From: Vinod Kumar Gupta < >

कैसे हो सशक्त भारत का निर्माण..

दुनिया में हमारे देश भारत के समान शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहां के  नागरिक दशको से आतंक से उत्पीड़ित होते रहें, पिटते व मरते रहें फिर भी पाक प्रायोजित व संरक्षित आतंकवाद पर हमारे देश के सत्ता प्रतिष्ठानों में किसी प्रकार का रोष , प्रतिकार, संघर्ष व आक्रामकता का भाव ही नही जागे। परिणामस्वरुप अत्याचारों को सहना आज हमारी विवशता बनती जा रही है । सन् 47 में कश्मीर की हज़ारो वर्ग किलोमीटर भूमि खो देने के बाद उस पर पुनः अधिकार पाने कि इच्छाशक्ति जुटाने में हम असफल रहें है । आज भी पाकिस्तान उस पर गैर कानूनी रुप से काबिज है और हमें शर्मसार करे हुए है। जबकि पूरी दुनिया को यह पता होना चाहिए कि  कश्मीर हमारा  अभिन्न अंग है ।

वह कौनसी मानसिकता थी जो 1947 में मुजफ़्फराबाद(पीओके) की ओर बढ़ती हुई सेनाओं को उडी में रोक देती है , जो 1965 में लाहौर पर कब्जा नहीं करती बल्कि हाजीपीर व उड़ी-पुंछ आदि सेक्टर को वापसी पाने पर भी ताशकंद जैसे समझौतों में छोड़ देती है , जो 1971 में बंग्ला देश तो बनवा देती है पर अपना कश्मीर का भाग वापस नहीं लेती और जो 1999 में कारगिल की दुर्गम पहाड़ियों में अपनी सेना के सैकड़ो होनहार युवा अधिकारियों व सैनिकों के बलिदान होने पर भी हाथ आये शत्रु सैनिको पर प्रहार न करने के लिए विवश कर देती है। वह कौन सी सोच थी जब  2001 में संसद पर आतंकी हमला हुआ औ उसके बाद आर -पार के युद्ध की ललकार के साथ सीमाओँ पर सेना को तैनात कर दि
या गया परंतु  लगभग 11 माह बाद उनको बिना कुछ क्रिया किये वहां से वापस मार्च करवाने का निर्णय लिया गया ?  हम कब तक वार्ताओं के पटल पर हज़ारो सुरक्षाकर्मियों व नागरिको के बलिदानों को भूलते रहेंगे ?

कब तक  हम केवल सीमाओं पर अनगिनत सैनिको की लाशें उठाते रहें और आतंकी हमलो में मारे गए हज़ारो नागरिको का दाह-संस्कार के बाद  निंदा व भर्त्सना करके मोमबत्ती जला कर ‘कैडल मार्च’ द्वारा अपना दायित्व निभाते रहे ? क्या धैर्य की कोई सीमा नहीं होती ? निरंतर रक्षात्मक नीतियों पर चल कर केवल वार्ताओं में ही समस्याओं का समाधान खोजने का एक तरफ़ा प्रयास क्या सफल हो पायेगा ? पड़ोसी देश से आदर्श मित्रता का अर्थ दोनों में सद्भाव बने और दोनों ही मित्रता के लिए प्रयास करे। अन्यथा मित्रता आत्मघाती होगी ।

पिछले 30-35 वर्षो में सैकड़ो वार्ताओं में हमने कभी भी अपने खोये हुए कश्मीर (पीओके) की मांग नही करी, जबकि उसके लिए हमें कठोर व्यवहार करके उसे वापस अपने अधिकार में लेने के लिए गंभीर होना चाहिए था। हमारी इसी कमजोरी का लाभ उठा कर पाकिस्तान ने विभिन्न वार्ताओं के दौरान  आतंकी हमले व युद्ध-विराम उल्लंघन करके हमारी पीठ में छुरा घौपने में कोई कसर नहीं छोडी।हम कब तक पाकिस्तान को समझाने के लिए कागजो के बंडलों ‘डोजियरों’ को भेज कर (2008) मुम्बई व  पठानकोट आदि आतंकी हमलो में पाकिस्तानियों की संलिप्ता के प्रमाण दे कर औपचारिकताओ का निर्वाह करते रहेंगे ?

हमको “परमाणु युद्ध” की भयावहता की चिंता तो है पर यह नहीं सोचते कि दिन-प्रति-दिन आतंकी दहशत से तो छुटकारा मिलें और सीमाओं पर सैनिकॉ के सिर कटने का सिलसिला तो थमे।जब पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री (जुल्फिकार अली भूट्टो) “एक हज़ार वर्ष तक लड़ने” की सोच रखते रहे और हमारे पूर्व प्रधानमंत्री (डॉ.मनमोहनसिंह)  “हज़ार घाव खा कर भी टूटेंगे नहीं” की सोच,  तो भी हम आक्रामक नहीं होते ? हम क्यों बार- बार अपमानित होकर भी अमरीका आदि देशों के समक्ष पाकिस्तानी आघातों का रोना रोकर अपने बचाव के लिये गिड़गिडाते रहे ? आत्मरक्षार्थ कीट-पतंगे भी पलटवार करते हैं , लेकिन सैकड़ो घाव झेलने के बाद भी  हज़ार घावों को और झेलने पर भी शायद हमारे सत्ताधारी राजमद में सुस्त और मस्त रहें। क्या इसप्रकार लोकतंत्र के ढ़ोंग में हम अपनी कमजोरियां नही छिपा रहे ?

इस लोकतांत्रिक व्यवस्था ने ऐसा वातावरण बना दिया है जिससे राजनैतिक, धार्मिक और जातीय धुर्वीकरण  बढ़ जाने से  पाकिस्तान व आतंकवाद के विरुद्ध प्रभावी कार्यवाही करने में सत्ताधारियों की कोई  इच्छा ही नही दिखती ? सत्ताओं ने राष्ट्रीय हित, राष्ट्रीय अस्मिता व राष्ट्रीय स्वाभिमान को मतदाताओं के सौदागरों की भेंट चढ़ा दिया है । जब तक राजनीति में कोई  ठोस वैचारिक आदर्श नहीं होगा तब तक  “राष्ट्रीय नीति” का आधार कैसे निर्मित होगा ?

निसंदेह ऐसा सोचा जा सकता है कि हमारा राष्ट्र कमजोर शासन परंतु सशक्त समाज वाला राष्ट्र है जो राष्ट्रीय हितो के लिए अपनी क्षमताओं का सदुपयोग नहीं कर पा रहा। क्या हम आतंकवाद से नहीं लड़ सकते ? क्या हम पाकिस्तान मे चल रहें आतंकियों के प्रशिक्षण केंद्रों को ध्वस्त नहीं कर सकते ? क्या हम पाक द्वारा अवैध रुप से कब्जायें गए 78114 वर्ग किलोमीटर कश्मीरी क्षेत्र को पुनः पाने के लिए अपनी क्षमताओं का प्रयोग नहीं कर सकते ? उसमें से पाक द्वारा चीन को 5180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र देने पर भी हमको लज्जा नहीं आती , जबकि हम यह भूलने को विवश हो रहें है कि कश्मीर के 37555 वर्ग किलोमीटर भूभाग को चीन ने सन् ’62 के युद्ध में जीता था और वह अभी भी उसके कब्जे में है।

क्या हम अमरीका द्वारा ऐवटाबाद (पाक) में मारे गए ओसामा के समान दाऊद इब्राहिम, अजहर मसूद व हाफिज सईद आदि मोस्ट वांटेड आतंकियों को नहीं मार सकते ? ध्यान रहे एक बार हमारे जनरल वी. के. सिंह (जो आज केंद्रीय सरकार में राज्य मंत्री है) ने कहा था कि हमारी सेनायें ऐवटाबाद जैसी कार्यवाही करने में सक्षम है, पर क्या हम अपनी सक्षमता का उपयोग करने की इच्छाशक्ति रखते है ? इस सत्य को छुपाया नहीं जा सकता कि सेनायें उतनी ही शक्तिशाली होती है जितनी हमारी राजनैतिक इच्छाशक्ति। परंतु सेनायें सत्ताधारियों के निर्देशो का पालन करने को बाध्य होती है, तभी वे शत्रुओं द्वारा अपने साथियों के सिर काटे जाने जैसे जघन्य काण्डों का भी बदला लेने के लिये क्रोध और आंसुओं के घूंट पीने को विवश होते है।ऐसी आत्मघाती और नपुंसक रणनीति कौन सी सैन्य नीति का भाग है ।

आज भारत की जनता आंतरिक सुरक्षा के साथ साथ “राष्ट्रीय स्वाभिमान”  के साथ जीना चाहती है । वे अस्थिरता की ओर बढ़ रहें पाकिस्तान की हेकडी से आहत है । उसे अपना खोया हुआ कश्मीर चाहिये, चाहे उसके लिए युद्ध छिड़ जाये पर नित्य होने वाले झगड़ों से तो निपटारा होगा।जब हमारा संविधान का अनुच्छेद 355  सभी नागरिकों की बाहरी व आंतरिक सुरक्षा की गारंटी देता है तो सरकार को अपना दायित्व निभाने में कैसा संकोच ? राष्ट्रवादियों ने राष्ट्र के सम्मान की रक्षा के लिए ही तो श्री नरेंद मोदी की आक्रामकता को ध्यान में रखकर उन्हें अपने देश का प्रधानमंत्री चुना था। दो वर्षो से जिस आक्रामकता की मोदी जी से आशा व प्रतीक्षा थी उसका सन्देश  70 वें स्वतंत्रता दिवस पर सुनने को मिला।अब उसे सार्थक करके भारत की “साफ्ट स्टेट ” की धूमिल छवि को हटा कर भारतीय स्वाभिमान को जगाना होगा।

भारत के पास प्रचंड सामर्थ्य है,  सेनाओं में पराक्रम की कोई कमी नहीं एवं राष्ट्रवादियों में मातृभूमि के लिए कुछ कर गुजरने का उत्साह किसी आह्वान की प्रतीक्षा में अधीर हो रहा है। जबकि पाकिस्तान आंतरिक रुप से टूट चूका है और अमरीकी डॉलर व चीन के दम पर पल रहा है। ऐसे में शीर्षासन पर बैठे मोदी जी को अब आँखों में आँखे डाल कर बातें करने के स्थान पर पूरी रुपरेखा के अनुसार शेष कश्मीर को वापस पाने व आयतित आतंकवाद (पाकिस्तान आदि द्वारा निर्यात )  को समाप्त करने के लिए आक्रामक नीतियां अपनानी होगी।

इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण निर्णय भी आवश्यक है जैसे पाकिस्तान को मोस्ट फेवरेट नेशन (MFN) न माना जाय और  समझौता एक्सप्रेस, दिल्ली-लाहौर बस सेवा व अन्य जितने भी भारत-पाक यात्रा के रेल व सड़क मार्ग है सभी को प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिये। सांस्कृतिक, फ़िल्मी व खेल आदि के नाम पर आये  हुए सभी पाकिस्तानियों को निसंकोच देश से निकाला जाये और भविष्य के लिए इस पर भी प्रतिबंध लगें। भारत की सम्पूर्ण सीमाओं पर घुसपैठियों  व आतंकियों को रोकने के प्रभावी उपाय किये जाए। सीमा क्षेत्रों में अवैध मस्ज़िद व मदरसो पर न्यायायिक कार्यवाही करके उनको ध्वस्त किया जाये। देश में सरकार द्वारा घोषित 90 मुस्लिम बहुल जिलों में ही पिछले  30 वर्षो के पुलिस व गुप्तचर विभागों के अभिलेखों का ब्यौरा (रिकार्ड्स) देखें  तो उसमें  नकली करेंसी, अवैध हथियार, नशीले पदार्थ व अन्य देशद्रोही घटनाओं में लिप्त पाये जाने वाले अपराधी अधिकाँश मुसलमान ही मिलेंगे। इन सबके पीछे  अहम भूमिका में पाक गुप्तचर संस्था (आई एस आई ) व कुछ आतंकी संगठन ही है , जो दशको से भारत विरोधी षड्यंत्र रचते आ रहे है। अनेक अवसरों पर पकडे जाने वाले ऐसे आतंकी व अन्य अपराधी पकडे जाने के बाद भी न्यायायिक प्रक्रिया में अनेक कमियां होने से छूटते रहते है और फिर  पकडे जाने व छूटने का सिलसिला कुछ वर्षो तक चलता है।धीरे धीरे ऐसे आतंकी तत्व अपनी पहचान छिपाने में सफल होकर सुरक्षित हो जाते है। ऐसे तत्वों से देश की बाहरी व आंतरिक सुरक्षा के लिए  सरकार को कठोरता से निपटना होगा।ऐसे देशद्रोहियों के फैले हुए नेटवर्क और ओवर ग्राउंड वर्कर(OGW) जो दीमक के समान चुपचाप राष्ट्र को खोखला करने में लगे हुए है , के भेद खुलने से शत्रुओं के षडयंत्रो पर अंकुश लगाया जा सकता है।

अतः इन विषम परिस्थितियों और समस्याओं  को सफलता पूर्वक  नियंत्रित करने के लिए सर्वप्रथम राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री और उनके साथियों को गांधी-नेहरु की पाकपरस्त  व मुस्लिम उन्मुखी राजनीति की  छाया से बाहर निकलना होगा । तभी भारतीय  मूल्यों का सम्मान करने वाले वर्तमान सत्ताधारी “शठे शाठ्यम समाचरेत” ( दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार) का पालन करते हुए सशक्त व समर्थ भारत का निर्माण कर  पायेंगे । मोदी जी का जुमला भी तभी सार्थक होगा जब वे शत्रु को “उसी की भाषा में समझाने” का राष्ट्र से किया गया  “वचन” पूरा करेंगे ?

धन्यवाद
भवदीय
विनोद कुमार सर्वोदय
गाज़ियाबाद

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