श्री दयानन्द सरस्वती का मे सन्मान करता हु।

किन्तु वो मूर्ती पूजा को सही तरह समज़ नहि पाये।

जैसे बहुत लोग अपने पाकेट मे और् घर मे अपने प्रिय मनुष्य का फोतो रखते है – जो 2D है वैसे हि घरमे व मन्दिरमे हिन्दु लोग अपने प्रिय भगवान की मूर्ती रखते है जो 3D है। मूर्ति पूजा करनेवाले भक्त वास्तवे मे मूर्ति के पत्थर या धातु की पूजा नहि करते है , किन्तु मूर्ति उनको उनमे प्रिय भगवान की याद दिलाती है। मूर्ति को देख भक्त को भगवान की यादा आती है और वो प्रेमसे मग्न हो जाता है। भक्त को देखने वाले को केवल भक्त का शरीर हि दिखता है। भक्त मन और् हृदय मे क्या हो रहा है वो नहि दिखता। इसी लिये भक्त मीराबाई ने गाया है
“ए री मे तो प्रेमदिवानी मेरा दरद न जाने कोई।”
कोई मूर्ति पूजा न करे तो ईसमे कोई हिन्दू को कोई आपत्ति नहि है।
इसी तरह कोई मूर्तिपूजा करे तो इसमे किसी को कोई भी आपत्ति नहि होनी चाहिये।
ईसलिये आर्यसमाजी लोग मूर्तीपूजा करनेवालों की टीका करना छोड दे तो हिन्दू सन्गठन अच्छा रहेगा।
ईस्लाम मूर्तिपूजा करने वालो का दुश्मन है।
किन्तु मूर्तिपूजा न करनेवालो बिनमुस्लिमो का भी दुश्मन है।
कुरान तर्क या बुद्धि का उपयोग करना नहि सिखाता है।
ईसलिये मुसलमानो से बुद्धि या सही तर्क से बात करना उनको बदलने का व्यर्थ प्रयास है।
जय श्री कृष्ण

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