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जहीरूद्दीन बाबर जीवन भर नही भूल पाया था खानवा के रणक्षेत्र को

बाबर कोस रहा था अपने भाग्य को


बाबर के सैनिकों में भगदड़  मच गयी और अंत में मिली पराजय। यह दृश्य देखकर बाबर को असीम दुख हुआ। उसने भारत में ‘लूट के माल’ को अपने सभी सैनिकों, परिचितों, मित्रों, बंधु बांधवों में बांट दिया था, केवल इसलिए कि ये लोग उसके हर सुख-दुख में उसका साथ देंगे, परंतु परिणाम आशानुरूप नही आया।जहीरूद्दीन बाबर Jahiruddin Babar बाबर कभी अपने भाग्य को कोसता था, तो कभी भारत के हिंदुओं की अनुपम देशभक्ति की भावना को कोसता था, जिसने उसकी यह दुर्गति करा दी थी, तो कभी वह अपने कृतघ्न सैनिकों, अधिकारियों और स्वदेश से आये लोगों कोसता था। बाबर जानता था कि अभी चाहे दिल्ली, आगरा दूर रह गयी है पर इतनी दूर भी नही है कि हाथ ही न आ सके… तो उसकी आत्मा कांप उठती।

आक्रमण को ‘जेहाद’ का रूप दिया


बाबर इस विषमता से निरंतर उभरने का प्रयास कर रहा था। वह कुल मिलाकर राणा का इस बात के लिए धन्यवाद ज्ञापित करता कि उसने ‘सदगुण विकृति’ के कारण ही सही मेरी भागती सेना का पीछा नही किया। और यही ‘सदगुण विकृति’ का दुर्बल  द्वार उसे भारत के सुदृढ़ दुर्ग में भीतर प्रविष्ट होने का सरल मार्ग जान पड़ता था। बाबर ने अपने सैनिकों को एकत्र करना आरंभ किया और उसने निर्णय लिया कि पराजित सैनिकों के मनोबल को ऊंचा करने का प्रयास किया जाए। फलस्वरूप बाबर ने अपने आक्रमण को ‘जेहाद’ का रूप दिया और  मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को उभारकर अपनी सेना में साम्प्रदायिक उन्माद उत्पन्न करने का प्रयास किया।


बाबर का संबोधन

बाबर ने अपने सैनिकों को संबोधित करते हुए कहा-‘‘ऐ मुसलमान बहादुरो! हिंदुस्तान की यह लड़ाई इस्लामी जेहाद की है। इस लड़ाई में होने वाली हार तुम्हारी नही इस्लाम की हार है। हमारा मजहब हमें बताता है कि इस दुनिया में जो पैदा हुआ है, वह मरता जरूर है। हमको और तुमको सबको मरना है। लेकिन जो अपने मजहब के लिए मरता है, खुदा उसे बहिश्त में भेजकर इज्जत देता है। लेकिन जो मजहब के खिलाफ मौत पाता है उसे खुदा दोजख में भेजता है। अब हमको इस बात का फैसला कर लेना है और समझ लेना है कि हम लोगों में बहिश्त कौन जाना चाहता है? उन्हें हर सूरत में इस लड़ाई में शरीक होना है। कुरान को अपने हाथों में लेकर तुम इस बात का आज अहद करो कि तुम इस्लाम के नाम पर होने वाली इस लड़ाई में काफिरों को शिकस्त दोगे, और ऐसा न कर सकने पर इस्लाम के नाम पर तुम अपनी कुर्बानी देने में किसी हालत में इनकार न करोगे।’’

हुआ सैनिकों में उत्साह का संचार

बाबर के इस उत्साहबर्धक भाषण को सुनकर उसके सैनिकों में उत्साह का संचार हुआ और उनके टूटे हुए मनोबल को ऊंचा उठाने में भी बाबर को सफलता प्राप्त हुई। हिंदू की देशभक्ति और धर्म के प्रति ‘अटूट आस्था’ का सामना करने के लिए मुसलमानों में बाबर के द्वारा उस समय अपने मजहब के प्रति ऐसी ही अंध भक्ति को पैदा करना अपेक्षित था, जिससे मुसलमान अपने को केवल मरने के लिए युद्घ में झोंक दें।

युद्घ का नियम है…..

विधि/न्याय का सिद्घांत है कि अपने से उत्तम स्वत्व कोई भी व्यक्ति किसी को प्रदान नही कर सकता। पर युद्घ का नियम है कि किसी को हराने के लिए आपको उससे भी उत्तम अस्त्र शस्त्र बांधने पडेंगे। इसलिए युद्घ के नियम का पालन करते हुए बाबर ने अपनी सेना को हिंदुओं की सेना से उत्तम मनोबल वाला बनाना उचित समझा।

बाबर का यह भाषण इतिहास में बहुत प्रसिद्घ है। इसकी प्रसिद्घि का कारण हिंदुओं की वीरता से उत्पन्न हुआ वह भय था जो बाबर की सेना को युद्घ के नाम तक से भागने के लिए प्रेरित करता था। बाबर की यह सफलता ही कही जाएगी कि उसने युद्घ से मुंह फेर चुकी अपनी सेना को पुन: युद्घ के लिए उद्यत किया और उसकी सेना ने उसका भाषण सुनकर उसका साथ देना स्वीकार कर लिया।

बाबर चला ‘जेहाद’ की ओर

ओमप्रकाश विर्लेय अपनी पुस्तक ‘‘भारतीय इतिहास के गौरव क्षण’’ के पृष्ठ 57 पर लिखते हैं-‘‘बाबर ने महाराणा सांगा के साथ जो युद्घ किया, उसका नाम उसने ‘जेहाद’ दिया था। मुसलमानों ने अन्य धर्मावलंबियों के विरूद्घ जो युद्घ जब भी कहीं और किसी भी समय किये, उनमें से अधिकांश को जेहाद के नाम पर ही लड़ा गया। भारत में सन 712 ई. से पूर्व सिंध से जेहाद का सिलसिला जारी हुआ तो अब भी किसी न किसी रूप में छद्म रूप में काम में लिया जा रहा है।’’

राणा भी हो गया सतर्क

बाबर के उद्देश्यों का ज्ञान राणा संग्राम सिंह को भी हो रहा था, इसलिए महाराणा चुप बैठने वाले नही थे। वह भी अपनी ओर से सैन्य संगठन करने में लग गये। बाबर और राणा संग्राम सिंह यहां तक तो समान थे कि वे दोनों एक दूसरे के विरूद्घ युद्घ की तैयारियां कर रहे थे, परंतु एक बात पर बाबर महाराणा से आगे था। वह संग्राम  सिंह के विरूद्घ छल-बल का प्रयोग करके भी युद्घ जीतने की योजना बना रहा था, जिससे महाराणा सर्वथा अनभिज्ञ थे, और भारतीय युद्घ नीति में सर्वथा त्याज्य नियमों को वह अपनाना भी नही चाहते थे।

जहीरूद्दीन बाबर नई चाल


बाबर ने अपनी सेना को आदेशित किया। ‘भारत की प्रसिद्घ लड़ाईयां’ का लेखक हमें बताता है-‘‘बाबर की सेना में युद्घ की तैयारियां हो रही थीं और चित्तौड़ की ओर से आने वाली सेनाएं युद्घ का रास्ता देख रही थीं। बाबर ने इस बीच में राजनीति की दूसरी चालों से काम लिया। दूत के पहुंचने पर सांगा के साथ संधि का प्रस्ताव किया। दूत के पहुंचने पर सांगा सोच विचार में पड़ गया। शत्रु के हथियार गिरा देने पर अथवा उसके संधि प्रस्ताव पर राजपूत कभी विश्वासघात नही करते थे। सांगा के साथ बाबर की संधि वार्ता आरंभ हो गयी। शिलादित्य नामक अपने एक सेनापति पर सांगा बहुत अधिक विश्वास करता था। संधि के संबंध में बातचीत करने के लिए सांगा ने शिलादित्य को नियुक्त किया।

संधि की बातचीत में एक महीना बीत गया। युद्घ के लिए उत्तेजित राजपूत सेनाओं में ढीलापन उत्पन्न हो गया। बाबर को परास्त करने के लिए सांगा ने एक विशाल सेना चित्तौड़ में तैयार की थी और शूरवीर सैनिकों तथा सरदारों को अपने साथ एकत्रित किया था। इतनी बड़ी और शक्तिशाली सेना का आयोजन चित्तौड़ के इतिहास में ही नही भारत के इतिहास में भी पहली बार हुआ था।’’

राणा कूटिनीतिक मोर्चे पर दुर्बल था

यह वर्णन हमें बताता है कि राणा संग्राम सिंह ने बाबर के साथ युद्घ के लिए कितने बड़े स्तर पर तैयारी की  थी? राणा अपने क्षत्रियपन में दुर्बल नही था पर कूटनीतिक मोर्चे पर दुर्बल था। एक परंपरागत शत्रु का विश्वास कर रहा था और संधि प्रस्ताव के झांसे में फंसकर अनावश्यक ही अपनी सेना के मनोबल से खिलवाड़ कर रहा था।

शत्रु के विरूद्घ बना राष्ट्रीय मोर्चा

भारतीय राजनीति में इस काल में विदेशी आततायी को भगाने के लिए बहुत ही सुखदायक स्थितियां परिस्थितियां निर्मित हो रही थीं। राजस्थान के अनेकों शक्तिशाली शासकों, सामंतों और सरदारों ने राणा सांगा का नेतृत्व स्वीकार कर अपना सैन्य सहयोग राणा को दिया था।

ये सभी शासक सामंत सरदार या प्रभावशाली व्यक्तित्व चित्तौड़ की ओर अपनी-अपनी सेनाएं लेकर आगे बढ़े और विदेशी आततायी शत्रु को मार भगाने के लिए राणा के नेतृत्व में पंक्तिबद्घ खड़े हो गये। बड़े सौभाग्य से ऐसे क्षण आये थे-जब हम पर लगने वाले ‘पारंपरिक फूट’ के आरोपों को सिरे से ही नकारा जा सकता था। परंतु बाबर की छल-बल की नीतियों के सामने यह सौभाग्य दुर्भाग्य में परिवर्तित हो गया था। कहा जाता है कि ‘‘राणा की सेना में इस बार एक लाख बीस हजार सामंतों सरदारों सेनापतियों तथा वीर लड़ाकुओं की संख्या थी। इसके अतिरिक्त राणा की सेना में अस्सी हजार सैनिक थे। तीस हजार पैदल सैनिकों की संख्या थी, युद्घ में लडऩे वाले पांच सौ खूंखार हाथी थे। इस प्रकार दो लाख तीस हजार सैनिक, सवारों, सरदारों, सामंतों और उन शक्तिशाली राजपूतों को लेकर राणा सांगा युद्घ के लिए रवाना हुआ था, जिनका संग्राम में लडऩा ही जीवन था। डूंगरपुर, सालुम्ब, सोनगड़ा, मेवाड़ मारवाड़ अंबेर, ग्वालियर, अजमेर चंदेरी तथा दूसरे राज्यों के अनेक बहादुर राजा इस विशाल सेना का नेतृत्व कर रहे थे’’।

(संदर्भ : ‘भारत की प्रसिद्घ लड़ाईयां’ पृष्ठ 214)

कितना देशभक्ति पूर्ण परिवेश था यह। स्वतंत्रता की दुन्दुभि चारों ओर बज रही थी। राणा सांगा सबके नेता बन गये थे। सर्वसम्मति से राणा को अनेकों राजाओं ने अपना नायक चुन लिया और उसके नेतृत्व में भारत की स्वतंत्रता का बिगुल फूंक दिया। इतनी बड़ी सेना अपनी स्वतंत्रता के लिए विश्व के अन्य देशों में भला कब और कहां बनी है?

वास्तव में ही भारत के इतिहास के गौरव क्षण थे यह जब दर्जनों शासकों, सामंतों और सरदारों ने राणा सांगा को अपना नेता चुना था। भारत की देशभक्ति को बाबर ने संधि के छलपूर्ण प्रयास से धूमिल कर दिया। बाबर ने इतने विशाल सैन्य दल को झांसा देकर संधि के झूठे झूले में झुलाते झुलाते उन्हें सुला दिया और इस देरी का स्वयं अपने सैन्य दल को सुदृढ़ करने में लाभ उठाता रहा।

अपनों ने किया विश्वासघात

हमारे सैनिकों की झपकी लगी, बाबर ने युद्घ की घोषणा कर दी।  पर ‘भारतीय इतिहास के गौरव क्षण’ के लेखक का मानना है कि-‘‘इतने सुरक्षित, इतने सज्जित तोपखाने और जेहाद का जादू चलाने वाले बाबर का फिर भी साहस नही हुआ कि वह युद्घ के लिए पहल करता। महाराणा सांगा ने ही आगे बढक़र आक्रमण किया। उधर से तोपें आग उगल रही थीं। इतिहासकार लिखते हैं कि आग के गोले बरसाती तोपों की परवाह न करते हुए धराशायी होते हुए भी मेवाड़ी वीर तोपचियों तक जा पहुंचे। वे तोपों को छीनने ही वाले थे कि विश्वासघात हो गया। महाराणा सांगा का एक विश्वस्त प्रमुख सेनापति धोखा कर गया। वह शत्रु से जा मिला। कुछ लोगों ने उसको सांगा का संबंधी भी कहा है। उस विश्वासघाती का नाम सलहदी था। वह पूर्विया तंवर था। अपनी सैनिक टुकड़ी के साथ वह युद्घ के निर्णायक क्षणों में बाबर से जा मिला था। दिन ढलते ढलते युद्घ का पास पलटने लगा। इस बीच किसी के तीर के प्रहार से सांगा भी मूच्र्छित हो गया।’’

कितने रोमांचकारी क्षण थे, जब मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए  संघर्ष कर रहे वीर अपने प्राणों की परवाह किये बिना आग बरसाती तोपों को छीनने के लिए तोपचियों पर झपटे थे। उनकी वीरता अद्भुत थी।

खानवा में जीता था विश्वासघात

खानवा के युद्घ क्षेत्र में ना तो बाबर जीता था और ना उसकी तोपें जीती थीं, जैसा कि प्रचारित किया जाता है खानवा में जीता था विश्वासघात और जीती थीं बाबर की छलपूर्ण नीतियां। भारत के शेरों ने अपने शौर्य का परिचय दे दिया था यदि उसे इतिहासकारों ने उचित सम्मान और उचित स्थान इतिहास में नही दिया है तो इसमें उनका कोई दोष नही है। उन्होंने जिस प्रकार अनेकों राजाओं का संघ बनाकर एक बड़ी सेना तैयार की और उस सेना से शत्रु को जिस प्रकार विचलित कर उसके तोपखाने पर अपने असंख्य बलिदान देकर नियंत्रण स्थापित करना चाहा था, वह भी तो एक इतिहास है, यदि लोग बाबर की कथित जीत को पढ़ते हैं तो तोपों पर अपना नियंत्रण स्थापित करने वाले इन सैनिकों के अदम्य साहस को भी पढऩा चाहिए।

मातृभूमि के लिए तड़पता महाराणा संग्रामसिंह

मूच्र्छित महाराणा संग्रामसिंह रणभूमि से किसी प्रकार बाहर ले जाया गया। पर वह शूरवीर मातृभूमि के लिए तड़प रहा था, उसके हर सांस से भारत माता की जय का स्वर उच्चरित हो रहा था। मूच्र्छावस्था में भी उसकी देशभक्ति और स्वतंत्रता के प्रति समर्पण का भाव देखने योग्य था। जब राणा को मूच्र्छावस्था में उठाकर दूर जंगल में ले जाया गया तो आंखें खुलते ही और चेतना लौटते ही वे रणभूमि में चलने की हठ करने लगे। उनके सिर पर देशभक्ति चढक़र बोल रही थी। वह नही चाहते थे कि उन्हें रणभूमि में पड़े अनेकों हिंदू देशभक्त वीरों के शवों के मध्य से उठाकर इस प्रकार लाया जाता। राणा की इच्छा थी कि मुझे रणभूमि में ही वीरगति प्राप्त करने दी जाती। मातृभूमि के लिए इतनी तड़प और इतनी पीड़ा भारत के अतिरिक्त भला किस देश में मिल सकती है?

राणा को घेर लिया विषाद ने

महाराणा अपनी दशा पर और विश्वासघाती लोगों पर अत्यंत दु:खी थे। उन्हें विषाद ने आकर घेर लिया था। तब शौर्य और साहस की उस साक्षात मूत्र्ति ने कठोर प्रतिज्ञा ली कि जब तक शत्रु को परास्त नही कर लेंगे तब तक चित्तौड़ नही लौटेंगे। उनका संकल्प था कि चित्तौड़ की प्राप्ति तक वह नगर या ग्राम में नही जाएंगे, भूमि पर शयन करेंगे और सिर पर राज्य चिन्ह धारण नही करेंगे, साथ ही सिर पर मेवाड़ी गौरव की प्रतीक पगड़ी भी धारण नही करेंगे।

यह है भारत की पहचान भारत का अभिप्राय है-भीषण प्रतिज्ञा लेने वाला भीष्म। भारत का अभिप्राय है-भीषण प्रतिज्ञा लेने वाला चाणक्य, और भारत की पहचान है अपने ज्ञान-विज्ञान और क्षत्रियत्व की सुरक्षार्थ नित्य प्रात:काल अपनी शिखा बंधन करना कि मैं शिखा (चोटी) वाला हूं और शिखा (चोटी) वाला ही रहूंगा। जिस देश का बच्चा अपने ‘चोटी धर्म’ के लिए इस प्रकार संकल्पबद्घ हो उस देश के शासक वर्ग से भी किसी प्रकार के स्खलन की अपेक्षा नही की जा सकती। यह ‘चोटी धर्म’ हमारी राष्ट्रीय चेतना का प्राणभूत तत्व है जो अत्यंत विषम परिस्थितियों में भी महाराणा संग्राम सिंह को प्राण ऊर्जा प्रदान कर रहा था।

महाराणा संग्राम सिंह अंतिम समय

देशधर्म के लिए अपना सर्वस्व होम करने वाले इस महावीर को अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार जीवन जीते हुए तीन वर्ष व्यतीत हो गये। उन्होंने अपने देश की स्वतंत्रता के लिए कठोर साधना की। अपना हर श्वांस उन्होंने मातृभूमि के लिए समर्पित कर दिया। अंत में भारतीय स्वातंत्रय समर के इस महानायक ने बसवा के निकट एक दिन अंतिम श्वांस ली। बसवा उस समय मेवाड़ राज्य का ही भाग था, वहीं पर महाराणा का दाह-संस्कार संपन्न कर दिया गया था।

बसवा है हमारी राष्ट्रचेतना का केन्द्र

बसवा हमारी राष्ट्रचेतना का एक केन्द्र है, यहां की माटी में उस परमवीर की सुगंध है जिसके नाम और काम से समकालीन विदेशी सत्ता और मां भारती के शत्रुओं का हृदय कांपता था। मेवाड़ के महाराणा ने स्वतंत्रता के पश्चात बसवा में महाराणा सांगा का एक भव्य स्मारक बनवाना चाहा था, जिसे किसी अन्य प्रभावशाली राजवंश ने बनने नही दिया था। इस प्रकार रणभूमि में जयचंद के हाथों पराजित हुआ एक शूरवीर अपनी समाधि में लीन होकर भी ‘जयचंदों  के छलछंदों’ का शिकार बन गया। ‘जयचंदी परंपरा’ भारतीय वीर परंपरा को कलंकित करने वाली परंपरा है।

युद्घ का वर्णन

महाराणा संग्राम सिंह और बाबर के युद्घ का वर्णन करते हुए इतिहासकार लिखता है-‘‘राणा सांगा ने अपने हाथी पर बैठे हुए युद्घ की परिस्थिति का निरीक्षण किया। उसने देखा बाबर के गोलों से राजपूत बड़ी तेजी के साथ मारे जा रहे हैं और शत्रु की सेना तोपों के पीछे है। उसने एक साथ अपनी विशाल सेना को शत्रु पर टूट पडऩे की आज्ञा दी। राणा की ललकार सुनते ही समस्त राजपूत बड़ी तेजी के साथ मारे जा रहे हैं और शत्रु की सेना तोपों के पीछे हैं। उसने एक साथ अपनी विशाल सेना को शत्रु पर टूट पडऩे की आज्ञा दी। राणा की ललकार सुनते ही समस्त राजपूत सेना अपने प्राणों का मोह छोडक़र एक साथ आंधी की तरह शत्रु के गोलंदाजों पर टूट पड़ी। उस भयानक विपद के समय उस्ताद अली तथा मुस्तफा ने राजपूतों पर गोलों की भीषण वर्षा की। उस मार में बहुत से राजपूत एक साथ मारे गये। लेकिन उन्होंने शत्रु की तोपों को छिन्न-भिन्न कर दिया और बाबर की सेना का संहार करने  के लिए वे जैसे ही आगे बढ़े, सबके सब एक साथ खाई के भीतर जा पहुंचे। उसी समय बाबर की सेना ने खाई के ऊपर से घेरकर जो मार आरंभ की, उसमें राजपूतों का भयानक रूप से वध हुआ। खाई से निकलकर बाहर आने के लिए राजपूतों ने बार-बार कोशिश की, लेकिन उनमें उनका भीषण संहार किया गया। राजपूत सेना के सामने एक प्रलय का दृश्य था। मरने और बलिदान देने के अतिरिक्त उनके सामने दूसरा कोई विकल्प नही था।’’

(संदर्भ : ‘भारत की प्रसिद्घ लड़ाईयां’ : केशव कुमार ठाकुर) इस प्रकार खानवा के युद्घ की वह अनाम खाई भी हमारे उन हिंदू वीरों का एक पावन स्मारक है, जिन्होंने निज देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वोत्कृष्ट बलिदान देकर मां भारती की सेवा का पुण्य प्रसाद ग्रहण किया था।

हसन खां मेवाती और महमूद खां लोदी की वीरता

इन्हीं योद्घाओं के साथ हसन खां मेवाती और महमूद खां लोदी ने भी अपना बलिदान देकर भारत के अमर शहीदों में अपना नाम अंकित कराया उनका बलिदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है, क्योंकि उन पर या उनकी बीस हजार की सेना पर बाबर के जेहाद या उत्साहजनक भाषण का कोई प्रभाव नही पड़ा और वे अंतिम क्षणों तक भारत के लिए लड़ते रहे। ऐसे वीर सपूतों को और अपने दिये वचन का सम्मान करने वाले सच्चे देशभक्तों को कोटि-कोटि प्रणाम।खानवा का मैदान हमारी पराजय की कटु स्मृतियों का स्थल ही नही है, अपितु यह मैदान हमारे रणबांकुरों की देशभक्ति, बलिदान और स्मरणीय त्याग का तीर्थ स्थल भी है। बाबर तो अपने जीवन में खानवा को भूल नही पाया था, पर हम भूल गये।

इसे क्या कहा जाए?

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