राष्ट्र-चिंतन – क्या मदर टेरेसा संत थीं ?


From: Pramod Agrawal < >

(1) राष्ट्र-चिंतन

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1929 में गुलाम भारत में ईसाइयत के प्रचार-प्रसार के लिए वेटिकन सिटी ने अपना कर्मचारी बना कर मदर टरेसा को भेजा था। मदर टरेसा का समर्पण किसके प्रति था?मदर टरेसा का समर्पण ‘‘ वेटिकन सिटी ‘‘ के प्रति था। वेटिकन सिटी की ही वह कर्मचारी थी। वेटिकन सिटी कथैलिक ईसाई धर्म की राजधानी है और जिसका सर्वेसर्वा पोप होता है। मदर टरेसा का समर्पण उसी वेटिकन सिटी के प्रति था जिस वेटिकन सिटी के अनुआयियों ने भारत को गुलाम बनाया था, मदर टरेसा का समर्पण उसी वेटिकन सिटी के प्रति जिस वेटिकन सिटी के अनुआयियों ने अफ्रीका में छुआछूत और रंगभेद का नंगा नाच किया था और जिसके विरोध में नेल्सन मंडेला को 30 सालों तक जेल में रहना पड़ा था, मदर टरेसा का समर्पण उसी वेटिकन सिटी के प्रति था जिसके अनुआयी अमेरिका पर कब्जा कर अमेरिका के आदिवासी और मूल निवासी रेड इंडियनो की संस्कृति को जमीेदोज की थी रेड इंडियन आज तक अमेरिका में रंगभेद के शिकार हैं, जिनके साथ पशुवत व्यवहार होता है और जिन्हें राजनीतिक तौर पर हाशिये पर रखा गया है।, मदर टरेसा का समर्पण उसी वेटिकन सिटी के प्रति था जिस वेटिकन सिटी के अनेको पादरी अमेरिका और यूरोप में बाल यौन शोषण के आरोपी रहे हैं जिन्हें सजा के लिए कानून को सौंपने की जगह उनके नाम और पते बदल कर भारत और अफ्रीकी देशों में भेज दिये गये थे। वेटिकन सिटी आज भी बाल यौन शोषण के आरोपी पादरियों की असली पहचान बताने से इनकार करती रही है। अनाथ बच्चों को ईसाई मिशनरियां किस प्रकार से ईसाई बनाती हैं, यह कौन नहीं जानता है।

भारत में अनेकानेक संगठन और हस्तियां रहें हैं जिन्होंने मानवता की सेवा में सर्वश्रेष्ठ योगदान देने की सफलतम कोशिश की है पर इन्हें मदर टरेसा जैसा सौभाग्य नहीं मिला। रामकृष्ण मिशन ने अनाथ बच्चों की सेवा में बडा योगदान दिया है। हरिद्वार और वाराणसी में बीमार, बुजुर्ग और असहाय तथा अनाथ महिलाओं की रक्षा और उनके जीवन को सुखमय बनाने में कई संगठन और कई धार्मिक हस्तियां लगी हुई हैं पर इन संगठनों और इन हस्तियों की चर्चा तक नहीं होती है। इन्हें विदेशी फड नहीं मिलते हैं और न ही देशी सरकारों से फंड मिलते हैं। पर वेटिकन सिटी और अन्य ईसाइयत के संगठनों को न केवल विदेशी फंड मिलते हैं और बल्कि देशी सरकारों से भी करोड़ों-अरबों का फंड मिलता है। भारज में अंधविश्वास को दूर करने और शती प्रथा जैसी हिंसक धार्मिक बुराइयों को समाप्त करने के लिए राजा राम मोहन राय ने बड़ी भूमिका निभायी थी, रामकृष्ण परमहंस और दयानंद सरस्वती ने धार्मिक पाखंड को समाप्त करने के लिए बडी भूमिका निभायी थी। पर क्या रामकृष्ण परमहंस और दयानंद सरस्वती को नोबेल पुरकार मिला था? उत्तर नहीं। पर अधविश्वास के प्रतीक चमत्माकर को स्थापित करने वाले,विदेशी पैसे पर सेवाभाव करने वाले, गुलाम भारत पर एक शव्द भी न बोलने वाले को न केवल नोबल पुरस्कार मिलता है बल्कि वेटिकन सिटी संत भी घोषित कर देता है।

(2) क्या मदर टेरेसा संत थीं?

केथोलिक संप्रदाय के विश्व-गुरु पोप फ्रांसिस आज मदर टेरेसा को संत की उपाधि प्रदान करेंगे। मदर टेरेसा भारतीय नागरिक थीं। इसलिए उन्हें कोई संत कहे और विश्व-स्तर पर कहे तो क्या हमें अच्छा नहीं लगेगा? वैसे भी उन्हें भारत-रत्न और नोबेल पुरस्कार भी मिल चुका है। उनके योगदान पर कई पुस्तकें भी आ चुकी हैं और छोटी-मोटी फिल्में भी बन चुकी हैं।

लेकिन मेरे मन में आज यह जिज्ञासा पैदा हुई कि मालूम करुं कि केथोलिक संप्रदाय में संत किसे घोषित किया जाता है? संत किसे माना जाता है? दो शर्तें हैं। एक शर्त तो यह है कि जो ईसा मसीह के लिए अपना जीवन समर्पित करे और दूसरी यह कि जो जीते-जी या मरने के बाद भी कम से कम दो चमत्कार करे। टेरेसा ने ये दोनों शर्तें पूरी की हैं। इसीलिए पूरी खात्री करने के बाद रोमन केथोलिक चर्च आज उन्हें ‘संत’ की सर्वोच्च उपाधि से विभूषित कर रहा है।

जहां तक ‘चमत्कारों’ की बात है, यह शुद्ध पाखंड है। विज्ञान, विवेक और तर्क की तुला पर उन्हें तोला जाए तो ये चमत्कार शुद्ध अंधविश्वास सिद्ध होंगे। टेरेसा का पहला चमत्कार वह था, जिसमें उन्होंने एक बंगाली औरत के पेट की रसौली को अपने स्पर्श से गला दिया। उनका दूसरा चमत्कार माना जाता है, एक ब्राजीलियन आदमी के मष्तिष्क की कई गांठों को उन्होंने गला दिया। यह चमत्कार उन्होंने अपने स्वर्गवास के 11 साल बाद 2008 में कर दिखाया। ऐसे हास्यास्पद चमत्कारों को संत-पद के लिए जरुरी कैसे माना जाता है? ऐसे चमत्कार सिर्फ ईसाइयत में ही नहीं हैं, हमारे भारत के हिंदू पाखंडी, स्याने-भोपे और बाजीगर भी दिखाते रहते हैं और अपनी दुकानें चलाते रहते हैं।

जहां तक मदर टेरेसा की मानव-सेवा की बात है, उसकी भी पोल उन्हीं के साथी अरुप चटर्जी ने अपनी किताब में खोलकर रखी है। उसने बताया है कि मदर टेरेसा का सारा खेल मानव-करुणा पर आधारित था। वे अपने आश्रमों में मरीजों, अपंगों, नवजात फेंके हुए बच्चों, मौत से जूझते लोगों को इसलिए नहीं लाती थीं कि उनका इलाज हो सके बल्कि इसलिए लाती थीं कि उनकी भयंकर दुर्दशा दिखाकर लोगों को करुणा जागृत की जा सके। उनके पास समुचित इलाज की कोई व्यवस्था नहीं थी और मरनेवालों के सिर पर पट्टी रखकर उन्हें वे छल-कपट से बपतिस्मा दे देती थीं याने ईसाई बना लेती थीं। मरते हुए आदमी से वे पूछ लेंती थीं कि ‘क्या तुमको स्वर्ग जाना है?’ इस प्रश्न के जवाब में ‘ना’ कौन कहेगा? ‘हां’ का मतलब हुआ बपतिस्मा। किसी को दवा देकर या पढ़ाकर या पेट भरकर बदले में उसका धर्म छीनने से अधिक अनैतिक कार्य क्या हो सकता है? कोई स्वेच्छा और विवेक से किसी भी धर्म में जाए तो कोई बुराई नहीं है लेकिन इस तरह का काम क्या कोई संत कभी कर सकता है? 1994 में लंदन में क्रिस्टोफर हिचंस और तारिक अली ने एक फिल्म बनाई, जिसमें मदर टेरेसा के आश्रमों का आंखों देखा हाल दिखाया गया था। हिचंस ने फिर एक किताब भी लिखी। उसमें बताया कि कैसे हैती के बदनाम और लुटेरे तानाशाह ज्यां क्लाड दुवालिए से टेरेसा ने सम्मान और धनराशि भी हासिल की। लंदन के राबर्ट मेक्सवेल और चार्ल्स कीटिंग-जैसे अपराधियों से उन्होंने करोड़ों रु. लिये। उन्होंने आपात्काल का समर्थन किया और भोपाल गैस-कांड पर लीपा-पोती की। धन्य है, मदर टेरेसा, जिनके संत बनने पर हमारे भोले प्रचार प्रेमी नेता वेटिकन पहुंच गए हैं।

 

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Author: Vyasji

I am a senior retired engineer in USA with a couple of masters degrees. Born and raised in the Vedic family tradition in Bhaarat. Thanks to the Vedic gurus and Sri Krishna, I am a humble Vedic preacher, and when necessary I serve as a Purohit for Vedic dharma ceremonies.

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