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भारत और वृहत्तर भारत का सेतु-उत्तर पूर्व
सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक वैभव का अदभुत खजाना

भारत का उत्तर पूर्व का क्षेत्र शायद इस देश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षेत्र है| प्राकृतिक संपदा तथा सांस्कृतिक वैभव का जैसा असीम भंडार यहॉं बिखरा पड़ा है, वैसा इस देश में ही नहीं, शायद पूरी दुनिया में अन्यत्र दुर्लभ है| यहॉं विभिन्न कुलों की अनगिनत भाषाएँ, अनगिनत लोग तथा अनगिनत संस्कृतियॉं ऐसा बहुरंगी वितान रचती हैं कि देखने समझने वाला मोहित होकर रह जाता है| दक्षिण पूर्व एशियायी क्षेत्र के लिए तो यह भारतीय संस्कृति का न केवल मुख्य द्वार बल्कि एक संगम स्थल है| इस छोटे से क्षेत्र में २२० से अधिक नस्ली समूहों के लोग निवास करते हैं, और जितनी नस्ल, उतनी भाषाएँ और उतनी ही संस्कृतियॉं| प्रकृति ने तो मानो अपना पूरा खजाना ही यहॉं बिखेर दिया हो| अकेले इस क्षेत्र में ५१ प्रकार के वन और असंख्य प्रकार की पादप जातियॉं हैं| नदियों, पहाड़ों, झरनों से भरा यह प्रदेश प्रागैतिहासिक काल से लेकर आज तक की नवीनतम संस्कृतियों को अपने में समेटे है|

भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र की ब्रह्मपुत्र घाटी का सांस्कृतिक व राजनीतिक इतिहास लगभग उतना ही पुराना है जितना कि पश्‍चिमी भारत की सिंधु घाटी, मध्य भारत की गंगा-नर्मदा घाटी तथा दक्षिण भारत की कृष्णा-कावेरी घाटी का है| यह क्षेत्र दक्षिण एशिया की मध्य भूमि से कुछ अलग-थलग रहा है इसलिए यह इतिहास में उसके समकक्ष स्थान नहीं बना सका, किंतु यदि यथार्थ की भूमि पर तुलना की जाए तो यह क्षेत्र अपनी विविधता में दक्षिण एशियायी किसी भी अन्य क्षेत्र से कहीं अधिक समृद्ध है| यह वास्तव में हिमाचल के दक्षिण व उत्तर एवं ब्रह्मपुत्र के पूर्व एवं पश्‍चिम की तमाम नस्लों, भाषाओं तथा संस्कृतियों का संगम स्थल रहा है| चीन से भारत तक सबसे अधिक व्यवहृत सांस्कृतिक राजमार्ग इसी क्षेत्र से होकर गुजरता रहा है| इस क्षेत्र ने प्रहरी का भी काम किया है और सेतु का भी| प्राकृतिक वैभव में तो यह विश्‍व का अद्वितीय क्षेत्र है ही, सांस्कृतिक व भाषाई विविधता में भी इसका एक कीर्तिमान है| इसके करीब २ लाख ६२ हजार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में करीब २२० नस्ली समूहों के लोग निवास करते हैं, जिनकी लगभग इतनी ही भाषाएँ हैं| इसके ८ राज्यों (आसाम, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर तथा सिक्किम) के पहाड़ी क्षेत्रों में आदिवासियों के एक साथ जितने नमूने  देखे जा सकते हैं, उतने अन्यत्र दुर्लभ हैं| इनके अलावा इतिहास के विभिन्न कालखंडों में तिब्बत, बर्मा (म्यांमार), थाईलैंड, पश्‍चिम बंगाल तथा बंगलादेश से आए तमाम लोग यहॉं बसे हुए हैं जो अपने साथ अपनी भाषा, संस्कृति भी लेकर आए हैं| यदि कुछ नस्लों या जातियों के नाम गिनाए जाएँ तो शायद इनका कुछ अंदाजा लगे| इस क्षेत्र की मुख्य नस्लों या जातियों में- असमी, नोआतिया, जमातिया, मिजो, रियांग, नगा, लुसाई, बंगाली, चकमा, भूटिया, बोडो, ढिमसा, गारो, गुरुंग, हजार, बियाटे, हाजोंग, खम्प्ती, करबी, खासी, कोच राजबोंग्सी (राजबंशी), कुकी, लेप्चा, मेइतेई, मिशिंग, चेत्री, नेपाली, पाइती, प्नार, पूर्वोत्तर मैथिली, रमा, सिग्फो, तमांग, तिवा त्रिपुरी तथा जेमे नगा आदि की गणना की जाती है|
२००१ की जनगणना के अनुसार इस क्षेत्र में करीब तीन करोड़ नब्बे लाख लोग निवास करते हैं जो भारत की कुल जनसंख्या के मात्र ३.८ प्रतिशत हैं| इसमें से करीब ६८ प्रतिशत जनसंख्या (२ करोड़ ६६ लाख से अधिक) अकेले आसाम में रहती है| आसाम में जनसंख्या का घनत्व प्रति वर्ग किलोमीटर १३ से लेकर ३४० तक है| पूरे क्षेत्र में अनुसूचित जनजातियों की संख्या १६० है| पूरे क्षेत्र की ८४ प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर निर्भर है और गांवों में रहती है| इस क्षेत्र में शिक्षा की दर (६८.५ प्रतिशत) देश के बाकी हिस्सों की दर (६१.५ प्रतिशत) से कहीं आगे है| जाहिर है इसके लोगों को आदिवासी या जनजातीय समुदाय वाला कहने से यह अनुमान नहीं लगाना चाहिए कि वे निरक्षर, अज्ञानी तथा असहाय लोग हैं| वे पूरे देश के औसत जनसमुदाय के मुकाबले कहीं अधिक शिक्षित, जागरूक तथा प्रगतिशील हैं|
इस क्षेत्र का प्राचीन इतिहास रामायण एवं महाभारत काल से जुड़ा है|  महाभारत की कथा से लगता है कि ईसा के पूर्व यहॉं निश्‍चय ही कोई बड़ा साम्राज्य रहा होगा| महाभारत व रामायण में इस क्षेत्र के दो नाम मिलते हैं- प्राग्ज्योतिषपुर और कामरूप| प्राग्ज्योतिषपुर नरेश नरकासुर की कहानियॉं पुराणों में अति प्रसिद्ध हैं| इस असुर नरेश को कृष्ण ने युद्ध में मारा था और उसकी कैद से १६१०० राज कन्याओं को मुक्त कराया था| इस नरेश के बेटे भगदत्त ने महाभारत युद्ध में कौरवों के पक्ष में युद्ध किया था| आसाम का पहला ज्ञात ऐतिहासिक साम्राज्य ‘कामरूप’ के नाम से जाना जाता है| यह साम्राज्य ईसवी सन् ३५० से लेकर ११४० तक करीब ८०० वर्षों तक कायम रहा, जिसके दौरान तीन राजवंशों ने शासन किया| कामरूप का प्रथम पुरातात्विक साक्ष्य चौथी शताब्दी के गुप्त नरेश समुद्र गुप्त के इलाहाबाद प्रस्तर स्तंभ लेख में मिलता है| ७वीं शताब्दी में भारत आए चीनी यात्री ह्वेन त्सांग के समय कामरूप पर भास्करवर्मन का  शासन था| बौद्ध धर्म की महायान शाखा उसके साथ ही यहॉं पहुँची थी| उसके पहले बौद्ध धर्म का प्राचीन हीनयान संप्रदाय ही यहॉं प्रचलित था| १०वीं शताब्दी में रचित माने जाने वाले कालिकापुराण में कामरूप की पूर्वी सीमा पर ताम्रेश्‍वरी देवी के मंदिर का जिक्र किया गया है (पूर्वांत कामरूपस्य देवी दिक्कार वासिनी)| १२वीं शताब्दी के बाद इस साम्राज्य का तो अंत हो गया, लेकिन कामरूप राज्य बना रहा| १५वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में इस राज्य पर हमला करने वाले अलाउद्दीन हुसैन शाह के सिक्के पर ‘कामरू’ या ‘कामरूद’ नाम

है| आज भी इस नाम का जिला (कामरूप) यहॉं विद्यमान है|
अत्यंत प्राचीन काल से यह क्षेत्र पूर्वी एशिया के देशों के साथ भारत को जोड़ने का प्रधान सेतु था| इधर से होकर ही भारतीय सभ्यता और संस्कृति लाओस, कंबोडिया व वियतनाम तक पहुँची| भारतीय व्यापारी यों समुद्री मार्ग का भरपूर उपयोग करते थे, किंतु थलमार्ग सबके लिए सर्वाधिक सुभीते का मार्ग था| चीनी अन्वेषक चांग किन ने करीब एक सौ वर्ष ईसा पूर्व में पहली बार इस क्षेत्र का जिक्र किया है|

त्तर पूर्व के ये राज्य प्रकृति के अद्भुत वरदान से संपन्न हैं| जैव विविधता की दृष्टि से यह दुनिया के सर्वाधिक संपन्न इलाकों में से एक है| इस इलाके में ५१ प्रकार के वन हैं, जिन्हें मोटे तौर पर ६ बड़े वर्गों में बांट दिया गया है| ये है- १. उष्ण कटिबंधीय नम पर्णपाती (जिनकी पत्तियॉं पतझड़ में झड़ जाती हैं) वन, २. उष्ण कटिबंधीय अर्ध सदाबहार (सेमी एवर ग्रीन) वन, ३. उष्ण कटिबंधीय बरसाती सदाबहार वन, ४. उप उष्ण कटिबंधीय वन, ५. शुष्क वन तथा ६. अल्पाइन वन| भारत की ९ प्रमुख पादप प्रजातियों में से ६ उत्तर पूर्वी क्षेत्र में पाई जाती हैं| पुष्पित होने वाले पौधों की ८० हजार प्रजातियों में से १५००० प्रजातियॉं यहॉं के राज्यों में पाई जाती हैं| सर्वाधिक पुष्पीय पादप प्रजातियॉं (५०००) अरुणाचल प्रदेश में उपलब्ध हैं| उसके बाद दूसरा स्थान सिक्किम (४५००) का है| भारत के ‘बॉटनिकल सर्वे विभाग द्वारा जारी पुस्तिका (रेड डाटा बुक) के अनुसार इस देश के १० प्रतिशत पुष्पीय पादप विलुप्ति के कगार पर हैं| खतरे में पड़े कुल करीब १५०० पुष्पीय पादपों में ८०० उत्तर पूर्व भारत में हैं| उत्तर पूर्व भारत ‘भारत बर्मा’ ‘हाट स्पॉट’ का हिस्सा है| यह २५ ‘हाट स्पॉट’ में मेडीटेरेनियन बेसिन के बाद दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र है| इस क्षेत्र में ६ बड़े संरक्षित वन या राष्ट्रीय उद्यान है|
भाषा की दृष्टि से इस क्षेत्र की भाषा के तीन मुख्य विभाग कर सकते हैं| एक तो असमिया, दूसरी ‘तिब्बती बर्मन’ भाषाएँ और तीसरी बंगला| असमिया के उपयोग का पहला प्रमाण ९०० ईसवी से मिलता है| बौद्ध ‘चर्या पद’ में इसका उल्लेख आया है| वैसे त्रिपुरा में बंगला भाषा का वर्चस्व है| त्रिपुरा के रियासत की राजकाज की भाषा बंगला थी, क्योंकि पूर्वी बंगाल में त्रिपुरा के राजा की जमींदारी थी| त्रिपुरा में बंगलादेशी घुसपैठ ने भी बंगला वर्चस्व को बढ़ाया| आज की स्थिति में बंगलादेशी मुसलमानों ने त्रिपुरा के मूल निवासियों को अल्पसंख्यक बना दिया है| आसाम के भी एक तिहाई लोगों की भाषा बंगला है| नागालैंड, मणिपुर तथा अरुणाचल में भी बंगला भाषी लोग बसे हैं| मेघालय को उत्तर पूर्व भारत का स्कॉटलैंड कहा जाता है, यहॉं भी बंगला का अच्छा खासा प्रभाव है| अन्य प्रमुख भाषाएँ हैं- नागा, मणिपुरी, मिजो, काकबोरोव, खसिया और अरुणाचली|
आइए उत्तर पूर्व क्षेत्र के इन राज्यों के सांस्कृतिक जीवन पर अलग-अलग एक उड़ती नजर डाल लें|

आसाम
आसाम को पूर्वोत्तर भारत का प्रवेश द्वार कहा जाता है| यों इस क्षेत्र के कुछ इलाकों को छोड़ दें, तो लगभग पूरा उत्तर पूर्व आसाम ही है| आसाम के सांस्कृतिक व भाषाई वैविध्य को एक छोटे आलेख में समेट पाना प्रायः असंभव है| यहॉं मंगोलियन, ईडो-ईरानी, इंडो बर्मीज, तिब्बतो-बर्मी नस्लों और इनके भाषा समूहों के लोग परस्पर गुंथे हुए है| उनकी मूल संस्कृतियों व भाषाओं के साथ उनके मिश्रण से बनी भाषा-संस्कृतियों की भी अच्छी व्याप्ति है|

इस राज्य में असमिया भाषा बोलने वालों हिंदुओं की संख्या लगभग २ तिहाई है| राज्य में करीब १६ प्रतिशत आदिवासी जनजाति के लोग है| यहॉं बाहरी क्षेत्रों से आए लोगों की संख्या ४० प्रतिशत से अधिक है| मैदानी जनजाति में बोडो की संख्या सबसे बड़ी है| ये हिंदू मतावलंबी हैं| यह क्षेत्र बार-बार मुगलों के हमले का शिकार हुआ| कहा जाता है कि इस क्षेत्र पर उनके १७ हमले हुए, लेकिन यहॉं कि निवासियों ने अपनी संस्कृति और स्वायत्तता को बचाए रखा| आज भी बहुसंख्यक असमी हिंदू वैष्णव हैं| हॉं बाहरी घुसपैठ के कारण मुस्लिमों की जनसंख्या एक चौथाई से भी अधिक हो गई है|
आसाम अपने कला कौशल, संगीत, नृत्य आदि में भी बहुत समृद्ध है| रेशमी व सूती वस्त्र, धातुओं तथा बॉंस और बेंत की वस्तुओं के निर्माण में असमी अत्यंत कुशल हैं| चित्रकला की तो यहॉं बहुत पुरानी परंपरा है| ७वीं शताब्दी में यहॉं आए चीनी यात्री ह्वेन-सांग ने इसका जिक्र किया है| कामरूप के राजा भास्कर वर्मन ने कई चित्र पटि्टकाएँ व कलात्मक वस्तुएँ मध्य देश के सम्राट हर्षवर्धन को भेंट की थी| यहॉं के नृत्य-संगीत की विश्‍व भर में प्रसिद्धि है| आसाम का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार बिहू है| यह नाचने गाने, खाने पीने और मौजमस्ती करने का त्यौहार है, जो पूरे आसाम में मनाया जाता है| दुनिया में जहॉं कहीं भी कोई असमी समुदाय हो वह बिहू अवश्य मनाता है|

यह शायद कम लोगों को मालूम हो बिहू के तीन त्यौहार होते हैं| मकर संक्रांति के अवसर पर मध्य जनवरी या माघ के महीने में माघी बिहू मनाया जाता है| इसे ‘भोगाली बिहू’ भी कहते हैं| भोगाली माने भोग करना यानी खाना पीना| इसके पूर्व कार्तिक मास यानी अक्टूबर के मध्य में ‘कंगाली बिहू’ मनाया जाता है| कंगाली यानी गरीबी| यह वह अवसर होता है, जब अभी नई फसल तैयार नहीं रहती और पुराने अनाज के भंडार खाली हो चुके रहते हैं| तीसरा बीहू अप्रैल के मध्य बोहाम (यानी बैसाख) के महीने में मनाया जाता है| इसे बोहागी यो रोंगाली (रंगीन) बिहू कहा जाता है| इन तीनों में सबसे महत्वपूर्ण बैसाख का रोंगाली बिहू है| यह पूरे बैसाख भर चलता है| इसमें बिहू नृत्य की प्रतियोगिताएँ होती हैं तथा ‘बोहागी कुंवरि’ का चयन किया जाता है| यहॉं के बोडो जनजाति का समूह नृत्य भी बहुत प्रसिद्ध है, लेकिन बिहू ऐसा उत्सव है, जिसमें लगभग पूरा असमी समाज आज शामिल हो जाता है|
मेघालय
२१ जनवरी १९७२ को आसाम के दो जिलों – खासी हिल्स और जयंतिया हिल्स – के साथ गारो हिल्स को मिलाकर मेघालय राज्य का निर्माण किया गया| १९वीं शताब्दी में इस पूरे क्षेत्र पर अंग्रेजों का आधिपत्य कायम होने के पूर्व खासी, गारो एवं जयंतिया जनजातियों का अपना स्वतंत्र राज्य था| १८३५ में ब्रिटिश शासन ने मेघालय को आसाम में शामिल कर लिया| स्वतंत्रता प्राप्ति के समय १९४७ में मेघालय आसाम के दो जिलों तक सीमित था और उसे आसाम राज्य के अंतर्गत सीमित स्वायत्तता प्राप्त थी| मेघालय में खासी जनजाति सबसे अधिक संख्या में है| दूसरा स्थान गारो जातियों का है| नागालैंड एवं मिजोरम के बाद मेघालय तीसरा ऐसा राज्य है, जो ईसाई बहुल है| यहॉं की ७०.३ प्रतिशत जनसंख्या ईसाई है| हिंदुओं का स्थान दूसरा (१३.३ प्रतिशत) है और एक अच्छी खासी संख्या प्रकृति पूजकों की है| १९९१ में जब यहॉं ईसाइयों की संख्या अभी ६५ प्रतिशत (करीब ११ लाख) ही थी तभी उन्होंने इसे एक ईसाई राज्य घोषित कर दिया|

मेघालय की एक उल्लेखनीय बात है कि यहॉं की अधिकांश जनजातियॉं मातृसत्तात्मक हैं| यहॉं वंश परंपरा तथा उत्तराधिकार स्त्रियों से चलता है| यह परंपरा थोड़े भेद से खासी, जयंतिया एवं गारो तीनों में प्रचलित है| यहॉं परिवार की छोटी बेटी सारी संपत्ति की उत्तराधिकारिणी होती है और परिवार के बूढ़े तथा बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी उसकी ही होती है|

स क्षेत्र का नाम ही मेघालय है, जाहिर है बादलों का सबसे दीर्घकालीन डेरा यहॉं रहता है| देश में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी इसी राज्य में स्थित है| नृत्य संगीत सभी जनजातियों की जीवनशैली का अनिवार्य अंग है तो मेघालय भी उसका अपवाद नहीं है|

नागालैंड
नागालैंड लगभग पूरा पहाड़ी क्षेत्र है| साहसी पर्यटकों के लिए बड़ी शानदार जगह है| इस राज्य को उत्तर पूर्व का स्विटजरलैंड कहा जाता है| ‘नागा’ यह नाम उन्हें मैदानी लोगों ने दिया है| शायद पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण उन्हें यह नाम मिला| संस्कृत में पहाड़ को नग भी कहते हैं, इसलिए वहॉं रहने वाले नागा हो गये| नागाओं की १६ जातियॉं (ट्राइब्स) हैं| सबके अलग-अलग परिधान हैं, जिनसे उनकी पहचान हो जाती है| इनके रंगीन कपड़े ज्यादातर मोटे ऊन के बने होते हैं, लेकिन उनकी खूबसूरती दर्शनीय होती है| ये अपने साथ कुछ हथियार भी रखते हैं, जो परिधान के ही अंग बन जाते हैं|
नागालैंंड का लिखित इतिहास (रिकार्डेड हिस्ट्री) १९वीं शताब्दी से मिलता है, जब ब्रिटिश यहॉं आए| नागालैंड अपने ‘कोहिमा वार’ के लिए भी प्रसिद्ध है| उत्तर-पूर्वी भारत की यही वह जगह है, जहॉं द्वितीय विश्‍व युद्ध के दौरान १९४४ में जापानी फौजों को रोका गया था| यह युद्ध ४ अप्रैल से २२ जून १९४४ तक चला था| जापानियों को मिली निर्णायक हार के कारण इसे पूर्व का स्टालिन गार्ड भी कहा जाता है| इस क्षेत्र में अंग्रेजों के समय से ही अमेरिकी व यूरोपीय ईसाई मिशनरियॉं यहॉं सक्रिय हो गई थीं, इसलिए यह राज्य ईसाई बहुल है और यहॉं की मुख्य भाषा अंगे्रजी है| राज्य में साक्षरता का स्तर ६० प्रतिशत से ऊपर है|

इस राज्य की जनसंख्या करीब २० लाख है| १ दिसंबर १९६३ को यह आसाम से अलग होकर एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया| नागा एक सरल लेकिन बहादुर जाति है| अंगे्रजों ने प्रथम विश्‍व युद्ध में उन्हें अपनी सेना में भर्ती किया था और फ्रांस भेजा था| बाहर निकलने के अनुभवों से नागाओं में एक नई चेतना आई| सेना में भर्ती होकर फ्रांस गये नगा युवक जब १९१८ में वापस लौटे, तो उन्होंने नागा नेशनलिस्ट आंदोलन प्रारंभ किया| देश जब स्वतंत्र हुआ और नागा क्षेत्र भारत राष्ट्र का अंग बन गया, उस समय भी यह आंदोलन जारी था| फिजो उस समय (१९४७ में) नागा नेशनल कौंसिल के अध्यक्ष थे| आंदोलन तेज होने पर १९५५ में वहॉं सेना भी भेजनी पड़ी| बाद में सरकार के साथ समझौता हो गया और १९६६ में वह एक अलग राज्य बन गया|
नागा लोग सुंदर और मिलनसार प्रकृति के होते हैं| देहयष्टि पर मंगोल प्रभाव स्पष्ट है, लेकिन इनकी आँखें मंगोलों जैसी नहीं होती| वे बादाम के आकार की होती है| नागा नाचने गाने के शौकीन तथा उत्सव प्रिय होते हैं|

मिजोरम
मिजोरम देश का अकेला राज्य है, जहॉं कोई बेघर नहीं है| यहॉं साक्षरता की दर केरल के बाद सबसे ऊँची ९५.६८ प्रतिशत से ऊपर है| स्वच्छता का स्तर भी करीब ९३.४ प्रतिशत है| शहरीकरण में मिजोरम देश में दूसरे स्थान पर है| छोटे से राज्य में २२ शहर या कस्बे हैं| मिजोरम शब्द का अर्थ है पहाड़ी लोगों का घर (मी-लोग, जो-पहाड़ी, रम-देश)| मिजोरम पहाड़ियों का ‘मोजैक’ है| २१ बड़ी पहाड़ियॉं हैं, बीच-बीच में छोटे-छोटे मैदान हैं| यहॉं की सबसे बड़ी नदी छिमतुई पुई है, जो बर्मा के चिन राज्य से निकलती है और मिजोरम के क्षेत्र से होते हुए फिर बर्मा (म्यांमार) में प्रवेश कर जाती है और वहॉं से बंगाल की खाड़ी में जा गिरती है| इस नदी का बड़ा व्यापारिक महत्व है| म्यांमार के साथ व्यापार में इसे जलमार्ग की तरह इस्तेमाल किया जाता है|

मिजो लोग मूलतः कौन हैं, कहॉं से आए  इसका कोई ठीक-ठीक पता नहीं| उत्तर पूर्व की तमाम जनजातियों की तरह इनका भी इतिहास अंधेरे की चादर में ढका है| १८वीं शताब्दी की          कहानियॉं स्थानीय कबीला सरदारों के एक-दूसरे पर हमले  से जुड़ी हैं| ‘ब्रिटिश इंडिया’ ने पहली बार एक घोषणा पत्र जारी करके १८९५ में मिजो
पहाड़ी क्षेत्र को ब्रिटिश राज्य का अंग बना लिया| १८९८ में उत्तर और दक्षिण की पहाड़ियों को मिलाकर ‘लुसाई हिल्स’ जिले का निर्माण हुआ और अइजवाल इसका मुख्यालय बना| १९५२ में पहली बार ‘लुसाई हिल्स आटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट कौंसिल’ की स्थापना हुई| इसके द्वारा सरदारों (चीफटेन्स) की परंपरा का अंत हो गया| इस कौंसिल से स्थानीय लोगों की आकांक्षा पूरी होनेे वाली नहीं थी, इसलिए लोगों ने १९५४ में ‘राज्य पुनर्गठन आयोग’ से अपील की कि वह त्रिपुरा और मणिपुर के मिजो बहुल इलाके को लेकर उनका अलग राज्य बनाए| राज्य पुनर्गठन आयोग से असंतुष्ट मिजो नेताओं ने १९५५ में ‘ईस्टर्न इंडिया ट्राइबल यूनियन’ (इआईटीयू) नामक एक संगठन बनाया, जिसने आसाम के पूरे पहाड़ी क्षेत्रों को मिलाकर एक राज्य बनाने की मांग की| १९५९ में मिजो क्षेत्र में भारी अकाल पड़ा| मिजो इतिहास में इसे ‘मौतम अकाल’ के नाम से जाना जाता है| इस अकाल का कारण बॉंस  के जंगलों का फूलना-फलना था| बॉंस के जंगल करीब ५० साल में एक बार फूलते हैं और उसमें भारी मात्रा में चावल जैसे बीज निकलते हैं| ये चावल काफी पौष्टिक होते हैं| इस चावल के कारण जंगल में काले रंग वाले चूहों की बाढ़ आ गई| ये चूहे गॉंवों की सारी फसल चट कर गये, जिससे भारी अकाल पड़ा| लोग बाहर भागने लगे| कुछ जंगल की जड़ व पत्तियॉं खाने को मजबूर हुए और बड़ी संख्या में लोग भोजन के अभाव में मौत के शिकार हुए| इस दौरान लोगों की सहायता करने के लिए कई संगठन बने| ‘मिजो कल्चरल सोसायटीफ नामक एक संगठन बहुत पहले १९५५ में बना था, जिसके नेता लाल डेंगा थे| १९५९-६० के अकाल के दौरान इसने अपना नाम बदलकर ‘मौतम फ्रंट’ कर लिया| अकाल पीड़ितों को राहत पहुँचाने में इस संगठन ने बड़ी भूमिका अदा की| सितंबर १९६० में इस संगठन ने अपना नाम ‘मिजो नेशनल फेमिन फ्रंट’ रखा| इस फ्रंट ने सहायता कार्य में काफी लोकप्रियता अर्जित की| बाद में लाल डेंगा ने इसमें से ‘फेमिन’ शब्द हटा दिया और २२ अक्टूबर १९६१ को ‘मिजो नेशनल फ्रंट’ के नाम से एक संगठन सामने आया, जिसके नेता लाल डेंगा थे और जिसका लक्ष्य था ‘स्वतंत्र ग्रेटर मिजोरम’ की स्थापना| इसने अपनी मॉंग मनवाने के लिए २८ फरवरी १९६६ से सरकार के विरुद्ध हिंसक आंदोलन शुरू किया| इस फ्रंट ने अइजवाल सहित तमाम शहरों, कस्बों में स्थित सरकारी भवनों, प्रतिष्ठानों पर ऐसा हमला किया कि भारत सरकार को अपनी वायु सेना का इस्तेमाल करना पड़ा| सेना के तूफान और हंटर जेट विमानों ने दो दिन बमबारी की| १९६७ में मिजो नेशनल फ्रंट को गैर कानूनी संगठन घोषित कर दिया गया| इसके बाद अलग राज्य की मांग और तेज हो गई| १९७१ ‘मिजो डिस्ट्रिक्ट कौंसिल’ का प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से मिला और मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग की| इंदिरा गांधी सरकार ने उन्हें केंद्र शासित राज्य का दर्जा देने का प्रस्ताव किया| लाल डेंगा ने इस शर्त पर इसे मान लिया कि आगे फिर पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया जाएगा| २१ जनवरी १९७२ को मिजोरम केंद्र शासित राज्य बना| और फिर राजीव गांधी के शासनकाल में २० फरवरी १९८७ को उसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिला| इसके बाद से मिजोरम अब एक शांत क्षेत्र है|

यह जानना रोचक होगा कि मिजो जीवनशैली सामाजिक जीवन का एक आदर्श है| उनका एक विशेष धर्म है, जिसमें दया, करुणा, निस्वार्थ सेवा, उदारता तथा अपने पूरे समाज के प्रति समभाव का व्यवहार अनिवार्य कर्तव्य है| मिजो दूसरों के हित में आत्म बलिदान को श्रेष्ठ सामाजिक मूल्य मानते हैं| मिजो परस्पर बड़ी सघनता के साथ जुड़ा समाज है| वहॉं लैंगिक भेदभाव नहीं है| पूरा गॉंव एक बड़े परिवार की तरह व्यवहार करता है| जन्म, मृत्यु, विवाहादि में पूरा गॉंव शामिल होता है| गीत, संगीत, नृत्य में भी उनकी गहरी रुचि है| वे बिना वाद्य यंत्रों के भी ताली की आवाज पर गा लेते हैं| करीब ८७ प्रतिशत मिजो ईसाई हैं, क्योंकि ईसाई मिशनरियॉं यहॉं १९वीं शताब्दी के अंतिम चरण में ही पहुँच गई थीं| इस क्षेत्र के लोग ज्यादातर प्रकृति पूजक थे| उन्हें ईसाइयत की तरफ मोड़ना आसान था| दूसरा स्थान बौद्धों (करीब ८ प्रतिशत) का है| हिंदू ३.५५ प्रतिशत हैं और राज्य में उनकी कहीं कोई पहचान नहीं है|

त्रिपुरा
महामाया त्रिपुर सुंदरी की भूमि त्रिपुरा देश का तीसरा सबसे छोटा राज्य (१०,४९२ वर्ग किमी) है, जो तीन तरफ से बंगलादेश से घिरा है, केवल    इसके पूर्व में इसकी सीमा आसाम एवं मिजोरम से जुड़ती है| आधुनिक त्रिपुरा प्राचीन त्रिपुरी राज्य का हिस्सा है| भारत में ब्रिटिश राज के समय यह एक स्वतंत्र रियासत थी| १९४९ में यह भारत में शामिल हुआ और इसे केंद्र शासित राज्य का दर्जा मिला| त्रिपुरा भारत का इतिहास प्रसिद्ध क्षेत्र है| इसका जिक्र रामायण, महाभारत के साथ अशोक के अभिलेख में भी मिलता है| इसका पुराना नाम ‘किरात’ राज्य है| त्रिपुरा के राजवंश की एक लंबी परंपरा है| ‘राजमाला’ (पंद्रहवी शताब्दी का ग्रंथ) में १७९ राजाओं का वर्णन है| १३वीं शताब्दी से यहॉं मुस्लिम हमले शुरू हो गये| अंततः १७३३ में इसके मैदानी क्षेत्र पर मुगल प्रभुत्व कायम हो गया, किंतु पहाड़ी क्षेत्र कभी मुगलों के आधिपत्य में नहीं आया| देश के स्वतंत्र होने पर १९४७ में ब्रिटिश इंडिया का त्रिपुरा जिला पूर्वी पाकिस्तान में शामिल हो गया, किंतु पहाड़ी त्रिपुरा १९४९ तक स्वतंत्र रहा|

त्रिपुरा की सीमाएँ बार-बार बदलती रही हैं| इसकी जनसंख्या का बड़ा हिस्सा बंगलाभाषियों का है, जो देश के विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान से शरणार्थी के रूप में आए| विभाजन के परिणामस्वरूप इस क्षेत्र की पूरी अर्थव्यवस्था चौपट हो गई| अपने ही देश में नगरों के बीच दूरियॉं बढ़ गईं| कलकत्ता से अगरतला के बीच सड़क मार्ग की जो दूरी विभाजन के पहले ३५० किमी थी, वह विभाजन के बाद १७०० किमी हो गई| १९७१ के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद २१ जनवरी १९७२ को मेघालय और मणिपुर के साथ त्रिपुरा को भी पूर्ण राज्य का दर्जा मिला|

त्रिपुरा एक मिश्रित संस्कृति वाला राज्य है| गैर आदिवासी संस्कृतियों में बंगला संस्कृति की प्रधानता है| बंगला साहित्य का भी बड़ा समादर है| यहॉं के राजा के राजकाज की भाषा बंगला ही थी, इसलिए बंगला को पूरा राज्याश्रय मिला| त्रिपुरा के संगीत, नृत्य के भी अनेक रूप है॥ यहॉं की वेशभूषा भी रंगीन और आकर्षक है| यहॉं की एक अत्यंत रोचक वस्तु है चट्टानों पर उत्कीर्ण असंख्य मूर्तियॉं, जो ज्यादातर शिव की है| कहा जाता है कि ऊनाकोटि में एक कम एक करोड़ ऐसी मूर्तियॉं हैं| इसको किसने बनाया, ये कैसे बनी  इसको लेकर अनेक दंतकथाएँ प्रचलित हैं|

मणिपुर
मणिपुर में ६० प्रतिशत आबादी मेइतेई-प्रंगाल जनजाति की है, किंतु आश्‍चर्य है कि राज्य की कुल जमीन का केवल १० प्रतिशत ही उनके पास है| बाकी नागा, कुकी, जोमिस आदि छोटे गुटों की आबादी राज्य की कुल आबादी की ४० प्रतिशत है| लेकिन राज्य की ९० प्रतिशत जमीन के मालिक ये छोटे समुदाय वाले हैं| मणिपुर क्षेत्र अपने इतिहास काल में अनेक नामों से पुकारा जाता रहा| एक दो नहीं बल्कि २०-२५ नामों से| मेइती या मेइतेई से जुड़े नाम मेइत्राबाक, मेइत्रिलेपीपाक के साथ और विविध प्रकार के नाम| मगर १८वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इस क्षेत्र के राजा भाग्यचंद तथा उनके वंशजों के चलाए सिक्कों पर ‘मणिपुरेश्‍वर’ का नाम अंकित है| इसके ही आधार पर इसका नाम मणिपुर चल पड़ा| मणिपुर १८९१ में ब्रिटिश शासन में एक रियासत (प्रिंसली स्टेट) के रूप में शमिल हुआ और भारतीय संघ में शामिल होने के समय तक इसी रूप में था| द्वितीय विश्‍व युद्ध के दौरान मणिपुर जापानी फौजों और मित्र राष्ट्रों के बीच घमासान का साक्षी बना| भारतीय संघ में शामिल होने के बाद मणिपुर १९५६ में केंद्र शासित राज्य बना| यह स्थिति १९७२ तक रही, जब उसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिला|

इस राज्य की जनसंख्या का करीब ५९ प्रतिशत घाटी में है और ४१ प्रतिशत पहाड़ी क्षेत्रों में है| पहाड़ी इलाकों में नागा, कुकी, पाइते (जो भी) का कब्जा है, तो मैदान में मेइती का| इस प्रदेश की मुख्य भाषा मेइती लॉन है| इसी को मणिपुरी का नाम भी दिया गया है| मणिपुरी भाषा और साहित्य की एमए स्तर की पढ़ाई होती है| यह पूरे प्रदेश की आम संपर्क भाषा है|

मणिपुर अत्यंत समृद्ध संस्कृति वाला राज्य है| यहॉं की हिंदू जनसंख्या, वैष्णव धर्म से सर्वाधिक प्रभावित है| कृष्ण भक्ति यहॉं के मैदानी क्षेत्र में जन जन में व्याप्त है| मणिपुरी नृत्य तो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है और भारत के शास्त्रीय नृत्यों में इसका प्रमुख स्थान है| यह वास्तव में कृष्ण की रास लीला की अनुकृति है| केरल के कथकली नृत्य की तरह इसका परिधान भी अनूठा रहता है| यह अत्यंत कोमल, भावप्रधान तथा गौरवमय नृत्य शैली है| इसके साथ गाये जाने वाले गीत ज्यादातर जयदेव, विद्यापति, चंडीदास, गोविंद दास जैसे भक्त कवियों की रचनाएँ होती हैं|

अरुणाचल प्रदेश
अरुणाचल प्रदेश के अकेले एक इलाके में भाषा, संस्कृति एवं नस्लों की जितनी विविधता है, उतनी पूरे एशिया में अन्यत्र कहीं नहीं है| यहॉं के अधिकांश निवासी तिब्बत-बर्मी मूल के हैं और उनकी मुख्य भाषा भी उसी मूल की है| यहॉं की सारी भाषाओं की गणना व पहचान का काम भी बहुत कठिन है| करीब ५० से ऊपर भाषाएँ प्रचलन में हैं| प्रायः हर जनजाति की अपनी अलग भाषा है| बाहर के अन्य इलाकों से आए लोगों के कारण भाषा और जाति की समृद्धि और बढ़ गई है|
यह प्रदेश पहली बार सर्वाधिक चर्चा में तब आया, जब १९६२ में चीन ने हमला किया| उस समय यह इलाका ‘नेफा’ (नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी) के नाम से जाना जाता था| भारत सरकार ने १९५५ में इसका गठन किया था| १९६२ के हमले के समय चीन ने नेफा के अधिकांश भाग पर कब्जा कर लिया था, लेकिन बाद में उसने स्वयं एकतरफा युद्ध विराम की घोषणा करके अपनी सेना को मैकमोहन लाइन तक पीछे हटा लिया था| यद्यपि उस मैकमहोन लाइन को चीन ने मान्यता नहीं दी थी, फिर भी उस समय उसने उसी लाइन का सम्मान किया| इस लाइन का निर्धारण ब्रिटिश सरकार और तिब्बत के बीच शिमला में हुई बैठक के बाद हुए समझौते में किया गया था| इस समझौते में ब्रिटिश इंडिया के प्रशासक सर     हेनरी मैकमहोन ने ८९० किमी की सीमा को निर्धारित किया| इस सीमा निर्धारण में तावांग तथा तिबेतान का इलाका ब्रिटिश इंडिया के क्षेत्र में दिखाया गया| चीन ने उस समय कोई आपत्ति नहीं की, लेकिन बाद में उसका दावा था कि तिब्बत चूँकि स्वतंत्र देश नहीं था, इसलिए उसे सीमा संबंधी कोई समझौता करने का अधिकार ही नहीं था| खैर, इसके बाद की कहानी लोगों को पता है, इसलिए उसकी विस्तृत चर्चा की जरूरत नहीं|
अरुणाचल में साक्षरता का स्तर करीब ६६.९५ प्रतिशत है| यहॉं के ज्यादातर मूल निवासी प्रकृति पूजक है| फिर भी हिंदू धर्म मानने वालों की संख्या करीब ३४.६ प्रतिशत है| तावांग व पश्‍चिमी कामेंग इलाके में बौद्ध धर्म की थेरवादी शाखा का प्रभाव है| करीब १९ प्रतिशत ईसाई है| राज्य में अंग्रेजी भाषा का प्रभुत्व है, किंतु हिंदी भी यहॉं काफी लोकप्रिय है|
वास्तव में उत्तर पूर्व का इलाका अनादिकाल से एक रहस्यमय क्षेत्र रहा है| यह रहस्यमयता कमोबेश आज भी बनी है| शाक्त उपासना, प्रकृति पूजा एवं बौद्ध वज्रयान की तांत्रिक साधना आदि के कारण इस क्षेत्र के बारे में अनेक कल्पित बातें देश की मुख्यभूमि में व्याप्त रहीं| आधुनिक काल में देश के स्वतंत्र होने के बाद भी हिंसक अशांति (ईसर्जेसी) की खबरों के कारण देश के मुख्य भाग के लोग इस क्षेत्र की यात्रा भी बहुत कम करते रहे हैं, इसलिए मध्य देश या अन्य क्षेत्रों के निवासियों के साथ इस क्षेत्र की घनिष्ठता नहीं बन पाई| समय बदलने के साथ वातावरण बदल रहा है, इसलिए अब यह अधिक आवश्यक है कि उत्तर पूर्व तथा शेष भारत के बीच आवागमन बढ़े| यह क्षेत्र अशांति और अलगाव का गढ़ न बने, इसके लिए भी आवश्यक है कि पूरे देश के विभिन्न क्षेत्रों की सांस्कृतिक साझेदारी बढ़े और आत्मीयता के सहज संबंध विकसित हों|

सिक्किम
पारंपरिक कथाओं के अनुसार बौद्ध संत गुरु रिंपोछे ईसा की ८वीं शताब्दी में कभी इस क्षेत्र में पहुँचे| उस समय वहॉं कोई राजा नहीं था| उन्होंने इस क्षेत्र में रहने वालों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी तथा भविष्यवाणी की कि शताब्दियों बाद वहॉं संगठित राज सत्ता का युग शुरू होगा| सिक्किम के इतिहास का ज्ञात राजवंश १६४२ में स्थापित हुआ| इसके पहले और शायद गुरु रिंपोछे के आने के पहले, किसी तिब्बती राजवंश ने इस पर आधिपत्य जमाया था, लेकिन वह अधिक समय तक टिक नहीं सका| नांग्याल वंश के काल में नेपाल की तरफ से अक्सर हमले होते रहते थे| अंततः १९वीं शताब्दी में उसने भारत के ब्रिटिश शासकों से तालमेल बैठाया, किंतु ब्रिटिश शासकों ने जल्दी ही सिक्किम को अपना सरंक्षित राज्य बना लिया|

उत्तर पूर्व का यह अकेला नेपाली बहुल राज्य है| नस्ली तथा भाषाई विविधता इतनी है कि यहॉं ११ सरकारी भाषाएँ हैं| नेपाली मुख्य संपर्क भाषा है और उसके अलावा भूटिया, लेप्चा, लिंबू, नेवारी, राई, गुरुंग, मंगर, शेरपा, तमांग, सुंवर भी मान्यता प्राप्त है| यहॉं का मुख्य धर्म हिंदू है| दूसरा स्थान बौद्ध वज्रयान धर्म का है| राजधानी गंगतोक एकमात्र बड़ा शहर है और समझा जाता है इसकी स्थापना तिब्बती राजा ने की थी|
देश के स्वतंत्र होने पर सिक्किम तत्काल भारत में शामिल नहीं हुआ, लेकिन बाद में यहॉं की जनता राजशाही के विरुद्ध हो गई और अंततः राजशाही के विरुद्ध जनमत संग्रह के उपरांत १९७५ में इसे भारत में मिला लिया गया| सिक्किम गोवा के बाद देश का सबसे छोटा राज्य है और आबादी में भी यह सभी राज्यों से पीछे है| पारंपरिक गुंपा नृत्य यहॉं का सर्वाधिक प्रसिद्ध नृत्य है|

प्रस्तुतकर्ता डॉ. राधेश्याम शुक्ल

 

 

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