मेरा कविता- एक भारतीय का आवाज़


Below poem has some Urdu, and I do not know Urdu.

So, I have failed to pickup some words correctly, or I missed some lines when hearing the poem.

I request please provide correct words or provide any line I missed.

Thanks.

Mera Kavita Ek Bhartiya ka Avaaz

by Sri Hari Om Pawar

Source: http://www.bharatswabhimansamachar.in/?p=1239

मेरा गीत चांद हे, न चांदनी है आजकल

न किसीके चांदकी ये रागनी है आज कल ॥1॥

मे गरीबके घरोंकी आंसूओकी एक आग हुं

भूखमे मजार पर जला हुवा चिराग हुं ॥2॥

मेरा गीत आरती नहिं है राज-पाठकी

कसम साती रे सोये राज् पाठ की ॥3॥

मेरा गीत गरीबोके आंसुओकी आवाझ है

मेरा गीत किसानोके दर्दकी आवाज़ है ॥4॥

भावनाका ज्वार भारी जिये जा रहा हुं मै

ईस क्रोध वाले आंसुओको पीये जा रहा हुं मै ॥5॥

मेरा देश खो गया है लहुके ऊबालमे

कैद हो कर रह गया हुं मै ईस सवालमे ॥6॥

आत्महत्याकी चित्तापर देखकर कीसानको

नींद कैसे आती है देशके प्रधान को ॥7॥

सोचकर ये शोक शर्म से भरा हुवा हुं मै

और मेरे काले धर्मसे (कर्मसे?) डरा हुवा हुं मै ॥8॥

मै तो इस हाथ गुनेगार पाने लगा हुं

ईसलिये मै भूखमरीके गीत गाने लगा हुं ॥9॥

गा रहा हुं इस लिये की ईनकिलाब ला शकुं

झोंपडीके अंधेरेमे आफताब ला सकुं ॥10॥

महेरबानो, भूखकी व्यथा कथा सुनाऊंगा

मेहेश तालीयों के लिये गीत नहीं गाऊंगा ॥11॥

चाहे आम चोच्ते हो ये हुं फिझुल है

किंतु देशका भविष्य हि मेरा उसुल है ॥12॥

क्युं कि आम भूखमरीके त्रासगीसे दूर है

आपने देखी नही है भुखे पेटकी तडप ॥13॥

कालदेवतासे भूखे पेटकी तदप ॥14॥

मैने ऐसे बचपनोकी दास्तान कही है

जहां मा की सुकी छातीयोमे दूध नहीं है ॥15॥

शर्म से भी शर्मनाक जीवन काटते है वे

कुत्ते चाटचुके है वे झुठन चाटते है वे ॥16॥

भूखे बच्चे सो रहे हैं आसमान ओढ कर

मा रोटी कमा रही है पथ्थरों को तोड कर ॥17॥

जिनके प्राण नंगे है जिनके पांव नंगे है

जिन सास सासां उकार्ख़ी उद्धार है ॥18॥

जिनके प्राण पिंदावारी मॄत्यु का गार है

आत्म हत्या कर रहे हैं भूखके शीकार है ॥19॥

भूख आदमीका स्वाभिमान छीन लेती है

भूख जब ली बागी होना खानेकी आवास की ॥20॥

भूख राजाओंके तख्त और ताज छीन लेती है

भूख जलकी बागि होना खानेके आवाम की ॥21॥

मुह की रोटी छीन लेगी देशके निझाम की ॥22॥

शर्मनाक हाथसे पर कोई नही उकारता

को अर्जुनका गांडीव भी नहीं टंकारता ॥23॥

कोईभी चाणक्य चोटी अपनी भी नही खोलता

कोई भीष्म प्रतीज्ञाकी भाषा नहीं बोलता ॥24॥

शर्मनाक हाथसे पर कोई नहीं ऊकता ॥25॥

कहीं कहीं गोदामोमें गेहुं सडा हुवा है

कहीं दाने दाने का अकाल पडा हुवा है ॥26॥

झीकी की झोपडीमे भूखे बच्चे बिलगिलाते है

जेलों मे आतन्कियोंको बिर्यानि खिलाते है ॥27॥

भूखका निदान झूठे वायदों मे नही है

सिर्फ पूंजीवादीयोके फायदोमे नहीं है ॥28॥

भूखका निदान जादु टोने से नहीं हुवा

दक्षिण और वाम दोनो पन्थोसे नहीं हुवा ॥29॥

भूखका निदान कर्णधारोसे नहीं हुवा

गरीबी हटाओ जैसे नारों से नहीं हुवा ॥30॥

भूख का निदान पैसा असंका कर्म है

बरीबोंकी देखभाल सिंघासन कर्म है ॥31॥

ईस वचनकी पालनामें जो किसीका चूक हो

उसके साथ मुजरीमोके जैसाही सलुक हो ॥32॥

भूखसे कोई मरे ये हत्याके समान है

हत्याओं के लिये मृत्यु दंडका विधान है ॥33॥

कानूनी किताबोमे सुधार होना चाहिये

भूखका किसीको जिम्मेदार होना चाहिये ॥34॥

भूखों के लिये हो कानून, मानता हुं मै

समर्थनमे जनताका झनून मानत हुं मै ॥35॥

खुदकुशिया मौतका जल भूखमरी आधर हो

ऊस जिल्लेका जिलाधीश सीधे जुम्मेदार हो ॥36॥

वहां कहे एम एल ए एम पी जिम्मेदार हो

क्योंकि हे जिमा रहे मे पहेरेदार हो ॥37॥

चाहे नेता अफसरोकी लोबीयां क्रुद्ध हो

हत्याका मुकदमा ईनकी नौकरी विरुद्ध हो ॥38॥

खुदा करे कि आज कोई खुदकुशी नहीं करे

दुवा करो कि आज कोई भूखसे नहीं मरे ॥39॥

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Author: Vyasji

I am a senior retired engineer in USA with a couple of masters degrees. Born and raised in the Vedic family tradition in Bhaarat. Thanks to the Vedic gurus and Sri Krishna, I am a humble Vedic preacher, and when necessary I serve as a Purohit for Vedic dharma ceremonies.

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