From: Vishwas Pitke < >:

प्रिय स्वजन,

दो दिन पहले, इस्त्राएल देशकी संसदने अपने देशको संपुर्ण यहुदि राष्ट्र घोषित कर डाला है.
अपनी राष्ट्रभाषा भी उन्होने अब हिब्रु कर डाली है. अबसे वहा अरेबिक भाषा प्रचार मे और बोली मे नही होगी.
उनकी संसदने यहा तक घोषित कर दिया है की अब इस्त्राएल सिर्फ अपने देश का ही नही बल्कि दुनिया की सारे यहुदियोंका हित भी देखेगा. ईसे कहते है  वैश्र्विक भुमिका धारण करना.
भारत को भी (इस्त्राएल की तरह) अपने आप को संपुर्ण हिंदु राष्ट्र घोषित करने की जरुरत है.
भारतने भी दुनिया के सारे हिंदुओंके योगक्षेम (हित) कि जिम्मेदारी अपने कंधे पे लेना अपेक्षित है. (वैश्र्विक भुमिका धारण करना)
बाकी सभी देश ईसी तरह बर्ताव करते है लेकिन जब भारत ये करना चाहेगा तब येही सब देश उसे धर्मनिरपेक्षताके वास्ते देने लगेंगे. इसमे सबसे पहले हो सकता है की अमेरिकाही हो क्योंकी वह खुद बाहरसे आये हुवे लोग है और वहाके असली भुमीपुत्र रेड इंडियंस को मार भगाकर अपना देश बना बैठा है. व्हॅटीकन से फतवे चालु हो सकते है. उन्हे सिर्फ कचरे के डिब्बेमेही फेक देना चाहिये.
भारत अगर संपुर्ण हिंदु राष्ट्र हो भी गया तब भी किसी मुसलमान, ईसाई या अन्य परधर्मीयोंको कोई भी तकलीफ नही होगी क्योंकी हिंदु कभी किसीको तकलीफ नही देते. यह आजतक हिंदु धर्म का ईतिहास है.
लेकीन इस समय यह जरुरी है की मुसलमान और अल्पसंख्यांक ईसाई और भारतमे बसे बाकी परधर्मियोंका मतदान का अधिकार छिन लेना चाहिये. ईसमे उन सभीका फायदा ही है. ईससे उन धर्मियोंको ढाल बनाकर गंदी और धार्मिक राजनीती करनेवाले राजकीय पक्षोंकी धार नष्ट होगी. वैसे भी अल्पसंख्याकोने बहुसंख्यांको के मामले मे दखलअंदाजी करना यह व्यवहार के दृष्टीसे उचित नही है. (लेकिन ऐसा ही आजतक अपने देशमे होता आया है).  यहा ये अध्यारुत है की जिनको मतदानका अधिकार नही दिया जायेगा उनके हितकी बात संसद तक पहुचनेके लिये एक विशेष आयोग स्थापित करना चाहिये जिससे ऐसे मतदान वंचितोंके हित का विचार हमेशा जिवित और ताजा रहेगा.
वह सब परधर्मिय बिना मतदान अधिकारसे ही भारतमे आरामसे अपनी प्रगती आसानीसे कर सकते है.
 
अगर यह सब परधर्मिय वापस हिंदु धर्म स्विकार करते है तो उनकी आजसे 15 साल बाद पैदा होने वाली अगली पिढीसे किसी एक (और सिर्फ एक ही व्यक्ती को) व्यक्ती को अगर मतदान का अधिकार देने का कायदा किया तो हम हमारेही हिंदु धर्मसे भ्रष्ट होकर खोये हुवे हमारेही भाई बहन वापस हिंदु धर्म मे ला सकते है. ऐसा करनेमे कुछ गलत नही है.  मैंने उनकी आजसे 15 साल बाद पैदा होने वाली अगली पिढी से ही (और वह भी सिर्फ एक ही व्यक्ती को) मतदान का अधिकार देने का विचार ईस लिये दिया की तब तक उनके कुटुंबमे हिंदु धर्म पुरी तरह से नही स्थापित होने की ही सन्म्भावना है और ऐसे कुटुंब अपनी छोटी सोच लगाकर सिर्फ मतदान का हक जताने के लियेही अपना धर्म ना बदल बैठे. लेकिन उनको मतदान का हक भी देना जरुरी है ताकी उन्हे यह विश्र्वास हो जाये की हिंदु बनने के बाद धीरे धीरे उन्हे मुख्य प्रवाह मे शामिल किया जायेगा.  ऐसे गुजरे हुवे पहले 15 सालोंके बाद वहासे उनकी पैदा होनेवाली तिसरी पिढीसे उनके सभी कुटुंबियोंको ईतर हिंदुओंकी तरह मतदान का हक दिया जा सकता है ताकी ऐसे सभी घर-वापस हिंदु हमारे हिंदु समाजकी मुख्य धारा मे आनंदसे शामिल हो सके. यह लंबा कालखंड जरुरी है क्योंकी ईतने कालावधीमे ऐसे सभी लोग सिर्फ अपनी पुरानी रहन-सहन ही नही बल्की मानसिक दृष्टीसे भी पुरी तरह से अपने पुराने संस्कार भुलकर पुर्णतः हिंदुही बन चुके होगे तथा उनके कुटुंबमे अब उनके उस पिढीके कोई भी सदस्य बचे ही नही होंगे की जो पहले किसी और धर्म के थे और जिनकी निष्ठा हिंदु बनने के बाद भी अपने पुराने धर्म के प्रती ही है जिसके कारण ऐसे सदस्य उनकेही घरके नव-मतदाताको प्रभावित कर सके.  
हिंदु धर्म मे हमारे सभी जातीयोंके लोग और शिख, जैन, बुद्ध और हिंदु धर्मकी ही शाखा होनेवाले ऐसे सभी पंथ भी हिंदुही माने जायेगे यह महत्वपुर्ण बात प्रथम जाहिर करनी पडेगी. अगर ऐसा हो गया तो सिर्फ राष्ट्र निर्माण के कार्यपर ही अच्छी राजनीती चलेगी.
सशक्त नेता यह सब कर सकता है. सिर्फ हसकर मेरे ईस विचारोंको नजर अंदाज मत करना.
यह हो सकता है. यह नीती वास्तव मे आ सकती है.
ईसके साथ भारत देश ने यह भी जाहिर करना चाहिये की अबसे भारत किसी बाहरवालेको या शरणार्थि को स्थायी स्वरुपसे आश्रय नही देगा क्योंकी एक तो हमारी अपनी जनसंख्याही हमारी भुमीपे बहुतही ज्यादा है और हमे बाहरवालोंसे अब तक सिर्फ तकलिफही पहुच रही है.  
विश्र्वास प्र पिटके

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