From: Vinod Kumar Gupta < >

बाहें पसारता हिन्दू समाज (Abnormal behavior)

 

बाहें पसारता हिन्दू समाज कब तक सैकड़ों वर्षों से आत्मसमर्पण की पराजित भावनाओं से घिरा रहेगा?

राष्ट्र के प्रति सर्वाधिक प्रतिबद्ध “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ” के प्रमुख श्री मोहन भागवत जी ने पिछले दिनों एक तीन दिवसीय कार्यक्रम में अनेक बिंदुओं पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करके सम्पूर्ण भारतीय समाज को अपने मानवतावादी विचारों से अवगत करवाया। मुख्यतः उनका लक्ष्य अनेक सम्प्रदायों में विखरे हुए समाज को संगठित करके देश के सशक्त निर्माण में उनकी भागेदारी सुनिश्चित करने का सकारात्मक प्रयास है.

 

लेकिन उनके वक्तव्य के कुछ मुख्य बिंदू अवश्य विचारणीय है, जैसे…

“जिस दिन हम कहेंगे कि मुसलमान नही चाहिये … उस दिन हिंदुत्व भी नही रहेगा ,

जिस दिन कहेंगे कि यहां केवल वेद चलेंगे, दूसरे ग्रंथ नही चलेंगे … उसी दिन हिंदुत्व का भाव नष्ट हो जायेगा,

क्योंकि हिंदुत्व में वसुधैव कुटुम्बकम की भावना समाहित है … जितने भी सम्प्रदाय जन्में है सबकी मान्यतायें है ,

हिंदुत्व के दर्शन में किसी भी सम्प्रदाय से अलगाव नही है ।”

(When the Veda said, “वसुधैव कुटुम्बकम,” it talks about blood relation, which cannot be denied. But more important than the blood relation is commitment to follow Vedic dharma or asuric ideology.  Sure, in this world there will be more or less demoniac people as Krishna has said in Bhagavad Gita: ॥ द्वौ भूत सर्गौ लोकेस्मिन् दैव असुर एव च॥.  But the Vedic dharma says that the suras (the devines) must fight to control or kill the asiric (demoniac) people in order to maintain law and order in the society.  Never forget that in Mahabhaarat/Gita, when Arjun said he does not want to fight, Krishna recommended him to fight.

 

Additionally, the anti-Vedic religions or ideologies (e. g. Islam, Xianity, and Communism) are not the offshoots from the Vedic dharma as the Jainism, Buddhism and Sikhism and Kabir Panth, etc. are.)  These anti-Vedic ideologies or religions are hell bent to completely wipe out the Vedic dharma (which is universal dharma for mankind) from the face of the Earth.  Therefore, they should not be given legal status in Aryavart, the land of the Vedics.  These anti- Vedic ideologies are foreign virus forcibley invasded in Aryavart.  They must be declared illegal by amending the constitution.

– Suresh Vyas)

 

इतिहास में भी प्रायः मुसलमानों का गुणगान करते हुए यह पढ़ाया जाता है कि वे बाहर से आये और हमारे ऊपर 600-700 वर्षो तक राज किया और उनमें से एक अकबर को महान बना दिया गया । लेकिन उन्होंने हमारे मठ-मंदिरों का विंध्वस किया, हमारे लाखों – करोड़ों पूर्वजों का बलात धर्मांतरण व भयानक नरसंहार करने के अतिरिक्त हमारी बहन-बेटियों पर अमानवीय अत्याचार किये आदि के इतिहास को साम्प्रदायिक सौहार्द बनाये रखने के लिये हमारे नीतिनियन्ताओं ने अधिक महत्व नही दिया। (because the ruling party was anti-Vedic.)

यहां एक अत्यंत कष्टकारी बिंदु सोचने को विवश करता है कि जब अन्य सम्प्रदाय “हिंदुत्व” के प्रति सौहार्द के स्थान पर  वैमनस्यपूर्ण व्यवहार करते आ रहे थे, है और भविष्य में भी उसमें कोई परिवर्तन होने की संभावना शिथिल न हो तो ऐसे में क्या किया जाय?

क्या उन बिन् हिंदु सम्प्रदायों की भारत के मूल निवासियों प्रति के बलात धर्मांतरण की अनाधिकार चेष्टा उचित है?

क्या उनको अपने-अपने सम्प्रदाय को श्रेष्ठ स्थापित करने की दूषित महत्वाकांक्षा के वशीभूत हो कर हिंदुओ पर अत्याचार करते रहने का मौलिक अधिकार मिला हुआ है, जबकि हमारा इतिहास साक्षी है कि आक्रांताओं और धर्मांधों के (हमारी संस्कृति और धर्म को नष्ट करने के लिये) किये गये अत्याचारों की कोई सीमा नही थी।

वर्तमान में भी ऐसे कट्टरपंथी हिन्दू समाज को शांतिपूर्वक जीवन निर्वाह करते रहने में बाधक बनें हुए है। विभिन्न गावों व नगरों में प्रायः होने वाले साम्प्रदायिक दंगे व आतंकवादियों के द्वारा निर्दोष और मासूमों को बम विस्फोटो से उड़ाना आदि कट्टरपंथियों के घिनौने प्रदर्शन अभी भी अनियंत्रित है। ऐसे में हम सबकी मान्यताओं का सम्मान करते हुए एक तरफा सहिष्णु बनकर कब तक अपने आप को आहत होते देखते रहें? अपने धर्म संस्कृति और् राष्ट्र के अस्तित्व की रक्षार्थ कर्तव्यविमुख होकर केवल उदारता व अहिंसा के गुणगान करने से क्या हम आत्महत्या के पाप का भागी नही बन जाएंगे?

हम कब तक बाहें पसारें सभी को गले लगाने को आतुर होते रहेंगे?

 

जब 90 वर्षो से “हिंदुत्व ही राष्ट्रीयत्व है” की प्रेरणा से करोड़ों देशभक्तों का निर्माण करने वाला “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ” अपने ही सिद्धान्तों और आदर्शो पर प्रश्नचिन्ह लगायेगा तो 1300 वर्षो से चल रहे जिहादियों के अत्याचारों पर अंकुश लगा कर मानवता की रक्षार्थ कौन सतर्क होगा?

क्या अपने को समयानुसार परिवर्तनशील, उदारवादी व सामाजिक समरसता में ढलने का ज्ञान बाटनें वाला हिन्दू समाज जिहादी दर्शन में भी परिवर्तन करवाने का प्रयास करेगा? (This is not possible because Koran does not give freedom of thought, speech and action. Punishment to quit Islam is death. What the Hindus can do in Aryavart is to declare the anti-Vedic religions and ideologies illegal. – Suresh Vyas)

 

हिंदुओं से ही सदैव यह आशा क्यों की जाती है कि वे ही अपने आप को इस्लाम व ईसाईयत के अनुरूप ढाल लें और एक तरफा उदार व सहिष्णु बनें रहें?  (It is due to foolishness (dharma glaani) of the Hindus. – Suresh Vyas)

…क्या यह दृष्टिकोण हिंदुओं की सनातन आस्थाओं और श्रद्धाओं को आहत नही करेगा?

हमारी व हमारे नेताओं की भावनावश हिन्दू-मुस्लिम सांझी परंपराओं व सांझे पूर्वजों का गुणगान करने से भी मुसलमानों की जिहादी मनोवृति  को प्रभावित नही किया जा सकता। लेकिन ऐसे सद्भावनापूर्ण प्रयासो से हिन्दू अवश्य भ्रमित होता आ रहा है। इसलिये आज भी हमारे अनेक महापुरुषों का विचार है कि “सहनशील व सहिष्णु होना अच्छा गुण है, परन्तु अन्याय का विरोध उससे कई गुणा उत्तम गुण” प्रसांगिक है। धर्मानुसार न्याय के साथ सहिष्णुता का व्यवहार व अन्याय के साथ असहिष्णुता का मार्ग ही स्वधर्म रक्षार्थ आवश्यक होता है।

(The Vedic wisdom is this:

अहिंसा परमो धर्मः। Non-volence is supreme Vedic dharma.

धर्म हिंसा तथैव च्॥ Violence authorized by the Vedic dharma is also supreme dharma.

  • Suresh Vyas)

सामान्यतः विश्वबंधुत्व की भावना के कारण ही हम हिन्दू मित्र व शत्रु में भेद नही कर पाते  जिससे वर्तमान व भविष्य के संकटो से अनभिज्ञ रहते है। परिणामस्वरूप धर्म व देश की रक्षार्थ उदासीन हो जाते है। स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी का दूरदर्शी संदेश आज भी प्रसांगिक है, उन्होंने कहा था कि “जिस राष्ट्र की जनता शत्रु और मित्र को पहचानने में भूल करती है, उस राष्ट्र को उस भूल का भयंकर परिणाम भुगतना पड़ता है” । हमारे ग्रंथों में भी यह स्पष्ट आदेश है कि “मित्र के साथ मित्रवत, व शत्रु के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार ही उचित रहता है”। (The focus should be on the ideology or religions. The forcibly invaded anti-Vedic religions must be declared illegal in Aryavart, else there is no possibility of peace or prosperity.  No virus (e.g. Islam) can be allowed in a computer (Aryavart.) – Suresh Vyas)

धर्माधारित देश के विभाजन के उपरांत भी पाकिस्तान, बांग्लादेश व कश्मीर आदि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ही अब तक लगभग एक करोड़ से ऊपर हिंदुओं का धर्म के नाम पर बलिदान हुआ हो तो कोई आश्चर्य नही होगा। परंतु जब हमारे धर्माचार्यों व नेताओं को सर्वधर्म समभाव, सहिष्णुता, उदारता व अहिंसा के उपदेश देने में ही परम आनन्द आता हो तो धर्मांधों व जिहादियों का दुःसाहस बढ़ना स्वाभाविक ही है।

हिंदुओं में तेजस्विता का अभाव  (dharma glaani) और उनकी समझौतावादी मनोवृत्ति ने भी हिन्दू विरोधी षड्यंत्रकारियों को उत्साहित किया है। बाहें पसारता हिन्दू समाज कब तक सैकड़ों वर्षों से आत्मसमर्पण की पराजित भावनाओं से घिरा रहेगा? हम कब तक यह सोचने को विवश होते रहेंगे कि भारत में राष्ट्रभक्ति रहित राजनीति के वर्चस्व से कब छुटकारा मिलेगा, विशेषतौर पर आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब मुख्य रूप से धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार की प्रमुखता से धर्मनिरपेक्षता जर्जर हो रही हो और सुरक्षित, सुदृढ़ व गौरवशाली भारत के निर्माण की योजनाओं की प्राथमिकता का अभाव हो रहा हो।

ध्यान रहें “वसुधैव कुटुम्बकम” के मंत्र से संस्कारित “हिंदुत्व” अपने शास्त्रों के ज्ञान के आधार पर मानवता की रक्षा करके उसको ऊर्जावान व प्रकाशवान करना चाहता है। ऐसे में जो दर्शन मानव समाज को विभक्त करते हो तो उसमें संशोधन करवाने का (सम्पूर्ण समाज को अपना परिवार मानने वाली) भारतीय संस्कृति भी दायित्व निभाये तो अनुचित नहीं होगा।

(There is no need for any research. The total history of Islam, Xianity, Pakista, Bangladesh, Rhingyas, etc. andy many books and Youtube videos have clearly exposed the anth-Vedic religions.  – Suresh Vyas)

वैसे भी हिंदुत्व में अलगाववाद का कोई स्थान नही तो उसे अलगाववादी दर्शन का विरोध तो करना ही चाहिये।

आज जब संघ के द्वितीय प्रमुख गुरु गोलवरकर जी की पुस्तक “द बंच ऑफ थॉट्स” की समीक्षा करके हिन्दू समाज बाहें पसारने को आतुर है, तो अन्य सम्प्रदायों (these are not sampradayas, they are anti-Vedic foreign religions.) को भी अपने अपने रूढ़िवादी ग्रंथो की समीक्षा करनी चाहिये। Why say so? They will not listen us kafirs. – Suresh Vyas) अतः सभी सम्प्रदायों के धार्मिक विद्वानों का भी यह दयित्व है कि वे अपने धर्म ग्रंथों और विद्याओं में आवश्यक संशोधन करके भारत सहित सम्पूर्ण विश्व को सकारात्मक संदेश देकर सभ्यताओं में हो रहे टकरावों को दूर करें।

 

✍विनोद कुमार सर्वोदय

(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)

गाज़ियाबाद

 

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