आझाद मैदान
कवी : सुजाता पाटील, पोलिस निरीक्षक
माटुंगा वाहतूक विभाग, मुंबई
हम ना समजे थे बात इतनी सी,
लाठी हाथ मे थी, पिस्टोल कमरपे थी,
गाडीयां फूकी थी, आखे नशीली थी,
धक्का देते उनको, तो वो भी जलते थे,
हम ना समजे थे, बात इतनी सी. *
होसला बुलंद था, इज्जत लुट रही थी,
गिराते एक एक को, क्या जरुरत थी इशारों की?
हम ना समजे थे, बात इतनी सी.
हिम्मत की गद्दारोने, अमर ज्योती को हाथ लगाने की,
काट देते हाथ उनके तो, फ़िर्याद किसी की भी ना होती.
हम ना समजे थे, बात इतनी सी.
भूल गये वो रमझान, भूल गये वो इन्सानियत,
घाट उतार देते एक-एक को,
अरे क्या जरुर्त थी, किसी को डर्रने की,
संगीन लाठी तो आपके ही हाथ मे थी.
हम ना समजे थे, बात इतनी सी.
हमला तो हमपे था, जनता देख रही थी,
खेलते गोलीयों की होली तो,
जरुरत ना पडती, नवरात्री के रावन जलाने की.
रमझान के साथ साथ दिवाली भी होती
हम ना समजे थे, बात इतनी सी.
सांपको दूध पिलाकर
बात करते है हम भाईचारे की,
ख्वाब अमर जवानो के
और जनता भी डरी डरी सी.
हम ना समजे थे, बात इतनी सी.
*This line is by Javed Akhtar
Source: youtube.com/watch?v=fiekTkZqi3Q