From: Madhusudan H Jhaveri < >

 

देश आज अधीर है।

डॉ. मधुसूदन

 

अब कुंभकरन जागो है।

 

कुंभकरन जागो है।

सात दसक सोयो थो।

अब बहुत भूखो है।

सब कुछ चएतो है

अब कुंभकरन जागो है।॥१॥

***

भारत जन-तंतर भाया,

एक परदान काम करैगो,

परजा जन हक से सोवैगो,

केवल वोट ही देवैगो।

अब कुंभकरन जागो है॥२॥

***

अकर्ण्यता अधिकार इनको

कृष्ण गीता में बोल्ल्यो है।

फल जल्दी मिलनो चाहिये,

संविधान मैं लिख्यो है।

अब कुंभकरन जागो है॥३॥

*****************

सूचना: मित्रों द्वारा वार्तालाप से निकले हुए प्रश्नों के उत्तर मेरी (दूर से पठित) जानकारी की सीमा में मैंने दिए थे। जिसपर आधारित यह संक्षिप्त आलेख प्रश्नोत्तरों की विधा में प्रस्तुत है।

 

प्रश्न (१) क्या आज देश की जनता अधीर है?

हाँ, आज प्रजा अधीर हो चुकी है; और शीघ्रातिशीघ्र प्रगति चाहती है। उसे समस्याओं के समाधान भी शीघ्र गतिवाले चाहिए। आज के आज चाहिए। आप सभी समस्याएँ जानते हैं। मैं यदि गिनाऊं तो आलेख भर जाएगा।

 

प्रश्न: (२) समस्याओं की अभूतपूर्व वृद्धि और हल?

हमारे चींटी की गतिवाले हल, जो भ्रष्ट नौकरशाह सुलझाते हैं, उनका फल जब तक पक कर मिलेगा तब तक समस्याएँ भी दुगुनी-तिगुनी हो जाएगी। समस्याओं की संख्या और मात्रा, दोनों की वृद्धि अति तीव्रता से हो रही है; जो इतिहास में अभूतपूर्व है। (कुछ बदलाव अवश्य लाया जा रहा है।}

 

 

प्रश्न: (३)काम-चोर उद्धत नौकरशाही ?

और दशकों की सुस्त, जड और उद्धत (आदतोंवाली) नौकरशाही की काम-चोर परम्परा से काम निकलवाना है। हड्डियों में भरी उद्धताई और सुस्ती भी अवरोध पैदा करती है। (बदलाव है।}

 

प्रश्न:(४) विरोधी पक्ष साथ क्यों नहीं दे रहे ?

 

परिस्थिति गम्भीर हैं। जो इतिहास में अभूतपूर्व है। साथ विरोधी पक्ष अपने भ्रष्ट कामों के (काला धन) इतिहास को छिपाने के लिए , हर देशोन्नति की बालटी में पैर गडाकर भारी बालटी उठवाने की चुनौती दे रहे हैं।

(The opposition party, instead of providing constructive criticism or effective solutions, simply hinders progress and thus acting as anti-national. – skanda987)

 

प्रश्न:(५) हमारा मतदाता कैसे मत देता है?

 

मतदाता तो की मूर्ख ढपोल शंखों के, कोरे वचनों पर मत देता है। (कुछ ऐसा ही इतिहास है।)

कुछ पढत मूर्ख अपने आप को विद्वान(?) भी समझते हैं। संचार-माध्यम (मिडीया)भी भ्रष्ट(?) है। पाकिस्तान की समस्या, चीन की समस्या, हमारी कश्मिर की समस्या, हमारे प्रवासी भारतीयों की भी, उन देशों की समस्याएँ जहाँ वें काम करते हैं, आतंकवादी, कश्मिर समस्या, कृषकों की आत्महत्त्याएँ इत्यादि इत्यादि अनेक अनगिनत, और अनजान समस्याएँ सामने मुँह फाडे खडी है।

 

प्रश्न:(६) आज समस्याओं का कैसा समाधान काम आएगा?

इस लिए समस्याओं का शीघ्र समाधान हमारा लक्ष्य होना चाहिए. समाधान स्वदेशी हो तो पहले प्रयोग अवश्य हो; पर ऐसा प्रयोग शीघ्रता की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए. अंतिम कसौटी राष्ट्र का हित ही अटल लक्ष्य होना चाहिए.

आज के हल, समाधान या सुलझाव की गति समस्यावृद्धि की गति की अपेक्षा शीघ्र (तीव्र) होनी चाहिए। पर स्वदेश का हित-लाभ अवश्य, पर शीघ्र होना चाहिए.

 

प्रश्न:(७) आज सम्पूर्ण (१०० %) स्वदेशी हल काम नहीं आएंगे क्या?

धीमी गति से समस्याएँ सुलझानेवाली परम्परागत स्वदेशी (यंत्रों)की प्रणाली का उपयोग भी देरी करा कर विफलता का दुःसाहस होगा। आज की स्थिति में, शीघ्र यंत्रों के बिना, तकली के सूत से हाथकरघे पर बना कपडा मात्रा की दृष्टि से, लाभकारी नहीं हो सकता। कपडे की माँग वृद्धिंगत जनसंख्या के अनुपात में ही अपेक्षित है।

 

प्रश्न:(८) क्या आप स्वदेशी का विरोध करते हैं?

यह स्वदेशीका विरोध नहीं; व्यावहारिकता का स्वीकार और विवेक है।

 

 

प्रश्न:(९) तो गांधीजी ने खादी को प्रोत्साहित क्यों किया था?स्वयं तकली पर सूत भी तो काता करते थे?

उस समय गांधीजी स्वतंत्रता के उद्देश्य से व्य़ूह रचना करते दिखाई देते हैं. अंग्रेज़ भारत से कच्ची सस्ती कपास मॅन्चेस्टर ले जाकर वहाँ की मिलों में बुना हुआ कपडा भारत के बाजार में ही महँगा बेचता था। सस्ती कपास भारत की, और उसी भारत को महँगा कपडा? पर ऐसा दोहरा लाभ अंग्रेज़ लेता था। इस अंग्रेज़ के आर्थिक लाभ पर प्रहार करने के लिए गांधीजी ने खादी को प्रोत्साहित किया था। आज की परिस्थिति अलग है। आज खादी स्वैच्छिक व्यक्ति की श्वेच्छापर छोडा जाए. कुछ प्रोत्साहन भी स्वीकार्य है, पर आज खादी का

 

प्रश्न: (१०) क्या दीनदयाल उपाध्याय जी ने इस विषय पर विचार के लिए कोई निर्देश या संकेत दिया है?

उत्तर: दीनदयाल उपाध्याय जी ने स्वदेश हित चिन्तन के लिए, विवेक पर निम्न संकेत दिया है?

*दीनदयाल उपाध्याय : कर्तृत्व एवं विचार* में –डॉ.महेशचंद्र शर्मा: (पी.एच. डी शोध निबंध) * पृष्ठ २८८ पर लिख्ते हैं;

*वे (दीनदयाल जी) किसी वादविशेष से कट्टरतापूर्वक बँधने की बजाय शाश्वत जीवनमूल्यों के प्रकाश में यथासमय आवश्यक परिवर्तन एवं मानवीय विवेक में आस्था रखते (थे)हैं।

 

(११) चिन्तन मौलिक होना चाहिए।

 

मौलिक चिन्तन मूल(जड) तक पहुँचता है। समाधान खोजने में,शोधकर्ता किसी भी विचारधारा से अपने आप को बाँध नहीं लेता। जैसे रोग का निदान करते समय डाक्टर पहले से विशेष रोग को मान कर नहीं चलता। समाधान मिलने पर आप विचारधारा के अंतर्गत हल को संभव हो, तो, प्राथमिकता (वरीयता) दे सकते हैं। कभी कभी यह संभव नहीं होगा। स्वदेश का हित मात्र दृष्टव्य सदैव होना चाहिए।

 

आज का नारा है-शीघ्रता।

यदि हम शीघ्रता से समस्याओं को हल नहीं करेंगे, तो काल कवलित हो जाएँगे।

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Last lines of a poem at:

https://skanda987.wordpress.com/2011/04/09/%e0%a4%93-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%82/

 

ओ भारतके पुत्रों ओ ऋषियोंके पूत्रों ।

ये अंधेरी दुनियाका अंधेरा तुम दूर करो ॥46॥

गीता चिराग ले कर उपनिषद् चिराग ले कर ।

घरसे बहार आओ जगका अंधियारा दूर करो ॥47॥

दिया मत छुपाओ बहुत अंधेरा है ।

कहते हैं रामानुज और मध्वाचार्यजी ॥48॥

और भक्तिवेदान्त स्वामि श्री प्रभुपादजी ।

राम कृष्ण जय हो राम कृष्ण जय हो ॥49॥

सनातन धर्म जय हो सनातन धर्म जय हो ।।

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