From: Pramod Agrawal < >
इतिहास का ठुकराया हीरा- वीर छत्रपति शम्भा जी
औरंगजेब को जब यह समाचार मिला तो वह ख़ुशी से झूम उठा था। उसने चार मील की दूरी पर उन शाही कैदियों को रुकवाया था। वहां शम्भा जी और कवि कलश को रंग बिरंगे कपडे और विदूषकों जैसी घुंघरूदार लम्बी टोपी पहनाई गई थी। फिर उन्हें ऊंट पर बैठा कर गाजे बाजे के साथ औरंगजेब की छावनी पर लाया गया था। औरंगजेब ने बड़े ही अपशब्द शब्दों में उनका स्वागत किया था। शम्भा जी के नेत्रों से अग्नि निकल रही थी परन्तु वह शांत रहे थे। उन्हें बंदी ग्रह भेज दिया गया था। औरंगजेब ने शम्भा जी का वध करने से पहले उन्हें इस्लाम काबुल करने का न्योता देने के लिए रूह्ल्ला खान को भेजा था।
नर केसरी लोहे के सींखचों में बंद था। कल तक जो मराठों का सम्राट था आज उसकी दशा देखकर करुणा को भी दया आ जाये। फटे हुए चिथड़ों में लिप्त हुआ उनका शरीर मिटटी में पड़े हुए स्वर्ण के समान हो गया था। उन्हें स्वर्ग में खड़े हुए छत्रपति शिवाजी टकटकी बंधे हुए देख रहे थे। पिता जी पिता जी वे चिल्ला उठे- मैं आपका पुत्र हूँ, निश्चित रहिये,मैं मर जाऊँगा लेकिन…..
लेकिन क्या शम्भा जी …रूह्ल्ला खान ने एक और से प्रकट होते हुए कहाँ.
तुम मरने से बच सकते हो शम्भा जी परन्तु एक शर्त पर।
शम्भा जी ने उत्तर दिया में उन शर्तों को सुनना ही नहीं चाहता। शिवाजी का पुत्र मरने से कब डरता हैं।
लेकिन जिस प्रकार तुम्हारी मौत यहाँ होगी उसे देखकर तो खुद मौत भी थर्रा उठेगी शम्भा जी- रुहल्ला खान ने कहाँ।
कोई चिंता नहीं , उस जैसी मौत भी हम हिंदुओं को नहीं डरा सकती। संभव हैं की तुम जैसे कायर ही उससे डर जाते हो, शम्भा जी ने उत्तर दिया।
लेकिन… रुहल्ला खान बोला वह शर्त हैं बड़ी मामूली। तुझे बस इस्लाम कबूल करना हैं, तेरी जान बक्श दी जाएगी। शम्भा जी बोले बस रुहल्ला खान आगे एक भी शब्द मत निकालना मलेच्छ। रुहल्ला खान अट्टहास लगाते हुए वहाँ से चला गया।
उस रात लोहे की तपती हुई सलाखों से शम्भा जी की दोनों आँखे फोड़ दी गयी, उन्हें खाना और पानी भी देना बंद कर दिया गया।
आखिर ११ मार्च को वीर शम्भा जी के बलिदान का दिन आ गया। सबसे पहले शम्भा जी का एक हाथ काटा गया, फिर दूसरा, फिर एक पैर को काटा गया और फिर दूसरे पैर को काटा गया। शम्भा जी कर पाद विहीन धड़ दिन भर खून की तल्य्या में तैरता रहा था। फिर सायकाल में उनका सर कलम कर दिया गया और उनका शरीर कुत्तों के आगे डाल दिया गया था। फिर भाले पर उनके सर को टांगकर सेना के सामने उसे घुमाया गया और बाद में कूड़े में फेंक दिया गया था।
मरहठों ने अपनी छातियों पर पत्थर रखकर आपने सम्राट के सर का इंद्रायणी और भीमा के संगम पर तुलापुर में दांह संस्कार कर दिया गया। आज भी उस स्थान पर शम्भा जी की समाधी हैं जो की पुकार पुकार कर वीर शम्भा जी की याद दिलाती हैं की हम सर कटा सकते हैं पर अपना प्यारे वैदिक धर्म कभी नहीं छोड़ सकते।