, gandharvas, karma devas etc., live. Heaven is His head, Sun and Moon are His eyes, the entire universe is His body and the earth is His feet. Brahmin varna is born from His mouth which symbolically represents the heaven. This divine varna was created to spread Brahmajnan– Vedic metaphysics amongst all members of society. Bhagavad-Gita in verse X-32 says, the science of soul or metaphysics is the supreme science. Rig-Veda 6-75-10 mentions that a Brahmin is the knower of God and Vedas. Since the origin of this varna is from heaven- the kingdom of God, which is the place of bliss and supreme knowledge, the followers of this divine profession are to spread Brahma’s knowledge amongst others and bring heavenly conditions i.e. the City of God on this earth.
            The human senses and sense organs like eyes, etc. can visualize and even see with the help of scientific instruments the entire gross universe which is the manifestation of the subtle divine Nature and is extremely powerful, disciplined and benevolent. Nature and the ever-expanding universe and cosmos are mentioned in the Vedas as part of His formless body. Symbolism to the various parts of His Body continues in the Vedic hymns. Kshatriya varna is born from the most powerful shoulders of God. This varna has men and women of great strength who are extremely powerful and benevolent. Their divine duty is to destroy all evil and corruption in society. The individuals belonging to this divine profession are rulers, defence services officers, commander-in-chief, bureaucrats, scientists, technicians etc. (Rig Veda.5-69-2). Their main duty is to protect the people belonging to other three varna and ensure a corruption free society. All monarchs, kings, queens and elected Presidents are Kshatriyas. However, if a ruler’s son is not virtuous or incompetent he is not entitled to rule the state or country (R.V. 4-19-9). The ashvinaus             (scientists) can be both men and women of absolute self-control with scientific outlook (R.V.1-3-4). Kshatriyas are advised to take Soma drink for vigour and energy (R.V 4-45-3). Soma drink is some kind of red coloured herbal drink, which is slightly intoxicant and should be taken with milk or curd.
It is the mother earth, which renders selfless service to all animate and inanimate life. Vedic hymns describe the earth as the feet of the God. Shudravarna is born from the earth and the members of this varna based on ability, merit and aptitude render selfless service to other three divine professions. Since all parts of the body are equally important and they help each other for a healthy body, so all these divine varna should assist, cooperate and sustain each other for achieving an ideal society. Mandla 10, suktam 90 of Rig-Veda describes the followers of Shudra varna as good at unskilled work, of good physique, handsome and of high character. In the universe, all planets, stars and others perform their allotted task silently and gracefully and it is difficult to say which parts of the gross universe and subtle Prakrti are more important. 
The above social scheme of Chatvar Varna Ashram is of divine origin being born of the Body of God. Rig-Veda 10-90-12 has a prayer “O, God give luster to BrahminKshatriyaVaish and Shudra and to me.” The basis of Vedic social grouping or Varna is pursuit of divine professions with Dharma and Rta (R.V 10-90-12, AV. 19-6-6, Y.V 31-13 and 17 and Br. Up 1-4-11 to 14) The individuals pursuing these four divine professions while following Rta and Dharma can eat and drink together. They can marry amongst themselves. In the society they are co-workers for prosperityand should make riches flow (AV 1-15-2, 4).
           
Thus individuals belonging to chatvar varna ashram form an egalitarian society and serve each other. All these four varnas (divine professions) are ordained by God. The fifth non divine Avarnas , Vritras Kimidin are not ordained by God. Thus there are five classes dealing with different professions –four divine and fifth non- divine. Marplots, sorcerers, bribe takers and givers, exploiters, evil minded people form Avarnas. (R.V 1-76-3, 1-191-8, 2-14-3). They are not ordained by God. Being dambhi purush (sycophants and hypocrites) they aim at honour, power and wealth and pretend as servants of the people. The terms used in Vedas for five classes is panch kshatinam, panch manavis etc.    
Vedas had also visualized that material prosperity alone may turn a number of individuals into avarnas, vritras and other evil minded people, resulting in lack of transparency, corrupt practices and make an ideal state and open society into a perverted state and closed society (R.V.1-191-8, 1-28-4 and 24, 1-76-3, 2-14-3, 4-9-9).
A few other relevant references are given below:
Female Gurus (preceptors) are mentioned in R.V 3-33-1 to 3 and can teach Vedic metaphysics to students.
Kashtriya Queens who have studied under the Vedic Education system up to the age of 24 years should take the role of protecting the subjects/citizens during the war if the king dies or injured. She can take the help of the Commander-in-Chief. (R.V 6-75-3 to 15)
Women can attend Vidhta and Sabha (religious and political assemblies (R.V 10-85-26, 42 to 47) 
There are many other mantras/riks about women studying Vedas. Gargi, Godhra, Lopmudra and many others were the renowned Vedic Rsikas of yore.
Kvaish Aylush, maharsi Valmiki, Vyas became Brahmins though born in other Varnas. 
From the above it is apparent from Vedas that four divine Varnas are not by Birth and women and all Varnas can study Vedas. Even non divine Avarnas can move towards Varna by studying Vedas and following their teachings/guidelines.
With regards,
Prem Sabhlok 
 
 2nd Vedic Message
 
Vedas Briefly Described
Vedas are derived from the root Vid- i.e. knowledge. Vedas thus means, “Store house of knowledge” and Vedic dharma is the spiritual science based on knowledge described in a large number of hymns/riks (about 18,000) in four Vedas. In book X1X section 22 and 23 of Atharva Veda, Jnan (knowledge) is described as study and complete understanding of bhutas (elements), matter, society and social organizations physical and social sciences, primordial subtle matter (three gunas), divine Nature “Prakrti”, Soul, Spirit, Time, Space and the formless and ineffable Supreme Reality (nirguna Brahma). 
The study of Vedas would reveal that the Vedic Dharma is a spiritual science and it contains all the major material, spiritual and divine thoughts/guidelines conveyed in all the other scriptures of major religions of the world. However, Vedas contain some additional knowledge not available in other scriptures like, certain permanent truths/findings about physical sciences, mathematics, state and society, medicine, role of a ruler, bureaucrats, scientists, industrialists, economics, science of good governance and many others. Being scriptures for the welfare of mankind, no specific religion is mentioned in Vedas. At best Vedic religion can be mentioned as Vedic Sanatan Dharma (eternal religion). Following the teachings and guidelines contained in Vedas the mankind can expedite the journey towards universal love and peace.  
Ishta theory of Vedas describes paths could be different so long as these paths aim at the welfare of mankind and other animate and inanimate life. Vedas do not consider matter as inert and explain in a large number of hymns that matter has unsuspected vitality. All religions should aim at unity in diversity i.e. (should lead to universal brotherhood-viswa bandhutva), global family of the same One God (vasudhaivan kutumbkam), global trade and global market for the material and spiritual welfare of mankind. God being formless, ineffable and self-created, avoid explaining God through categories, substance, activity, quality and relationship. He is beyond cognition, perception of human senses, logic of mind and intellect. Words recoil to explain the Supreme Reality. Only true and harmonised material, spiritual and divine knowledge (para jnan) can unite all religions to compete with each other for the welfare of mankind. 
Vedas as a whole are Karma Marga i.e. path of selfless action – nothing for self all for   society. The Vedic metaphysics is Jana marga i.e. the path of knowledge. This knowledge brings out clearly the ultimate significance of all material and spiritual things. The Vedic Rsis and Munnies (metaphysicists and wandering sages) had found the substantial essence of all these things in the scheme of Reality, thereby unifying the absolute Truth. Vedas have a concept of absolute and perfect truth based on a-priori knowledge against material and imperfect truth influenced by our outward looking mind and physical senses/sense organs. Material truths being imperfect are never permanent and vary considerably amongst individuals.
The Vedic science of Axiology (trivarga) covering idealistic, ideational and sensate values is entirely based on permanent truths in the form of Rta, which are the cosmic laws of social and moral order. Yajur-Veda 7-14 clearly brings out that the noble thoughts made the culture of the Vedas the first and foremost foundations of the edifice of universal values. Through the Vedic mantras (poetical hymns which liberate the mind) homage is paid to the Rsis of the yore, path makers and pioneers (R.V 10-14-15 and A.V 18-2-2). Mantra is man (mind) and tra (freedom, liberation). Mundaka Upanishads 1-1-3 mentions that having known Vedanta, all other knowledge will stand revealed to us. Vedas are thus the acme of human thought and the metaphysics reaches its summit in the Vedantic philosophy contained in the fourth and last part of the Vedas in the form of pure idealism and absolute monism. Vedas are also known as Shruti – the heard. Most of the modern Hindus believe that the Vedas were directly revealed by God and were not fabricated as later the ancient dreaded materialists Charvakas found and criticized these divine revelations. Adi Grantha says, “Omkar Ved nirmaye.” It literally means Omkar (God) revealed the Vedas.
            Vedic wisdom covers the cosmic working at all levels, from microcosm to macrocosm. It covers material, temporal, secular, spiritual, and divine knowledge by blending both the inner and outer worlds. In the concept of Brahman as the “only Reality”, the highest metaphysical ethics is reached, as all else is Maya (appearance or phenomenon but not exactly mirage). Maya is His Creative Art (R.V 6-45-16 and 6-47-18) Isvaraya Upanishad explains this as the illusory but dazzlingly brilliant golden disc, which appears real to human senses. 
For more details kindly see “Glimpses of Vedic Metaphysics” for on line reading and even taking print at no cost on Website http://www.sabhlokcity.com/metaphysics  OR access the book through google.comyahoo.comlulu.com. Kindly render divine social service and forward this e-mail to other seekers of Vedic knowledge known to you
 
P.S
 
3rd Vedic Message 
Subject: Vedic Religion Sanatan Dharma (Eternal Religion) is a Spiritual Science
Swami Viveknanda had said that religion is a spiritual science. The concept of spiritual science many existing Gurus, Swamis, pujaris/priests are not able to explain. But most of them agree that Vedas are the supreme scriptures of Hindus. Bhagavad-Gita mentions that study of Vedas is the highest virtue. Adi Granth sahib says “asankh grantha mukhi Vedpatha”. There are innumerable scriptures but Vedic study is the supreme. 
 
Sad- Darshana (six schools of Indian philosophy) based on Vedic metaphysics and Vedic Ishta theory– paths can be many but aim should be welfare of mankind, made it ample clear that to know the concept of religion as spiritual science, study of Vedas is essential. To avoid spread of pious forgeries in the society Swami Dayananda had suggested study and propagation of Vedic knowledge for the Aryans (noble people).
After study of Vedas through English translation of mantras/riks/hymns and even some verses, it was apparent the religion as spiritual science is “dharma” and it is an institution of social, moral, ethical and spiritual uplift of mankind. It is based on certain principles of spiritual science relating to Rta (cosmic laws of Nature), ideal mosaic society where people follow four divine professions (chatvar varnasallotted through Vedic education system based on merit, ability and aptitude and certainly not by birth. 
The concept of Guru– Gu– darkness, Ru– to dispel i.e. dispeller of inner and outer darkness as a preceptor, the cosmic delusion (Maya), the difference between soul, manifested soul, spirit and their respective roles, Prakrti (divine Nature), the ineffable and formless Supreme Reality Brahman, the Cosmic Word “OM” (Shabd Brahma) cause of origin of the universe, physical sciences and scientific temper and many other subjects/concepts have been explained in the context of dharma as spiritual science. 
In the SOCIAL aspect of Dharma, Vedas refer to healthy community life through Sabha and Vidhta, local self governance, iddm nan mmam– enlightened liberalism (nothing for self all for society) etc. 
In regard to the Moral aspect hydra headed corruption with nine heads and ninety nine sources of entry in the human body is mentioned and solution thereof to eliminate corruption. 
On the Ethical aspect of dharma, trivarga (three kinds of value systems are explained) and as regard Spiritual side of dharma harmonised divine, spiritual and material knowledge (para jnan) is explained in great details.
After study of Vedas I wrote Glimpses of Vedic Metaphysics as a part of Vedic spiritual science. Hence this book is by a commoner for the common human beings and seekers of Vedic knowledge who may not have time to study over 17000 mantras/riks in all the four Vedas but are keen to know what these shrutis contain. Atharva Veda clearly mentions when soul was provided to the human beings Vedas were revealed (hence shrutis).
 Thus Vedas became omniform for all periods of time. The study of Vedas can save simple, honest and God loving people from the pious forgeries of “leaders of hope” like miracles, breaking unity into diversity of cults/sects or even declaring Veda mantras have secret divine power.    
Instead of publishing the book with proper editing and commercially pricing it, I opted for putting this book on the Internet for on line reading and even taking print at no cost. It is available on Website http://www.sabhlokcity.com/metaphysics. The book can be accessed through google.comyahoo.comlulu.com search for the book or just Vedic Metaphysics. 
 
If you find useful to know the concept of dharma as spiritual science, kindly render divine social service and forward to seekers of Vedic knowledge known to you. Please also visit my Blog http://prem.sabhlokcity.com for open discussion on Vedic metaphysics and many other subjects like Freedom,  Swaraj etc.
With kind regards,
Prem Sabhlok

वेदों में नारी

From: Vivek Arya < >
 वेदों में नारी

(विश्व महिला दिवस 8 मार्च के अवसर पर प्रकाशित)
डॉ विवेक आर्य

नारी जाति के विषय में वेदों को लेकर अनेक भ्रांतियां हैं। भारतीय समाज में वेदों पर यह दोषारोपण किया जाता हैं की वेदों के कारण नारी जाति को सती प्रथा, बाल विवाह, देवदासी प्रथा, अशिक्षा, समाज में नीचा स्थान, विधवा का अभिशाप, नवजात कन्या की हत्या आदि अत्याचार हुए हैं। किसी ने यह प्रचलित कर दिया गया था की जो नारी वेद मंत्र को सुन ले तो उसके कानों में गर्म सीसा डाल देना चाहिए और जो वेदमंत्र को बोल दे तो उसकी जिव्हा को अलग कर देना चाहिए। कोई नारी को पैर की जूती कहने में अपना बड़प्पन समझता था तो कोई उसे ताड़न की अधिकारी बताने में समझता था[i]। इतिहास इस बात का साक्षी हैं की नारी की अपमानजनक स्थिति पश्चिम से लेकर पूर्व तक के सभी देशों के इतिहास में देखने को मिलती हैं। इस विषय में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह हैं की वेद इन अत्याचारों में से एक का भी समर्थन नहीं करते अपितु वेदों में नारी को इतना उच्च स्थान प्राप्त हैं की विश्व की किसी भी धर्म पुस्तक में उसका अंश भर भी देखने को नहीं मिलता । कुछ लेखकों द्वारा वेदों में भी नारी की स्थिति को निकृष्ट रूप में दर्शाया गया है[ii]।

1. वेदों में नारी के कर्तव्यों एवं अधिकारों के विषय में क्या कहा गया हैं?
समाधान- वेदों में नारी की स्थिति अत्यंत गौरवास्पद वर्णित हुई हैं। वेद की नारी देवी हैं, विदुषी हैं, प्रकाश से परिपूर्ण हैं, वीरांगना हैं, वीरों की जननी हैं, आदर्श माता हैं, कर्तव्यनिष्ट धर्मपत्नी हैं, सद्गृहणी हैं, सम्राज्ञी हैं, संतान की प्रथम शिक्षिका हैं, अध्यापिका बनकर कन्याओं को सदाचार और ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देनेवाली हैं, उपदेशिका बनकर सबको सन्मार्ग बतानेवाली हैं ,मर्यादाओं का पालन करनेवाली हैं, जग में सत्य और प्रेम का प्रकाश फैलानेवाली हैं। यदि गुण-कर्मानुसार क्षत्रिया हैं,तो धनुर्विद्या में निष्णात होकर राष्ट्र रक्षा में भाग लेती हैं। यदि वैश्य के गुण कर्म हैं उच्चकोटि कृषि, पशुपालन, व्यापार आदि में योगदान देती हैं और शिल्पविद्या की भी उन्नति करती हैं। वेदों की नारी पूज्य हैं, स्तुति योग्य हैं, रमणीय हैं, आह्वान-योग्य हैं, सुशील हैं, बहुश्रुत हैं, यशोमयी हैं।

पुरुष और नारी के संबंधों के विषय में वेदों में आलंकारिक वर्णन हैं। पुरुष धुलोक हैं तो नारी पृथ्वी हैं दोनों के सामंजस्य से हो सौर जगत बना हैं ,पुरुष साम हैं तो नारी ऋक हैं दोनों के सामंजस्य से ही सृष्टि का सामगान होता हैं,पुरुष वीणा-दंड हैं तो नारी वीणा तन्त्री हैं, दोनों के सामंजस्य से ही जीवन के संगीत की नि:सृत झंकार होती हैं, पुरुष नदी का एक तट हैं, तो नारी दूसरा तट हैं, दोनों के बीच में ही वैयविक्त और सामाजिक विकास की धारा बहती हैं। पुरुष दिन हैं, तो नारी रजनी हैं। पुरुष प्रभात हैं तो नारी उषा हैं। पुरुष मेघ हैं तो नारी विद्युत हैं। पुरुष अग्नि हैं, तो नारी ज्वाला हैं। पुरुष आदित्य हैं तो नारी प्रभा हैं। पुरुष तरु हैं, तो नारी लता हैं। पुरुष फूल हैं, तो नारी पंखुड़ी हैं। पुरुष धर्म हैं, तो नारी धीरता हैं। पुरुष सत्य हैं, तो नारी श्रद्धा हैं। पुरुष कर्म हैं, तो नारी विद्या हैं। पुरुष सत्व हैं, तो नारी सेवा हैं। पुरुष स्वाभिमान हैं, तो नारी क्षमा हैं। दोनों के सामंजस्य में ही पूर्णता हैं। विवाह इसी सामंजस्य का एक प्रतीक हैं।

वेदों में नारी के दो जन्म माने गए हैं। एक शरीरत: और एक विद्यात: । विद्यात: जन्म होने पर नारी का पदार्पण जैसे ही विवाह-वेदी पर होता हैं, वैसे ही उसका कुल,व्रत, यज्ञ आदि सब-कुछ बदल जाता हैं। उसके नाम,काम,रिश्ते-नाते सब बदल जाते हैं। उसके दो कुल हो जाते हैं। एक पितृकुल और एक पति कुल। वह दोनों कुलों को जोड़ने वाली कड़ी हैं। पितृकुल में नारी कन्या,पुत्री, भगिनी, ननद, बुआ हैं तो पतिकुल में नारी वधु, गृहिणी, पत्नी, भार्या, जाया, दारा, जननी, अम्बा, माता, श्वश्रु हैं। वेदों में इन सभी दायित्वों के अनुरूप नारी के कर्तव्यों का विस्तार से वर्णन हैं। वैदिक मन्त्रों में नारी को उसके कर्तव्यों का पालन करने के प्रेरणा देते हुए महान बनने के प्रेरणा हैं।

2. स्वामी दयानंद के नारी जाति के उत्थान के विषय में क्या विचार हैं?

समाधान- स्वामी दयानंद नारी जाति को न केवल शिक्षित करने के पक्षधर थे अपितु नारी जाति को गृह स्वामिनी से लेकर प्राचीनकाल की महान विदुषी गार्गी और मैत्रयी के समान विद्वान बनाना चाहते थे। स्वामी जी के अनुसार नारी ताड़न की नहीं अपितु सम्मान करने योग्य हैं।
सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी दयानंद क्रान्तिकारी उद्घोष करते हुए लिखते हैं
“जन्म से पांचवे वर्ष तक के बालकों को माता तथा छ: से आठवें वर्ष तक पिता शिक्षा करे और नौवें के प्रारंभ में द्विज अपने संतानों का उपनयन करके जहाँ पूर्ण विद्वान तथा पूर्ण विदुषी स्त्री, शिक्षा और विद्या-दान करने वालो हो वहां लड़के तथा लडकियों को भेज दे।[iii]”

“लड़कों को लड़कों की तथा लड़कियों को लकड़ियों की शाला में भेज देवें, लड़के तथा लड़कियों की पाठशालाएँ एक दुसरे से कम से कम दो कोस की दुरी पर हो।[iv]”

जो वहां अध्यापिका और अध्यापक अथवा भृत्य, अनुचर हों, वे कन्यायों की पाठशाला में सब स्त्री तथा पुरुषों की पाठशाला में सब पुरुष रहें। स्त्रियों की पाठशाला में पांच वर्ष का लड़का और पुरुषों की पाठशाला में पांच वर्ष की लड़की भी न जाने पाए।[v]

जब तक वे ब्रहाम्चारिणी रहे, तब तक पुरुष का दर्शन, स्पर्शन, एकांत सेवन, भाषण, विषय-कथा, परस्पर क्रीरा, विषय का ध्यान और संग इन आठ प्रकार के मैथुनों से अलग रहे।[vi]

इसमें राजनियम और जाती नियम होना चाहिए कि पांचवे अथवा आठवें वर्ष से आगे अपने लड़के और लड़कियों को घर में न रख सकें, पाठशाला में अवश्य भेज देवें। जो न भेजे वह दंडनीय हो ।[vii]

स्वामी दयानंद नारी शिक्षा के महत्व को यथार्थ में समझते थे क्यूंकि माता ही शिशु की प्रथम गुरु होती हैं इसलिए नारी का शिक्षित होना अत्यंत महत्व पूर्ण होता है। स्वामी जी शिक्षा के प्रबल पक्षधर थे परन्तु सहशिक्षा के पक्षधर नहीं थे इसलिए उन्होंने लड़के लड़कियों की पाठशाला को न केवल अलग होने का सन्देश दिया हैं अपितु उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए भी यही नियम बताया था की केवल पुरुष अध्यापक लड़कों को पढ़ाये एवं स्त्री अध्यापिका लड़कियों को पढ़ाये। देखा जाये तो यह नियम समाज में होने वाले दुराचार, बलात्कार, शारीरिक शोषण, चरित्रहीनता आदि से युवक-युवतियों की रक्षा कर उन्हें राष्ट्र के लिए तैयार करने की दूरगामी सोच हैं। स्वामी जी दुराचार की भावना को मनुष्य के लिए विनाशकारी मानते थे इसीलिए उनका मानना था की अगर माता और पिता का चरित्र उज्जवल होगा तभी संतान भी सुयोग्य एवं चरित्रवान होगी। स्वामी जी के चिंतन में अशिक्षित रखने वाले माता-पिता को राजा द्वारा दण्डित करना प्रशंसनीय हैं क्यूंकि अगर देश की अगली पीढ़ी का विकास उचित प्रकार से होगा और उनकी नींव विधिवत रूप से रखी जाएगी तभी वे समाज के लिए जिम्मेदार नागरिक बनेगे। जिसका नींव में ही दोष होगा वह समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का कैसे निर्वाहन कर पायेगा। आज से 150 वर्ष पूर्व स्वामी दयानंद के विचारों से शिक्षा चेतना का प्रचार हुआ जिसके कारण देश में हज़ारों शिक्षण संस्थाएं खुली, अनेक विद्यालय, गुरुकुल आदि प्रारम्भ हुए जिससे शिक्षा क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई। यह स्वामी दयानंद के चिंतन का परिणाम था।[viii]

3. शंका – क्या वेद नारी जाति को शिक्षा का अधिकार देते हैं?

समाधान – स्वामी दयानंद ने “स्त्रीशूद्रो नाधियातामिति श्रुते:” – स्त्री और शूद्र न पढे यह श्रुति हैं को नकारते हुए वैदिक काल की गार्गी, सुलभा, मैत्रयी, कात्यायनी आदि सुशिक्षित स्त्रियों का वर्णन किया जो ऋषि- मुनिओं की शंकाओं का समाधान करती थी। उनका प्रयास नारी जाति को शिक्षित, स्वालम्बी, आत्मनिर्भर बनाने का था इसीलिए वे नारी को शिक्षा दिलवाने के पक्षधर थे। वेदों में नारी को शिक्षित करने के लिए अनेक मंत्र हैं जैसे-

1. ऋग्वेद[ix] का भाष्य करते हुए स्वामी दयानंद लिखते हैं राजा ऐसा यत्न करे जिससे सब बालक और कन्यायें ब्रहमचर्य से विद्यायुक्त होकर समृधि को प्राप्त हो सत्य, न्याय और धर्म का निरंतर सेवन करे।

2. राजा को प्रयत्नपूर्वक अपने राज्य में सब स्त्रियों को विदुषी बनाना चाहिए – यजुर्वेद[x]।

3. विद्वानों को यही योग्यता हैं की सब कुमार और कुमारियों को पुन्दित बनावे, जिससे सब विद्या के फल को प्राप्त होकर सुमति हों- ऋग्वेद[xi]।

4. जितनी कुमारी हैं वे विदुषियों से विद्या अध्ययन करे और वे कुमारी ब्रह्मचारिणी उन विदुषियों से ऐसी प्रार्थना करें की आप हम सबको विद्या और सुशिक्षा से युक्त करें -ऋग्वेद[xii]।

इस प्रकार यजुर्वेद[xiii] एवं ऋग्वेद[xiv] में भी नारी को शिक्षा का अधिकार दिया गया हैं। इतने स्पष्ट प्रमाण होने के बाद भी मध्य काल में नारी जाति को शिक्षा से वंचित रखना न केवल उनपर अत्याचार था अपितु वेदों के प्रचलन से सामान्य समाज की अनभिज्ञता का प्रदर्शन भी था।

4. क्या वेद सती प्रथा का समर्थन करते हैं?

समाधान- 1875 में स्वामी दयानंद ने पूना[xv] में दिए गए अपने प्रवचन में स्पष्ट घोषणा की थी की “सती होने के लिए वेद की आज्ञा नहीं हैं” ।
वैदिक काल के इतिहास में कहीं भी सती होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता। महाभारत में माद्री के पाण्डु के मृत शरीर के साथ आत्मदाह का उल्लेख हैं जिसका सती प्रथा से कोई सम्बन्ध नहीं हैं। मध्य काल में जब अवनति का दौर चला तब नारी जाति की दुर्गति आरम्भ हुई। सती प्रथा उसी काल के देन हैं।
जहाँ तक वेदों का प्रश्न हैं सायण ने अथर्ववेद के मंत्र[xvi] में सती प्रथा दर्शाने का प्रयास किया हैं। सायण के अनुसार यहाँ पर वेद नारी को आदेश दे रहे हैं की “यह नारी अनादीशिष्टाचारसिद्ध, स्मृति पुराण आदि में प्रसिद्द
सहमरणरूप धर्म का परी पालन करती हुई पतिलोक को अर्थात जिस लोक में पति गया हैं उस स्वर्गलोक को वरण करना चाहती हुई ,तुझ मृत के पास सहमरण के लिए पहुँच रही हैं। अगले जन्म में तू इसे पुत्र- पौत्रादि प्रजा और धन प्रदान करना। अगले मंत्र में सायण कहते हैं अगले जन्म में भी उसे वही पति मिलेगा। इसलिए ऐसा कहा गया हैं।

यहाँ पर सायण के अर्थों को देखकर अनेक शंका उत्पन्न होती हैं। इस मंत्र का सही अर्थ इस प्रकार हैं – यह नारी पुरातन धर्म का पालन करती हुई पतिगृह को पसंद करती हुई। हे मरण धर्मा मनुष्य , तुझ मृत के समीप नीचे भूमि पर बैठी हुई हैं। उसे संतान और सम्पति यहाँ सौप। अर्थात पति की मृत्यु होने के पश्चात पत्नी का उसकी सम्पति और संतान पर अधिकार हैं।

हमारे कथन की पुष्टि अगले ही मंत्र[xvii] में स्वयं सायण करते हुए कहते हैं “हे मृत पति की धर्मपत्नी ! तू मृत के पास से उठकर जीवलोक में आ, तू इस निष्प्राण पति के पास क्यों पड़ी हुई हैं? पाणीग्रहणकर्ता पति से तू संतान पा चुकी हैं, उसका पालन पोषण कर.’

सायण के इस अर्थ से हमें कोई शंका नहीं हैं। दोनों मन्त्रों में विरोधाभास होना हमारे पक्ष को भी सिद्ध करता हैं।

मध्यकाल के बंगाल के कुछ पंडितो ने ऋग्वेद[xviii] में अग्रे के स्थान पर अग्ने पढकर सती प्रथा को वैदिक सिद्ध करना चाहा था, परन्तु यह केवल असत्य कथन हैं। इस मंत्र में वधु को अग्नि नहीं अपितु अग्रे अर्थात गृह में प्रवेश के समय आगे चलने को कहा गया हैं।

इस प्रकार से वेद के मन्त्रों के असत्य अर्थ निकाल कर सती प्रथा को वैदिक सिद्ध किया गया था। धन्य हैं आधुनिक भारत के विचारक राजा राममोहन राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद जिनके प्रयासों से सती प्रथा का प्रचलन बंद हुआ।

5. शंका- क्या नारी जाति को वेदाध्ययन करने का अधिकार नहीं हैं?

समाधान- कुछ अज्ञानी लोगों ने यह प्रचलित कर दिया हैं की नारी और शूद्रों को वेदाध्ययन का अधिकार नहीं हैं परन्तु आज तक ऐसा मानने वाले वेद मन्त्रों में एक भी मंत्र इस कथन के समर्थन में नहीं दिखा पाये हैं। इसके विपरीत वेदों में नारी को वेदाध्ययन करने का स्पष्ट सन्देश हैं।

ऋग्वेद[xix] में ईश्वर सन्देश देते हुए कह रहे हैं की हे समस्त नर नारियों! तुम्हारे लिए ये मंत्र समान रूप से दिए गए हैं तथा तुम्हारा परस्पर विचार भी समान रूप से हो। मैं तुम्हें समान रूप से ग्रंथों का उपदेश करता हूँ।

अथर्ववेद[xx] में स्पष्ट सन्देश हैं की ब्रह्मचर्य का पालन कर कन्या वर का ग्रहण करे। यहाँ पर ,ब्रह्मचर्य का अर्थ हैं ब्रह्म अर्थात वेद में चर अर्थात गमन, ज्ञान या प्राप्ति करना।

अथर्ववेद[xxi] में नववधू को सम्बोधित करते हुए उपदेश दिया गया हैं की हे वधु! तेरे आगे, पीछे,मध्य में, अंत में सर्वत्र वेद विषयक ज्ञान रहे। और वेदज्ञान को प्राप्त करके तदनुसार तुम अपना सारा जीवन बना।

इसी प्रकार से यजुर्वेद[xxii] में स्त्री को उपदेश हैं की “इमा ब्रह्मा पीपिही ” अर्थात सौभाग्य की प्राप्ति के लिए वेदमंत्रों के अमृत का बार बार अच्छी प्रकार
से पान कर।

ऋग्वेद[xxiii] में स्वामी दयानंद लिखते हैं जो कन्या 24 वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य पूर्वक अंग-उपांग सहित वेद विद्याओं को पढ़ती हैं, वे मनुष्य जाति को सुशोभित करने वाली होती हैं।

यजुर्वेद[xxiv] के भाष्य में स्वामी दयानंद लिखते हैं यदि मनुष्य इस सृष्टि में ब्रह्मचर्य आदि से कुमार और कुमारियों को द्विज बनाएं तो वे शीघ्र विद्वान हो जाएं।

ऋग्वेद[xxv] के भाष्य में स्वामी दयानंद लिखते हैं जिस प्रकार वैश्य लोग धर्म धारण करके धनोपार्जन करते हैं, उसी प्रकार कन्याओं को चाहिए की विवाह से पहले शुभ ब्रह्मचर्य व्रत धारण करके विदुषी अध्यापिकाओं को प्राप्त करके सुशिक्षा और (वेद ) विद्या संचय करके विवाह करें।

ऋग्वेद[xxvi] के भाष्य में स्वामी दयानंद लिखते हैं जैसे ब्रह्मचर्य करके यौवनावस्था को प्राप्त हुई विदुषी कुमारी कन्या अपने पति को पा निरंतर उसकी सेवा करती हैं और जैसे ब्रह्मचर्य को किये हुए जवान पुरुष अपनी प्रीति के अनुकूल चाही हुई स्त्री को पाकर आनंदित होता हैं, वैसा ही सभा और सेनापति सदा होवें।

ऐसा ही आशय ऋग्वेद 5/32/11 में मिलता हैं।

महाभारत[xxvii] में स्पष्ट रूप से लिखा हैं की जिनका धन समान हो और वेदशास्त्रविषयक ज्ञान समान हो, उनमें मित्रता और विवाह आदि हो सकते हैं ,बलवान और सर्वथा निर्बल व्यक्तियों में नहीं।
वेदों में स्त्री को विदुषी बनने का और अपने गुण, कर्म और स्वभाव के अनुसार गुणशाली वर चुनने का अधिकार दिया गया हैं। इस प्रकार से वेदों में अनेक मंत्र स्त्रियों को वेदाध्ययन की प्रेरणा देते हैं।

वेदों में अनेक सूक्त हैं जैसे ऋग्वेद 10 /134, 10/40, 8/91, 10/95,10/107, 10/109, 10/154, 10/159,5/28 आदि जिनकी ऋषिकाएँ गोधा,घोषा, विश्ववारा, अपाला, उपनिषत्, निषत्, रोमशा आदि हुई हैं। यह ऋषिकाएँ न केवल वेदों को पढ़ती थी, उनके रहस्य को समझती थी अपितु उनका प्रचार भी करती थी[xxviii]। इन ऋषिकाओं[xxix] की सूचि बृहद देवता[xxx] अध्याय में मिलती हैं। ऋषिकायों को ब्रह्मवादिनी भी कहा जाता था और इनका नियमपूर्वक उपनयन, वेदाध्ययन, वेदाध्यापन, गायत्री मंत्र का उपदेश प्रदान आदि होता था।

6. शंका- क्या नारी जाति को यज्ञ में भाग लेने का अधिकार नहीं हैं?

समाधान- वैदिक काल में नारी जाति को यज्ञ में भाग लेने का पूर्ण अधिकार था जिसे मध्य काल में वर्जित कर दिया गया था। कुछ ग्रंथों में इस बात को प्रचलित कर दिया गया की नारी का स्थान यज्ञवेदी से बाहर हैं[xxxi] अथवा कन्या और युवती अग्निहोत्र की होता नहीं बन सकती । वेद परम प्रमाण हैं इसलिए इस शंका का समाधान भी वेद भली प्रकार से करते हैं। वेद नारी जाति को यज्ञ में भाग लेने का पूर्ण अधिकार देते हैं।
ऋग्वेद[xxxii] में कहा गया हैं की जो पति-पत्नी समान मनवाले होकर यज्ञ करते हैं उन्हें अन्न, पुष्प, हिरण्य आदि की कमी नहीं रहती हैं।
ऋग्वेद[xxxiii] में कहा गया हैं की विवाह यज्ञ में वर वधु उच्चारण करते हुए एक दुसरे का ह्रदय-स्पर्श करते हैं।
ऋग्वेद[xxxiv] में कहा गया हैं की विद्वान लोग पत्नी सहित यज्ञ में बैठते हैं और नमस्करणीय (नमन करने योग्य जैसे ईश्वर, विद्वान आदि) को नमस्कार करते हैं।

इस प्रकार यजुर्वेद[xxxv] और अथर्ववेद[xxxvi] में भी यज्ञ में नारी के भाग लेने के स्पष्ट प्रमाण हैं।

7. शंका – क्या नारी को यज्ञ में ब्रह्मा बनने का अधिकार हैं?

समाधान- यज्ञ में ब्रह्मा का पद सबसे ऊँचा होता है। ऐतरेय ब्राह्मण 5/33 के अनुसार ज्ञान, कर्म और उपासना तीनों विद्याओं के प्रतिपादक वेदों के पूर्ण ज्ञान से ही मनुष्य ब्रह्मा बन सकता हैं। शतपथ ब्राह्मण 11/5/7 में इसी तथ्य का समर्थन किया गया हैं। गोपथ ब्राह्मण 1/3 के अनुसार जो सबसे अधिक परमेश्वर और

वेदों का ज्ञाता हो उसे ब्रह्मा बनाना चाहिए।

ऋग्वेद 8/33 में नारी को कहा गया है कि “स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ” अर्थात इस प्रकार से उचित सभ्यता के नियमों का पालन करती हुई नारी निश्चित रूप से ब्रह्मा के पद को पाने योग्य बन सकती है।

जब वेदों में स्पष्ट रूप से नारी जाति को यज्ञ में ब्रह्मा बनने का आदेश हैं तो अन्य ग्रंथों से इसके विरोध में अगर कोई प्रमाण प्रस्तुत किया जाता है तो वह अमान्य है

क्यूंकि मनुस्मृति 2/13में लिखा है कि धर्म को जानने की इच्छा रखने वालों के लिए वेद ही परम प्रमाण है।

8. शंका- क्या वेदों में दहेज देने की प्रथा का विधान हैं जिसके कारण नारी जाति पर अनेक अत्याचार हो रहे है?

समाधान- वेदों में पुत्री को दहेज से अलंकृत करने का सन्देश दिया गया है परन्तु यहाँ पर दहेज का वास्तिक अर्थ उससे भिन्न है जैसा प्राय: प्रचलित है।

अथर्ववेद 14/1/8 के मंत्र में पिता द्वारा कन्या को स्तुति वृति वाला बना देना ही पुत्री के लिए सच्चा दहेज़ है। यहाँ पर स्तुति वृति का भाव है पुत्री सदा दूसरों के गुणों की प्रशंसा करने वाली हो, किसी के भी अवगुणों की और ध्यान नहीं देने वाली हो अर्थात परनिंदा नहीं करने वाली हो एवं उसके गहने उसकी भद्रता , उसका शिष्टाचार और उसकी प्रभु के गुणगान करने की वृति हो।

यहाँ पर पुत्री को गुणों से सुशोभित करना एक पिता के लिए सच्चा दहेज देने के समान हैं। कालांतर में कुछ लोभी लोगो ने दहेज का अर्थ धन समझ लिया जिसके कारण उनका लालच बढ़ता गया एवं उसका परिणाम नारी जाति पर अत्याचार के रूप में आया हैं जो निश्चित रूप से सभ्य समाज के माथे पर कलंक के समान हैं।

9. शंका- क्या वेदों में केवल पुत्र की कामना करी गई हैं?

समाधान- आज समाज में कन्या भ्रूण हत्या का महापाप प्रचलित हो गया है। जिसका मुख्य कारण नारी जाति का समाज में उचित सम्मान न होना, धन आदि के रूप में दहेज जैसी कुरीतियों का होना ,समाज में बलात्कार जैसी घटनाओं का बढ़ना ,चरित्र दोष आदि हैं जिससे नारी जाति की रक्षा कर पाना कठिन हो गया हैं। ऐसे में समाज में पुत्र की कामना अधिक बलवती हो उठी हैं एवं पुत्री को बोझ समझा जाने लगा हैं। कुछ लोगो ने यह कुतर्क देना प्रारम्भ कर दिया है कि वेद नारी को हीन दृष्टी से देखते है और वेदों में सर्वत्र पुत्र ही मांगे गई है। सत्य यह है कि वेदों में पत्नी को उषा के सामान प्रकाशवती [ऋग्वेद 4/14/3, ऋग्वेद 7/78/3, ऋग्वेद 1/124/3, ऋग्वेद 1/48/8], वीरांगना [अथर्ववेद14/1/47, यजुर्वेद 5/10, यजुर्वेद 10/26, यजुर्वेद 13/16, यजुर्वेद 13/18], वीरप्रसवा [ऋग्वेद 10/47/2-5, ऋग्वेद 4/2/5, ऋग्वेद 7/56/24, ऋग्वेद 9/98/1], विद्या अलंकृता [यजुर्वेद 20/84, यजुर्वेद 20/85, ऋग्वेद 1/164/49, ऋग्वेद 6/49/7], स्नेहमयी माँ [ऋग्वेद 10/17/10, ऋग्वेद 6/61/7, यजुर्वेद 6/17, यजुर्वेद 6/31, अथर्ववेद 3/13/7], पतिंवरा (पति का वरण करने वाली) [ऋग्वेद 5/32/11, यजुर्वेद 37/10, यजुर्वेद 37/19, यजुर्वेद 8/7, अथर्ववेद 2/36/5] , अन्नपूर्णा [ अथर्ववेद 7/60/5, अथर्ववेद 3/24/4, अथर्ववेद 3/12/2, यजुर्वेद 8/42, ऋग्वेद 1/92/8], सदगृहणी और सम्राज्ञी [अथर्ववेद14/1/17, अथर्ववेद 14/1/42, यजुर्वेद 11/63, यजुर्वेद 11/64, यजुर्वेद 15/63] आदि से संबोधित किया गया हैं जो निश्चित रूप से नारी जाति को उचित सम्मान प्रदान करते हैं।

उदहारण के लिए वेदों में नारी जाति की यशगाथा के लिए कुछ वेद मंत्र प्रस्तुत कर रहे हैं।

1. मेरे पुत्र शत्रु हन्ता हों और पुत्री भी तेजस्वनी हो।[ऋग्वेद 10/159/3]

2. यज्ञ करने वाले पति-पत्नी और कुमारियों वाले होते है।[ऋग्वेद 8/31/8]

3. प्रति प्रहर हमारी रक्षा करने वाला पूषा परमेश्वर हमें कन्यायों का भागी बनायें अर्थात कन्या प्रदान करे।[ऋग्वेद 9/67/10]

4. हमारे राष्ट्र में विजयशील सभ्य वीर युवक पैदा हो, वहां साथ ही बुद्धिमती नारियों के उत्पन्न होने की भी प्रार्थना हैं।[यजुर्वेद 22/22 ]

5. जैसा यश कन्या में होता हैं वैसा यश मुझे प्राप्त हो ।[अथर्ववेद 10/3/20]

इस प्रकार से नारी जाति की वेदों में महिमामंडन हैं नाकि उन्हें अवांछनीय मान कर केवल पुत्रों की कामना की गई हैं।

10. शंका- क्या वेदों में बहु-विवाह आदि का विधान हैं?

समाधान- वेदों के विषय में एक भ्रम यह भी फैलाया गया हैं की वेदों में बहुविवाह की अनुमति दी गयी है [5 ]।

वेदों में स्पष्ट रूप से एक ही पत्नी होने का विधान बताया गया हैं।

ऋग्वेद 10/85 को विवाह सूक्त के नाम से जाना चाहता हैं। इस सूक्त के मंत्र ४२ में कहा गया हैं तुम दोनों इस संसार व गृहस्थ आश्रम में सुख पूर्वक निवास करो। तुम्हारा कभी परस्पर वियोग न हो और सदा प्रसन्नतापूर्वक अपने घर में रहो। यहाँ पर हर मंत्र में “तुम दोनों” अर्थात पति और पत्नी आया हैं। अगर बहुपत्नी का सन्देश वेदों में होता तो “तुम सब” आता।

ऋग्वेद 10/85/47 में हम दोनों (वर-वधु) सब विद्वानों के सम्मुख घोषणा करते हैं की हम दोनों के ह्रदय जल के समान शांत और परस्पर मिले हुए रहेंगे।

अथर्ववेद 7/35/4 में पति पत्नी के मुख से कहलाया गया हैं की तुम मुझे अपने ह्रदय में बैठा लो , हम दोनों का मन एक ही हो जाये।

अथर्ववेद 7/38/4 पत्नी कहती हैं तुम केवल मेरे बनकर रहो और अन्य स्त्रियों का कभी कीर्तन व व्यर्थ प्रशंसा आदि भी न करो।

ऋग्वेद 10/101/11 में बहु विवाह की निंदा करते हुए वेद कहते हैं जिस प्रकार रथ का घोड़ा दोनों धुराओं के मध्य में दबा हुआ चलता हैं वैसे ही एक समय में दो स्त्रियाँ करनेवाला पति दबा हुआ होता हैं अर्थात परतंत्र हो जाता हैं.इसलिए एक समय दो व अधिक पत्नियाँ करना उचित नहीं हैं।

इस प्रकार वेदों में बहुविवाह के विरुद्ध स्पष्ट उपदेश हैं। वेदों की अलंकारिक भाषा को समझने में गलती करने से इस प्रकार की भ्रान्ति होती हैं।

11. शंका- क्या वेद बाल विवाह का समर्थन करते हैं?

समाधान- हमारे देश पर विशेषकर मुस्लिम आक्रमण के पश्चात बाल विवाह की कुरीति को समाज ने अपना लिया जिससे न केवल ब्रहमचर्य आश्रम लुप्त हो गया बल्कि शरीर की सही ढंग से विकास न होने के कारण एवं छोटी उम्र में माता पिता बन जाने से संतान भी कमजोर पैदा होती गयी जिससे हिन्दू समाज दुर्बल से दुर्बल होता गया।

अथर्ववेद के ब्रहमचर्य सूक्त के 11/5/18 मंत्र में कहा गया हैं की ब्रहमचर्य (सादगी, संयम और तपस्या) का जीवन बिता कर कन्या युवा पति को प्राप्त करती हैं। इस मंत्र में नारी को युवा पति से ही विवाह करने का प्रावधान बताया गया हैं जिससे बाल विवाह करने की मनाही स्पष्ट सिद्ध होती हैं।

ऋग्वेद 10/183 सूक्त में वर वधु मिलकर संतान उत्पन्न करने की बात कह रहे हैं। वधु वर से मिलकर कह रही हैं की तो पुत्र काम हैं अर्थात तू पुत्र चाहता हैं वर वधु से कहता हैं की तू पुत्र कामा हैं अर्थात तू पुत्र चाहती हैं अत: हम दोनों मिलकर उत्तम संतान उत्पन्न करे। पुत्र अर्थात संतान उत्पन्न करने की कामना युवा पुरुष और युवती नारी में ही उत्पन्न हो सकती हैं। छोटे छोटे बालक और बालिकाओं में नहीं हो सकती हैं।

इसी प्रकार से अथर्ववेद 2/30/5 में भी परस्पर युवक और युवती एक दुसरे को प्राप्त करके कह रहे हैं की मैं पतिकामा अर्थात पति की कामना वाली और यह तू जनीकाम अर्थात पत्नी की कामना वाला दोनों मिल गए हैं। युवा अवस्था में ही पति-पत्नी की कामना की इच्छा हो सकती हैं छोटे छोटे बालक और बालिकाओं में यह इच्छा नहीं होती हैं। इन प्रमाणों से यही सिद्ध होता हैं की वेद बालविवाह का समर्थन नहीं करते।

12. शंका- वेदों में नारी की महिमा का संक्षेप में वर्णन बताये?

समाधान- संसार की किसी भी धर्म पुस्तक में नारी जाति की महिमा [6] का इतना सुंदर गुण गान नहीं मिलता जितना वेदों में मिलता हैं। कुछ उद्हारण देकर हम अपने कथन को सिद्ध करेगे।

1. उषा के समान प्रकाशवती – हे राष्ट्र की पूजा योग्य नारी! तुम परिवार और राष्ट्र में सत्यम, शिवम्, सुंदरम की अरुण कान्तियों को छिटकती हुई आओ , अपने विस्मयकारी सद्गुणगणों के द्वारा अविद्या ग्रस्त जनों को प्रबोध प्रदान करो। जन-जन को सुख देने के लिए अपने जगमग करते हुए रथ पर बैठ कर आओ।[ऋग्वेद 4/14/3]

2. वीरांगना- हे नारी! तू स्वयं को पहचान ।तू शेरनी हैं, तू शत्रु रूप मृगों का मर्दन करनेवाली हैं, देवजनों के हितार्थ अपने अन्दर सामर्थ्य उत्पन्न कर। हे नारी ! तू अविद्या आदि दोषों पर शेरनी की तरह टूटने वाली हैं, तू दिव्य गुणों के प्रचारार्थ स्वयं को शुद्ध कर! हे नारी ! तू दुष्कर्म एवं दुर्व्यसनों को शेरनी के समान विश्वंस्त करनेवाली हैं, धार्मिक जनों के हितार्थ स्वयं को दिव्य गुणों से अलंकृत कर।[यजुर्वेद 5/10]

3. वीर प्रसवा- राष्ट्र को नारी कैसी संतान दे- हमारे राष्ट्र को ऐसी अद्भुत एवं वर्षक संतान प्राप्त हो, जो उत्कृष्ट कोटि के हथियारों को चलाने में कुशल हो, उत्तम प्रकार से अपनी तथा दूसरों की रक्षा करने में प्रवीण हो, सम्यक नेतृत्व करने वाली हो, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूप चार पुरुषार्थ- समुद्रों का अवगाहन करनेवाली हो, विविध संपदाओं की धारक हो, अतिशय क्रियाशील हो, प्रशंशनीय हो, बहुतों से वरणीय हो, आपदाओं की निवारक हो।[ ऋग्वेद 10/47/3]

4. विद्या अलंकृता-विदुषी नारी अपने विद्या-बलों से हमारे जीवनों को पवित्र करती रहे। वह कर्मनिष्ठ बनकर अपने कर्मों से हमारे व्यवहारों को पवित्र करती रहे। अपने श्रेष्ठ ज्ञान एवं कर्मों के द्वारा संतानों एवं शिष्यों में सद्गुणों और सत्कर्मों को बसाने वाली वह देवी गृह आश्रम-यज्ञ एवं ज्ञान-यज्ञ को सुचारू रूप से संचालित करती रहे। [यजुर्वेद 20/84]

5. स्नेहमयी माँ- हे प्रेमरसमयी माँ! तुम हमारे लिए मंगल कारिणी बनो, तुम हमारे लिए शांति बरसाने वाली बनो, तुम हमारे लिए उत्कृष्ट सुख देने वाली बनो। हम तुम्हारी कृपा-दृष्टि से कभी वंचित न हो।[अथर्वेद 7/68/2]

6. अन्नपूर्णा- इस गृह आश्रम में पुष्टि प्राप्त हो, इस गृह आश्रम में रस प्राप्त हो. इस गिरः आश्रम में हे देवी! तू दूध-घी आदि सहस्त्रों पोषक पदार्थों का दान कर। हे यम- नियमों का पालन करने वाली गृहणी! जिन गाय आदि पशु से पोषक पदार्थ प्राप्त होते हैं उनका तू पोषण कर।[अथर्ववेद 3/28/4]

अंत में मनुस्मृति के प्रचलित श्लोक से इस विषय को विराम देना चाहेंगे।संसार में नारी जाति को सम्मान देने के लिए इससे सुन्दर शब्द शायद हो कहीं मिलेंगे।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: । यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।।

जिस कुल में नारियो कि पूजा, अर्थात सत्कार होता हैं, उस कुल में दिव्यगुण , दिव्य भोग और उत्तम संतान होते हैं और जिस कुल में स्त्रियो कि पूजा नहीं होती, वहां जानो उनकी सब क्रिया निष्फल हैं।

[1] Census Report of 1901 on Female literacy rate in united provinces was 15/10,000 for common population while for members of Aryasamaj it was 674/10,000.

[2] पूना प्रवचन उपदेश मंजरी 12 वां प्रवचन

[3] आधुनिक भारतीय विद्वानों में से स्वामी दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश में, पंडित सत्यव्रत जी सामश्रमी ने ऐतरेयालोचन में, श्री रमेशचन्द्र दत्त ने History of civilization of India में, श्री भगवत शरण उपाध्याय Women in Rigveda में, डॉ ऐतलेकर The education in ancient India में, पंडित शिवदत्त शर्मा महामहोपाध्याय आर्य विद्या सुधाकर में, श्री काणे महोदय History of Dharam Shastras में, श्री महादेव जी शास्त्री The Vedic Law of Marriage में मानते हैं की प्राचीन काल में कन्याओं का उपनयन होता था और नारी न केवल वेदाध्ययन करती थी अपितु ऋषिकाएँ भी बनती थी।

[4] डॉ मिज़ Dharma and Society में लिखते हैं In Rigvedic India there were women Rishis, the wives participated in the ceremonies with their husbands. They were highly honored and respected and could even perform the function of a priest at a sacrifice.

[5] Vedic Age page 390

[6] वैदिक नारी रचियता रामनाथ वेदालंकार

Science in the Vedas

From: Prem Sabhlok < >

The Sun never sets or rises and it is the earth, which rotates (Sama-Ved 121). The gravitational effect of solar system makes the earth stable (R.V.1-103-2, 1-115-4 and 5-81-2). The axle of the earth does not get rusted and the earth continues to revolve on its axle (R.V. 1-164-29). The science of Time and its subtle nature is described in (R.V.1-92-12 and 1-95-8). The need to study the properties of water, air and fire for discovering and manufacturing aircrafts, ships and other vehicles capable of moving in the firmament, land and water are mentioned in Rig Veda 1-3-1,2, 1-34-1, 1-140-1 and many other hymns. Reference to infinite number of both gross and subtle atoms and the energy principle as spirit of God in each atom is given in R.V. 5-47-2 and Sama Veda 222. Atoms and sub atomic particles are not inert and have unsuspected vitality owing to this energy principle. Physical sciences relating to agriculture, medicine, astronomy mathematics particularly algebra, toxicology etc. are described in R.V.1-71-9, 4-57-5, Sama Veda 121 and many other hymns.

In the Vedas scientists are described as men and women of absolute self-control, truthful with scientific outlook and destroyers of miseries (R.V., 1-3-4). With the help of these scientists one could travel far on the earth and also in the sky through conveyances, which run and touch the middle region (R.V. 1-3-1, 6-22-2 and 1-22-2). Such scientists from both the sexes go across to distance places quickly like the mind and electricity (R.V. 1-71-9). In this hymn aircrafts and even space ships are hinted. These ashvinaus should be well versed in Physics, agricultural sciences (R.V. 4-57-5), medical sciences (R.V. 5-74-3), astronomy (S.V. 121) and other sciences. Ashvinaus have been advised to learn thoroughly about Prakrti (divine Nature), characteristics and various qualities of water, air, fire, electricity and heat and sound energy. Other sciences mentioned are Toxicology and use of various kinds of medicines and drugs (R.V 1-191-14), science of Time (Kala vidya) that starts with dawn (Usha). R.V. 1-95-2, and 10, refers to use of time for mathematics. There is a mention of infrared rays, study of Algebra (Rekha di ganit vidya), sound as a medium of knowledge for various sciences, diseases like bile, cough, jaundice and others and their treatment etc. The relevant hymns in this regard are in Rig-Veda 1-185-2, 1-12-1, 2, 1-22-1 to 4, 1-2-3, 1-95-1, 1-101-1 and many others.

However, the greater emphasis is on the development of Scientific Temper amongst the members of Society with a view to curb spread of blind faith, hypocrisy, miracle and ostentatious worship of God. Thus, the knowledge of Vedic sciences is meant to save the human beings from falling into an utter darkness as Isa Upanishad and the last chapter of Yajur Veda caution us. The unity in diversity is the message of Vedic physical and metaphysical sciences. While matter is the cause of diversity owing to three primordial subtle particles of purity, activity and passivity present in it, the spirit (jiva) provides the necessary unity.

To encourage scientific temper Vedas advise, “O, Man Explore further.” Kindly see for more details on Vedic Science- about Earth, Sun, Gravitation, Moon, Eclipse, telegraphy, ships, aircrafts and many other http://www.aryasamajjamnagar.org

The Vedas combine science with metaphysics and clearly mention that it is God who is the giver of knowledge of all sciences as “Sahstra sam ” (R.V. 1-10-11). The scientists are advised to study cause and effect of all material elements and also how the objects are produced and there after utilize these properly (R.V. 5-47-3). By following these guidelines, they can alleviate much suffering of the people (R.V. 5-77-4). Without the knowledge and practical application of physical sciences, it is not possible to eradicate poverty and attain prosperity (R.V. 1-34-1 to 5).

For more details on Vedic science and many other divine, spiritual and material Vedic subjects kindly see “Glimpses of Vedic Metaphysics” available on Internet for on line reading and even taking print at no cost. The website is http://www.sabhlokcity.com/metaphysics. Also, the book can be accessed through google.com, yahoo.com, lulu.com. Search for the book or Vedic Metaphysics.

Kindly render divine social service and forward to other seekers of Vedic knowledge.

Kindly also feel free to improve this Vedic Message strictly based on Ved mantras, riks/hymns.

With kind regards,

Prem Sabhlok

Indian Defense Accounts Service (Retd)

P.S.

Vedas say in regard to scientific temper “O: Man Explore further”

For more knowledge of Vedic Science as obtained from Arya Samaj Jamnagar

For movement of Earth refer to R.V 10-22-14, R.V 10-149-1 (Gravitational force of Sun), R.V 8-12-28 and 30, 1-6-5 for the power of Sun to hold the Earth and other planets, moving planets do not collide R.V 1-164-13, Y.V 33-43, A.V 4-11-1

Eclipse

Rerefer to R.V 5-40-5—the earth gets scared by sudden darkness when O: Surya you are blocked by the one to whom you have gifted your own light (Moon).

On the science of Telegraphy and aircraft and ship building refer to RV 1-119-10, RV 1-116-3,4,5 and 6, 11-134-2 and 7, 1-148- 8

Kindly see original mantras at Website http://www.aryasamajjamnagar.org

 

33 करोड़ नहीं , 33 कोटी देवी-देवता हैँ हिंदू धर्म में हैं ।

From: Pramod Agrawal < >

33 करोड़ नहीं , 33 कोटी देवी-देवता हैँ हिंदू धर्म में हैं ।

अधूरा ज्ञान खतरना होता है।

 

कोटि = प्रकार ।

देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते हैं ।

कोटि का मतलब प्रकार होता है, और एक अर्थ करोड़ भी होता ।

 

कुल 33 प्रकार के देवता हैं –◾12 आदित्य है – धाता, मित्, अर्यमा, शक्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वान, पूषा, सविता, त्वष्टा,एवं विष्णु

◾8 वसु हैं – धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष, तथा प्रभाष

◾11 रूद्र हैं – हर , बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजिता, वृषाकपि, शम्भू, कपर्दी, रेवत,

म्रग्व्यध, शर्व, तथा कपाली .

◾2 अश्विनी कुमार हैं .

कुल – 12 +8 +11 +2 =33

==

 

शरीर के 7 चक्र |

From Pramod Agrawal < >

 

शरीर के 7 चक्र बनाते हैं चमकदार,

आप भी कर सकते हैं उन्हें सक्रिय

 

  1. मूलाधार चक्र:

 

यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिंग के बीच 4 पंखुरियों वाला यह ‘आधार चक्र’ है। 99.9% लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है और वे इसी चक्र में रहकर मर जाते हैं। जिनके जीवन में भोग, संभोग और निद्रा की प्रधानता है उनकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है।

 

मंत्र : लं

चक्र जगाने की विधि : मनुष्य तब तक पशुवत है, जब तक कि वह इस चक्र में जी रहा है इसीलिए भोग, निद्रा और संभोग पर संयम रखते हुए इस चक्र पर लगातार ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। इसको जाग्रत करने का दूसरा नियम है- यम और नियम का पालन करते हुए साक्षी भाव में रहना।

 

प्रभाव :  इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति के भीतर वीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव जाग्रत हो जाता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए वीरता, निर्भीकता और जागरूकता का होना जरूरी है।

 

  1. स्वाधिष्ठान चक्र-

 

यह वह चक्र है, जो लिंग मूल से 4 अंगुल ऊपर स्थित है जिसकी 6 पंखुरियां हैं। अगर आपकी ऊर्जा इस चक्र पर ही एकत्रित है तो आपके जीवन में आमोद-प्रमोद, मनोरंजन, घूमना-फिरना और मौज-मस्ती करने की प्रधानता रहेगी। यह सब करते हुए ही आपका जीवन कब व्यतीत हो जाएगा आपको पता भी नहीं चलेगा और हाथ फिर भी खाली रह जाएंगे।

 

मंत्र : वं

कैसे जाग्रत करें : जीवन में मनोरंजन जरूरी है, लेकिन मनोरंजन की आदत नहीं। मनोरंजन भी व्यक्ति की चेतना को बेहोशी में धकेलता है। फिल्म सच्ची नहीं होती लेकिन उससे जुड़कर आप जो अनुभव करते हैं वह आपके बेहोश जीवन जीने का प्रमाण है। नाटक और मनोरंजन सच नहीं होते।

 

प्रभाव : इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश

होता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि उक्त सारे दुर्गुण समाप्त हों तभी सिद्धियां आपका द्वार खटखटाएंगी।

 

  1. मणिपुर चक्र :

 

नाभि के मूल में स्थित यह शरीर के अंतर्गत मणिपुर नामक तीसरा चक्र है, जो 10 कमल पंखुरियों से युक्त है। जिस व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा यहां एकत्रित है उसे काम करने की धुन-सी रहती है। ऐसे लोगों को कर्मयोगी कहते हैं। ये लोग दुनिया का हर कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं।

 

मंत्र : रं

कैसे जाग्रत करें : आपके कार्य को सकारात्मक आयाम देने के लिए इस चक्र पर ध्यान लगाएंगे। पेट से श्वास लें।

 

प्रभाव : इसके सक्रिय होने से तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि कषाय-कल्मष दूर हो जाते हैं। यह चक्र मूल रूप से आत्मशक्ति प्रदान करता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए आत्मवान होना जरूरी है। आत्मवान होने के लिए यह अनुभव करना जरूरी है कि आप शरीर नहीं, आत्मा हैं।

आत्मशक्ति, आत्मबल और आत्मसम्मान के साथ जीवन का कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं।

 

  1. अनाहत चक्र-

 

हृदयस्थल में स्थित द्वादश दल कमल की पंखुड़ियों से युक्त द्वादश स्वर्णाक्षरों से सुशोभित चक्र ही अनाहत चक्र है। अगर आपकी ऊर्जा अनाहत में सक्रिय है तो आप एक सृजनशील व्यक्ति होंगे। हर क्षण आप कुछ न कुछ नया रचने की सोचते हैं। आप चित्रकार, कवि, कहानीकार, इंजीनियर आदि हो सकते हैं।

 

मंत्र : यं  कैसे जाग्रत करें : हृदय पर संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। खासकर रात्रि को सोने से पूर्व इस चक्र पर ध्यान लगाने से यह अभ्यास से जाग्रत होने लगता है और सुषुम्ना इस चक्र को भेदकर ऊपर गमन करने लगती है।

 

प्रभाव : इसके सक्रिय होने पर लिप्सा, कपट, हिंसा, कुतर्क, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार समाप्त हो जाते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम और संवेदना का जागरण होता है। इसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के समय ज्ञान स्वत: ही प्रकट होने लगता है। व्यक्ति अत्यंत आत्मविश्वस्त, सुरक्षित, चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता है। ऐसा व्यक्ति अत्यंत हितैषी एवं बिना किसी स्वार्थ के मानवता प्रेमी एवं सर्वप्रिय बन जाता है।

 

  1. विशुद्ध चक्र-

 

कंठ में सरस्वती का स्थान है, जहां विशुद्ध चक्र है और जो 16 पंखुरियों वाला है। सामान्य तौर पर यदि आपकी ऊर्जा इस चक्र के आसपास एकत्रित है तो आप अति शक्तिशाली होंगे।

 

मंत्र : हं   कैसे जाग्रत करें : कंठ में संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।

 

प्रभाव : इसके जाग्रत होने कर 16 कलाओं और 16 विभूतियों का ज्ञान हो जाता है। इसके जाग्रत होने से जहां भूख और प्यास को रोका जा सकता है वहीं मौसम के प्रभाव को भी रोका जा सकता है।

 

  1. आज्ञाचक्र :

 

भ्रूमध्य (दोनों आंखों के बीच भृकुटी में) में आज्ञा चक्र है। सामान्यतौर पर जिस व्यक्ति की ऊर्जा यहां ज्यादा सक्रिय है तो ऐसा व्यक्ति बौद्धिक रूप से संपन्न, संवेदनशील और तेज दिमाग का बन जाता है लेकिन वह सब कुछ जानने के बावजूद मौन रहता है। इसे बौद्धिक सिद्धि कहते हैं।

 

मंत्र : उ

कैसे जाग्रत करें : भृकुटी के मध्य ध्यान लगाते हुए साक्षी भाव में रहने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।

 

प्रभाव : यहां अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से ये सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं और व्यक्ति सिद्धपुरुष बन जाता है।

 

  1. सहस्रार चक्र :

 

सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है अर्थात जहां चोटी रखते हैं। यदि व्यक्ति यम, नियम का पालन करते हुए यहां तक पहुंच गया है तो वह आनंदमय शरीर में स्थित हो गया है। ऐसे व्यक्ति को संसार, संन्यास और सिद्धियों से कोई मतलब नहीं रहता है।

 

मंत्र : ॐ

कैसे जाग्रत करें :  मूलाधार से होते हुए ही सहस्रार तक पहुंचा जा सकता है। लगातार ध्यान करते रहने से यह चक्र जाग्रत हो जाता है और व्यक्ति परमहंस के पद को प्राप्त कर लेता है।

 

प्रभाव : शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण विद्युतीय और जैवीय विद्युत का संग्रह है। यही मोक्ष का द्वार है।